{
  "type": "article",
  "title": "लैब टेस्टिंग के प्रस्तावित नियमों पर विवाद, पशु अधिकार कार्यकर्ता अजय जो ने निगरानी और खरीद व्यवस्था पर जताई चिंता",
  "summary": "प्रयोगशालाओं में जानवरों के इस्तेमाल से जुड़े प्रस्तावित सरकारी ड्राफ्ट पर पशु अधिकार कार्यकर्ता अजय जो ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने खुले बाजार से खरीद की आशंका, लैब की आंतरिक कमेटियों को छूट और गैर-पशु परीक्षण तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया है।",
  "content": "प्रयोगशालाओं में जीव-जंतुओं के उपयोग को लेकर तैयार किए गए नए सरकारी ड्राफ्ट पर देश भर में बहस छिड़ गई है। पशु अधिकार कार्यकर्ता और रेस्क्यूअर अजय जो ने इन प्रस्तावित बदलावों पर गहरी आपत्ति जताई है। उनका मानना है कि अगर यह मसौदा मौजूदा रूप में लागू हुआ, तो शोध संस्थानों और प्रयोगशालाओं में जानवरों पर प्रयोग करने की प्रक्रिया पहले की तुलना में काफी सरल हो जाएगी। इससे वैज्ञानिक जांच के नाम पर इस्तेमाल होने वाले जीवों का दायरा बढ़ सकता है। उनका कहना है कि पहले इस तरह के प्रयोगों के लिए कड़े नियम तय थे, जबकि नए प्रस्तावों में लैब्स को अपनी आंतरिक समितियां बनाकर कई महत्वपूर्ण निर्णय खुद लेने की व्यापक छूट मिल सकती है, जिससे जवाबदेही और निगरानी कमजोर पड़ने का अंदेशा है।\n\nअजय जो के अनुसार, पूर्व व्यवस्था में मुख्यतः छोटे आकार के जीवों पर ध्यान केंद्रित रहता था, किंतु नए मसौदे के तहत बड़े जानवरों और वन्यजीवों को शामिल किए जाने की संभावनाओं ने नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। इस बदलाव से जानवरों की खरीद-फरोख्त और बाजार में उनकी मांग बढ़ने का जोखिम पैदा हो सकता है। ऐसे व्यापारी और बिचौलिए जो जीवों के प्रजनन और अनौपचारिक व्यापार में शामिल हैं, वे इस छूट का अनुचित लाभ उठाने की कोशिश कर सकते हैं। हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि किसी प्रस्तावित मसौदे की व्यावहारिक व्याख्या और उसके दुरुपयोग की आशंकाओं के बीच कानूनी संतुलन को समझना भी उतना ही आवश्यक है।\n\nजीवों की आपूर्ति व्यवस्था और अनियंत्रित बाजार का जोखिम\nप्रस्तावित ड्राफ्ट को लेकर उठाई गई सबसे बड़ी आपत्तियों में यह बिंदु शामिल है कि प्रयोगशालाओं को परीक्षण के लिए जीव आखिर कहां से प्राप्त होंगे। अजय जो ने रेखांकित किया कि मौजूदा व्यवस्था में केवल विशेष रूप से पंजीकृत और अधिकृत ब्रीडिंग केंद्रों से ही जीवों की आपूर्ति की अनुमति रहती है, जहां एक तय और नियमित निगरानी तंत्र काम करता है। इसके विपरीत, चर्चा में आए नए बदलावों के तहत यदि पंजीकृत ब्रीडर्स के पास जीव उपलब्ध न हों, तो विशिष्ट परिस्थितियों में फार्म वाले जानवरों, पक्षियों और मछलियों को खुले बाजार से खरीदने की अनुमति का प्रावधान सामने आया है।\n\nअजय जो ने आशंका व्यक्त की कि खुले बाजार की अनुमति मिलने से अवैध रूप से जीवों को पकड़ने और बेचने वाले बिचौलियों का नेटवर्क सक्रिय हो सकता है। उन्होंने बताया कि पुरानी दिल्ली समेत कई शहरी इलाकों में रात के समय खरगोश और चूहे खुलेआम बिकते देखे जाते हैं। यदि नियमों में ढिलाई बरती गई तो इस अवैध कारोबार को अप्रत्याशित बढ़ावा मिल सकता है। उन्होंने सवाल किया कि प्रयोगशालाओं के पास यह जांचने का क्या स्वतंत्र पैमाना होगा कि कोई विक्रेता वास्तव में अधिकृत रूप से ब्रीडिंग कर रहा है या फिर आवारा और सड़कों से जानवरों को पकड़कर आपूर्ति कर रहा है। यह खतरा केवल चूहों या खरगोशों तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़े जानवरों की श्रेणी में आवारा कुत्तों, बिल्लियों और वन्यजीवों की सुरक्षा भी सीधे तौर पर प्रभावित हो सकती है।\n\nआंतरिक समितियों के अधिकार और निरीक्षण की निष्पक्षता\nप्रस्तावित मसौदे का दूसरा संवेदनशील पहलू लैबोरेटरीज की आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा है। अजय जो का तर्क है कि यदि किसी संस्थान को अपनी आंतरिक समिति गठित करके जानवरों पर होने वाले प्रयोगों से जुड़े फैसले लेने की पूरी छूट दे दी जाएगी, तो निष्पक्ष मूल्यांकन संभव नहीं रह पाएगा। समिति में शामिल सदस्य उसी संस्थान के प्रबंधन और उच्च अधिकारियों के अधीन कार्य करते हैं, जिससे यह स्वाभाविक खतरा बना रहता है कि वे बेजुबान जीवों के संरक्षण के बजाय संस्थान की प्राथमिकताओं और शोध लक्ष्यों को तरजीह देंगे।\n\nइसके अलावा निरीक्षण से पहले प्रयोगशाला को पूर्व सूचना देने के नियम पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। अजय जो का कहना है कि जब किसी लैब को पहले से पता होगा कि निरीक्षण दल कब आ रहा है, तो वह अपने परिसर को कागजों और नियमों के अनुकूल व्यवस्थित कर लेगी। ऐसी स्थिति में जीवों के रहने की वास्तविक दशा, उनकी खानपान संबंधी देखरेख और परीक्षणों के दौरान झेले जाने वाले कष्ट का यथार्थवादी आकलन कर पाना लगभग असंभव होगा। उनका कहना है कि निरीक्षण की प्रणाली पूरी तरह स्वतंत्र, औचक और प्रभावी होनी चाहिए, क्योंकि केवल नियमावली बना देने भर से जीवों का वास्तविक संरक्षण सुनिश्चित नहीं हो सकता।\n\nपरीक्षणों के दौरान शारीरिक यातना और दर्द का स्तर\nवैज्ञानिक प्रयोगों के दौरान जीवों को होने वाले शारीरिक और मानसिक कष्ट का मुद्दा हमेशा से संवेदनशील रहा है। अजय जो ने कहा कि आम समाज को इस बात का बहुत कम भान होता है कि चारदीवारी के भीतर जीवों पर किस तरह की प्रक्रियाएं आजमाई जाती हैं। प्रयोगों के दौरान जीवों को स्थिर रखने के लिए बांधा जाता है, कई बार विशेष ढांचों में लटकाया जाता है और लंबे समय तक अत्यधिक दबाव व तनावपूर्ण परिस्थितियों में रखा जाता है।\n\nदवाइयों, रसायनों और कॉस्मेटिक से जुड़े परीक्षणों में पदार्थों को जीवों की आंखों, श्लेष्मा झिल्लियों और त्वचा के विभिन्न हिस्सों पर लगाया जाता है, जिसके बाद उन्हें सीमित स्थानों में लंबे समय तक रखा जाता है। अजय जो ने तर्क दिया कि मनुष्य अपनी तकलीफ शब्दों में बयां कर सकता है, लेकिन बेजुबान जीव अपनी वेदना नहीं कह सकते। ऐसे में यह तय करने का एकाधिकार केवल प्रयोगकर्ता वैज्ञानिकों के पास छोड़ देना न्यायसंगत नहीं है। उनका मानना है कि किसी जीव की पीड़ा का आकलन करने के लिए उसके शारीरिक हाव-भाव और व्यवहार संबंधी संकेतों को भी नियामक आधार बनाया जाना चाहिए।\n\nदर्द की श्रेणियों का वैज्ञानिक वर्गीकरण और उसकी सीमाएं\nप्रस्तावित मसौदे में परीक्षणों को माइल्ड, मॉडरेट और सीवियर यानी हल्के, मध्यम और गंभीर दर्द की श्रेणियों में वर्गीकृत करने का प्रस्ताव रखा गया है। इसका उद्देश्य किसी प्रयोग के दौरान जीव को होने वाले संभावित दर्द के स्तर को पहले से आंकना है। किंतु पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि दर्द की अनुभूति को ऐसी श्रेणियों में बांटने का पैमाना पूरी तरह व्यक्तिपरक हो सकता है।\n\nअजय जो का कहना है कि दर्द आखिर दर्द होता है, चाहे किसी जीव के शरीर में सुई या ट्यूब डाली जा रही हो अथवा उसे जलने जैसी गंभीर चोट से गुजरना पड़ रहा हो। उन्होंने सवाल किया कि लैब में बैठकर कोई वैज्ञानिक यह कैसे तय कर सकता है कि कौन सा कष्ट किसी जीव के लिए हल्का है और कौन सा मध्यम। उनका आग्रह है कि वैज्ञानिक अनुसंधान को जानवरों पर नए प्रयोग थोपने के बजाय ऐसे आधुनिक और तकनीकी विकल्प खोजने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जिससे परीक्षणों में जीवित प्राणियों के उपयोग की अनिवार्यता ही समाप्त हो जाए।\n\nपरीक्षण समाप्त होने के बाद जीवों की देखभाल और जीवन रक्षा\nशोध प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद जीवित बचे प्राणियों का भविष्य क्या होगा, यह इस विवाद का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्तमान व्यवस्था में प्रयोग से गुजर चुके जीवों की आजीवन देखभाल का दायित्व तय किया गया है। अजय जो का स्पष्ट कहना है कि जिन जीवों ने वैज्ञानिक अनुसंधानों के लिए कष्ट उठाया है, उनकी शेष जिंदगी की देखरेख की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी प्रयोगशाला को ही उठानी चाहिए।\n\nइसके विपरीत, प्रस्तावित बदलावों में परीक्षण के बाद जीवों को दोबारा किसी अन्य प्रयोग में इस्तेमाल करने या फिर इच्छामृत्यु यानी यूथेनेशिया देने की संभावनाओं पर उन्होंने कड़ा ऐतराज जताया है। उनका कहना है कि लागत और रखरखाव का खर्च बचाने के नाम पर स्वस्थ हो सकने वाले जीवों को यूथेनेशिया देना अनुचित है। यदि कोई जीव प्रयोग के उपरांत सामान्य जीवन जी सकता है, तो संस्थान को उसके रहने की व्यवस्था करनी चाहिए अथवा उसे पशु प्रेमियों द्वारा गोद लिए जाने का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।\n\nजीवों का मानसिक स्वास्थ्य और आवास की परिस्थितियां\nलैब में रखे जाने वाले जीवों के संदर्भ में सामान्यतः केवल उनके शारीरिक घावों की बात की जाती है, किंतु अजय जो के अनुसार उनके मानसिक स्वास्थ्य को समझना भी उतना ही गंभीर विषय है। जानवर भी अलगाव, भय, अवसाद और मानसिक आघात से पीड़ित होते हैं। लंबे समय तक संकरे पिंजरों में बंद रहना, अपनी ही प्रजाति के अन्य साथियों से अलग रखा जाना और लगातार कृत्रिम रोशनी व रसायनों का सामना करना उनके सामान्य व्यवहार को पूरी तरह विकृत कर देता है।\n\nअजय जो ने रेखांकित किया कि प्रत्येक जीव के लिए खुली जगह, सामाजिक मेलजोल, समुचित पोषण और नियमित देखरेख बुनियादी जरूरतें हैं। उन्होंने देश की कई गौशालाओं और शेल्टरों में होने वाली अव्यवस्था, भोजन के अभाव और भीड़भाड़ का उदाहरण देते हुए कहा कि केवल नीतियां बना देने से सुधार नहीं आता, जब तक कि जमीनी स्तर पर सख्त निगरानी और जवाबदेही तय न की जाए।\n\nप्रतिबंधों के बावजूद नियमों के उल्लंघन की चिंताएं\nभारत में सौंदर्य प्रसाधनों यानी कॉस्मेटिक्स के परीक्षण के लिए जानवरों के इस्तेमाल पर 2014 से ही कानूनी रोक लागू है, और यूरोपीय संघ में भी इस प्रकार के परीक्षण पूरी तरह प्रतिबंधित हैं। इसके बावजूद नए मसौदे से यह आशंका गहरा रही है कि ढीले नियमों की आड़ में इन पाबंदियों का दुरुपयोग हो सकता है।\n\nअजय जो ने हिमाचल प्रदेश के बद्दी औद्योगिक क्षेत्र का संदर्भ देते हुए कहा कि वहां बड़ी संख्या में फार्मास्युटिकल कंपनियां कार्यरत हैं, किंतु औद्योगिक कचरे और मेडिकल वेस्ट के निस्तारण को लेकर पहले से ही गंभीर सवाल उठते रहे हैं। घग्गर नदी में गिरते कचरे ने स्थानीय पर्यावरण को भारी क्षति पहुंचाई है। उनका तर्क है कि जब वर्तमान में मौजूद प्रदूषण और सुरक्षा नियमों को लागू कराना ही प्रशासनिक स्तर पर कठिन सिद्ध हो रहा है, तो लैब नियमों में ढील देने से पर्यावरण और जीवों दोनों के लिए नए संकट खड़े हो सकते हैं।\n\nआधुनिक तकनीक, AI और वैकल्पिक परीक्षण विधियों का मार्ग\nजीवों पर निर्भरता घटाने के लिए अजय जो ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक्स को अत्यंत प्रभावी विकल्प बताया। दुनिया भर में वैज्ञानिक पद्धतियां तेजी से बदल रही हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) ने वर्ष 2035 तक रासायनिक परीक्षणों में स्तनधारी जीवों के उपयोग को पूरी तरह समाप्त करने का आधिकारिक लक्ष्य तय किया है। अजय जो का मानना है कि भारत को इस दिशा में कदम उठाने के लिए 2035 तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि तुरंत अपनी घरेलू तकनीक और स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित करना चाहिए।\n\nअजय जो ने रेखांकित किया कि जानवरों पर किए जाने वाले परीक्षणों में से 90 से 95 प्रतिशत से अधिक परीक्षण तब पूरी तरह विफल हो जाते हैं, जब वे इंसानों पर क्लीनिकल ट्रायल के चरण में पहुंचते हैं। मानव शरीर और जानवरों की शारीरिक व आनुवंशिक संरचना में मूलभूत अंतर होता है, जिसके चलते जानवरों पर सुरक्षित दिखने वाली औषधि भी इंसानों पर अप्रभावी या घातक सिद्ध हो सकती है। कंप्यूटर मॉडलिंग, सेल कल्चर और मानव ऊतक आधारित आधुनिक गैर-पशु परीक्षण तकनीकें इंसानी प्रभाव का कहीं अधिक सटीक पूर्वानुमान लगा सकती हैं।\n\nप्राचीन परंपरा और जनता की सहभागिता\nअजय जो ने ध्यान दिलाया कि भारत का चिकित्सा और वैज्ञानिक इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है। सम्राट अशोक के शासनकाल में पशुओं के उपचार के लिए समर्पित चिकित्सालयों की स्थापना के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं। भारत को अपनी इसी करुणापूर्ण परंपरा से प्रेरणा लेकर वैज्ञानिक प्रगति और प्राणी संरक्षण के बीच सामंजस्य स्थापित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि गैर-पशु तकनीकों को अपनाने में मुख्य बाधा केवल बजट या तकनीक की नहीं, बल्कि शोधकर्ताओं, कंपनियों और नीति निर्धारकों की मानसिकता की भी है।\n\nइस मसौदे को लेकर आम नागरिकों की भागीदारी को निर्णायक बताते हुए अजय जो ने अपील की कि वे इस प्रस्तावित नीति का अध्ययन करें। इस मसौदे पर अपने सुझाव और आपत्तियां 5 नवंबर से पहले सरकार के समक्ष दर्ज कराई जा सकती हैं। आम नागरिक अपने आधिकारिक विचार ईमेल के माध्यम से cpcsea-mef@gov.in पर भेज सकते हैं, ताकि पशु अधिकारों की रक्षा के लिए एक पारदर्शी और संवेदनशील नीति तैयार हो सके।\n\nइसका आप पर असर\nप्रयोगशालाओं में जानवरों के इस्तेमाल से जुड़े प्रस्तावित नियम सीधे तौर पर वैज्ञानिक शोध, दवा परीक्षण और पशु संरक्षण की नीतियों को प्रभावित करते हैं।\n\n• दवाइयों और टीकों की सुरक्षा पर असर: पशुओं पर सफल रहने वाले 90 से 95 प्रतिशत परीक्षण इंसानी क्लीनिकल ट्रायल में असफल हो जाते हैं। इससे नई दवाओं के परीक्षण में आधुनिक सेल कल्चर और AI तकनीकों को बढ़ावा मिलने से इंसानों के लिए अधिक सटीक परिणाम मिल सकेंगे।\n• आवारा और खुले बाजार के जीवों का जोखिम: खुले बाजार से जीवों की खरीद की छूट मिलने पर गली-मोहल्लों के आवारा जानवरों और अवैध ब्रीडर्स का दखल बढ़ सकता है। यदि निगरानी सख्त नहीं रही तो नागरिकों के पालतू और लावारिस पशुओं की सुरक्षा पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है।\n• नागरिकों की राय भेजने की समयसीमा: आम नागरिक 5 नवंबर से पूर्व इस प्रस्तावित ड्राफ्ट पर अपने आधिकारिक सुझाव और आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं। इसके लिए संबंधित सरकारी समिति के आधिकारिक ईमेल पते cpcsea-mef@gov.in पर अपनी राय भेजी जा सकती है।\n• आधुनिक विज्ञान और स्टार्टअप्स के अवसर: पशु परीक्षण पर निर्भरता घटने से देश के बायोटेक स्टार्टअप्स को नॉन-एनिमल टेस्टिंग टूल्स विकसित करने का अवसर मिलेगा। इससे भारतीय शोध संस्थानों में रोबोटिक्स और कंप्यूटर मॉडलिंग के क्षेत्र में नए तकनीकी रास्ते खुलेंगे।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह विवाद भारत सरकार द्वारा प्रयोगशालाओं में जीवों के उपयोग से संबंधित नियमों में व्यापक संशोधन का ड्राफ्ट जारी करने के बाद उत्पन्न हुआ है।\n\n• नियमों में प्रस्तावित छूट: प्रस्तावित मसौदे में प्रयोगशालाओं को अपनी आंतरिक कमेटियों के माध्यम से निर्णय लेने की स्वायत्तता देने और विशिष्ट स्थितियों में खुले बाजार से जीव खरीदने की अनुमति पर विचार किया जा रहा है। इसी संभावित ढील के कारण पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने निगरानी तंत्र कमजोर होने की आशंका जताई है।\n• दवा परीक्षण की ऐतिहासिक विफलता दर: शोधों में देखा गया है कि जानवरों और इंसानों की जैविक संरचना भिन्न होने के कारण 90 से 95 प्रतिशत परीक्षण इंसानों पर विफल हो जाते हैं। इसी वैज्ञानिक सीमा के चलते दुनिया भर में गैर-पशु मॉडल्स को अनिवार्य करने की मांग तेज हो रही है।\n• वैश्विक तकनीकी बदलाव: अमेरिका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) द्वारा 2035 तक रासायनिक परीक्षणों में स्तनधारियों के उपयोग को समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया है। वैश्विक स्तर पर आ रहे इस बदलाव के मद्देनजर भारत में भी पशु प्रयोगों के विकल्प के रूप में AI और रोबोटिक्स को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है।\n• सुझाव प्रक्रिया की अंतिम तिथि: सरकार ने इस मसौदे पर आम जनता और हितधारकों से 5 नवंबर तक सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की हैं, जिसके चलते यह विषय सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में आया है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. लैब टेस्टिंग के नए ड्राफ्ट को लेकर मुख्य विवाद क्या है?\nमुख्य विवाद प्रयोगशालाओं को अपनी आंतरिक कमेटी बनाकर फैसले लेने की छूट देने और पंजीकृत ब्रीडर्स न मिलने पर खुले बाजार से जानवर खरीदने की संभावित अनुमति को लेकर है।\n\n2. अजय जो ने जानवरों की खरीद को लेकर क्या आशंका जताई है?\nउन्होंने आशंका जताई है कि खुले बाजार से खरीद की अनुमति मिलने से अवैध बिचौलिए सक्रिय हो सकते हैं, जिससे आवारा पशुओं और वन्यजीवों को पकड़कर बेचे जाने का खतरा बढ़ जाएगा।\n\n3. जानवरों पर होने वाले परीक्षणों की विफलता दर कितनी बताई गई है?\nअजय जो के अनुसार, जानवरों पर सफल रहने वाले परीक्षणों में से 90 से 95 प्रतिशत से अधिक परीक्षण इंसानी क्लीनिकल ट्रायल के दौरान पूरी तरह विफल हो जाते हैं।\n\n4. जानवरों पर प्रयोग के विकल्प के रूप में किन तकनीकों का सुझाव दिया गया है?\nजानवरों पर निर्भरता खत्म करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, कंप्यूटर मॉडलिंग और सेल कल्चर जैसी आधुनिक गैर-पशु तकनीकों को अपनाने का सुझाव दिया गया है।\n\n5. अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी ने एनिमल टेस्टिंग को लेकर क्या लक्ष्य रखा है?\nअमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) ने 2035 तक रासायनिक परीक्षणों में स्तनधारी जीवों के इस्तेमाल को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।\n\n6. आम नागरिक इस ड्राफ्ट पर अपने सुझाव कब तक और कहां भेज सकते हैं?\nआम नागरिक 5 नवंबर से पहले अपने सुझाव और आपत्तियां ईमेल आईडी cpcsea-mef@gov.in पर भेज सकते हैं।",
  "url": "https://trendkia.com/national/lab-testing-ke-prastavit-niyamo-par-vivad-pashu-adhikar-karyakarta-ajay-joe-ne-nigrani-aur-kharid-vyavastha-par-jatai-chinta-54453",
  "category": "भारत",
  "publishedAt": "2026-11-01",
  "tags": [
    "लैब टेस्टिंग",
    "अजय जो",
    "पशु अधिकार",
    "एनिमल टेस्टिंग नियम",
    "वैज्ञानिक शोध",
    "आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस",
    "क्लीनिकल ट्रायल"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia",
  "whatItMeansForYou": "प्रयोगशालाओं में जानवरों के इस्तेमाल से जुड़े प्रस्तावित नियम सीधे तौर पर वैज्ञानिक शोध, दवा परीक्षण और पशु संरक्षण की नीतियों को प्रभावित करते हैं।\n\n• दवाइयों और टीकों की सुरक्षा पर असर: पशुओं पर सफल रहने वाले 90 से 95 प्रतिशत परीक्षण इंसानी क्लीनिकल ट्रायल में असफल हो जाते हैं। इससे नई दवाओं के परीक्षण में आधुनिक सेल कल्चर और AI तकनीकों को बढ़ावा मिलने से इंसानों के लिए अधिक सटीक परिणाम मिल सकेंगे।\n• आवारा और खुले बाजार के जीवों का जोखिम: खुले बाजार से जीवों की खरीद की छूट मिलने पर गली-मोहल्लों के आवारा जानवरों और अवैध ब्रीडर्स का दखल बढ़ सकता है। यदि निगरानी सख्त नहीं रही तो नागरिकों के पालतू और लावारिस पशुओं की सुरक्षा पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है।\n• नागरिकों की राय भेजने की समयसीमा: आम नागरिक 5 नवंबर से पूर्व इस प्रस्तावित ड्राफ्ट पर अपने आधिकारिक सुझाव और आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं। इसके लिए संबंधित सरकारी समिति के आधिकारिक ईमेल पते cpcsea-mef@gov.in पर अपनी राय भेजी जा सकती है।\n• आधुनिक विज्ञान और स्टार्टअप्स के अवसर: पशु परीक्षण पर निर्भरता घटने से देश के बायोटेक स्टार्टअप्स को नॉन-एनिमल टेस्टिंग टूल्स विकसित करने का अवसर मिलेगा। इससे भारतीय शोध संस्थानों में रोबोटिक्स और कंप्यूटर मॉडलिंग के क्षेत्र में नए तकनीकी रास्ते खुलेंगे।",
  "whyItHappened": "यह विवाद भारत सरकार द्वारा प्रयोगशालाओं में जीवों के उपयोग से संबंधित नियमों में व्यापक संशोधन का ड्राफ्ट जारी करने के बाद उत्पन्न हुआ है।\n\n• नियमों में प्रस्तावित छूट: प्रस्तावित मसौदे में प्रयोगशालाओं को अपनी आंतरिक कमेटियों के माध्यम से निर्णय लेने की स्वायत्तता देने और विशिष्ट स्थितियों में खुले बाजार से जीव खरीदने की अनुमति पर विचार किया जा रहा है। इसी संभावित ढील के कारण पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने निगरानी तंत्र कमजोर होने की आशंका जताई है।\n• दवा परीक्षण की ऐतिहासिक विफलता दर: शोधों में देखा गया है कि जानवरों और इंसानों की जैविक संरचना भिन्न होने के कारण 90 से 95 प्रतिशत परीक्षण इंसानों पर विफल हो जाते हैं। इसी वैज्ञानिक सीमा के चलते दुनिया भर में गैर-पशु मॉडल्स को अनिवार्य करने की मांग तेज हो रही है।\n• वैश्विक तकनीकी बदलाव: अमेरिका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) द्वारा 2035 तक रासायनिक परीक्षणों में स्तनधारियों के उपयोग को समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया है। वैश्विक स्तर पर आ रहे इस बदलाव के मद्देनजर भारत में भी पशु प्रयोगों के विकल्प के रूप में AI और रोबोटिक्स को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है।\n• सुझाव प्रक्रिया की अंतिम तिथि: सरकार ने इस मसौदे पर आम जनता और हितधारकों से 5 नवंबर तक सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की हैं, जिसके चलते यह विषय सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में आया है।",
  "questionsAndAnswers": [
    {
      "question": "लैब टेस्टिंग के नए ड्राफ्ट को लेकर मुख्य विवाद क्या है?",
      "answer": "मुख्य विवाद प्रयोगशालाओं को अपनी आंतरिक कमेटी बनाकर फैसले लेने की छूट देने और पंजीकृत ब्रीडर्स न मिलने पर खुले बाजार से जानवर खरीदने की संभावित अनुमति को लेकर है।"
    },
    {
      "question": "अजय जो ने जानवरों की खरीद को लेकर क्या आशंका जताई है?",
      "answer": "उन्होंने आशंका जताई है कि खुले बाजार से खरीद की अनुमति मिलने से अवैध बिचौलिए सक्रिय हो सकते हैं, जिससे आवारा पशुओं और वन्यजीवों को पकड़कर बेचे जाने का खतरा बढ़ जाएगा।"
    },
    {
      "question": "जानवरों पर होने वाले परीक्षणों की विफलता दर कितनी बताई गई है?",
      "answer": "अजय जो के अनुसार, जानवरों पर सफल रहने वाले परीक्षणों में से 90 से 95 प्रतिशत से अधिक परीक्षण इंसानी क्लीनिकल ट्रायल के दौरान पूरी तरह विफल हो जाते हैं।"
    },
    {
      "question": "जानवरों पर प्रयोग के विकल्प के रूप में किन तकनीकों का सुझाव दिया गया है?",
      "answer": "जानवरों पर निर्भरता खत्म करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, कंप्यूटर मॉडलिंग और सेल कल्चर जैसी आधुनिक गैर-पशु तकनीकों को अपनाने का सुझाव दिया गया है।"
    },
    {
      "question": "अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी ने एनिमल टेस्टिंग को लेकर क्या लक्ष्य रखा है?",
      "answer": "अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) ने 2035 तक रासायनिक परीक्षणों में स्तनधारी जीवों के इस्तेमाल को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।"
    },
    {
      "question": "आम नागरिक इस ड्राफ्ट पर अपने सुझाव कब तक और कहां भेज सकते हैं?",
      "answer": "आम नागरिक 5 नवंबर से पहले अपने सुझाव और आपत्तियां ईमेल आईडी cpcsea-mef@gov.in पर भेज सकते हैं।"
    }
  ]
}