न्यायपालिका के शीर्ष पद पर लगातार अग्निपरीक्षा का दबाव, सीजेआई सूर्यकांत के सामने बोले मानवाधिकार आयोग प्रमुख राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के स्थापना दिवस समारोह में जस्टिस वी. रामसुब्रमण्यम ने प्रधान न्यायाधीश के पद की चुनौतियों और संवेदनशीलता पर खुलकर विचार रखे। देश के शीर्ष न्यायिक पद की जिम्मेदारियों और उस पर बनने वाले भारी दबाव को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के प्रमुख जस्टिस (सेवानिवृत्त) वी. रामसुब्रमण्यम ने बेहद विचारणीय टिप्पणी की है। नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन के मंच पर जब भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत स्वयं मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थित थे, तब आयोग के अध्यक्ष ने न्यायपालिका के शीर्ष नेतृत्व के सामने आने वाली रोजमर्रा की कठिन परिस्थितियों का जिक्र किया। उनके अनुसार मुख्य न्यायाधीश का दायित्व निभा रहे व्यक्ति को हर पल कठिन कसौटी पर परखा जाता है। शीर्ष न्यायिक कुर्सी की संवेदनशीलता और जवाबदेही समारोह को संबोधित करते हुए आयोग के प्रमुख ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश का पदभार आज के समय में देश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण, शक्तिशाली, बेहद सक्रिय और उतना ही संवेदनशील पद बन चुका है। न्यायिक व्यवस्था के सर्वोच्च प्रतिनिधि के रूप में इस पद पर बैठने वाले शख्सियत की हर गतिविधि पर पूरे राष्ट्र की निगाहें टिकी रहती हैं। संस्थागत मर्यादा और निष्पक्षता बनाए रखने के क्रम में इस कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को हर समय अत्यंत जटिल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। “भारत के प्रधान न्यायाधीश का पद ऐसा है, जिस पर आसीन व्यक्ति को हर दिन, बल्कि हर मिनट ‘अग्निपरीक्षा’ से गुजरना पड़ता है।” जस्टिस रामसुब्रमण्यम ने यह तीखा कटाक्ष भी जोड़ा कि जो लोग इस सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति की परीक्षा लेने की कोशिश करते हैं, उनका हर बार सच्चा या निष्कपट होना कतई अनिवार्य नहीं होता। हालांकि उन्होंने अपने इस वक्तव्य पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया, मगर हालिया राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए इसे काफी अर्थपूर्ण माना गया। हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मसले पर ज्ञापन सौंपने के लिए राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने मिलने का समय मांगा था, जिसे प्रधान न्यायाधीश ने स्वीकार नहीं किया था। व्यस्त दिनचर्या के बीच कार्यक्रम में पहुंचे मुख्य अतिथि अत्यंत व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने के लिए एनएचआरसी प्रमुख ने सीजेआई सूर्यकांत के प्रति विशेष आभार प्रकट किया। उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि फुर्सत मिलने पर शायद प्रधान न्यायाधीश यहां कुछ पल और बिताना पसंद करते। सभा में मौजूद गणमान्य व्यक्तियों और स्वयं मुख्य न्यायाधीश ने इन टिप्पणियों को सहज व खुशनुमा माहौल में स्वीकार किया। मानवाधिकार संरक्षण के तीन दशक से अधिक का सफर यह भव्य आयोजन मानवाधिकार आयोग की 33वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था। इस सांविधिक संस्था का गठन 12 अक्टूबर 1993 को किया गया था। अपने 33 वर्षों के लंबे सफर का ब्यौरा रखते हुए आयोग प्रमुख ने रेखांकित किया कि इस समयावधि में संस्था ने भारत के नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा करने, उनका संवर्धन करने और कमजोर वर्गों की आवाज बुलंद करने की दिशा में सराहनीय भूमिका निभाई है। इसका आप पर असर संवैधानिक संस्थाओं और न्यायपालिका के बीच संवाद देश की कानूनी प्रणाली की स्वतंत्रता और गरिमा को मजबूत करता है। • नागरिक अधिकारों के लिए: मानवाधिकार आयोग के 33 वर्षों के कार्य से आम नागरिकों को बुनियादी अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में न्याय पाने का मंच मिलता है। इससे प्रशासनिक जवाबदेही तय करने में मदद मिलती है। • न्यायिक गरिमा के संदर्भ में: शीर्ष अदालत के प्रमुख पर राजनीतिक दबावों से दूरी बनाए रखने की अपेक्षा जनता का न्यायिक निष्पक्षता में विश्वास बढ़ाती है। सामान्य याचिकाकर्ताओं को निष्पक्ष सुनवाई का भरोसा मिलता है। • संस्थागत कामकाज पर: मुख्य न्यायाधीश द्वारा कार्यपालिका व राजनीतिक दलों से आवश्यक दूरी बनाए रखने का संदेश साफ होता है। इससे संस्थागत मर्यादाओं का पालन सुनिश्चित होता है। • सार्वजनिक विमर्श में: संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों की चुनौतियों पर खुली चर्चा से नागरिक व्यवस्था की संवेदनशीलता को समझ पाते हैं। इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति सम्मान बढ़ता है। ऐसा क्यों हुआ यह टिप्पणी शीर्ष संवैधानिक दायित्वों की कार्यप्रणाली और हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों की पृष्ठभूमि में सामने आई है। • प्रत्यक्ष अवसर: 12 अक्टूबर 1993 को स्थापित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 33वें स्थापना दिवस समारोह का आयोजन नई दिल्ली के विज्ञान भवन में किया जा रहा था। इस विशेष अवसर पर मुख्य न्यायाधीश मुख्य अतिथि के रूप में मंच पर मौजूद थे। • हालिया राजनीतिक संदर्भ: हाल ही में विपक्षी नेताओं राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दे पर प्रधान न्यायाधीश से मुलाकात का समय मांगा था। मुख्य न्यायाधीश द्वारा मुलाकात से इनकार किए जाने के बाद शीर्ष पद की स्वतंत्रता चर्चा में थी। • पद की संवेदनशील प्रकृति: देश के प्रधान न्यायाधीश के पास न्यायिक और प्रशासनिक मामलों में सर्वोच्च अधिकार होते हैं। इस वजह से सार्वजनिक और राजनीतिक हलकों से निरंतर अपेक्षाओं और आलोचनाओं का दबाव बना रहता है। सवाल-जवाब 1. जस्टिस वी. रामसुब्रमण्यम ने यह बयान किस कार्यक्रम में दिया? उन्होंने यह बयान नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 33वें स्थापना दिवस समारोह के दौरान दिया। 2. इस समारोह के मुख्य अतिथि कौन थे? इस कार्यक्रम में भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए थे। 3. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना कब हुई थी? राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना 12 अक्टूबर 1993 को की गई थी। 4. कटाक्ष के पीछे किस हालिया घटना का संदर्भ था? राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने सीईसी ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर सीजेआई से मिलने का समय मांगा था, जिससे उन्होंने इनकार कर दिया था। https://trendkia.com/national/nyayapalika-ke-shirsha-pada-para-lagatara-agnipariksha-ka-dabava-cji-surya-kant-ke-samane-bole-nhrc-pramukha-46912 TrendKia — Har trend, sabse pehle.