म्यूनिख में जयशंकर ने साफ किया भारत का रुख, 1950 के दशक से रूस के साथ साझेदारी को ऐतिहासिक अनुभवों और राष्ट्रीय हितों पर आधारित बताया विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में स्पष्ट किया कि भारत के रूस के साथ संबंध पश्चिमी दबाव के बजाय राष्ट्रीय हितों और 1950 के दशक से चले आ रहे ऐतिहासिक अनुभवों से तय होते हैं। उन्होंने यूक्रेन संघर्ष पर कूटनीतिक समाधान और व्यावहारिक मुद्दों पर संवाद की वकालत की। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पक्ष रखते हुए भारत ने रूस के साथ अपने ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंधों को लेकर एक बार फिर स्पष्ट संदेश दिया है। म्यूनिख लीडर्स मीटिंग के दौरान द्विपक्षीय संबंधों के भविष्य पर चर्चा में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि नई दिल्ली की कूटनीति किसी पश्चिमी भू-राजनीतिक खेमे के दबाव या प्राथमिकताओं से तय नहीं होती। भारत के सभी वैश्विक फैसले उसके अपने राष्ट्रीय हितों, रणनीतिक जरूरतों और लंबे ऐतिहासिक अनुभवों की ठोस बुनियाद पर आधारित होते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में दोनों देशों की साझेदारी की ऐतिहासिक गहराई को भुलाया नहीं जा सकता। 1950 के दशक की ऐतिहासिक विरासत और सुरक्षा चुनौतियां विदेश मंत्री ने दोनों देशों के शुरुआती संबंधों का उल्लेख करते हुए बताया कि भारत और रूस के बीच 1950 के दशक से ही गहरे और मजबूत रिश्ते रहे हैं। उन्होंने उस जटिल कालखंड का स्मरण कराया जब भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के समक्ष गंभीर चुनौतियां खड़ी थीं। उस कठिन दौर में जब दुनिया के कई प्रमुख देश भारत के पड़ोसी सैन्य शासन के समर्थन में लामबंद थे, तब सोवियत संघ ने कई महत्वपूर्ण मौकों पर भारत का दृढ़ता से साथ दिया था। एस. जयशंकर के अनुसार, भारत के साथ उस दौर में बने संबंध पूरी तरह अलग और भरोसेमंद साबित हुए थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज जब भी दोनों देशों के संबंधों की समीक्षा की जाती है, तो इस ऐतिहासिक विरासत और सहयोग को कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। समय बीतने के साथ इन रिश्तों में बदलाव आया है और इसका दायरा लगातार विस्तृत हुआ है। रक्षा क्षेत्र से आगे बढ़कर ऊर्जा, व्यापार और तकनीक तक विस्तार भारत और रूस के द्विपक्षीय संबंधों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह रही है कि यह केवल पारंपरिक रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं रहा। शीत युद्ध के दौर में दोनों पक्षों के बीच रक्षा साझेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण थी, लेकिन वर्तमान समय में यह सहयोग ऊर्जा, व्यापक व्यापार, प्रत्यक्ष निवेश, असैन्य परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे अहम रणनीतिक क्षेत्रों तक फैल चुका है। विदेश मंत्री ने रेखांकित किया कि सैन्य और परमाणु सहयोग के समानांतर दोनों देशों के बीच बड़े पैमाने पर व्यापारिक और निवेश गतिविधियां संचालित हो रही हैं। ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों के क्षेत्र में रूस भारत का एक बेहद अहम साझेदार बना हुआ है। एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया कि रूस के साथ भारत का अनुभव अब तक लगातार सकारात्मक रहा है, यही कारण है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय खेमेबंदी के बावजूद भारत इस साझेदारी को अपने राष्ट्रीय हितों के चश्मे से देखता है। यूक्रेन युद्ध पर कूटनीतिक समाधान और बातचीत का आह्वान द्विपक्षीय संबंधों पर विचार रखते हुए विदेश मंत्री ने रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध पर भी भारत की नीति को पूरी स्पष्टता के साथ दोहराया। उन्होंने कहा कि भारत युद्ध का तत्काल अंत चाहता है और इस संघर्ष का स्थायी समाधान केवल कूटनीति, बातचीत और आपसी संवाद के जरिए ही निकाला जा सकता है। भारत शुरू से ही दोनों पक्षों से यह अपील करता रहा है कि वे वार्ता की मेज पर लौटें। हाल के महीनों में भारत ने इस दिशा में अपनी सक्रिय कूटनीतिक भागीदारी बढ़ाई है। नई दिल्ली ने रूस और यूक्रेन दोनों के शीर्ष नेतृत्व के साथ निरंतर संवाद बनाए रखा है ताकि दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक बातचीत का रास्ता पूरी तरह खुला रहे और तनाव कम करने के रास्ते तलाशे जा सकें। व्यावहारिक मुद्दों पर मध्यस्थता और समाधान की दिशा विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत की भूमिका केवल युद्ध समाप्त करने की औपचारिक अपील करने तक सीमित नहीं है। इसके बजाय भारत दोनों पक्षों के साथ कई व्यावहारिक और तत्काल चिंताओं पर रचनात्मक बातचीत में शामिल रहा है। इनमें ब्लैक सी में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने का मुद्दा प्रमुख रहा है, जिससे वैश्विक खाद्य आपूर्ति बाधित न हो। इसके अतिरिक्त अनाज निर्यात, ऊर्जा निर्यात और एक-दूसरे के महत्वपूर्ण ठिकानों पर हमले न करने की संभावनाओं जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी दोनों पक्षों की प्राथमिकताओं और चिंताओं को समझने का प्रयास किया जा रहा है। भारत का प्राथमिक उद्देश्य उन विशिष्ट क्षेत्रों में व्यावहारिक समाधान निकालना है जहां तत्काल प्रगति संभव हो सकती है और आम जनजीवन से जुड़ी समस्याओं को कम किया जा सकता है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच स्वतंत्र विदेश नीति की निरंतरता एस. जयशंकर का यह वक्तव्य ऐसे महत्वपूर्ण समय में सामने आया है जब यूक्रेन संघर्ष के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं। पश्चिमी देश अपने सहयोगी राष्ट्रों से भी यह अपेक्षा कर रहे थे कि वे मास्को के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों पर पुनर्विचार करें। इसके बावजूद भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अडिग रुख बनाए रखा है कि उसकी संप्रभु विदेश नीति किसी बाहरी दबाव या निर्देश से संचालित नहीं होगी। रूस के साथ दशकों पुराने रक्षा संबंध, भारत की विशाल ऊर्जा जरूरतें, व्यापारिक हित और दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी इस नीति के सबसे मजबूत आधार स्तंभ बने हुए हैं। इसका आप पर असर भारत की संतुलित कूटनीति देश की ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों को नियंत्रित रखने में सीधी मदद करती है। • ऊर्जा कीमतों पर असर: रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल और प्राकृतिक संसाधनों की आपूर्ति निर्बाध बनी रहती है। इससे भारतीय उपभोक्ताओं और उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार के भारी उतार-चढ़ाव से राहत मिलती है। • राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा आपूर्ति: भारतीय सशस्त्र बलों के लिए महत्वपूर्ण सैन्य उपकरणों और कलपुर्जों की उपलब्धता सुनिश्चित होती है। इससे सीमा सुरक्षा और राष्ट्रीय रक्षा तैयारियों में किसी भी प्रकार का व्यवधान नहीं आता। • अंतरराष्ट्रीय व्यापार और अर्थव्यवस्था: प्रतिबंधों के वैश्विक माहौल में भी वैकल्पिक भुगतान और व्यापारिक रास्ते खुले रहते हैं। भारतीय आयातकों और निर्यातकों को नए बाजारों और संसाधनों तक सुरक्षित पहुंच प्राप्त होती है। • वैश्विक मंच पर स्वतंत्र पहचान: किसी एक गुट में शामिल न होने से भारत एक विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में उभरता है। इससे वैश्विक संकटों के समाधान में भारतीय कूटनीति का प्रभाव और सम्मान बढ़ता है। ऐसा क्यों हुआ विदेश मंत्री का यह बयान पश्चिमी देशों द्वारा भारत-रूस साझेदारी पर लगातार उठाए जा रहे सवालों और यूक्रेन संघर्ष के भू-राजनीतिक दबाव के बीच आया है। ऐतिहासिक रूप से दोनों देशों के संबंधों ने कई सुरक्षा संकटों में भारत की संप्रभुता का समर्थन किया है। • ऐतिहासिक सुरक्षा साझेदारी: 1950 के दशक और उसके बाद के तनावपूर्ण दौर में सोवियत संघ ने भारत की संप्रभुता का निरंतर साथ दिया था। उस समय पश्चिमी शक्तियां पड़ोसी सैन्य शासन के समर्थन में खड़ी थीं, जिससे गहरा रणनीतिक भरोसा स्थापित हुआ। • व्यावहारिक रणनीतिक और आर्थिक आवश्यकताएं: वर्तमान समय में भारत को अपनी विशाल आबादी के लिए ऊर्जा, रक्षा तंत्र और अंतरिक्ष तकनीक में भरोसेमंद साझेदार चाहिए। रूस इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारत की प्रमुख जरूरतों को पूरा करने में सक्षम रहा है। • यूक्रेन संकट पर मध्यस्थता की गुंजाइश: भारत का मानना है कि दोनों पक्षों के साथ खुले संवाद के बिना शांति संभव नहीं है। इसलिए भारत ब्लैक सी जहाजरानी और ऊर्जा आपूर्ति जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर बातचीत को बढ़ावा दे रहा है। सवाल-जवाब 1. विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत-रूस संबंधों पर क्या बयान दिया? उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की विदेश नीति किसी पश्चिमी खेमे के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों, रणनीतिक जरूरतों और 1950 के दशक से चले आ रहे सकारात्मक ऐतिहासिक अनुभवों पर आधारित है। 2. 1950 के दशक का उल्लेख जयशंकर ने क्यों किया? उन्होंने याद दिलाया कि जब भारत की सुरक्षा को चुनौतियां थीं और अन्य शक्तियां पड़ोसी सैन्य शासन के साथ थीं, तब सोवियत संघ ने भारत का दृढ़ता से साथ दिया था। 3. भारत और रूस के बीच सहयोग किन क्षेत्रों में फैला हुआ है? दोनों देशों का सहयोग रक्षा, असैन्य परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष तकनीक, बड़े पैमाने पर व्यापार, निवेश और ऊर्जा संसाधनों तक विस्तृत है। 4. यूक्रेन संघर्ष को लेकर भारत का क्या रुख है? भारत चाहता है कि युद्ध समाप्त हो और इसका समाधान कूटनीति, बातचीत और शांतिपूर्ण संवाद के जरिए निकाला जाए। 5. भारत किन व्यावहारिक मुद्दों पर दोनों पक्षों से बात कर रहा है? भारत ब्लैक सी में सुरक्षित जहाजरानी, अनाज निर्यात, ऊर्जा निर्यात और एक-दूसरे के अहम ठिकानों पर हमले न करने जैसे तात्कालिक मुद्दों पर चर्चा कर रहा है। 6. पश्चिमी प्रतिबंधों पर भारत का क्या दृष्टिकोण है? भारत ने स्पष्ट किया है कि उसकी विदेश नीति किसी बाहरी देश के दबाव में नहीं, बल्कि संप्रभु हितों और रक्षा व ऊर्जा जरूरतों के आधार पर तय होती है। 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