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  "type": "article",
  "title": "लोकसभा में आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव का बड़ा ऐलान, डीपफेक और आपत्तिजनक सामग्री पर 3 घंटे में कार्रवाई का निर्देश",
  "summary": "लोकसभा में केंद्र सरकार ने साफ किया कि सोशल मीडिया पर डीपफेक और आपत्तिजनक कंटेंट हटाने के लिए 3 घंटे की समयसीमा तय की गई है। नियम न मानने पर कंपनियों की कानूनी सुरक्षा छीन ली जाएगी।",
  "content": "डिजिटल स्पेस में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने कड़े कदम उठाए हैं। ऑनलाइन मंचों की स्वेच्छाचारिता पर लगाम लगाते हुए सरकार ने डिजिटल सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संसद के निचले सदन यानी लोकसभा में इस विषय पर महत्वपूर्ण जानकारी प्रस्तुत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चों के लिए हानिकारक सामग्री पर सोशल मीडिया कंपनियों को निरंतर निगरानी रखनी होगी। यदि किसी अदालत या प्रशासनिक प्राधिकरण का आदेश आता है, तो संबंधित प्लेटफॉर्म को आपत्तिजनक सामग्री को 3 घंटे की समयसीमा के भीतर हटाना अनिवार्य होगा। इसके साथ ही, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से निर्मित फर्जी कंटेंट और डीपफेक पर भी नियम कड़े कर दिए गए हैं।\n\nडिजिटल स्पेस को सुरक्षित बनाने का संकल्प और एआई कंटेंट पर पाबंदी\nलोकसभा में चर्चा के दौरान सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री डॉ एल मुरुगन ने सरकार के विजन को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, \n \"भारत का इंटरनेट सुरक्षित और भरोसेमंद बनाया जाएगा।\"\n उन्होंने आगे जोर देकर बताया कि सोशल मीडिया कंपनियों को एआई जनित भ्रामक कंटेंट के प्रसार को रोकने के लिए अपने तकनीकी तंत्र में आवश्यक बदलाव करने ही होंगे।\n\n10 फरवरी 2026 से प्रभावी नए आईटी नियमों के अंतर्गत डीपफेक और फर्जी एआई कंटेंट के खिलाफ कठोर कानूनी प्रावधान किए गए हैं। इन नियमों का पालन न करने वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को आईटी अधिनियम के तहत मिलने वाली मध्यस्थ कानूनी सुरक्षा (सेफ हार्बर) से वंचित कर दिया जाएगा। कानूनी सुरक्षा समाप्त होने के बाद ऐसी कंपनियों पर सीधे दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।\n\nडीपीडीपी एक्ट 2023 और बच्चों की डिजिटल प्राइवेसी के सुरक्षात्मक प्रावधान\nबच्चों की ऑनलाइन प्राइवेसी और सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट 2023 के तहत विशेष नियम लागू किए गए हैं। अब किसी भी बच्चे के डिजिटल डेटा को प्रोसेस करने से पूर्व उनके माता-पिता या कानूनी अभिभावक की स्पष्ट सहमति प्राप्त करना अनिवार्य बना दिया गया है।\n\nइसके अतिरिक्त, इंटरनेट पर बच्चों की गतिविधियों की ट्रैकिंग और उनके ऑनलाइन व्यवहार की मॉनिटरिंग करने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है। बच्चों को केंद्रित करके दिखाए जाने वाले विज्ञापनों (टार्गेटेड ऐड्स) पर भी रोक लगा दी गई है। नए नियमों के अनुसार, सोशल मीडिया कंपनियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि यदि उनके प्लेटफॉर्म पर बच्चों से जुड़ा कोई अपराध सामने आता है, तो वे पॉक्सो एक्ट और भारतीय न्याय संहिता के तहत संबंधित जांच एजेंसियों को तुरंत सूचित करें।\n\nराष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर नए फीचर्स और गुमनाम शिकायत सुविधा\nनागरिकों को साइबर अपराधों से बचाने के लिए नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) पर आधुनिक तकनीकी सुविधाएं जोड़ी गई हैं। अब महिलाएं और बच्चे बिना अपनी पहचान उजागर किए गुमनाम रहकर इस पोर्टल पर साइबर सुरक्षा से जुड़ी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं।\n\nएनसीआरपी पोर्टल पर 'रिपोर्ट एंड चेक सस्पेक्ट' नाम से एक नया फीचर शामिल किया गया है। इस सुविधा के माध्यम से आम नागरिक किसी भी संदिग्ध वेबसाइट, ऑनलाइन लिंक या व्हाट्सएप नंबर की विश्वसनीयता की जांच आसानी से कर सकते हैं। इसके अलावा, टेलीग्राम हैंडल तथा डीपफेक से जुड़े सोशल मीडिया लिंक्स की शिकायत भी सीधे पोर्टल के जरिए की जा सकती है।\n\nजन-जागरूकता अभियान, शैक्षणिक पाठ्यक्रम और बुनियादी ढांचे का विस्तार\nसाइबर सुरक्षा के प्रति नागरिकों को जागरूक करने के उद्देश्य से इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के ISEA कार्यक्रम के तहत देशभर में हजारों कार्यशालाओं का आयोजन किया गया है। इन जागरूकता कार्यक्रमों में अब तक 11 लाख से अधिक नागरिकों ने भाग लिया है। सरकार और CERT-In लगातार साइबर सुरक्षा से संबंधित मार्गदर्शिकाएं (हैंडबुक) और निर्देशात्मक वीडियो जारी कर रहे हैं। शिक्षा मंत्रालय और सीबीएसई ने भी इस विषय की महत्ता को समझते हुए साइबर सुरक्षा को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया है।\n\nसंस्थागत स्तर पर भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) ने एनसीसी और एनएसएस से जुड़े 2 लाख से अधिक विद्यार्थियों को साइबर सुरक्षा का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया है। महिलाओं के विरुद्ध होने वाले साइबर अपराधों की रोकथाम के लिए राज्यों को 132 करोड़ रुपये से अधिक का वित्तीय आवंटन किया गया है। जांच क्षमता बढ़ाने के लिए देश के 33 स्थानों पर साइबर फॉरेंसिक प्रयोगशालाएं स्थापित की गई हैं, और 24 हजार से अधिक पुलिस अधिकारियों एवं कर्मियों को फॉरेंसिक तथा अपराध जांच में प्रशिक्षित किया जा चुका है।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: डिजिटल स्पेस में बच्चों और महिलाओं की प्राइवेसी और सुरक्षा के नियम बेहद कड़े हो गए हैं, जिससे ऑनलाइन ठगी और डीपफेक के शिकार लोगों को 3 घंटे में त्वरित राहत मिलेगी।\n\nआम नागरिकों के लिए: नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल पर 'रिपोर्ट एंड चेक सस्पेक्ट' फीचर से लोग किसी भी संदिग्ध वेबसाइट, व्हाट्सएप नंबर या टेलीग्राम लिंक की जांच शिकायत दर्ज करने से पहले स्वयं कर सकते हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. डीपफेक और आपत्तिजनक सामग्री को हटाने के लिए क्या समयसीमा तय की गई है?\nअदालत या सरकार का आदेश मिलने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को 3 घंटे के भीतर आपत्तिजनक सामग्री और डीपफेक कंटेंट को हटाना अनिवार्य है।\n\n2. नए आईटी नियम कब से लागू हुए हैं और उल्लंघन करने पर क्या कार्रवाई होगी?\nनए आईटी नियम 10 फरवरी 2026 से लागू हुए हैं। नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों की कानूनी सुरक्षा (सेफ हार्बर) समाप्त कर दी जाएगी और उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई होगी।\n\n3. डीपीडीपी एक्ट 2023 बच्चों की ऑनलाइन प्राइवेसी किस प्रकार सेफ करता है?\nयह कानून बच्चों का डेटा प्रोसेस करने के लिए अभिभावकों की सहमति अनिवार्य बनाता है और बच्चों की ट्रैकिंग, बिहेवियर मॉनिटरिंग तथा टार्गेटेड विज्ञापनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है।\n\n4. महिलाएं और बच्चे साइबर अपराध की शिकायत किस प्रकार दर्ज कर सकते हैं?\nमहिलाएं और बच्चे नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) पर बिना अपनी पहचान उजागर किए गुमनाम रहकर शिकायत दर्ज करा सकते हैं।\n\n5. साइबर अपराध जांच के लिए फॉरेंसिक बुनियादी ढांचे के स्तर पर क्या सुधार किए गए हैं?\nदेश में 33 स्थानों पर साइबर फॉरेंसिक लैब स्थापित की गई हैं और 24 हजार से अधिक पुलिसकर्मियों को फॉरेंसिक व अपराध जांच का प्रशिक्षण दिया गया है।",
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  "publishedAt": "2026-08-05",
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