लैब टेस्टिंग के प्रस्तावित नियमों से वैज्ञानिक साख और पशु सुरक्षा पर मंडराया संकट, अंबिका शुक्ला ने उठाई आवाज प्रयोगशालाओं में जीवों के परीक्षण संबंधी नए मसौदे पर एनिमल वेलफेयर एक्टिविस्ट अंबिका शुक्ला ने गहरी चिंता प्रकट की है। उन्होंने आगाह किया है कि निगरानी तंत्र में ढील से भारत की शोध गुणवत्ता और पशु कल्याण दोनों प्रभावित होंगे। प्रयोगशालाओं में परीक्षण के लिए इस्तेमाल होने वाले जीवों के संदर्भ में केंद्र सरकार द्वारा तैयार किए गए नए मसौदे को लेकर देश भर में बहस तेज हो चुकी है। इस मसौदे पर आम जनता तथा विशेषज्ञों से राय और आपत्तियां प्राप्त करने की अंतिम मियाद 5 नवंबर निर्धारित है। इसी क्रम में गैर-लाभकारी संगठन 'पीपल फॉर एनिमल्स' की पदाधिकारी तथा पशु अधिकार कार्यकर्ता अंबिका शुक्ला ने सरकार के इस कदम पर अपनी गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं। उनका तर्क है कि यदि नए प्रावधानों को बिना आवश्यक संशोधनों के स्वीकार कर लिया गया, तो देश में पशु संरक्षण से जुड़े दशकों पुराने सुरक्षा उपायों की नींव हिल जाएगी। इससे न केवल मूक जीवों को भारी क्रूरता और पीड़ा सहनी पड़ेगी, बल्कि भारत की वैज्ञानिक साख और औषधि अनुसंधानों की विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में आ जाएगी। नियामक व्यवस्था के इतिहास और जीएलपी मानकों की महत्ता भारत में प्रयोगशालाओं के भीतर जीवों पर होने वाले अनुसंधानों की निगरानी का एक व्यवस्थित इतिहास रहा है। वर्ष 1997 में 'कमेटी फॉर द पर्पस ऑफ कंट्रोल एंड सुपरविज़न ऑफ एक्सपेरिमेंट्स ऑन एनिमल्स' यानी सीपीसीएसईए का गठन किया गया था, जिसका उद्देश्य प्रयोगशालाओं में होने वाली मनमानी पर लगाम लगाना था। इस समिति के शुरुआती दौर में जब प्रमुख शोध संस्थानों और चिकित्सा केंद्रों की प्रयोगशालाओं का औचक मुआयना किया गया, तब वहां की परिस्थितियां बेहद चिंताजनक पाई गई थीं। कई प्रयोगशालाओं में जीवों को वर्षों तक बेहद अस्वच्छ वातावरण में बंद रखा गया था, जहां न तो समुचित चिकित्सकीय देखभाल थी और न ही उन पर कोई सक्रिय शोध चल रहा था। इन गंभीर चूकों को सुधारने के लिए वर्ष 2000 के आसपास नियामक तंत्र का पुनर्गठन हुआ और 'गुड लैबोरेटरी प्रैक्टिसेज' (जीएलपी) के कड़े नियम लागू किए गए। इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक अनुसंधान प्रस्ताव की गहन समीक्षा शुरू हुई, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि क्या प्रस्तावित शोध सचमुच आवश्यक है, क्या इस तरह का प्रयोग पूर्व में तो नहीं हो चुका, और अनुसंधान के लिए न्यूनतम कितने जीवों की आवश्यकता है। अंबिका शुक्ला के अनुसार, इन सख्त मानकों ने देश में एक जवाबदेह ढांचा खड़ा किया। इसी व्यवस्था की बदौलत भारत ने कोविड-19 महामारी के दौरान प्रभावी टीकों का विकास किया और वैश्विक स्तर पर अपनी वैज्ञानिक साख स्थापित की। उनका कहना है कि इस भरोसेमंद निगरानी तंत्र को किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। जीवों की खरीद और बाहरी स्रोतों से जुड़ा विवाद प्रस्तावित मसौदे में सबसे गंभीर चिंता का विषय नियम 5 है, जो प्रयोगशालाओं को अपने परिसर से बाहर के स्रोतों से जीव जुटाने की अनुमति देता है। वर्तमान नियमों के तहत केवल पंजीकृत एवं प्रमाणित ब्रीडिंग केंद्रों से ही जीव प्राप्त किए जा सकते हैं, जिससे वैज्ञानिकों के पास उनके स्वास्थ्य, आनुवंशिकी और पूर्व चिकित्सकीय इतिहास का पूरा रिकॉर्ड रहता है। परंतु प्रस्तावित प्रावधानों में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि 'स्वीकार्य वैकल्पिक स्रोत' का दायरा क्या होगा। अंबिका शुक्ला ने सवाल उठाया है कि स्पष्ट परिभाषा के अभाव में सड़कों, पालतू पशुओं के घरों या खुले प्राकृतिक आवासों से आवारा कुत्तों और बिल्लियों को पकड़े जाने का खतरा पैदा हो सकता है। अनियंत्रित वातावरण से उठाए गए जीव पहले से ही विभिन्न संक्रमणों अथवा अज्ञात बीमारियों से ग्रस्त हो सकते हैं। जब ऐसे अस्वस्थ जीवों पर दवाओं अथवा रसायनों का परीक्षण किया जाएगा, तो शोध के परिणाम पूरी तरह से दूषित हो जाएंगे। इससे शोधकर्ताओं के लिए यह समझना नामुमकिन हो जाएगा कि परिणाम वास्तव में दवा के असर से आए हैं अथवा जीव की पहले से मौजूद बीमारी के कारण। स्वतंत्र केंद्रीय निगरानी बनाम संस्थागत स्वायत्तता नए प्रस्तावों में अनुसंधानों की स्वीकृति प्रक्रिया का विकेंद्रीकरण करने का विचार भी शामिल है, जिस पर गंभीर एतराज जताया गया है। वर्तमान समय में एक केंद्रीय वैधानिक प्राधिकरण प्रत्येक शोध प्रस्ताव की निष्पक्ष जांच करता है और जीवों की संख्या तय करता है। यदि यह शक्ति अलग-अलग संस्थानों की आंतरिक समितियों को सौंप दी गई, तो निष्पक्षता पूरी तरह समाप्त हो सकती है। इस स्थिति को स्पष्ट करते हुए अंबिका शुक्ला ने उदाहरण दिया कि यह व्यवस्था विद्यार्थियों की कॉपियों को जांचने का जिम्मा स्वयं उनके माता-पिता को सौंपने जैसी होगी। कोई भी संस्थान अपने ही शोधकर्ताओं के प्रस्तावों को खारिज करने से कतराएगा। बाह्य और स्वतंत्र निगरानी हटने से संस्थानों की सुविधा और वास्तविक वैज्ञानिक आवश्यकता के बीच का अंतर समाप्त हो जाएगा, जिससे अत्यधिक संख्या में अनावश्यक प्रयोगों का रास्ता साफ हो जाएगा। अनियंत्रित वातावरण में परीक्षण और पूर्व-सूचित निरीक्षण मसौदे के अन्य प्रावधान प्रयोगशालाओं के बुनियादी ढांचे और औचक निरीक्षण की पद्धति को शिथिल करने की ओर इशारा करते हैं। पूरी तरह से नियंत्रित एवं सीलबंद प्रयोगशालाओं के बजाय खुले अथवा आंशिक रूप से खुले वातावरण में परीक्षणों की गुंजाइश पर सवाल खड़े किए गए हैं। तापमान, आर्द्रता, धूल और मौसमी बदलाव किसी भी वैज्ञानिक निष्कर्ष को अप्रत्याशित रूप से बदल सकते हैं। विज्ञान की मौलिक कसौटी यह है कि एक ही प्रयोग को समान परिस्थितियों में दोहराए जाने पर हर बार एक जैसे नतीजे आने चाहिए, जो अनियंत्रित वातावरण में संभव नहीं है। इसके अतिरिक्त, प्रयोगशालाओं के निरीक्षण से पहले अग्रिम नोटिस देने का प्रस्ताव भी संदेह के घेरे में है। औचक निरीक्षण ही वह एकमात्र जरिया है जिससे यह पता चल पाता है कि प्रयोगशालाओं में जीवों को वास्तव में किन परिस्थितियों में रखा जा रहा है। यदि निरीक्षण से पहले सूचना दे दी जाएगी, तो प्रबंधन अपनी कमियों को अस्थायी रूप से छिपाने और मानकों के उल्लंघन पर पर्दा डालने में सक्षम हो जाएगा, जिससे जांच का वास्तविक उद्देश्य ही निष्प्रभावी हो जाएगा। दर्द और मानसिक आघात के वर्गीकरण की विसंगतियां प्रस्तावित नियमों में जीवों को उनके शारीरिक आकार (छोटे, मध्यम, बड़े) के आधार पर वर्गीकृत करने की प्रचलित व्यवस्था को हटाकर दर्द की तीव्रता (हल्का दर्द, मध्यम दर्द, गंभीर दर्द और मृत्यु) के आधार पर श्रेणीबद्ध करने की बात कही गई है। इस पर सवाल उठाते हुए अंबिका शुक्ला ने पूछा कि जो मूक जीव बोलकर अपनी तकलीफ नहीं बता सकते, उनके दर्द का सटीक मापन कोई कैसे कर सकता है? विशेष रूप से मसौदे में जीवों को भूखा रखने अथवा लंबे समय तक एकांत में बंद रखने को 'हल्के दर्द' की श्रेणी में रखे जाने पर भारी आपत्ति दर्ज कराई गई है। पशु केवल शारीरिक चोट से ही नहीं, बल्कि घबराहट, अकेलेपन और वातावरण के बदलाव से भी भारी मानसिक आघात झेलते हैं। उनकी सूंघने और सुनने की क्षमता अत्यंत संवेदनशील होती है, जिसके कारण प्रयोगशाला का माहौल उन्हें गहरे अवसाद में धकेल देता है। कई जीव प्रयोग शुरू होने से पूर्व ही तनाव में खाना-पीना छोड़ देते हैं। सहमति देने में असमर्थ इन जीवों के कल्याण की पूरी नैतिक जिम्मेदारी नियामकों और वैज्ञानिकों पर ही आती है। पशु परीक्षणों की जैविक सीमाएं और ऐतिहासिक गलतियां पशुओं पर निर्भरता को लगातार बनाए रखने के वैज्ञानिक आधार पर भी सवाल उठाए गए हैं। मानव और अन्य जीवों की शारीरिक संरचना, चयापचय तथा आनुवंशिकी में भारी भिन्नताएं होती हैं। यही कारण है कि पशुओं पर किए गए परीक्षण कई बार बेहद भ्रामक परिणाम दे चुके हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि पेनिसिलिन जैसी जीवनरक्षक एंटीबायोटिक के शुरुआती दौर में पशु परीक्षणों के दौरान निराशाजनक परिणाम मिले थे। यदि वैज्ञानिकों ने केवल उन निष्कर्षों पर भरोसा किया होता, तो यह क्रांतिकारी दवा कभी इंसानों तक नहीं पहुंच पाती। इसी प्रकार, तंबाकू उद्योग ने फेफड़ों के कैंसर और धूम्रपान के सीधे संबंध को झुठलाने के लिए बंदरों पर किए गए परीक्षणों के आंकड़ों का दुरुपयोग किया था। इन तथ्यों से सिद्ध होता है कि पशुओं पर सफल दिखने वाला फार्मूला इंसानों के लिए घातक या बेअसर साबित हो सकता है। आधुनिक विकल्प: कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कंप्यूटर सिमुलेशन आज का आधुनिक विज्ञान तेजी से ऐसे विकल्पों की ओर बढ़ रहा है जो जीवों को नुकसान पहुंचाए बिना सटीक आंकड़े प्रदान करते हैं। इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), स्टेम सेल टेक्नोलॉजी और परिष्कृत कंप्यूटर सिमुलेशन मॉडल प्रमुख हैं। इन उन्नत तकनीकों के माध्यम से मानव कोशिकाओं और जैविक प्रणालियों पर किसी रसायन या दवा के असर को बहुत कम समय और लागत में परखा जा सकता है। अंबिका शुक्ला का मानना है कि वैज्ञानिक प्रगति की पहचान प्रयोगों की संख्या बढ़ाने में नहीं, बल्कि प्रयोगों की गुणवत्ता और मानवीयता में निहित है। उनका उद्देश्य पशु परीक्षणों पर रातोंरात पूर्ण प्रतिबंध लगवाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि वर्तमान कड़े नियम लागू रहें और देश धीरे-धीरे आधुनिक गैर-पशु तकनीकों को अपनाए। सस्ते परीक्षणों का डंपिंग ग्राउंड बनने की आशंका एक और गंभीर चेतावनी यह दी गई है कि यदि भारत में नियम शिथिल कर दिए गए, तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारे देश को 'कम लागत और कम निगरानी' वाले परीक्षणों का केंद्र बना लेंगी। विकसित देशों में पशु परीक्षणों पर बेहद सख्त कानून और प्रतिबंध हैं। ऐसे में विदेशी कंपनियां अपने जोखिम भरे परीक्षणों को पूरा करने के लिए भारतीय प्रयोगशालाओं का सहारा ले सकती हैं। यदि ऐसा हुआ, तो भारत वैश्विक शोध के क्षेत्र में एक डंपिंग ग्राउंड बनकर रह जाएगा, जहां मौलिक नवाचार के स्थान पर केवल परीक्षण की औपचारिकताएं निपटाई जाएंगी। इससे भारत की अंतरराष्ट्रीय शोध साख को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी और विदेशी निवेशक भारतीय आंकड़ों की गुणवत्ता पर अविश्वास प्रकट करने लगेंगे। कॉस्मेटिक्स उद्योग की मिसाल और करुणा का मार्ग भारत ने पूर्व में सौंदर्य प्रसाधनों (कॉस्मेटिक्स) के परीक्षण के लिए पशुओं के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर दुनिया के सामने मिसाल पेश की थी। लैक्मे जैसे प्रतिष्ठित भारतीय ब्रांड्स ने बिना पशु परीक्षणों के भी बाजार में निरंतर विकास करके दिखाया है। इसके अलावा, आज वैश्विक स्तर पर निवेशक ईएसजी (पर्यावरण, सामाजिक और शासन) मानकों के तहत क्रूरता-मुक्त प्रक्रियाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। अंबिका शुक्ला ने महात्मा गांधी के अहिंसा के दर्शन को याद दिलाते हुए कहा कि करुणा के बिना किया गया विज्ञान अधूरा है। तनावग्रस्त और भयभीत जीवों से प्राप्त आंकड़े कभी भी विश्वसनीय नहीं हो सकते। उन्होंने देश के वैज्ञानिकों, नागरिकों और शोधकर्ताओं से भावुक अपील की है कि वे 5 नवंबर की अंतिम तिथि से पूर्व आधिकारिक ईमेल cpcsea-mef@gov.in पर अपनी आपत्तियां और रचनात्मक सुझाव सरकार तक जरूर प्रेषित करें, क्योंकि यह मसौदा अभी कानून नहीं बना है और जनमत इसे बदल सकता है। इसका आप पर असर प्रस्तावित नियमों में बदलाव का सीधा असर देश की वैज्ञानिक विश्वसनीयता, दवाओं की गुणवत्ता और जीवों के संरक्षण पर पड़ेगा। • भारत में: नई नियमावली यदि लागू होती है तो औषधियों की जांच प्रणाली में पारदर्शिता प्रभावित हो सकती है। आम नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़ी दवाओं के परिणामों की विश्वसनीयता पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संदेह पैदा हो सकता है। • प्रयोगशालाओं और पशु कल्याण पर: बाहरी स्रोतों से जीव लाने की छूट मिलने से गली-मोहल्लों के बेसहारा जीवों के पकड़े जाने का खतरा बढ़ जाएगा। आम नागरिक 5 नवंबर से पहले आधिकारिक ईमेल पर अपनी आपत्ति दर्ज कराकर नियमों को सख्त बनाए रखने में योगदान दे सकते हैं। • वैज्ञानिक समुदाय पर: स्वतंत्र निगरानी समाप्त होने से शोध कार्यों में दोहराव और गुणवत्ता में गिरावट आ सकती है। इससे घरेलू शोधकर्ताओं की वैश्विक स्वीकार्यता और शोध निष्कर्षों की साख पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। • उद्योग और व्यापार पर: क्रूरता-मुक्त मानकों से हटने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्यात और नैतिक निवेश को झटका लग सकता है। कंपनियों को वैश्विक बाजारों में नियामक जांच और प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसा क्यों हुआ केंद्र सरकार द्वारा प्रयोगशाला में जीवों के उपयोग से जुड़े नियमों को संशोधित करने के लिए एक नया मसौदा पेश किया गया है, जिसका पशु कल्याण संगठन विरोध कर रहे हैं। • सीधे तौर पर मसौदा नियम: सरकार ने शोध प्रक्रिया को तेज और सुगम बनाने के उद्देश्य से मौजूदा कड़े नियमों में ढील देने का प्रस्ताव रखा है। इसमें संस्थानों को स्व-अनुमोदन का अधिकार देना और बाहरी स्रोतों से जीव जुटाने का प्रावधान शामिल है। • निगरानी तंत्र को शिथिल करने की मांग: कुछ शोध संस्थानों द्वारा केंद्रीय मंजूरी प्रक्रिया को जटिल और समय लेने वाली बताए जाने के कारण नियमों के विकेंद्रीकरण की सिफारिश की गई थी। इसी पृष्ठभूमि में स्वतंत्र केंद्रीय प्राधिकरण की भूमिका को सीमित करने का प्रयास हुआ। • ऐतिहासिक सबक की अनदेखी: वर्ष 1997 से 2000 के बीच प्रयोगशालाओं में पाई गई भारी अनियमितताओं के बाद ही सीपीसीएसईए और जीएलपी के कड़े मानक बनाए गए थे। इन सुरक्षा उपायों को हटाने से पुराने दौर की कमियां दोबारा उभरने की आशंका है। • आगामी कदम: वर्तमान में यह मसौदा केवल विचारार्थ है और 5 नवंबर तक जनता, विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों से आपत्तियां मांगी गई हैं, जिनके आधार पर अंतिम निर्णय होगा। सवाल-जवाब 1. प्रस्तावित पशु लैब टेस्टिंग नियमों पर आपत्ति दर्ज कराने की अंतिम तिथि क्या है? प्रस्तावित मसौदे पर आम जनता और वैज्ञानिक 5 नवंबर तक अपने सुझाव और आपत्तियां भेज सकते हैं। 2. अंबिका शुक्ला किस संस्था से जुड़ी हुई हैं? अंबिका शुक्ला भारत के प्रमुख गैर-लाभकारी पशु कल्याण संगठन 'पीपल फॉर एनिमल्स' से जुड़ी हैं। 3. मसौदे के नियम 5 को लेकर मुख्य विवाद क्या है? नियम 5 प्रयोगशालाओं को वैकल्पिक बाहरी स्रोतों से जीव लाने की अनुमति देता है, जिससे सड़कों और घरों से आवारा जीवों को उठाए जाने की आशंका है। 4. प्रयोगशालाओं की निगरानी के लिए सीपीसीएसईए की स्थापना कब हुई थी? वैज्ञानिक प्रयोगों में जीवों की देखरेख और नियंत्रण के लिए सीपीसीएसईए का गठन वर्ष 1997 में किया गया था। 5. पशु परीक्षण के विकल्प के रूप में किन आधुनिक तकनीकों का सुझाव दिया गया है? विकल्प के रूप में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्टेम सेल तकनीक और उन्नत कंप्यूटर सिमुलेशन मॉडल का उपयोग करने का सुझाव दिया गया है। 6. नागरिक अपनी आपत्तियां किस ईमेल पते पर भेज सकते हैं? नागरिक अपनी आपत्तियां और सुझाव आधिकारिक ईमेल पते cpcsea-mef@gov.in पर भेज सकते हैं। https://trendkia.com/national/laiba-testinga-ke-prastavita-niyamon-se-vaijnanika-sakha-aura-pashu-suraksha-para-mndaraya-snkata-ambika-shukla-ne-uthai-avaja-54221 TrendKia — Har trend, sabse pehle.