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  "title": "नए वोटरों के फॉर्म-6 में अनधिकृत बदलाव पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सीजेआई सूर्यकांत ने चुनाव आयोग से मांगा जवाब",
  "summary": "सुप्रीम कोर्ट ने नए मतदाताओं के पंजीकरण वाले फॉर्म-6 में बिना वैधानिक संशोधन बदलाव किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताते हुए स्पष्ट किया कि इस परिवर्तन को शीर्ष अदालत की कोई मंजूरी नहीं थी और आयोग की रिपोर्ट के बाद जिम्मेदार व्यक्ति की भूमिका जांची जाएगी।",
  "content": "देश में पहली बार मतदाता बनने वाले नागरिकों के पंजीकरण हेतु तय फॉर्म-6 में बिना आधिकारिक संशोधन बदलाव किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने दो टूक शब्दों में कहा कि शीर्ष अदालत ने इस फॉर्म में किसी भी तरह के फेरबदल को अपनी स्वीकृति नहीं दी है। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग से तलब की गई रिपोर्ट आने के बाद इस बात की गहन जांच की जाएगी कि यह अनधिकृत बदलाव आखिर किसके निर्देश पर और किस स्तर पर किया गया था।\n\nसीईसी के अधिकारों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई\nसुप्रीम कोर्ट में यह मामला मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अधिकारों और कार्यप्रणाली को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया। सोमवार को हुई इस अहम सुनवाई में याचिकाकर्ताओं की ओर से दलीलें पेश करते हुए अदालत को बताया गया कि चुनाव आयोग ने अपने ऑनलाइन पोर्टल पर मौजूद फॉर्म-6 के प्रारूप में ऐसे प्रावधान जोड़ दिए हैं, जिन्हें कानूनी तौर पर कोई मंजूरी हासिल नहीं थी। अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दायर इस याचिका में आयोग के आंतरिक प्रशासनिक फैसलों पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।\n\nमाता-पिता की जानकारी और एसआईआर की नई शर्तें\nनए मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल करने के लिए उपयोग किए जाने वाले फॉर्म-6 से जुड़ी प्रक्रिया समझाते हुए याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने अदालत के समक्ष विस्तृत जानकारी रखी। उन्होंने बताया कि दिल्ली में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर के दौरान फॉर्म-6 में दो नई शर्तें जोड़ दी गईं। इन बदली हुई शर्तों के आधार पर नए आवेदकों को बाकायदा नोटिस भी जारी किए जाने लगे। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि फॉर्म में पहली बार जोड़े गए इस नए हिस्से में आवेदक से उनके माता-पिता से संबंधित विवरण मांगे गए, विशेषकर यह स्पष्ट करने को कहा गया कि क्या उनके माता-पिता पूर्व में हुए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन एसआईआर के समय मतदाता सूची में दर्ज थे अथवा नहीं। वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी रेखांकित किया कि उन्हें स्वयं भी ऐसा नोटिस प्राप्त हुआ और अब इस बदले हुए फॉर्म के आधार पर नए मतदाताओं के नाम जोड़ने से रोके जा रहे हैं।\n\nनियम 1960 में संशोधन के बिना पोर्टल पर बदलाव\nइस पूरे कानूनी विवाद का सबसे अहम पहलू यह है कि रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स 1960 के अंतर्गत वैधानिक रूप से अधिसूचित फॉर्म-6 में आधिकारिक तौर पर कोई संशोधन किया ही नहीं गया था। अदालत में उठाई गई मुख्य आपत्ति यही है कि जब संसद अथवा संबंधित वैधानिक नियमों के तहत आधिकारिक बदलाव हुआ ही नहीं, तो फिर आयोग के ऑनलाइन पोर्टल पर इसे किस अधिकार से और किस आधार पर लागू कर दिया गया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने महानिदेशक आईटी के साथ मिलकर जुलाई 2026 में ECINET पोर्टल पर फॉर्म-6 के प्रारूप को बदल दिया था।\n\nआयोग के भीतर असहमति और व्यक्तिगत जवाबदेही की मांग\nयाचिका में यह चौंकाने वाला दावा भी किया गया है कि इस बदलाव पर चुनाव आयोग के भीतर ही गहरा मतभेद था। याचिका के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने इस कदम को पूरी तरह अनधिकृत और गैरकानूनी करार दिया था तथा इस आदेश को तत्काल वापस लेने का आग्रह किया था। इसके बावजूद इस संशोधित फॉर्म को पोर्टल से नहीं हटाया गया और यह लंबे समय तक ऑनलाइन उपलब्ध बना रहा। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पहली बार मतदान करने के पात्र युवाओं के संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों से जुड़े फॉर्म-6 में रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स 1960 में बदलाव किए बिना छेड़छाड़ की गई है, जो कानून की दृष्टि से गंभीर उल्लंघन है। इस आधार पर याचिका में मांग की गई है कि इस अनधिकृत कदम के लिए जिम्मेदार संबंधित व्यक्ति पर व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।\n\nसुप्रीम कोर्ट की दो टूक: रिपोर्ट में देखेंगे फैसला किसने लिया\nवरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी की दलीलों को गंभीरता से लेते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 में किए गए किसी भी बदलाव को मंजूरी नहीं दी है। उन्होंने साफ किया कि आयोग से जो रिपोर्ट मांगी गई है, उसमें यह परखा जाएगा कि क्या यह निर्णय पूरे आयोग द्वारा सर्वसम्मति से लिया गया था या फिर इसे बिना उचित सहमति के थोपा गया। मुख्य न्यायाधीश ने दोहराया कि यदि यह बदलाव गैरकानूनी तरीके से अंजाम दिया गया है, तो अदालत यह अवश्य देखेगी कि इसके पीछे वास्तविक रूप से कौन व्यक्ति था।\n\nइसका आप पर असर\nयह अदालती हस्तक्षेप उन सभी युवाओं और नए मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करता है जो बिना कानूनी नियमों के जटिल सत्यापन और नोटिस का सामना कर रहे थे।\n\n• भारत में: देशभर में 18 वर्ष की आयु पूरी कर पहली बार मतदाता बनने के इच्छुक युवाओं के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया आसान बनी रहेगी। यदि सुप्रीम कोर्ट पोर्टल पर जोड़े गए अतिरिक्त नियमों को रद्द करता है तो आवेदकों को गैर-जरूरी हलफनामों और दस्तावेजी नोटिस से राहत मिलेगी।\n• दिल्ली में: दिल्ली के निवासियों को स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के तहत फॉर्म-6 भरने पर अतिरिक्त माता-पिता की मतदाता स्थिति साबित करने के नोटिस से छुटकारा मिल सकता है। जिन आवेदकों के नाम इस आधार पर रोके गए थे, उनके आवेदनों पर चुनाव आयोग को पुनः सामान्य नियमों से विचार करना पड़ सकता है।\n• आवेदकों के अधिकार: नए मतदाताओं को फॉर्म भरते समय केवल वही जानकारी देनी होगी जो रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स 1960 के तहत वैधानिक रूप से तय है। किसी भी पोर्टल स्तर पर किए गए आंतरिक बदलाव के आधार पर नाम खारिज किए जाने पर आवेदक कानूनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।\n• प्रशासनिक पारदर्शिता: चुनाव आयोग के ऑनलाइन पोर्टल्स पर किसी भी फॉर्म में फेरबदल के लिए अब सख्त कानूनी जवाबदेही तय होगी। प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा बिना नियम संशोधन के अपनी मर्जी से शर्तें थोपने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह विवाद तब उत्पन्न हुआ जब चुनाव आयोग के डिजिटल पोर्टल पर पहली बार पंजीकरण करने वाले नागरिकों के फॉर्म में बिना किसी वैधानिक अधिसूचना के नए सवाल जोड़ दिए गए।\n\n• पोर्टल पर अनधिकृत संशोधन: आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और आईटी महानिदेशक द्वारा जुलाई 2026 में ECINET पोर्टल पर फॉर्म-6 में संशोधन किया गया। यह बदलाव रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स 1960 में आवश्यक आधिकारिक संशोधन किए बिना सीधे ऑनलाइन लागू कर दिया गया।\n• अतिरिक्त सत्यापन शर्तें: स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के दौरान फॉर्म-6 में आवेदक से उसके माता-पिता के पूर्व मतदाता पंजीकरण का विवरण मांगा जाने लगा। इसके चलते कई पात्र आवेदकों को नोटिस भेजे गए और उनके नाम मतदाता सूची में जोड़ने पर रोक लगाई गई।\n• आयोग में आंतरिक असहमति: चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने इस कदम को नियमों के विरुद्ध मानकर आदेश वापस लेने की अपील की थी। इसके बावजूद संशोधित फॉर्म पोर्टल पर बना रहा, जिसके चलते मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।\n• सर्वसम्मति की जांच: सुप्रीम कोर्ट अब यह जांच कर रहा है कि क्या यह फैसला आयोग की सर्वसम्मति से लिया गया था अथवा किसी अधिकारी ने अपने स्तर पर मनमाना आदेश जारी किया था।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर क्या टिप्पणी की?\nमुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि शीर्ष अदालत ने फॉर्म-6 में किसी भी बदलाव को मंजूरी नहीं दी है और आयोग की रिपोर्ट के बाद देखा जाएगा कि यह बदलाव किसने किया।\n\n2. फॉर्म-6 में क्या नई शर्तें जोड़ी गई थीं?\nफॉर्म में आवेदक के माता-पिता की जानकारी मांगी गई थी, विशेष रूप से यह कि क्या वे पिछली स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) मतदाता सूची में शामिल थे।\n\n3. फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर मुख्य कानूनी विवाद क्या है?\nविवाद यह है कि रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स 1960 में कोई आधिकारिक संशोधन किए बिना ही ऑनलाइन पोर्टल पर यह बदलाव लागू कर दिया गया था।\n\n4. याचिका में किन अधिकारियों पर आरोप लगाए गए हैं?\nयाचिका में आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने महानिदेशक आईटी के साथ मिलकर जुलाई 2026 में ECINET पोर्टल पर यह फेरबदल किया था।\n\n5. क्या चुनाव आयोग के भीतर इस बदलाव पर कोई आपत्ति जताई गई थी?\nयाचिका के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने इसे अनधिकृत और गैरकानूनी मानते हुए इस आदेश को वापस लेने की अपील की थी।",
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  "category": "भारत",
  "publishedAt": "2026-10-05",
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