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  "type": "article",
  "title": "नीट-यूजी प्रदर्शन जांच समिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया रुख, FIR दर्ज कराने की शक्ति केवल शीर्ष अदालत के पास",
  "summary": "जंतर-मंतर पर नीट-यूजी पेपर लीक विरोध-प्रदर्शन की जांच के लिए बनी उच्चस्तरीय समिति के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति स्पष्ट की है। अदालत ने साफ किया कि समिति एफआईआर दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकती और न ही इसके गठन में बदलाव किया जाएगा।",
  "content": "नीट-यूजी पेपर लीक के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों की जांच के लिए गठित उच्चस्तरीय जांच समिति के अधिकारों की सीमा तय करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। भारत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि अदालत द्वारा बनाई गई पांच सदस्यीय समिति के पास एफआईआर दर्ज करने या आपराधिक जांच का आदेश देने का कानूनी अधिकार नहीं है। शीर्ष अदालत ने दोहराया है कि किसी भी आपराधिक जांच का निर्देश देने की शक्ति सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के पास सुरक्षित है। इसके साथ ही अदालत ने जांच समिति के पुनर्गठन की मांग को भी सिरे से खारिज कर दिया है।\n\nसमिति के अधिकार और सुप्रीम कोर्ट की सीधी निगरानी\nप्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान समिति के काम करने के तरीके और दायरों को रेखांकित किया। अदालत ने कहा कि पूर्व जज आर. सुभाष रेड्डी की अगुआई वाली यह उच्चस्तरीय समिति केवल आरोपों की निष्पक्ष जांच करेगी, प्रभावित पीड़ितों की पहचान करेगी और अपनी सिफारिशें सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी। यदि जांच के दौरान आपराधिक मामला दर्ज करने की स्थिति बनती है, तो उस पर अंतिम निर्णय केवल शीर्ष अदालत ही लेगी।\n\nसुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी सुनिश्चित किया कि समिति का संचालन अदालत की सीधी निगरानी में रहेगा। समिति को अपने कामकाज के दौरान आने वाली किसी भी व्यावहारिक या कानूनी अड़चन को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के सामने आने की स्वतंत्रता दी गई है। इसके अलावा, समिति अपनी सहायता के लिए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एमिकस क्यूरी यानी न्याय मित्र या वकील नियुक्त करने का अधिकार भी रखेगी।\n\nजनहित तंत्र, गवाहों की सुरक्षा और पहली बैठक\nजांच प्रक्रिया को पारदर्शी और सुलभ बनाने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने समिति को कई विशेष अधिकार दिए हैं। समिति अपनी कार्यवाही का व्यापक प्रचार-प्रसार कर सकती है और आम जनता से सुझाव तथा आपत्तियां आमंत्रित कर सकती है। संवेदनशील गवाहों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए, जो सीधे तौर पर समिति के सामने पेश होने में असहज महसूस करते हैं, उनके लिए एक अलग हेल्पलाइन और विशेष व्यवस्था बनाने की अनुमति दी गई है।\n\nमामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को सूचित किया कि इस उच्चस्तरीय जांच समिति की पहली औपचारिक बैठक 15 सितंबर 2026 को आयोजित होना प्रस्तावित है।\n\nसमिति के पुनर्गठन की मांग खारिज और वकीलों की दलीलें\nसुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं और प्रदर्शनकारियों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने समिति की संरचना पर सवाल उठाए। वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी, एन. हरिहरन, गोपाल शंकरनारायणन, मेनका गुरुस्वामी, प्रशांत भूषण और वृंदा ग्रोवर ने कई गंभीर मुद्दे उठाए। उन्होंने संवेदनशील गवाहों तक पहुंच, प्रभावितों के लिए अंतरिम मुआवजे की व्यवस्था, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गन के कथित इस्तेमाल और दिल्ली पुलिस से जुड़ी निजी एजेंसियों द्वारा प्रदर्शनकारियों का डेटा एकत्र किए जाने पर गहरी चिंता जताई।\n\nतमाम दलीलों को सुनने के बाद पीठ ने समिति की संरचना बदलने की मांग को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया। अदालत ने कहा कि चूंकि इस समिति का गठन स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने किया है, इसलिए इसके काम शुरू करने से पहले इसमें कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। हालांकि, पीठ ने यह छूट दी कि सभी पक्ष अपनी सामग्री, साक्ष्य और सुझाव सीधे समिति के समक्ष रख सकते हैं। यदि जांच प्रक्रिया आगे बढ़ने पर कोई नई समस्या सामने आती है, तो पक्षकार दोबारा सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।\n\nअनुच्छेद 142 का इस्तेमाल और मामले की पृष्ठभूमि\nयह पूरा मामला जुलाई के दौरान कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में नीट-यूजी परीक्षा में गड़बड़ियों को लेकर हुए उग्र प्रदर्शनों से जुड़ा है। जंतर-मंतर से संसद भवन तक निकाले गए मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच तीखी झड़पें हुई थीं, जिसमें दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर हिंसा का आरोप लगाया था। पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगे थे, तो वहीं प्रदर्शनकारियों पर सुरक्षाकर्मियों पर हमले और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की शिकायतें आई थीं।\n\nइससे पहले, 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए इन प्रदर्शनों से जुड़ी तमाम आपराधिक कार्यवाहियों पर रोक लगा दी थी। शीर्ष अदालत ने 20 से 25 जुलाई के बीच दर्ज हुई एफआईआर पर आगे की कार्रवाई रोक दी थी और नई एफआईआर दर्ज करने पर पाबंदी लगा दी थी। इसी पृष्ठभूमि में पूर्व न्यायाधीश आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति बनाई गई थी, जिसे लिखित सबूत, गवाहों के बयान और संवेदनशील गवाहों को संरक्षण देने के लिए गुमनाम शिकायतें भी स्वीकार करने का अधिकार दिया गया है।\n\nइसका आप पर असर\nयह फैसला आम नागरिकों और प्रदर्शनकारियों के लिए प्रक्रियात्मक और कानूनी स्पष्टता सुनिश्चित करता है।\n\n• भारत में: यह निर्णय स्पष्ट करता है कि किसी विशेष जांच समिति का गठन आपराधिक एफआईआर दर्ज करने का स्वचालित अधिकार नहीं देता, जिससे शक्तियों के टकराव की संभावना समाप्त होती है। प्रदर्शनकारियों और गवाहों के लिए गोपनीय शिकायत और हेल्पलाइन का विकल्प सुरक्षित वातावरण प्रदान करता है।\n• दिल्ली में: जंतर-मंतर पर जुलाई प्रदर्शनों से जुड़े गवाह और पीड़ित नागरिक बिना किसी नई पुलिस कार्रवाई या एफआईआर के डर से समिति के सामने अपनी आपत्तियां और साक्ष्य दर्ज करा सकते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nनीट-यूजी प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई हिंसक झड़पों के बाद परस्पर विरोधी दावों की निष्पक्ष जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने यह समिति बनाई थी।\n\n• सीधा कारण: याचिकाकर्ताओं द्वारा समिति के गठन, एफआईआर दर्ज करने की क्षमता और संरचना को लेकर जताई गई कानूनी आशंकाओं पर विराम लगाना।\n• पृष्ठभूमि: 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुच्छेद 142 के तहत जुलाई 20 से 25 के बीच दर्ज सभी एफआईआर पर रोक लगाने के बाद जांच की कार्यप्रणाली को स्पष्ट करना आवश्यक था।\n• भावी कदम: 15 सितंबर 2026 से समिति की बैठकें शुरू होंगी, जहां साक्ष्य, आपत्तियां और गवाहों के बयान दर्ज किए जाएंगे।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. क्या सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति खुद एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे सकती है?\nनहीं, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उच्चस्तरीय समिति केवल जांच कर सिफारिशें दे सकती है, एफआईआर या आपराधिक जांच का आदेश केवल शीर्ष अदालत दे सकती है।\n\n2. इस उच्चस्तरीय जांच समिति की अध्यक्षता कौन कर रहा है?\nइस पांच सदस्यीय समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं।\n\n3. क्या समिति के गठन में कोई बदलाव किया गया है?\nनहीं, सुप्रीम कोर्ट ने समिति के पुनर्गठन की मांग को खारिज कर दिया और कहा कि काम शुरू होने से पहले इसमें बदलाव नहीं होगा।\n\n4. जांच समिति की पहली बैठक कब प्रस्तावित है?\nसॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अनुसार समिति की पहली बैठक 15 सितंबर 2026 को प्रस्तावित है।",
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  "publishedAt": "2026-09-11",
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