{
  "type": "article",
  "title": "नीट प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दिल्ली समेत सात राज्यों को नोटिस",
  "summary": "नीट-यूजी परीक्षा के विरोध प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और बिहार समेत सात राज्यों को नोटिस जारी किया है। अदालत ने सभी सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है और मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को तय की है।",
  "content": "नीट-यूजी परीक्षा में हुई अनियमितताओं के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों और उनके बाद सामने आई पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। देश की सबसे बड़ी अदालत ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए दिल्ली, बिहार, महाराष्ट्र, असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और केरल की सरकारों को नोटिस जारी कर उनसे विस्तृत जवाब तलब किया है। इस पूरे प्रकरण ने शैक्षणिक समुदाय और प्रशासनिक तंत्र दोनों का ध्यान आकर्षित किया है, जहां छात्र अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे थे और उसके बाद सुरक्षा बलों के साथ टकराव की स्थिति बनी थी।\n\nन्यायालय की इस विशेष पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल रहे। सुनवाई के दौरान पीठ ने कड़े निर्देश देते हुए कहा कि संबंधित सभी अधिकारी घटनास्थल के सभी सीसीटीवी फुटेज को तुरंत सुरक्षित रखें ताकि बाद में साक्ष्यों के साथ कोई छेड़छाड़ न हो सके। इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पहले से कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं था, लेकिन विरोध प्रदर्शन के दौरान उनके नाम पर मुकदमे दर्ज कर लिए गए, उनके विरुद्ध फिलहाल किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।\n\nयाचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत के समक्ष कई गंभीर मांगें रखी गईं। इनमें दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करने, सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में विशेष जांच दल से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और भविष्य में देश भर में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के संचालन के लिए एक समान और स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार किए जाने की मांग प्रमुख रूप से शामिल थी।\n\nसुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यह छात्रों का पूरी तरह से शांतिपूर्ण प्रदर्शन था, जिसमें उन्होंने अपनी मांगें पूरी तरह से संवैधानिक दायरे में रहकर उठाई थीं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि ऐसे बड़े आंदोलनों में अक्सर कुछ बिन बुलाए मेहमान भी शामिल हो जाते हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य अपने अलग एजेंडे को आगे बढ़ाना होता है और वे धीरे-धीरे इस प्रकार के आयोजनों का हिस्सा बन जाते हैं।\n\nअदालत ने लोकतंत्र में आंदोलनों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विरोध प्रदर्शन होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। मुख्य न्यायाधीश ने इस बात पर भी जोर दिया कि अब वह समय आ गया है जब यह स्पष्ट रूप से तय किया जाना चाहिए कि पुलिस द्वारा आंसू गैस जैसे सुरक्षात्मक या निवारक साधनों का इस्तेमाल किन विशिष्ट परिस्थितियों में और किस तरीके से किया जाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने सभी संबंधित पक्षों से इस दिशा में अपने रचनात्मक और व्यावहारिक सुझाव देने की अपील भी की ताकि भविष्य के लिए मानक तय किए जा सकें।\n\nयाचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायण ने अदालत को एक गंभीर घटना से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि एक सहायक उप निरीक्षक ने खुद कार के शीशे तोड़े थे और इस कृत्य का वीडियो सबूत भी रिकॉर्ड पर मौजूद है। उन्होंने दलील दी कि पुलिस ने बिना किसी नियम कायदे के बल प्रयोग किया है और जब तक इस मामले में वास्तविक जिम्मेदारी तय नहीं की जाएगी, तब तक ऐसी घटनाएं बार-बार दोहराई जाती रहेंगी। उन्होंने सुझाव दिया कि बनने वाली विशेष जांच दल में सुप्रीम कोर्ट के किसी पूर्व न्यायाधीश को शामिल किया जाना चाहिए ताकि लोगों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा बना रहे।\n\nइस दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत का प्रथम दृष्टया यह मानना है कि यह मामला पूरी तरह से स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग करता है। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि कानून का उल्लंघन चाहे किसी भी पक्ष ने किया हो, उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। यदि इस पूरी घटना में जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जाती है, तो ऐसी किसी भी जांच का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा। हालांकि, एसआईटी की अंतिम संरचना और उसके स्वरूप पर अदालत ने फैसला बाद के लिए सुरक्षित रख लिया है।\n\nसुनवाई के दौरान एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने अदालत का ध्यान एक और संवेदनशील मुद्दे की ओर खींचा। उन्होंने बताया कि भले ही बिहार सरकार की ओर से एफआईआर वापस लेने की सार्वजनिक घोषणा की गई हो, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि 150 से अधिक नाबालिग बच्चे अब भी पुलिस हिरासत में हैं। उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कई बच्चों को 48 घंटे से अधिक समय तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया और घटना के करीब 40 घंटे बीत जाने के बाद उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि हिरासत में लिए गए इन बच्चों में एक की उम्र मात्र 13 वर्ष है, और मांग की कि सभी नाबालिगों को तुरंत प्रभाव से रिहा किया जाना चाहिए।\n\nदूसरी ओर, सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को जानकारी दी कि इस हिंसक झड़प के दौरान कुल 250 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, जिनमें से कई ऐसे हैं जिन्हें गंभीर चोटें आईं और टांके लगाने पड़े। उन्होंने कहा कि इस पूरी घटना की सच्चाई देश के सामने आनी चाहिए क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में ऐसा नहीं लगता कि छात्र इस तरह की हिंसक वारदातों में शामिल हो सकते हैं। उनके अनुसार, प्रदर्शनकारियों के बीच कुछ असामाजिक तत्व और बिन बुलाए मेहमान घुस आए थे। उन्होंने दावा किया कि सरकार के पास पुख्ता डेटा मौजूद है जिससे यह साबित होता है कि उस भीड़ में हत्या, दुष्कर्म और एनडीपीएस जैसे गंभीर मामलों के आरोपी भी सक्रिय रूप से मौजूद थे।\n\nइसके बावजूद, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह भी स्वीकार किया कि यदि छात्रों के खिलाफ आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया गया है, तो यह निश्चित रूप से एक गंभीर चिंता का विषय है और सरकार पूरी तरह से छात्रों के साथ खड़ी है। उन्होंने साथ ही यह भी जोड़ा कि ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाना चाहिए जिससे सुरक्षा बलों या पुलिस का मनोबल गिरे। उन्होंने दोहराया कि सरकार भी इस पूरे प्रकरण की एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच चाहती है और अंतिम सत्यता जांच पूरी होने के बाद ही आधिकारिक रूप से सामने आ सकेगी।\n\nकार्यवाही के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी एक विशिष्ट मामला उठाते हुए अदालत को बताया कि प्रदर्शन के दौरान शांतिपूर्ण तरीके से भोजन बांटने वाले जुनैद मलिक को पुलिस हिरासत में ले लिया गया और उन्हें मसूरी ले जाया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि जुनैद मलिक के परिवार को लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को अत्यंत गंभीर मानते हुए आगे की विस्तृत सुनवाई के लिए 3 अगस्त की तारीख तय कर दी है।\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: देश भर में छात्र प्रदर्शनों और कानून व्यवस्था से जुड़े मामलों में पुलिस की जवाबदेही तय होने के नए कानूनी मानक स्थापित हो सकते हैं।\n• दिल्ली में: स्थानीय स्तर पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव के मामलों में अदालत की निगरानी और सीसीटीवी फुटेज सुरक्षा के कड़े आदेश लागू होंगे।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सुप्रीम कोर्ट ने नीट प्रदर्शन मामले में किन राज्यों को नोटिस जारी किया है?\nसुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, बिहार, महाराष्ट्र, असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और केरल सरकार को नोटिस जारी किया है।\n\n2. अदालत ने सीसीटीवी फुटेज को लेकर क्या निर्देश दिए हैं?\nअदालत ने सभी संबंधित अधिकारियों को घटनास्थल के सभी सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है।\n\n3. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को घायलों के बारे में क्या जानकारी दी?\nतुषार मेहता ने बताया कि इस घटना में 250 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, जिनमें से कई को टांके लगे हैं।\n\n4. इस मामले की अगली सुनवाई कब तय की गई है?\nसुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त के लिए तय की है।",
  "url": "https://trendkia.com/national/neet-protest-police-action-supreme-court-delhi-seven-states-11411",
  "category": "भारत",
  "publishedAt": "2026-07-28",
  "tags": [
    "नीट परीक्षा",
    "सुप्रीम कोर्ट",
    "पुलिस कार्रवाई",
    "छात्र प्रदर्शन",
    "तुषार मेहता",
    "न्यायालय",
    "सीजेआई सूर्यकांत"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}