# नाबालिगों के सोशल मीडिया अनुबंधों पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक, केंद्र लाएगा सख्त कानूनी नियम

> सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों द्वारा सोशल मीडिया पर फर्जी उम्र डालकर अकाउंट खोलने और कानूनी अनुबंध पर सहमति जताने को अमान्य ठहराया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की ओर से आईटी नियमों के तहत कड़े कानूनी प्रावधान लागू करने की सहमति दी है।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-09-29 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/nabaligon-ke-soshala-midiya-anubndhon-para-supreme-court-ki-do-tuka-kendra-laega-sakhta-kanuni-niyama-40016 · **Language:** Hindi
**Tags:** सुप्रीम कोर्ट, सोशल मीडिया, आईटी नियम, बाल सुरक्षा, सूर्यकांत, तुषार मेहता, फेसबुक, इंस्टाग्राम

इंटरनेट के मौजूदा दौर में कम उम्र बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर देश की शीर्ष अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे विशाल सोशल मीडिया मंचों पर नाबालिगों के बेधड़क प्रवेश तथा गलत जन्मतिथि दर्ज करके बनाए जा रहे खातों की परिपाटी पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने गहरी चिंता व्यक्त की है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कानूनी पहलू को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी सोशल मीडिया मंच की सेवा शर्तों पर सहमति देना वस्तुतः एक संविदा यानी कानूनी अनुबंध होता है। भारतीय कानूनों के प्रावधानों के तहत कोई भी नाबालिग वैध अनुबंध करने की कानूनी पात्रता नहीं रखता। इस बिंदु पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायालय से पूर्ण सहमति व्यक्त करते हुए भरोसा दिलाया कि इस विषय पर ठोस कार्रवाई होगी और आवश्यक कानूनी कदम उठाए जाएंगे। इसके बाद केंद्र सरकार इन व्यवस्थाओं को केवल औपचारिक परामर्श या गाइडलाइन तक सीमित न रखकर सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत कठोर कानूनी रूप देने की दिशा में सक्रिय हो गई है, जिससे टेक कंपनियों की कार्यप्रणाली पर कड़ा नियंत्रण स्थापित किया जा सके।

## याचिका की मुख्य मांगें और अदालत की वैधानिक व्याख्या
यह महत्वपूर्ण कानूनी विमर्श गैर सरकारी संगठन जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस की ओर से दाखिल की गई जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ता संगठन ने देश भर में बच्चों को डिजिटल खतरों से बचाने के लिए तकनीकी फायरवॉल स्थापित करने और कड़े वैधानिक नियम लागू करने का आग्रह किया है। मामले की सुनवाई करते हुए पीठ में शामिल जस्टिस जोयमाल्या बागची ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के समक्ष कानूनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया पर नया अकाउंट पंजीकृत करते समय प्रत्येक प्रयोक्ता को सेवा शर्तों को स्वीकार करना पड़ता है, जो विधि के समक्ष पूरी तरह से एक बाध्यकारी अनुबंध है।

भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 11 के विधिक प्रावधानों के अनुसार 12 अथवा 15 वर्ष जैसे कम उम्र के बच्चे किसी भी प्रकार का वैध अनुबंध करने के लिए सक्षम नहीं माने जाते। कानून की नजर में नाबालिगों द्वारा किए गए ऐसे सभी समझौते शुरू से ही शून्य और निष्प्रभावी होते हैं। न्यायालय के इस तार्किक विश्लेषण का समर्थन करते हुए सॉलिसिटर जनरल ने भी माना कि यह स्थिति कानूनी रूप से अमान्य अनुबंध की श्रेणी में आती है और इसमें व्यवस्थागत सुधार अनिवार्य है।

## कागजी निर्देशों की जगह आईटी नियमों में वैधानिक शक्ति
अदालत ने सुनवाई के दौरान इस बात पर विशेष बल दिया कि बच्चों की डिजिटल हिफाजत से जुड़े सुरक्षा मानक केवल कागजों पर लिखी सलाह अथवा स्वैच्छिक दिशा-निर्देश बनकर नहीं रहने चाहिए। अदालत का मत है कि सरकार को इन प्रावधानों को सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के अंतर्गत वैधानिक और अनिवार्य रूप प्रदान करना चाहिए, ताकि इनका उल्लंघन होने पर जवाबदेही तय की जा सके। इस कानूनी प्रक्रिया में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के साथ-साथ विधि और न्याय मंत्रालय को भी औपचारिक रूप से पक्षकार बनाया गया है, जिससे तकनीकी और कानूनी दोनों स्तरों पर सुदृढ़ व्यवस्था बनाई जा सके।

## सोशल मीडिया पर बच्चों से जुड़े गंभीर खतरे
जनहित याचिका में विस्तार से बताया गया है कि इंटरनेट की दुनिया में सक्रिय बच्चे किन भयावह चुनौतियों और अपराधों के जोखिम से घिरे रहते हैं। इनमें ऑनलाइन ग्रूमिंग, सेक्सटॉर्शन, साइबरबुलिंग, यौन शोषण तथा बच्चों के व्यक्तिगत डेटा के अवैध दोहन जैसी विकट समस्याएं शामिल हैं। याचिका में यह गंभीर तथ्य भी उजागर किया गया है कि फेसबुक और स्नैपचैट जैसे प्रमुख वैश्विक प्लेटफॉर्म बच्चों को केवल अपनी इच्छा से चुनी गई जन्मतिथि के आधार पर 13 वर्ष या उससे अधिक आयु का मानकर स्वतंत्र खाता खोलने की छूट दे रहे हैं।

यह व्यवस्था भारतीय कानून के मूलभूत सिद्धांतों के सीधे तौर पर विपरीत है, क्योंकि भारत में 18 वर्ष से कम आयु के प्रत्येक व्यक्ति को विधिक रूप से नाबालिग माना गया है। उम्र सत्यापन की ठोस व्यवस्था न होने के कारण सुरक्षा के सभी मौजूदा दावे विफल साबित हो रहे हैं।

## पूर्ण प्रतिबंध नहीं बल्कि अभिभावकों की अनुमति और तकनीकी पहरा
याचिकाकर्ता पक्ष ने यह भी स्पष्ट किया है कि उनकी मांग बच्चों के इंटरनेट प्रयोग पर पूरी तरह से पाबंदी लगाने की कतई नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य एक ऐसा सुरक्षित डिजिटल वातावरण तैयार करना है, जहां कोई भी नाबालिग सोशल मीडिया मंचों का उपयोग करने से पहले अपने माता-पिता अथवा कानूनी अभिभावक की स्पष्ट सहमति प्राप्त करे। इसके अतिरिक्त, बच्चों द्वारा अपनी मर्जी से स्वतंत्र रूप से सीधे खाते तैयार करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए स्वचालित तकनीकी फायरवॉल का उपयोग अनिवार्य करने की मांग उठाई गई है। अब शीर्ष अदालत के इस कड़े रुख के उपरांत केंद्र सरकार को अपनी कार्ययोजना तय करनी है, जिससे सोशल मीडिया पर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नए वैधानिक नियमों को जमीन पर उतारा जा सके।

## इसका आप पर असर
सुप्रीम कोर्ट की इस सख्ती और केंद्र सरकार के संभावित नियमों से बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर बड़ा असर पड़ेगा।

- **अभिभावकों पर असर:** माता-पिता को अब बच्चों के किसी भी नए सोशल मीडिया अकाउंट के लिए औपचारिक सहमति देनी पड़ सकती है। बिना अभिभावक की पुष्टि के 18 साल से कम उम्र के बच्चों का खाता बनाना नामुमकिन हो जाएगा।
- **बच्चों की डिजिटल प्राइवेसी:** फर्जी जन्मतिथि डालकर सीधे अकाउंट बनाने का रास्ता बंद होने से नाबालिगों का निजी डेटा कंपनियों के सीधे हाथ नहीं लगेगा। इससे बच्चों को ऑनलाइन साइबरबुलिंग और ग्रूमिंग जैसे अपराधों से सुरक्षा मिलेगी।
- **सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर असर:** फेसबुक, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट जैसी कंपनियों को उम्र सत्यापन के लिए सख्त तकनीकी फायरवॉल लागू करने होंगे। महज सेल्फ-डिक्लेरेशन के आधार पर 13 साल के बच्चों को अकाउंट खोलने देने की छूट समाप्त हो सकती है।
- **कानूनी अनुबंधों की वैधता:** 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों द्वारा सेवा शर्तों को स्वीकार करने को अवैध माना जाएगा, जिससे टेक कंपनियों की मनमानी पर लगाम लगेगी। कंपनियों को भारतीय अनुबंध अधिनियम के अनुरूप अपनी नीतियों में अनिवार्य बदलाव करने होंगे।

## ऐसा क्यों हुआ
सर्वोच्च न्यायालय में यह मामला एक गैर-सरकारी संगठन द्वारा बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर दायर की गई जनहित याचिका के कारण उठा।

- **फर्जी जन्मतिथि से अकाउंट निर्माण:** फेसबुक, स्नैपचैट और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म केवल प्रयोक्ता द्वारा चुनी गई जन्मतिथि पर भरोसा करके 13 वर्ष से ऊपर के बच्चों को सीधे अकाउंट बनाने देते हैं। उम्र का कोई स्वतंत्र सत्यापन न होने के कारण लाखों नाबालिग बिना किसी निगरानी के खतरनाक सामग्री और शोषण के संपर्क में आ रहे हैं।
- **कानूनी अनुबंध की विधिक खामी:** डिजिटल सेवा शर्तों पर क्लिक करना एक वैध अनुबंध माना जाता है, जबकि भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 11 के तहत नाबालिग अनुबंध करने में कानूनी रूप से अक्षम हैं। अदालत ने पाया कि यह व्यवस्था कानूनन शुरू से ही अमान्य है और इसे केवल कंपनियों के स्व-नियमन पर नहीं छोड़ा जा सकता।
- **ऑनलाइन अपराधों की बढ़ती चुनौतियां:** सोशल मीडिया पर नाबालिगों को ऑनलाइन ग्रूमिंग, सेक्सटॉर्शन, साइबरबुलिंग, यौन शोषण और डेटा दुरुपयोग का गंभीर खतरा झेलना पड़ रहा है। एनजीओ जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस ने इसी पृष्ठभूमि में आईटी नियमों के तहत अनिवार्य सुरक्षा उपायों और फायरवॉल की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया।

## सवाल-जवाब

### 1. सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर क्या चिंता जताई है?
कोर्ट ने कहा कि बच्चे फर्जी जन्मतिथि के सहारे अकाउंट बना रहे हैं और डिजिटल सेवा शर्तों को स्वीकार कर रहे हैं, जबकि कानूनन नाबालिग कोई वैध अनुबंध नहीं कर सकते।

### 2. भारतीय कानून के तहत नाबालिगों द्वारा किया गया अनुबंध अमान्य क्यों है?
भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 11 के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति अनुबंध करने के योग्य नहीं होते और उनके द्वारा किए गए समझौते शुरुआत से ही अमान्य होते हैं।

### 3. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में क्या आश्वासन दिया?
सॉलिसिटर जनरल ने सहमति जताई कि यह एक अमान्य अनुबंध है और केंद्र सरकार केवल दिशा-निर्देश देने के बजाय आईटी नियमों के तहत कड़े कानूनी प्रावधान लागू करेगी।

### 4. यह याचिका किस संगठन ने दायर की थी?
यह जनहित याचिका जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस नामक गैर-सरकारी संगठन द्वारा दायर की गई थी।

### 5. याचिका में सोशल मीडिया पर बच्चों के सामने किन खतरों का उल्लेख किया गया है?
याचिका में ऑनलाइन ग्रूमिंग, सेक्सटॉर्शन, साइबरबुलिंग, यौन शोषण और निजी डेटा के गलत इस्तेमाल को बच्चों के लिए प्रमुख खतरा बताया गया है।

### 6. क्या याचिका में बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर पूरी तरह पाबंदी लगाने की मांग की गई है?
नहीं, याचिका में इंटरनेट पर पूर्ण रोक की बजाय माता-पिता की सहमति और बच्चों को सीधे अकाउंट बनाने से रोकने के लिए ऑटोमेटेड टेक्निकल फायरवॉल की मांग की गई है।

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