# एमबीबीएस की पढ़ाई के 13 साल बाद शैलजा पांडे को मिलेगी डिग्री, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने रद्द एडमिशन आदेश को किया खारिज

> मध्य प्रदेश में साल 2013 में एमबीबीएस पूरा करने के बाद डोमिसाइल विवाद के कारण डिग्री से वंचित रहीं शैलजा पांडे को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने रानी दुर्गावती यूनिवर्सिटी को डिग्री जारी करने और एनएमसी को तीन महीने में प्रैक्टिस संबंधी फैसला लेने का निर्देश दिया है।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-08-21 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/mbbs-ki-parhai-ke-13-sala-bada-shailja-pandey-ko-milegi-digri-madhya-pradesh-high-court-ne-radda-edamishana-adesha-ko-kiya-kharija-19561 · **Language:** Hindi
**Tags:** शैलजा पांडे, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, एमबीबीएस डिग्री, रानी दुर्गावती यूनिवर्सिटी, नेशनल मेडिकल कमीशन, डोमिसाइल विवाद

मध्य प्रदेश में प्रशासनिक लापरवाही की वजह से 13 सालों तक अपनी मेडिकल डिग्री का इंतजार करने वाली डॉक्टर शैलजा पांडे को आखिरकार कानून के दरवाजे से न्याय मिल गया है। साल 2013 में एमबीबीएस पाठ्यक्रम सफलता पूर्वक पूरा करने के बावजूद मूल निवास यानी डोमिसाइल प्रमाण पत्र से जुड़े प्रशासनिक विवाद के कारण उन्हें डिग्री और मार्कशीट नहीं दी गई थी। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की मुख्य पीठ ने इस पूरे मामले पर गंभीर संज्ञान लेते हुए 13 साल पुराने एडमिशन निरस्तीकरण के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया है। अदालत के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद जबलपुर स्थित रानी दुर्गावती यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया गया है कि वह डॉक्टर शैलजा पांडे की मार्कशीट और एमबीबीएस डिग्री बिना किसी देरी के तत्काल प्रभाव से जारी करे।

 

## डोमिसाइल प्रमाण पत्र विवाद और 13 जून 2013 का एडमिशन निरस्तीकरण

यह मामला प्रशासनिक तंत्र की बड़ी खामी को उजागर करता है। शैलजा पांडे ने मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेते समय सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध मूल निवास प्रमाण पत्र जमा किया था। उन्होंने दाखिले की प्रक्रिया के दौरान अपनी सभी जानकारियां और दस्तावेज पूरी पारदर्शिता और ईमानदारी के साथ प्रस्तुत किए थे। प्रवेश प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद उन्होंने अपनी एमबीबीएस की कठिन पढ़ाई पूरी की। हालांकि जब उनकी पढ़ाई अंतिम चरण में थी और डिग्री मिलने का समय आया, तब कॉलेज प्रशासन ने उनके डोमिसाइल प्रमाण पत्र की वैधता पर अचानक सवाल खड़े कर दिए। इसके बाद 13 जून 2013 को कॉलेज प्रशासन ने उनका दाखिला रद्द करने का एकतरफा आदेश जारी कर दिया, जिससे उनके इतने वर्षों का परिश्रम और डॉक्टर बनने का सपना अधर में लटक गया।

 

## हाईकोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की पीठ का कड़ा रुख

इस अन्याय के खिलाफ शैलजा पांडे ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की विशेष पीठ ने प्रशासनिक रवैये पर अत्यंत कठोर सवाल उठाए। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जब छात्रा शैलजा पांडे ने दाखिले के वक्त किसी भी प्रकार की जानकारी या दस्तावेज नहीं छिपाए थे, तो इसमें उनकी कोई व्यक्तिगत गलती नहीं मानी जा सकती। कोर्ट ने पूछा कि मूल निवास प्रमाण पत्र जारी करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों और कॉलेज प्रबंधन को पात्रता नियमों की पूरी जांच एडमिशन देते समय ही सही समय पर करनी चाहिए थी। जब छात्र अपनी एमबीबीएस की संपूर्ण पढ़ाई पूरी कर चुका हो, तब इतने वर्षों बाद ऐसा मुद्दा उठाना पूरी तरह अनुचित और तर्कहीन है।

 

## 13 साल लंबे कानूनी संघर्ष के बाद प्रैक्टिस के लिए नई चुनौती

अदालत के इस फैसले से शैलजा पांडे को उनकी मार्कशीट और डिग्री मिलना तय हो गया है, लेकिन 13 वर्षों तक चली इस कानूनी लड़ाई ने उनके करियर के सामने एक नई व्यावहारिक चुनौती खड़ी कर दी है। वर्ष 2013 से लेकर 2026 तक डिग्री और मेडिकल काउंसिल में अनिवार्य पंजीकरण न हो पाने की वजह से वह इतने लंबे समय तक किसी भी अस्पताल या क्लिनिक में मरीजों का इलाज नहीं कर सकीं। मेडिकल साइंस जैसे तेजी से बदलते क्षेत्र में 13 साल तक क्लिनिकल प्रैक्टिस से दूर रहने के बाद यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या वे वर्तमान समय में तुरंत प्रैक्टिस शुरू करने के लिए पूरी तरह सक्षम और अपडेटेड हैं।

 

## एनएमसी (NMC) को 3 महीने के भीतर मूल्यांकन पूरा करने का निर्देश

चिकित्सा क्षेत्र की संवेदनशीलता और डॉक्टर शैलजा पांडे के भविष्य को ध्यान में रखते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) को एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। अदालत ने एनएमसी को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वह तय नियमों के तहत यह जांच करे कि महिला डॉक्टर वर्तमान में प्रैक्टिस के लिए कितनी तैयार हैं। यदि आवश्यकता महसूस होती है, तो मेडिकल यूनिवर्सिटी उनके ज्ञान और क्लिनिकल दक्षता के आकलन के लिए एक विशेष परीक्षा आयोजित कर सकती है। हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि इस पूरी प्रक्रिया को हर हाल में 3 महीने के भीतर निपटाया जाए, ताकि 13 साल से न्याय का इंतजार कर रही डॉक्टर को आगे और विलंब का सामना न करना पड़े।

## इसका आप पर असर
- **भारत में:** मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के समय जमा किए गए मूल निवास और पात्रता प्रमाण पत्रों के सत्यापन के लिए प्रशासनिक जवाबदेही तय होगी, जिससे छात्रों के वर्षों बर्बाद होने से बचेंगे।

- **मध्य प्रदेश में:** डोमिसाइल विवाद का सामना कर रहे मेडिकल विद्यार्थियों और रानी दुर्गावती यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए यह निर्णय एक महत्वपूर्ण विधिक नजीर साबित होगा।

## सवाल-जवाब

### 1. शैलजा पांडे का एमबीबीएस दाखिला रद्द क्यों किया गया था?
एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी होने के समय कॉलेज प्रशासन ने उनके मूल निवास (डोमिसाइल) प्रमाण पत्र पर प्रशासनिक आपत्ति जताई थी, जिसके बाद 13 जून 2013 को उनका दाखिला रद्द कर दिया गया था।

### 2. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले में क्या फैसला सुनाया?
हाईकोर्ट ने साल 2013 के दाखिला निरस्तीकरण आदेश को खारिज कर दिया और जबलपुर की रानी दुर्गावती यूनिवर्सिटी को शैलजा पांडे की मार्कशीट और डिग्री तुरंत जारी करने का निर्देश दिया।

### 3. हाईकोर्ट की किस पीठ ने इस मामले की सुनवाई की?
इस मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की विशेष पीठ ने की।

### 4. हाईकोर्ट ने नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) को क्या निर्देश दिए?
कोर्ट ने एनएमसी को 3 महीने के भीतर यह तय करने का निर्देश दिया है कि 13 साल के अंतराल के बाद शैलजा पांडे मेडिकल प्रैक्टिस के लिए कितनी तैयार हैं, और जरूरत पड़ने पर विशेष परीक्षा आयोजित की जा सकती है।

### 5. क्या शैलजा पांडे ने एडमिशन के समय कोई गलत जानकारी दी थी?
नहीं, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि शैलजा पांडे ने सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी प्रमाण पत्र जमा किया था और कोई जानकारी नहीं छिपाई थी, इसलिए इसमें उनकी कोई गलती नहीं थी।

## प्रेरणा और सबक
**शैलजा पांडे के 13 साल लंबे संघर्ष से मिलने वाली प्रमुख सीख:**

- **अन्याय के खिलाफ अटूट धैर्य:** प्रशासनिक गलती से एडमिशन रद्द होने के बाद भी हौसला नहीं खोया और 13 वर्षों तक कानून के दायरे में रहकर लड़ाई जारी रखी।

- **पूर्ण पारदर्शिता का महत्व:** दाखिले के वक्त सही और प्रामाणिक दस्तावेज जमा करना ही अंततः अदालत में उनकी सबसे बड़ी ताकत और निर्दोषता का सबूत बना।

- **संवैधानिक प्रक्रिया पर दृढ़ विश्वास:** लंबी अदालती कार्रवाई के बावजूद न्याय प्रणाली पर विश्वास बनाए रखा और अपने अधिकारों की पुनर्स्थापना कराई।

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