ओडिशा में 73 साल के सुकदेव नाहक ने टूटी टांग के साथ 3 दिन ट्राइसाइकिल चलाकर तय किया 150 किलोमीटर का सफर, ब्रह्मपुर के अस्पताल में भर्ती ओडिशा के नयागढ़ जिले में 73 वर्षीय सुकदेव नाहक ने टूटी हुई टांग और भारी गरीबी के बावजूद हार नहीं मानी। वह 3 दिनों तक ट्राइसाइकिल चलाकर 150 किलोमीटर दूर ब्रह्मपुर के एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उनके निशुल्क इलाज की जिम्मेदारी उठाई है। जीवन में परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर मन में इच्छाशक्ति और हौसला हो तो असंभव दिखने वाला रास्ता भी पूरा हो जाता है। ओडिशा के नयागढ़ जिले के 73 वर्षीय सुकदेव नाहक ने इस बात को साबित कर दिखाया है। एक दर्दनाक हादसे में बाईं टांग टूट जाने, गंभीर आर्थिक तंगी और परिवार का कोई सहारा न होने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। सुकदेव नाहक ने अपनी ट्राइसाइकिल संभाली और इलाज कराने की आस में लगातार तीन दिनों तक 150 किलोमीटर का सफर तय करके ब्रह्मपुर स्थित एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल पहुंच गए। बुजुर्ग का यह अदम्य साहस और संघर्ष देखकर अस्पताल प्रशासन के साथ-साथ हर कोई हैरान है। हादसे के बाद बदल गई जीवन की दिशा नयागढ़ जिले के सारणकुल थाना क्षेत्र के बरासाही गांव निवासी सुकदेव नाहक पूर्व में अपने गांव में चौकीदार के तौर पर कार्य करते थे। जीवन की गाड़ी सामान्य चल रही थी, लेकिन एक दुर्घटना ने उनके जीवन को पूरी तरह से बदल दिया। हादसे में उनकी बाईं टांग गंभीर रूप से टूट गई। इस शारीरिक चोट के कारण वह कामकाज करने में असमर्थ हो गए और उनके सामने आजीविका के साथ-साथ इलाज कराने का संकट खड़ा हो गया। अत्यधिक गरीबी के कारण उनके पास किसी निजी या स्थानीय अस्पताल में इलाज कराने के लिए वित्तीय साधन उपलब्ध नहीं थे। इसके बावजूद उन्होंने अपनी बेबसी के आगे घुटने टेकने से इनकार कर दिया। पारिवारिक दुखों का पहाड़ और अकेलापन सुकदेव नाहक का जीवन व्यक्तिगत स्तर पर भी अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा है। वर्ष 2011 में उनकी पत्नी का निधन हो गया था, जिससे उनका जीवन साथी हमेशा के लिए छूट गया। परिवार में उनका एक बेटा है, परंतु मानसिक स्थिति ठीक न होने के कारण वह कोई काम करने में सक्षम नहीं है और न ही अपने पिता की देखभाल कर सकता है। ऐसे में वृद्धावस्था, शारीरिक दिव्यांगता, गरीबी और अकेलापन, इन चारों चुनौतियों से सुकदेव अकेले ही जूझ रहे थे। जब गांव या आसपास इलाज का कोई जरिया नहीं बचा, तो उन्होंने ब्रह्मपुर के बड़े सरकारी अस्पताल जाने का साहसिक निर्णय लिया। 3 दिन की कठिन यात्रा और 150 किलोमीटर का संघर्ष ब्रह्मपुर पहुंचने के लिए सुकदेव के पास न तो बस का किराया था और न ही किसी अन्य वाहन की व्यवस्था। उन्होंने अपनी हाथ से चलने वाली ट्राइसाइकिल को ही अपना सहारा बनाया। टूटी हुई टांग के दर्द को सहते हुए उन्होंने लगातार तीन दिनों तक ट्राइसाइकिल के पैडल चलाए और 150 किलोमीटर की लंबी दूरी तय की। रास्ते में खाने-पीने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। यात्रा के दौरान रास्ते में मिलने वाले सहृदय लोगों ने उन्हें जो भोजन और पानी दिया, उसी के सहारे वह जीवित रहे और आगे बढ़ते रहे। अपनी इस बेहद कठिन यात्रा के बारे में सुकदेव नाहक ने बताया, "रास्ता बहुत कठिन था, लेकिन मैंने तय कर लिया था कि इलाज कराकर ही रहूंगा।" अस्पताल प्रशासन ने लिया निशुल्क इलाज का फैसला जब सुकदेव नाहक अपनी ट्राइसाइकिल से एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल पहुंचे, तो उनकी हालत और संघर्ष की गाथा सुनकर वहां मौजूद चिकित्सा कर्मी और अधिकारी दंग रह गए। अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने तुरंत मामले का संज्ञान लिया। अस्पताल प्रशासन ने फैसला किया है कि सुकदेव का पूरा इलाज अस्पताल प्रबंधन द्वारा निशुल्क कराया जाएगा। डॉक्टरों की टीम सबसे पहले उनकी टांग की विस्तृत जांच और आवश्यक मेडिकल टेस्ट करवा रही है। चोट की गंभीरता का सही आकलन करने के बाद उनके ऑपरेशन या आगे की चिकित्सा प्रक्रिया तय की जाएगी। डॉक्टरों ने उम्मीद जताई है कि उचित इलाज के बाद बुजुर्ग सुकदेव फिर से अपने पैरों पर चलने में सक्षम हो सकेंगे। जीवटता और मानवीय संकल्प की अनूठी मिसाल 73 वर्ष की आयु में टूटी टांग के साथ ट्राइसाइकिल से 150 किलोमीटर की यात्रा पूरी करना केवल एक दूरी तय करना नहीं है, बल्कि यह अटूट उम्मीद और जीवन जीने की जिजीविषा का प्रमाण है। सुकदेव नाहक का यह संघर्ष दर्शाता है कि विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी अगर मनुष्य का आत्मविश्वास बना रहे, तो वह बड़ी से बड़ी बाधा को पार कर सकता है। इसका आप पर असर भारत में: यह घटना देश भर में वरिष्ठ नागरिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा, ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं की सुलभता और निर्धन बुजुर्गों के लिए आपातकालीन सहायता प्रणालियों की आवश्यकता पर ध्यान केंद्रित करती है। ओडिशा में: नयागढ़ और ब्रह्मपुर क्षेत्र के निवासियों के लिए, यह मामला एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में अत्यंत गरीब मरीजों के लिए उपलब्ध निशुल्क चिकित्सा देखभाल और प्रशासनिक सहायता को उजागर करता है। सवाल-जवाब 1. सुकदेव नाहक कौन हैं और वे कहां के निवासी हैं? सुकदेव नाहक 73 वर्षीय बुजुर्ग हैं जो ओडिशा के नयागढ़ जिले के सारणकुल थाना क्षेत्र स्थित बरासाही गांव के रहने वाले हैं। 2. सुकदेव नाहक ने कितनी दूरी और कितने दिनों में तय की? उन्होंने टूटी टांग के साथ ट्राइसाइकिल चलाकर 3 दिनों में 150 किलोमीटर की दूरी तय की। 3. सुकदेव नाहक इलाज कराने के लिए किस अस्पताल पहुंचे? वह इलाज कराने के लिए ब्रह्मपुर स्थित एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल पहुंचे। 4. अस्पताल प्रशासन ने सुकदेव नाहक के लिए क्या कदम उठाया है? एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल प्रशासन ने सुकदेव का पूरा इलाज निशुल्क कराने का निर्णय लिया है और उनकी आवश्यक जांचें शुरू कर दी हैं। प्रेरणा और सबक प्रेरणा और सीख: • अतुलनीय मानसिक दृढ़ता: सुकदेव नाहक ने साबित किया कि विपरीत परिस्थितियों और शारीरिक पीड़ा के बावजूद मजबूत इच्छाशक्ति से किसी भी कठिन लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। • स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता: गरीबी और परिवार का सहारा न होने पर भी उन्होंने दूसरों पर आश्रित रहने के बजाय स्वयं कदम उठाने का रास्ता चुना। • उम्मीद कभी न छोड़ना: जीवन की सबसे कठिन घड़ियों में भी बेहतर स्वास्थ्य और जीवन की उम्मीद बनाए रखना ही आगे बढ़ने की शक्ति देता है। • मानवता में विश्वास: रास्ते में अनजान लोगों की मदद स्वीकार कर यात्रा पूरी करना दिखाता है कि कठिन समय में समाज की सहृदयता बड़ा सहारा बनती है। https://trendkia.com/national/odisha-men-73-sala-ke-sukadev-nahak-ne-tuti-tanga-ke-satha-3-dina-traisaikila-chalakara-taya-kiya-150-kilomitara-ka-saphara-brahma-14531 TrendKia — Har trend, sabse pehle.