# लालकृष्ण आडवाणी की राजनीतिक यात्रा: जनसंघ की कमान संभालने से लेकर देश के सर्वोच्च सम्मान तक

> भारतीय राजनीति के दिग्गज और पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के जीवन, संघर्ष और राजनीतिक सफर की अनकही दास्तान, जिन्होंने जनसंघ से लेकर भाजपा को राष्ट्रीय पटल पर स्थापित किया।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-11-08 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/lal-krishna-advani-ki-rajnitik-yatra-jansangh-ki-kaman-sambhalne-se-lekar-desh-ke-sarvuchch-samman-tak-57789 · **Language:** Hindi
**Tags:** लालकृष्ण आडवाणी, भारतीय जनता पार्टी, भारतीय जनसंघ, अटल बिहारी वाजपेयी, भारत रत्न, भारतीय राजनीति, इतिहास

भारतीय राजनीति के क्षितिज पर कुछ ऐसे व्यक्तित्व उभरते हैं जो किसी एक दल या कालखंड की सीमाओं से परे जाकर संपूर्ण युग के प्रतीक बन जाते हैं। लालकृष्ण आडवाणी ऐसे ही अद्वितीय नेताओं में शुमार हैं, जिन्होंने जनसंघ के शुरुआती दौर से लेकर भारतीय जनता पार्टी को देश की मुख्यधारा की राष्ट्रीय ताकत बनाने में अपना सर्वस्व झोंक दिया। राजनीतिक गलियारों में उन्हें कभी 'लौह पुरुष' की संज्ञा दी गई तो कभी पार्टी का मुख्य चेहरा माना गया, लेकिन संगठन के जमीनी कार्यकर्ताओं के दिलों में वे हमेशा 'भीष्म पितामह' के रूप में आदरणीय बने रहे।

 

## सिंध से विस्थापन और शुरुआती जीवन का संघर्ष

आठ नवंबर 1927 को सिंध प्रांत में जन्मे लालकृष्ण आडवाणी ने देश के विभाजन के बाद राष्ट्र सेवा को ही अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लिया। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर अपनी वैचारिक यात्रा की शुरुआत की थी। वर्ष 1947 में जब देश स्वतंत्रता का जश्न मना रहा था, तब वे इस उल्लास में शामिल नहीं हो सके थे क्योंकि आजादी मिलने से महज कुछ ही घंटे पहले उन्हें अपना पैतृक आवास छोड़कर भारत की तरफ रुख करना पड़ा था। हालांकि, जब वे महज 14 वर्ष की बाल्यावस्था में थे, तभी उन्होंने अपना पूरा जीवन हिंदुस्तान की सेवा के वास्ते समर्पित करने का संकल्प ले लिया था।

 

## अटल बिहारी वाजपेयी के आग्रह पर संभाली जनसंघ की कमान

सक्रिय राजनीति के मैदान में उन्होंने जनसंघ के माध्यम से कदम रखा और अपनी संगठनात्मक क्षमता का लोहा मनवाया। वर्ष 1990 की ऐतिहासिक राम रथयात्रा ने उन्हें देश के कोने-कोने में एक जननेता के रूप में स्थापित कर दिया। राजनीतिक पटल पर बदलते समीकरणों के बीच उनकी मुखर शैली ने भाजपा के विस्तार को अभूतपूर्व गति प्रदान की। भाजपा के आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, फरवरी 1968 से पार्टी की कमान संभाल रहे अटल बिहारी वाजपेयी 1971 के आम चुनावों के बाद अध्यक्ष पद छोड़ने का विचार कर रहे थे। वाजपेयी ने लालकृष्ण आडवाणी से आग्रह किया कि वे पार्टी अध्यक्ष का पदभार संभालें, क्योंकि वे अपने चार साल पूरे कर चुके थे और अब दूसरों को अवसर देना चाहते थे।

 

## अध्यक्ष बनने से हिचकिचा रहे थे लालकृष्ण आडवाणी

लालकृष्ण आडवाणी इस प्रस्ताव को लगातार ठुकराते रहे, क्योंकि उनका मानना था कि वे एक अच्छे वक्ता नहीं हैं और सार्वजनिक मंचों या जनसभाओं को संबोधित करते समय वे काफी असहज व घबरा जाते हैं। इसके विपरीत, अटल बिहारी वाजपेयी अपनी अनूठी वाकपटुता से श्रोताओं को आसानी से मंत्रमुग्ध कर लेते थे। अंततः अटल बिहारी वाजपेयी के बार-बार समझाने और मनाने के बाद, दिसंबर 1972 में लालकृष्ण आडवाणी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष पद पर आसीन हुए।

 

## संगठन का विस्तार और चुनावी सफलताएं

वर्ष 1980 से 1990 के दशक के बीच लालकृष्ण आडवाणी ने भारतीय जनता पार्टी को अखिल भारतीय स्तर पर स्थापित करने के लिए अपना संपूर्ण समय और ऊर्जा समर्पित कर दी। इसका प्रत्यक्ष परिणाम तब देखने को मिला जब 1984 के आम चुनावों में महज दो सीटों पर सिमट जाने वाली पार्टी ने 1989 के लोकसभा चुनावों में छलांग लगाते हुए 86 सीटों पर विजय प्राप्त की, जो उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों के लिहाज से एक ऐतिहासिक प्रदर्शन था। इसके बाद पार्टी की यह रफ्तार थम नहीं सकी और 1992 में यह संख्या बढ़कर 121 तथा 1996 में 161 सीटों के आंकड़े तक पहुंच गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के इतिहास में यह पहला अवसर था जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई थी और भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी। इस सफलता के बाद लालकृष्ण आडवाणी ने अपने एक वक्तव्य में कहा था कि प्रकृति हमारे समक्ष खुशहाली और उसके मायने रखती है ताकि हम खुद चयन कर सकें, लेकिन उन्हें इसके दोनों पहलू प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुए।

 

## देश के सर्वोच्च पदों पर कार्य और वैचारिक दृढ़ता

लालकृष्ण आडवाणी को अपने दौर के अत्यंत मेधावी, सक्षम और वैचारिक रूप से दृढ़ राजनेता के रूप में पहचाना जाता रहा है, जिनके भीतर एक सशक्त और समृद्ध भारत का सपना गहराई से रचा-बसा था। जैसा कि अटलजी अक्सर उल्लेख करते थे, आडवाणी ने राष्ट्रवाद के मूल सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया और इसी वैचारिक पृष्ठभूमि पर आगे बढ़ते हुए जहां भी आवश्यकता महसूस हुई, वहां व्यावहारिक लचीलापन भी दिखाया। वे केवल एक कुशल संगठनकर्ता तक सीमित नहीं रहे, बल्कि देश के सर्वोच्च प्रशासनिक पदों पर पहुंचकर राष्ट्र सेवा की। आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने और आतंकवाद के खिलाफ शून्य टॉलरेंस की नीति अपनाने के मामले में उनकी प्रशासनिक दृढ़ता सर्वविदित रही। संसद के भीतर उनके भाषण अकादमिक तर्कों, तथ्यों और राष्ट्रहित की भावना से ओत-प्रोत होते थे। भारतीय लोकतंत्र, संविधान और संसदीय मर्यादाओं के प्रति उनका आदर भाव सभी राजनीतिक दलों के लिए अनुकरणीय रहा। संसद सदस्य के रूप में तीन दशकों की लंबी पारी खेलने के बाद वे देश के गृह मंत्री बने और तत्पश्चात अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में 1999 से 2004 के दौरान उप प्रधानमंत्री के रूप में देश की सेवा की।

 

## प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और राजनीतिक सफर का अगला पड़ाव

वर्ष 2009 के आम चुनावों के दौरान लालकृष्ण आडवाणी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रहे थे, इसलिए यह लगभग तय माना जा रहा था कि वे आगामी चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के आधिकारिक उम्मीदवार होंगे। उनके पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह था कि वे भाजपा के सबसे ताकतवर और स्थापित नेता थे तथा अटल बिहारी वाजपेयी के बाद पार्टी के भीतर उन्हीं का कद सबसे ऊंचा था। स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी भी आडवाणी की उम्मीदवारी का पूरी तरह समर्थन कर रहे थे। इसके चलते 10 दिसंबर 2007 को भाजपा के संसदीय बोर्ड ने आधिकारिक तौर पर यह घोषणा कर दी कि 2009 के लोकसभा चुनावों के लिए लालकृष्ण आडवाणी ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। हालांकि, चुनाव परिणामों में कांग्रेस और उसके गठबंधन को सफलता मिली और मनमोहन सिंह एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए, जिसके बाद आडवाणी ने 15वीं लोकसभा में सुषमा स्वराज को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी। उल्लेखनीय है कि 1980 में भाजपा की स्थापना के बाद से लालकृष्ण आडवाणी ही वे राजनेता हैं जो सबसे लंबी अवधि तक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर रहे।

 

## राष्ट्र द्वारा सर्वोच्च सम्मानों से अलंकृत

छह दशकों से अधिक का उनका यह व्यापक राजनीतिक सफर न केवल भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के विकास को गहराई से समझने में मददगार साबित होता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि अटूट सिद्धांत, उत्कृष्ट संगठनात्मक क्षमता और वैचारिक स्पष्टता के साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति समर्पण किसी भी व्यक्ति को युग पुरुष कैसे बना देता है। राष्ट्र ने भी उनके इस महान योगदान की सराहना करते हुए वर्ष 2015 में उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से अलंकृत किया। इसके ठीक नौ वर्ष पश्चात, वर्ष 2024 में उन्हें भारत सरकार द्वारा देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।

## ऐसा क्यों हुआ
लालकृष्ण आडवाणी के राजनीतिक उभार और जनसंघ से लेकर भाजपा तक के सफर के पीछे कई ऐतिहासिक परिस्थितियां और संगठनात्मक रणनीतियां जिम्मेदार थीं। देश के विभाजन के बाद शरणार्थी संकट से जूझते हुए राष्ट्र निर्माण में जुटने की उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता ने उनके राजनीतिक जीवन की नींव रखी।

- **विभाजन का प्रभाव:** वर्ष 1947 में देश के बंटवारे के दौरान सिंध से विस्थापन ने उनके भीतर राष्ट्र सेवा की भावना को अत्यंत तीव्र कर दिया, जिसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से अपना जीवन देश के नाम कर दिया।
- **नेतृत्व परिवर्तन की आवश्यकता:** वर्ष 1971 के चुनावों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा पद छोड़ने की इच्छा जताए जाने और दूसरों को मौका देने के आग्रह के कारण लालकृष्ण आडवाणी को दिसंबर 1972 में जनसंघ की कमान संभालनी पड़ी।
- **रणनीतिक विस्तार:** वर्ष 1980 के दशक में पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के लिए आडवाणी द्वारा किए गए लगातार संगठनात्मक प्रयासों और 1990 की राम रथयात्रा ने पार्टी के जनाधार को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया।
- **सर्वोच्च सम्मान:** दशकों के राजनीतिक योगदान और देश की प्रशासनिक व्यवस्था में उनके महत्वपूर्ण निर्णयों को मान्यता देते हुए सरकार ने उन्हें पहले पद्म विभूषण और बाद में भारत रत्न से सम्मानित किया।

## सवाल-जवाब

### 1. लालकृष्ण आडवाणी का जन्म कब और कहां हुआ था?
लालकृष्ण आडवाणी का जन्म 8 नवंबर 1927 को सिंध प्रांत (अब पाकिस्तान) में हुआ था।

### 2. लालकृष्ण आडवाणी पहली बार भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष कब बने थे?
अटल बिहारी वाजपेयी के समझाने के बाद लालकृष्ण आडवाणी दिसंबर 1972 में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने थे।

### 3. वर्ष 1984 के आम चुनावों में भाजपा को कितनी सीटें मिली थीं?
वर्ष 1984 के आम चुनावों में भाजपा को महज 2 सीटें हासिल हुई थीं, जो बाद में बढ़कर 1989 में 86 हो गईं।

### 4. लालकृष्ण आडवाणी देश के उप प्रधानमंत्री कब बने थे?
लालकृष्ण आडवाणी ने अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में 1999 से 2004 के दौरान देश के उप प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया था।

### 5. लालकृष्ण आडवाणी को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' कब मिला?
लालकृष्ण आडवाणी को वर्ष 2024 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया था।

## प्रेरणा और सबक
लालकृष्ण आडवाणी का छह दशक से अधिक लंबा राजनीतिक जीवन समर्पण, सिद्धांतों और संगठन कौशल की अनूठी मिसाल पेश करता है। उनके संघर्षशील और अनुशासित सफर से कई महत्वपूर्ण प्रेरणाएं ली जा सकती हैं।

- **कठिन परिस्थितियों में दृढ़ता:** विभाजन के समय सब कुछ छूटने के बावजूद राष्ट्र सेवा के संकल्प से विचलित न होना यह सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियां भी आपके लक्ष्यों को नहीं डिगा सकतीं।
- **जिम्मेदारी स्वीकार करना:** अपनी झिझक और वक्ता न होने की आशंका के बावजूद पार्टी और देश हित में बड़े नेतृत्व का दायित्व स्वीकार करना सच्ची कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाता है।
- **दीर्घकालिक दृष्टिकोण:** वर्ष 1984 में मात्र दो सीटों से शुरू करके पार्टी को राष्ट्रीय सत्ता के शिखर तक पहुंचाने की लंबी यात्रा यह बताती है कि धैर्य और निरंतर परिश्रम से बड़े बदलाव संभव हैं।
- **मूल्यों से समझौता न करना:** राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बीच अपने मूल सिद्धांतों और राष्ट्रवाद की विचारधारा से कभी समझौता न करना एक मजबूत नेता की पहचान है।

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