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  "type": "article",
  "title": "नेशनल कॉन्फ्रेंस के बदलते रुख से केंद्र और कश्मीर के बीच अविश्वास पैदा हुआ, महबूबा मुफ्ती का बड़ा हमला",
  "summary": "पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने नेशनल कॉन्फ्रेंस पर जम्मू-कश्मीर और केंद्र के बीच दूरी बढ़ाने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि कश्मीर मामले का स्थायी हल बल प्रयोग के बजाय केवल सार्थक संवाद से ही संभव है।",
  "content": "जम्मू-कश्मीर की राजनीति में बयानों का दौर तेज हो गया है। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी यानी पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने नेशनल कॉन्फ्रेंस पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। सोमवार को पार्टी कार्यकर्ताओं के एक बड़े सम्मेलन में अपनी बात रखते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर के आवाम के बीच जो अविश्वास बना हुआ है, उसकी असली जिम्मेदार नेशनल कॉन्फ्रेंस ही है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र का यह सबसे पुराना राजनीतिक दल हमेशा से अपने राजनीतिक नफे-नुकसान के अनुसार कश्मीर मसले पर अपना रुख बदलता रहा है।\n\nऐतिहासिक विलय और जनमत संग्रह की मांग पर सवाल\nसम्मेलन में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए पीडीपी अध्यक्ष ने इतिहास के पन्नों का हवाला दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर आज जो संदेह और दूरी का माहौल दिखाई देता है, उसकी नींव किसने रखी थी। उन्होंने कहा कि 79 साल पहले जब भारत को आजादी मिली थी, उसी दौर में 79 साल पहले जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय हुआ था। उस ऐतिहासिक विलय दस्तावेज पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के संस्थापक शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने हस्ताक्षर किए थे। मुस्लिम बहुल राज्य होने के बाद भी उन्होंने पूरे होशोहवास में भारत के साथ जुड़ने का रास्ता चुना था।\n\nमहबूबा मुफ्ती ने आगे कहा कि इस बड़े फैसले के महज कुछ ही वर्षों के भीतर नेशनल कॉन्फ्रेंस अपने वादे से पलट गई। पार्टी ने अचानक अपना पुराना रुख त्यागकर जनमत संग्रह की मांग उठानी शुरू कर दी। उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि अविश्वास और संशय का यह बीज नेशनल कॉन्फ्रेंस ने ही लोगों के दिलों में बोया। पूरे 22 वर्षों तक पाकिस्तान में जनमत संग्रह कराने का राग अलापा गया और फिर 1975 में अचानक सब कुछ भुलाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल ली गई। उन्होंने 1975 के इंदिरा गांधी और शेख अब्दुल्ला समझौते का स्पष्ट जिक्र किया, जिसके जरिए नेशनल कॉन्फ्रेंस के संस्थापक बिना किसी विधायक के राज्य के मुख्यमंत्री बन गए थे।\n\nसत्ता की खातिर रुख बदलने और विशेष दर्जे का जिक्र\nपीडीपी नेता ने यह भी आरोप लगाया कि सत्ता पाने की लालसा में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने आम जनता की भावनाओं से समझौता किया। उन्होंने कहा कि जैसे ही कुर्सी मिली, लोगों से जनमत संग्रह की मांग भूलने को कह दिया गया। महबूबा के अनुसार, भारत के शीर्ष नेताओं चाहे वे जवाहरलाल नेहरू हों या डॉ. बी.आर. आंबेडकर, सभी ने जम्मू-कश्मीर को एक विशेष दर्जा और अलग संविधान सौंपा था। लेकिन नेशनल कॉन्फ्रेंस की अवसरवादी नीतियों ने न केवल यहां के नेताओं बल्कि पूरे कश्मीर के आवाम को लेकर दिल्ली के मन में एक गहरा शक पैदा कर दिया।\n\nउन्होंने जोर देकर कहा कि इस दल की राजनीति ने हमेशा जम्मू-कश्मीर के मूल हितों को भारी नुकसान पहुंचाया है। जब तक यह दल सत्ता में रहेगा, तब तक इलाके में स्थायी शांति कायम होना बेहद मुश्किल है।\n\nभाजपा गठबंधन और शांति के लिए बातचीत की वकालत\nकार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाते हुए महबूबा मुफ्ती ने कहा कि वर्ष 2014 में सरकार बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी के साथ किए गए गठबंधन को लेकर पीडीपी कार्यकर्ताओं को किसी भी तरह से संकोच या शर्म महसूस करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि जब भी नेशनल कॉन्फ्रेंस के लोग उस गठबंधन पर तंज कसें, तो उन्हें तुरंत याद दिलाएं कि किस तरह उनके अपने नेताओं के बार-बार बदलते रुख ने कश्मीर के लोगों को दशकों तक भारी मुसीबतों में झोंका है।\n\nनेशनल कॉन्फ्रेंस के मौजूदा अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला का नाम लिए बिना उन्होंने आरोप लगाया कि तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके नेता यह दावा करके लोगों को भड़का रहे हैं कि पाकिस्तान कश्मीर की हिफाजत कर रहा है। महबूबा ने कहा कि यह असल में दिल्ली के हुक्मरानों को यह जताने का एक संकेत है कि कश्मीरी पाकिस्तान के पाले में खड़े हैं। अंत में उन्होंने केंद्र सरकार को आगाह करते हुए साफ किया कि जम्मू-कश्मीर की समस्याओं का समाधान किसी तरह के दबाव या जबरदस्ती के उपायों से नहीं निकल सकता, बल्कि इसके लिए केवल ईमानदार बातचीत का रास्ता ही एकमात्र विकल्प है।\n\nइसका आप पर असर\nइस राजनीतिक बयानबाजी से केंद्र और जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक रिश्तों तथा स्थानीय विमर्श पर सीधा प्रभाव पड़ता है।\n\n• भारत में: राष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर नीति और पूर्ववर्ती गठबंधनों को लेकर बहस दोबारा तेज हो सकती है। आम नागरिकों को क्षेत्रीय दलों के राजनीतिक इतिहास और केंद्र के साथ उनके समीकरणों को समझने का मौका मिलता है।\n• जम्मू-कश्मीर में: घाटी की दो प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों के बीच जुबानी जंग तेज होने से चुनावी और स्थानीय राजनीति में ध्रुवीकरण बढ़ सकता है। स्थानीय लोगों के लिए यह बयानबाजी यह तय करने में मदद करती है कि कौन सा दल स्थायी शांति और बातचीत की पैरवी मजबूती से कर रहा है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nपीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती का यह कड़ा बयान नेशनल कॉन्फ्रेंस के हालिया बयानों और जम्मू-कश्मीर के लंबे राजनीतिक इतिहास की पृष्ठभूमि में आया है। पार्टी कार्यकर्ताओं के सम्मेलन में उन्होंने इन मुद्दों को उठाया।\n\n• सीधा कारण: नेशनल कॉन्फ्रेंस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कश्मीर और पाकिस्तान के संदर्भ में दिए गए बयानों के विरोध में यह तीखी प्रतिक्रिया दी गई। महबूबा मुफ्ती ने इन बयानों को दिल्ली को गलत संदेश देने वाला बताया।\n• ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: वर्ष 1947 में भारत के साथ हुए विलय के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस द्वारा 22 सालों तक जनमत संग्रह की मांग और फिर 1975 के समझौते के तहत सत्ता में वापसी को संदेह का मूल कारण बताया गया। पीडीपी ने इसी आधार पर विरोधियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए।\n• आगे की राह: क्षेत्रीय दलों के बीच यह आरोप-प्रत्यारोप राजनीतिक जमीन मजबूत करने और आगामी रणनीतियों को तय करने की दिशा में जारी रहने की संभावना है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. महबूबा मुफ्ती ने केंद्र और कश्मीर के बीच अविश्वास के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया?\nमहबूबा मुफ्ती ने नेशनल कॉन्फ्रेंस को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि इस पार्टी ने समय-समय पर कश्मीर मुद्दे पर अपना रुख बदला है।\n\n2. महबूबा मुफ्ती ने भारत में विलय के इतिहास को लेकर क्या कहा?\nउन्होंने कहा कि 79 साल पहले नेशनल कॉन्फ्रेंस के संस्थापक शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने मुस्लिम बहुल राज्य होने के बावजूद भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे।\n\n3. 1975 के समझौते को लेकर महबूबा ने क्या आरोप लगाया?\nउन्होंने कहा कि 22 साल तक जनमत संग्रह की मांग करने के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस ने सत्ता पाने के लिए 1975 में मुख्यमंत्री पद स्वीकार कर लिया और मांग छोड़ दी।\n\n4. महबूबा मुफ्ती ने कश्मीर मुद्दे के समाधान के लिए क्या उपाय सुझाया?\nमहबूबा मुफ्ती ने कहा कि कश्मीर मुद्दे को किसी भी तरह के दबाव या जबरदस्ती से नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण बातचीत के जरिए ही सुलझाया जा सकता है।",
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