# ओडिशा के होनहार छात्र बिभास साहा की घर वापसी, नौकरी न मिलने के तनाव में खोई थी याददाश्त

> मास्टर्स डिग्री पूरी करने के बाद मनपसंद नौकरी न मिलने पर गहरे अवसाद में चले गए ओडिशा के बिभास साहा की एक साल बाद घर वापसी हुई है। हावड़ा स्टेशन पर बेसुध मिले बिभास की याददाश्त चली गई थी, जिन्हें मिशनरीज ऑफ चैरिटी और हैम रेडियो के साझा प्रयासों से उनके परिवार से मिलाया गया।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-10-30 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/odisha-ke-honahara-chhatra-bibhas-saha-ki-ghara-vapasi-naukari-na-milane-ke-tanava-men-khoi-thi-yadadashta-53488 · **Language:** Hindi
**Tags:** बिभास साहा, हैम रेडियो, मिशनरीज ऑफ चैरिटी, ओडिशा, हावड़ा रेलवे स्टेशन, निर्मल हृदय केंद्र, बालासोर

ओडिशा के रहने वाले एक मेधावी छात्र के जीवन में बेरोजगारी और मानसिक तनाव ने ऐसा मोड़ ला दिया कि वह करीब एक साल तक अपने परिवार से पूरी तरह दूर रहे। उच्च शिक्षा हासिल करने और राज्य स्तर पर शैक्षणिक पहचान बनाने के बाद भी जब मनचाही नौकरी नहीं मिली, तो युवक मानसिक संतुलन खो बैठा और अचानक घर से लापता हो गया। पिछले साल जुलाई में पश्चिम बंगाल के हावड़ा रेलवे स्टेशन परिसर में बेसुध और गंभीर हालत में मिलने के बाद उन्हें नया जीवन मिला। इसके बाद मिशनरीज ऑफ चैरिटी और हैम रेडियो ऑपरेटरों के मानवीय प्रयासों की बदौलत उनकी पहचान संभव हो सकी और वह अपने परिजनों से दोबारा मिल पाए।

## हावड़ा स्टेशन परिसर से रेस्क्यू और इलाज का लंबा सफर
यह पूरा मामला ओडिशा के बालासोर जिले के सहदेव कुंटा गांव निवासी बिभास साहा से जुड़ा हुआ है। पिछले साल जुलाई के महीने में बिभास हावड़ा रेलवे स्टेशन के परिसर में बेहद दयनीय स्थिति में पड़े हुए पाए गए थे। उस समय वह गंभीर रूप से बीमार थे, कई दिनों से भूखे-प्यासे थे और चलने-फिरने की स्थिति में भी नहीं थे। स्टेशन पर मौजूद रेलवे यात्रियों और स्थानीय पुलिस कर्मियों की नजर जब उन पर पड़ी, तो तत्परता दिखाते हुए उन्हें तुरंत सुरक्षित बाहर निकाला गया। इसके बाद उन्हें मानवीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए मिशनरीज ऑफ चैरिटी की कालीघाट शाखा पहुंचाया गया, जहां चिकित्सकों और सेवा कर्मियों ने उनका प्राथमिक उपचार शुरू किया।

शुरुआती स्वास्थ्य सुधार के बाद बिभास को बेहतर देखभाल और दीर्घकालिक पुनर्वास के लिए बारुईपुर स्थित निर्मल हृदय केंद्र में स्थानांतरित कर दिया गया। केंद्र में लंबे समय तक चले चिकित्सकीय उपचार और निरंतर तीमारदारी के बाद उनकी शारीरिक स्थिति में काफी सुधार आ गया, लेकिन डॉक्टरों और सेवा कर्मियों के सामने एक नई और गंभीर चुनौती खड़ी हो गई। मानसिक आघात और भारी अवसाद के चलते बिभास अपनी याददाश्त पूरी तरह गंवा चुके थे। वह न तो अपना नाम बता पाने की स्थिति में थे और न ही अपने घर, गांव या परिजनों के बारे में कोई सुराग दे पा रहे थे।

## पहचान की तलाश में मिशनरीज ऑफ चैरिटी और हैम रेडियो का तालमेल
याददाश्त खो चुके बिभास की पहचान स्थापित करने और उनके मूल निवास का पता लगाने के लिए मिशनरीज ऑफ चैरिटी प्रबंधन ने समाजसेवी खोकोन मंडल से संपर्क साधा। खोकोन मंडल ने इस मानवीय कार्य में वेस्ट बंगाल रेडियो क्लब यानी हैम रेडियो के शौकिया ऑपरेटरों के विस्तृत नेटवर्क का सहयोग लेने का निर्णय किया। हैम रेडियो टीम ने लापता और बेसहारा व्यक्तियों की खोजबीन के अपने स्थापित तौर-तरीकों का इस्तेमाल करते हुए विभिन्न क्षेत्रों में सुराग जुटाने शुरू किए।

हैम रेडियो के सचिव अंबरीश नाग बिस्वास और उनके साथियों ने लगातार कड़ियों को जोड़ते हुए ओडिशा के बालासोर जिले के सहदेव कुंटा गांव तक संपर्क स्थापित करने में सफलता पाई। इसके बाद अंबरीश नाग बिस्वास ने बारुईपुर केंद्र में उपचाराधीन युवक की एक हालिया तस्वीर गांव के संपर्कों के जरिए परिजनों तक पहुंचाई। तस्वीर सामने आते ही परिवार के बड़े बेटे वासुदेव साहा ने तुरंत अपने छोटे भाई बिभास को पहचान लिया, जिससे एक साल से चल रही खोज का सुखद अंत सुनिश्चित हुआ।

## शिक्षा में अव्वल प्रदर्शन और बेरोजगारी से उपजा गहरा अवसाद
परिजनों के अनुसार, बिभास बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में असाधारण प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने अपने स्नातक स्तर के अध्ययन में पूरे राज्य स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर शैक्षणिक रिकॉर्ड बनाया था। इसके उपरांत उन्होंने पूरी लगन के साथ मास्टर डिग्री भी सफलता पूर्वक हासिल की थी। उच्च शिक्षा पूरी होने के बाद बिभास अपनी योग्यता के अनुसार एक प्रतिष्ठित और मनपसंद नौकरी हासिल करना चाहते थे। काफी कोशिशों के बावजूद जब उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप रोजगार का अवसर नहीं मिला, तो वह धीरे-धीरे गहरी निराशा और अवसाद के घेरे में आ गए।

मानसिक तनाव और भविष्य की चिंताओं से घिरे बिभास एक दिन अचानक बिना किसी को कुछ बताए घर से चले गए। बेटे के अचानक गायब होने से परिवार स्तब्ध रह गया और रिश्तेदारों तथा आसपास के सभी संभावित ठिकानों पर उनकी सरगर्मी से तलाश की गई। परिजनों ने स्थानीय पुलिस स्टेशन पहुंचकर उनकी गुमशुदगी की आधिकारिक जनरल डायरी (GD) भी दर्ज कराई थी। इसके बावजूद महीनों तक उनका कोई सुराग नहीं लग सका था, जिससे परिवार किसी अनहोनी की आशंका में जी रहा था।

## निर्मल हृदय केंद्र में भावुक पुनर्मिलन और कृतज्ञता
पहचान पुख्ता होने के बाद बुधवार के दिन बिभास के बड़े भाई वासुदेव साहा पश्चिम बंगाल के बारुईपुर स्थित निर्मल हृदय केंद्र पहुंचे। लगभग एक वर्ष के लंबे और पीड़ादायी वियोग के बाद जैसे ही दोनों भाइयों का आमना-सामना हुआ, पूरा माहौल बेहद भावुक हो गया। वासुदेव ने दौड़कर अपने छोटे भाई को सीने से लगा लिया और उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। बिभास की शारीरिक स्थिति में आया सुधार देखकर परिजनों ने राहत की सांस ली।

अपने छोटे भाई को नई जिंदगी देने और सुरक्षित रखने के लिए वासुदेव ने संस्था के सभी कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों के प्रति गहरा आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि जिस असीम प्रेम, स्नेह और करुणा के साथ निर्मल हृदय केंद्र के कर्मियों ने उनके भाई की देखभाल की है, उसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने मिशनरीज ऑफ चैरिटी और हैम रेडियो क्लब के सदस्यों का भी हृदय से धन्यवाद किया, जिनकी सक्रियता से यह पुनर्मिलन संभव हो पाया।

## संकट के समय हैम रेडियो नेटवर्क की प्रभावी भूमिका
हैम रेडियो, जिसे शौकिया रेडियो सेवा (Amateur Radio Service) के रूप में भी जाना जाता है, विशेष रेडियो फ्रीक्वेंसी के माध्यम से काम करने वाला एक गैर-व्यावसायिक संचार माध्यम है। इसके अधिकृत ऑपरेटर आपातकालीन परिस्थितियों, प्राकृतिक आपदाओं, संचार व्यवस्था ठप होने या गुमशुदा लोगों को उनके परिजनों से मिलाने में महत्वपूर्ण तकनीकी और सामाजिक भूमिका निभाते हैं। बिभास साहा के प्रकरण में भी हैम रेडियो की त्वरित सूचना प्रणाली और जमीनी नेटवर्क ने एक मेधावी युवा को बेसहारा होने से बचाकर सुरक्षित घर तक पहुंचाने में निर्णायक योगदान दिया।

## इसका आप पर असर
यह घटना दर्शाती है कि अत्यधिक करियर दबाव और मानसिक अवसाद किस तरह किसी व्यक्ति के जीवन को प्रभावित कर सकता है, साथ ही यह भी बताती है कि संकट के समय कौन से नागरिक नेटवर्क मदद कर सकते हैं।

- **भारत में:** यदि परिवार का कोई सदस्य मानसिक तनाव के कारण लापता हो जाए, तो स्थानीय पुलिस स्टेशन में त्वरित जनरल डायरी (GD) दर्ज कराना पहला कानूनी कदम है। इसके अलावा मिशनरीज ऑफ चैरिटी और गैर-सरकारी आश्रय केंद्रों से संपर्क करके अस्पताल व रेलवे परिसरों में बेसहारा मिले मरीजों की जानकारी हासिल की जा सकती है।
- **ओडिशा में:** बालासोर और आसपास के ग्रामीण इलाकों के युवाओं में करियर तनाव को लेकर सतर्कता आवश्यक है। युवाओं में अचानक स्वभाव बदलाव या गहरे अवसाद के लक्षण दिखने पर पेशेवर चिकित्सीय व मानसिक परामर्श लेना जरूरी है ताकि ऐसे गंभीर संकट से बचा जा सके।
- **हैम रेडियो का नागरिक उपयोग:** आपात स्थिति या लापता व्यक्तियों की खोज में नागरिक शौकिया रेडियो क्लबों जैसे वेस्ट बंगाल रेडियो क्लब की सहायता ले सकते हैं। यह गैर-व्यावसायिक नेटवर्क बिना औपचारिक इंटरनेट संचार के भी सुदूर गांवों तक जानकारी और तस्वीरें प्रसारित करने में सक्षम है।
- **आश्रय गृहों की भूमिका:** लावारिस या याददाश्त खो चुके बीमार लोगों के लिए बारुईपुर स्थित निर्मल हृदय जैसे केंद्र दीर्घकालिक पुनर्वास और मुफ्त चिकित्सा उपलब्ध कराते हैं। यदि आम जनता को स्टेशनों पर कोई गंभीर बीमार व्यक्ति मिले, तो रेलवे पुलिस और ऐसे सामाजिक संगठनों को तुरंत सूचित करना चाहिए।

## ऐसा क्यों हुआ
यह दुखद घटना अत्यधिक करियर अपेक्षाओं के टूटने और उससे उपजे तीव्र मानसिक अवसाद के कारण घटित हुई। मेधावी छात्र का अपनी पहचान और परिजनों को भूल जाना लगातार उपेक्षा, तनाव और शारीरिक भुखमरी की शृंखला का परिणाम था।

- **बेरोजगारी और अवसाद:** स्नातक में राज्य स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन और मास्टर्स डिग्री पूरी करने के बाद भी जब बिभास को अपनी रुचि की नौकरी नहीं मिली, तो वह गहरे मानसिक आघात में चले गए। इस विफलता के तनाव ने उन्हें इतना विचलित कर दिया कि वह चुपचाप अपना घर छोड़कर निकल गए।
- **शारीरिक कमजोरी और याददाश्त खोना:** महीनों तक लावारिस भटकने, भोजन की कमी और बीमारी के कारण हावड़ा स्टेशन पर उनकी शारीरिक हालत बेहद गंभीर हो गई। भीषण आघात और कुपोषण के संयुक्त प्रभाव से उन्होंने अपनी स्मृति खो दी और परिजनों की कोई जानकारी देने में असमर्थ हो गए।
- **पहचान की तकनीकी बाधाएं:** किसी भी पहचान पत्र या फोन के न होने के कारण महीनों तक उनकी शिनाख्त नहीं हो सकी। इस गतिरोध को तब तोड़ा गया जब सेवा संस्थाओं ने शौकिया रेडियो ऑपरेटरों के संचार नेटवर्क का उपयोग कर ओडिशा के बालासोर तक सुराग ढूंढे।

## सवाल-जवाब

### 1. बिभास साहा कौन हैं और वह कहां के रहने वाले हैं?
बिभास साहा ओडिशा के बालासोर जिले के सहदेव कुंटा गांव के निवासी हैं, जिन्होंने स्नातक में राज्य स्तर पर बेहतरीन प्रदर्शन के बाद मास्टर डिग्री पूरी की थी।

### 2. बिभास साहा के घर से अचानक लापता होने की मुख्य वजह क्या थी?
मास्टर्स की डिग्री हासिल करने के बाद भी मनपसंद नौकरी न मिल पाने के कारण वह गहरे अवसाद में चले गए थे और इसी मानसिक तनाव के चलते घर से चले गए थे।

### 3. बिभास को किस स्थान से और किस हालत में बचाया गया था?
उन्हें पिछले साल जुलाई में पश्चिम बंगाल के हावड़ा रेलवे स्टेशन परिसर से बेहद गंभीर, बीमार और भूखी हालत में पुलिस व यात्रियों की मदद से बचाया गया था।

### 4. हावड़ा स्टेशन से रेस्क्यू के बाद बिभास को कहां भर्ती कराया गया था?
शुरुआत में उन्हें मिशनरीज ऑफ चैरिटी की कालीघाट शाखा ले जाया गया और बाद में दीर्घकालिक इलाज के लिए बारुईपुर स्थित निर्मल हृदय केंद्र में स्थानांतरित किया गया।

### 5. इलाज के दौरान देखभाल करने वालों के सामने क्या बड़ी चुनौती आई?
शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार के बाद यह सामने आया कि बिभास अपनी याददाश्त पूरी तरह खो चुके थे और अपने नाम या घर के बारे में कुछ भी बताने में असमर्थ थे।

### 6. बिभास के परिवार की पहचान कराने में किन संगठनों ने मुख्य भूमिका निभाई?
मिशनरीज ऑफ चैरिटी, समाजसेवी खोकोन मंडल और वेस्ट बंगाल रेडियो क्लब (हैम रेडियो) के सचिव अंबरीश नाग बिस्वास के प्रयासों से उनकी पहचान संभव हुई।

### 7. लापता बिभास की पहचान उनके परिजनों ने कैसे की?
हैम रेडियो द्वारा ओडिशा के सहदेव कुंटा गांव भेजी गई तस्वीर को देखकर उनके बड़े भाई वासुदेव साहा ने तुरंत अपने छोटे भाई को पहचान लिया।

### 8. दोनों भाइयों का पुनर्मिलन कब और कहां हुआ?
बुधवार के दिन बारुईपुर स्थित निर्मल हृदय केंद्र में वासुदेव साहा ने पहुंचकर अपने भाई बिभास से भावुक मुलाकात की और उन्हें गले लगाया।

## प्रेरणा और सबक
यह घटना निराशा के अंधकार में भी निस्वार्थ मानवीय सेवा, धैर्य और सामाजिक सहयोग की शक्ति का एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करती है।

- **निस्वार्थ सेवा का प्रभाव:** मिशनरीज ऑफ चैरिटी और निर्मल हृदय केंद्र के सेवा कर्मियों ने एक अज्ञात, बीमार युवक को पूरे स्नेह और गरिमा के साथ लंबे समय तक संभाला। यह दर्शाता है कि बिना किसी स्वार्थ के की गई देखभाल किसी इंसान को नया जीवन दे सकती है।
- **सामुदायिक एकजुटता:** हैम रेडियो के स्वयंसेवकों ने तकनीकी संसाधनों का उपयोग कर एक अनजान परिवार की मदद के लिए स्वेच्छा से प्रयास किए। संकट में पड़े लोगों की मदद के लिए नागरिक समाज का एकजुट होना सबसे बड़ी ताकत है।
- **आशा और पारिवारिक जुड़ाव:** एक वर्ष तक कोई सुराग न मिलने के बावजूद परिवार ने उम्मीद नहीं छोड़ी और अंततः सुखद मिलन हुआ। यह घटना सिखाती है कि कठिन से कठिन दौर में भी धैर्य और सकारात्मक प्रयास बनाए रखने चाहिए।

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