मुगलसराय की तंग गलियों से देश के शीर्ष पद तक, लाल बहादुर शास्त्री के त्याग और ईमानदारी की अनकही दास्तान सादगी और उसूलों की मिसाल रहे देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की 122वीं जयंती पर जानिए उनके बचपन के संघर्ष, जेल यात्रा और निजी जीवन से जुड़ी प्रेरक बातें। सादगी, अटूट सत्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति की जब भी बात छिड़ती है, भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का व्यक्तित्व सबसे आगे नजर आता है। ऐतिहासिक 1965 के युद्ध में राष्ट्र को दिशा देने वाले और ‘जय जवान, जय किसान’ जैसे प्रेरणादायी उद्घोष से जवानों व अन्नदाताओं में नया जोश भरने वाले शास्त्री जी की जीवन यात्रा हर दौर में प्रेरणा देती रही है। सत्ता के शीर्ष पर बैठने के बाद भी उनका जीवन आम नागरिक जैसा ही रहा। जब परिवार के लिए एक कार की जरूरत महसूस हुई, तब भी उन्होंने पद का प्रभाव इस्तेमाल करने के बजाय बैंक से 5,000 रुपये का ऋण लिया। सादगी का आलम यह था कि उनके निधन के बाद उनकी धर्मपत्नी ललिता देवी ने अपनी पारिवारिक पेंशन के जरिए इस कर्ज की पूरी अदायगी की। पिता के साए के बिना गुजरा बचपन लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था, जो वाराणसी से लगभग सात मील की दूरी पर बसा एक छोटा सा रेलवे कस्बा है। उनके पिता एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे। परिवार पर उस समय गहरा संकट आ गया जब शास्त्री जी की उम्र महज डेढ़ साल थी और उनके पिता का अचानक देहांत हो गया। उस कठिन समय में उनकी माता जी की उम्र लगभग 20 वर्ष थी। पति के निधन के बाद तीनों मासूम संतानों के पालन-पोषण का भार उन पर आ गया, जिसके बाद वह अपने बच्चों को लेकर मायके यानी अपने पिता के घर चली गईं। गंभीर आर्थिक तंगहाली और सीमित साधनों के बीच लाल बहादुर का लालन-पालन हुआ। तपती दोपहर में नंगे पैर स्कूल का सफर प्राथमिक स्तर के बाद आगे की औपचारिक शिक्षा जारी रखने के लिए उन्हें वाराणसी में अपने चाचा के आवास पर रहना पड़ा। घर में आर्थिक संसाधन बेहद तंग थे। तेज चिलचिलाती धूप और गर्म सड़कों पर बिना जूतों या चप्पलों के नंगे पांव कई किलोमीटर पैदल चलकर विद्यालय जाना उनकी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था। अभावों के बीच बिताए इन वर्षों ने उनके भीतर आत्मसम्मान, संवेदनशीलता और संघर्ष करने की गजब की क्षमता विकसित की। कठिन परिस्थितियों से निकलकर वह देश के सर्वोच्च पद पर आसीन हुए, मगर अहंकार या तड़क-भड़क उनके आचरण में कभी नहीं आई। गांधी जी के आह्वान पर स्वाधीनता समर में कदम अल्पायु से ही उनके दिलो-दिमाग पर भारत की स्वतंत्रता की ललक छाने लगी थी। केवल 11 वर्ष की उम्र से ही वह राष्ट्रीय चेतना और आज़ादी के विमर्श से गहरे जुड़ चुके थे। जब महात्मा गांधी ने देशव्यापी असहयोग आंदोलन का बिगुल फूंका, उस समय लाल बहादुर की आयु केवल 16 साल थी। देश सेवा के संकल्प के आगे उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई को छोड़ दिया और सीधे आंदोलन में कूद पड़े। स्वाभाविक रूप से उनकी मां और नजदीकी परिजन इस फैसले से बेहद चिंतित थे और उन्हें समझा-बुझाकर रोकना चाहते थे। हालांकि लाल बहादुर जो निर्णय एक बार अपने अंतर्मन से ले लेते थे, उस पर अडिग रहने का स्वभाव उनका बचपन से ही था। देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने की इस राह में उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की जेलों में करीब सात वर्ष गुजारे। सिद्धांतों के लिए पद त्यागने की नजीर आजादी मिलने के बाद जब देश निर्माण का दौर शुरू हुआ, तब भी उन्होंने ईमानदारी और उच्च नैतिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से कभी समझौता नहीं किया। केंद्रीय रेल मंत्री के दायित्व का निर्वहन करते समय जब एक बड़ा रेल हादसा घटा, तो उन्होंने किसी और पर दोष मढ़ने के बजाय स्वयं नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए अपने पद से तत्काल इस्तीफा दे दिया। लोकतंत्र और जवाबदेही की यह मिसाल आज भी भारतीय राजनीति में अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है। 2 अक्टूबर को जब देश उनकी 122वीं जयंती मना रहा है, उनका निष्कलंक जीवन हर नागरिक को कर्तव्यपरायणता और सादगी का संदेश देता है। इसका आप पर असर सादगी और सार्वजनिक जवाबदेही के ये ऐतिहासिक दृष्टांत आज के नागरिकों और नीति-निर्माताओं को नैतिक जीवन जीने की ठोस प्रेरणा देते हैं। • आम नागरिक के लिए: यह प्रसंग सिखाता है कि सीमित आमदनी में भी स्वाभिमान और वित्तीय ईमानदारी के साथ जीवन जिया जा सकता है। शास्त्री जी का जीवन दिखाता है कि साधन कम होने पर भी उच्च लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। • सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के लिए: रेल हादसे पर दिया गया उनका त्याग यह रेखांकित करता है कि पद से बड़ा जनता के प्रति उत्तरदायित्व होता है। संस्थागत विफलता पर जवाबदेही स्वीकारना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है। • युवा पीढ़ी के लिए: 16 वर्ष की आयु में पढ़ाई छोड़कर देश सेवा का मार्ग चुनना दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रमाण है। यह युवाओं को करियर के साथ-साथ समाज और राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पित होने का पाठ पढ़ाता है। • पारिवारिक मूल्यों के स्तर पर: पेंशन से बैंक का 5,000 रुपये का कर्ज चुकाना यह साबित करता है कि पारिवारिक मान-सम्मान नियमों के पालन में है। इससे समाज में ईमानदारी और नियमबद्धता के संस्कार मजबूत होते हैं। ऐसा क्यों हुआ लाल बहादुर शास्त्री का जीवन अभावों, नैतिक बंधनों और स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक परिस्थितियों के बीच आकार लेता रहा। • पारिवारिक संकट और गरीबी: महज डेढ़ साल की उम्र में पिता के निधन के बाद परिवार पूरी तरह बिखरने की कगार पर था। मां के मायके में रहने और सीमित संसाधनों के कारण उन्हें नंगे पांव स्कूल जाने जैसी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। • राष्ट्रीय चेतना का उभार: महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन ने देश के लाखों किशोरों को प्रेरित किया। शास्त्री जी 11 वर्ष की उम्र से ही आजादी के विमर्श से जुड़ चुके थे, जिसने 16 वर्ष की आयु में पढ़ाई छोड़ने का मार्ग प्रशस्त किया। • नैतिक मूल्यों के प्रति निष्ठा: मंत्री या प्रधानमंत्री रहते हुए भी निजी लाभ न उठाना उनके संस्कारों की देन था। यही वजह थी कि कार के लिए बैंक से 5,000 रुपये का सामान्य कर्ज लिया गया और रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ा गया। सवाल-जवाब 1. लाल बहादुर शास्त्री का जन्म कब और कहां हुआ था? उनका जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश में वाराणसी से करीब सात मील दूर मुगलसराय के एक छोटे से रेलवे कस्बे में हुआ था। 2. शास्त्री जी के पिता का निधन किस उम्र में हुआ था? जब लाल बहादुर शास्त्री महज डेढ़ साल के थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया था और उस समय उनकी मां की उम्र लगभग 20 वर्ष थी। 3. उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए किस उम्र में पढ़ाई छोड़ी थी? महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के आह्वान पर उन्होंने मात्र 16 साल की उम्र में अपनी स्कूली पढ़ाई छोड़ दी थी। 4. शास्त्री जी ने ब्रिटिश हुकूमत के दौरान जेल में कितना समय बिताया? देश की आजादी की लड़ाई लड़ते हुए उन्होंने ब्रितानी हुकूमत की जेलों में करीब सात साल का समय गुजारा था। 5. कार खरीदने के लिए उन्होंने कितना कर्ज लिया था और उसे किसने चुकाया? उन्होंने कार खरीदने के लिए बैंक से 5,000 रुपये का लोन लिया था, जिसे उनके निधन के बाद उनकी पत्नी ललिता देवी ने अपनी पेंशन से चुकाया। 6. रेल मंत्री के पद से लाल बहादुर शास्त्री ने इस्तीफा क्यों दिया था? एक भीषण रेल दुर्घटना होने के बाद उन्होंने किसी अन्य पर दोष मढ़ने के बजाय स्वयं नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया था। प्रेरणा और सबक अभावों में पले-बढ़े एक साधारण व्यक्ति का देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचना और जीवन भर बेदाग रहना अद्वितीय सबक सिखाता है। • संकल्प की शक्ति: 16 वर्ष की आयु में पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम का चुनाव करना दिखाता है कि जब लक्ष्य बड़ा हो, तो कठिन निर्णय लेने से पीछे नहीं हटना चाहिए। • सादगी और ईमानदारी: देश का प्रधानमंत्री होने के बावजूद 5,000 रुपये के बैंक लोन पर निर्भर रहना यह सिखाता है कि पद की गरिमा सादगी और वित्तीय शुचिता से बढ़ती है। • सच्ची जवाबदेही: रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मंत्री पद छोड़ना यह सबक देता है कि नेतृत्व में दूसरों पर दोष मढ़ने के बजाय स्वयं उत्तरदायित्व स्वीकारना ही महानता है। • विपरीत हालातों में धैर्य: पिता के न रहने और तपती धूप में नंगे पैर स्कूल जाने के बावजूद उन्होंने कभी परिस्थितियों को अपनी प्रगति की बाधा नहीं बनने दिया। https://trendkia.com/national/mughalsarai-ki-tnga-galiyon-se-desha-ke-shirsha-pada-taka-lal-bahadur-shastri-ke-tyaga-aura-imanadari-ki-anakahi-dastana-41380 TrendKia — Har trend, sabse pehle.