पैतृक और खुद खरीदी संपत्ति में पत्नी व बेटी की हिस्सेदारी, कानूनी नियम और बंटवारे की पूरी प्रक्रिया पैतृक और स्व-अर्जित संपत्ति पर पत्नी और बेटी के कानूनी अधिकारों के नियम अलग-अलग होते हैं। जानिए वसीयत, सुप्रीम कोर्ट के 2005 के फैसले और उत्तराधिकार कानून के तहत संपत्ति बंटवारे के प्रावधान। पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे और वसीयत तैयार करने को लेकर अक्सर लोगों के मन में कई तरह के कानूनी सवाल उठते हैं। बिहार की राजधानी पटना के रहने वाले बुजुर्ग डॉक्टर प्रभुनाथ की कहानी इस उलझन का एक सटीक उदाहरण पेश करती है। उम्र के इस पड़ाव में गंभीर बीमारियों का सामना कर रहे प्रभुनाथ अपनी वसीयत लिखने का विचार कर रहे हैं। उनके पास पुरखों से मिली पैतृक जायदाद भी है और खुद के पेशे से कमाई गई संपत्ति भी। बेटों के भविष्य को लेकर तो वे पूरी तरह स्पष्ट हैं, लेकिन कानूनी रूप से पत्नी और बेटी को संपत्ति में किस तरह और कितना हिस्सा दिया जा सकता है, इसे लेकर वे दुविधा में हैं। यह स्थिति केवल प्रभुनाथ तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र समेत देश के अलग-अलग राज्यों में हर वर्ष सैकड़ों परिवारों के सामने ऐसे कानूनी पेंच आते हैं। उत्तराधिकार कानून के तहत महिलाओं के अधिकार की बुनियादी स्थिति संपत्ति में पत्नी और बेटी की हिस्सेदारी तय करने से पहले यह समझना आवश्यक है कि कानून संपत्ति को किस नजरिए से देखता है। इसका कोई एक सीधा नियम नहीं है, बल्कि पूरा मामला संपत्ति की प्रकृति पर टिका होता है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1965 के प्रावधानों के अनुसार, किसी व्यक्ति की पत्नी और बेटी के अधिकार इस बात पर निर्भर करते हैं कि संपत्ति के मूल मालिक का निधन वैध वसीयत छोड़े बिना हुआ है या वसीयत बनाकर। इसके साथ ही यह भी देखा जाता है कि परिवार में कौन-कौन से प्राथमिक कानूनी वारिस जीवित हैं। भारतीय कानून के तहत पत्नी और बेटी दोनों को उत्तराधिकार का स्पष्ट अधिकार प्राप्त है, किंतु संपत्ति का प्रकार बदलते ही हिस्सेदारी के नियम और अनुपात भी बदल जाते हैं। स्व-अर्जित संपत्ति पर मालिक का पूर्ण अधिकार प्रभुनाथ जैसी स्थिति में सबसे पहले स्व-अर्जित संपत्ति के कानूनी पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति ने अपने जीवनकाल में अपनी कमाई और मेहनत से कोई अचल या चल संपत्ति खरीदी है, जैसे अपने नाम पर लिया गया मकान, दुकान अथवा कोई भूखंड, तो उस पर पूरी तरह से उसका व्यक्तिगत मालिकाना हक होता है। इस श्रेणी की संपत्ति पर हिंदू उत्तराधिकार कानून का सामान्य नियम जबरन लागू नहीं होता। जीवित रहते हुए संपत्ति का मालिक अपनी इच्छानुसार अपनी पत्नी, बेटी, बेटे अथवा किसी अन्य व्यक्ति को मनचाहा हिस्सा उपहार यानी गिफ्ट डीड के जरिए दे सकता है या फिर वसीयत के माध्यम से स्थानांतरित कर सकता है। मालिक चाहे तो किसी एक सदस्य को पूरी संपत्ति दे सकता है अथवा सभी में अपनी मर्जी से बंटवारा कर सकता है। पैतृक संपत्ति में बेटी का जन्मसिद्ध कानूनी हक यदि प्रभुनाथ के पास मौजूद संपत्ति पूरी तरह से पुरखों से मिली पैतृक यानी पुश्तैनी संपत्ति है, तो उसके नियम पूरी तरह बदल जाते हैं। पैतृक संपत्ति में बेटे की तरह ही बेटी को भी जन्म लेते ही बराबर का अधिकार हासिल हो जाता है। साल 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इस अधिकार पर कानून की मुहर लगाई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि बेटी चाहे विवाहित हो या अविवाहित, पैतृक संपत्ति पर उसका अधिकार कभी समाप्त नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में प्रभुनाथ को अपने बेटे और बेटी दोनों को उस पैतृक जायदाद में समान अनुपात में हिस्सा देना होगा। यदि कोई पिता पैतृक संपत्ति को केवल अपने बेटे के नाम करना चाहता है, तो उसे कानूनी रूप से अपनी बेटी से अनापत्ति अथवा सहमति पत्र तैयार करवाना अनिवार्य होता है। बिना वसीयत मृत्यु होने और विरासत में मिली संपत्ति के नियम यदि किसी व्यक्ति को या उसकी पत्नी अथवा बेटी को किसी अन्य रिश्तेदार से वसीयत के जरिए कोई संपत्ति मिली है, तो उसकी कानूनी स्थिति अलग तरह से परखी जाती है। इसमें यह पड़ताल की जाती है कि वसीयतकर्ता कौन था और संबंधित समय का उत्तराधिकार कानून क्या था, क्योंकि पिता से प्राप्त हर संपत्ति कानूनी रूप से स्वतः पुश्तैनी नहीं मानी जाती। वहीं दूसरी ओर, यदि प्रभुनाथ की मृत्यु बिना कोई वसीयत तैयार किए हो जाती है, तो उनकी संपत्ति का निपटारा हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 और धारा 10 के निर्धारित नियमों के आधार पर किया जाएगा। इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों को प्राथमिकता मिलती है, जिनमें मृतक की विधवा पत्नी, बेटा, बेटी और मां शामिल होती हैं। इन सभी चारों वारिसों के बीच पूरी संपत्ति को बराबर भागों में बांटा जाता है। उदाहरण के तौर पर, यदि प्रभुनाथ के पास 60 लाख रुपये मूल्य की खुद बनाई गई संपत्ति मौजूद है, तो उनकी पत्नी, मां, बेटा और बेटी प्रत्येक को 15-15 लाख रुपये की संपत्ति पर कानूनी अधिकार मिलेगा। इसका आप पर असर पारिवारिक संपत्ति के कानूनी नियमों की स्पष्ट जानकारी होने से परिवार के भीतर अनावश्यक मुकदमों और संपत्ति विवादों से बचाव संभव है। • राष्ट्रीय स्तर पर: पूरे देश में रहने वाली बेटियों और पत्नियों के लिए यह कानून स्पष्ट करता है कि पैतृक और बिना वसीयत वाली संपत्ति में उनका बराबर का कानूनी हिस्सा बनता है। संपत्ति का बंटवारा करते समय परिवार बेटियों के अधिकारों की अनदेखी नहीं कर सकते हैं। • संपत्ति मालिकों के लिए: अपनी मेहनत से खरीदी गई संपत्ति पर व्यक्ति का पूरा अधिकार होता है और वह जिसे चाहे उसे वसीयत के जरिए सौंप सकता है। यदि विवाद से बचना है तो समय रहते वैध वसीयत का पंजीकरण करवा लेना चाहिए। • विवाहित बेटियों के लिए: साल 2005 के फैसले के बाद वैवाहिक स्थिति बदलने से पैतृक जायदाद पर बेटी का अधिकार खत्म नहीं होता है। किसी भी भाई या पिता द्वारा पैतृक संपत्ति बेचते समय बेटी की लिखित सहमति होना अनिवार्य है। • उत्तराधिकार बंटवारे के समय: बिना वसीयत छोड़े मृत्यु होने पर मां, पत्नी, बेटे और बेटी चारों को कानूनी रूप से समान हिस्सा मिलता है। किसी एक सदस्य द्वारा पूरी संपत्ति पर एकाधिकार का दावा कानूनी तौर पर खारिज हो जाता है। ऐसा क्यों हुआ पारिवारिक संपत्ति को लेकर अक्सर भ्रम की स्थिति इसलिए उत्पन्न होती है क्योंकि पैतृक और खुद कमाई गई संपत्ति के लिए उत्तराधिकार के नियम अलग-अलग तय किए गए हैं। • संपत्ति की अलग-अलग श्रेणियां: कानून में खुद खरीदी गई संपत्ति और पूर्वजों से मिली पुश्तैनी संपत्ति को दो भिन्न श्रेणियों में रखा गया है। व्यक्ति को अपनी अर्जित संपत्ति पर पूर्ण अधिकार मिलता है, जबकि पैतृक संपत्ति में बच्चों का अधिकार जन्म से जुड़ जाता है। • 2005 का कानूनी संशोधन और अदालती रुख: ऐतिहासिक रूप से पैतृक संपत्ति में बेटियों के अधिकार सीमित माने जाते थे, जिसे सर्वोच्च न्यायालय और कानूनी संशोधनों ने दूर किया। साल 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि बेटियों का पैतृक संपत्ति पर बेटों के समान अविभाज्य अधिकार है। • वसीयत की गैर-मौजूदगी में विवाद: जब कोई व्यक्ति अपनी वसीयत छोड़े बिना दुनिया से चला जाता है, तो कानून की धारा 8 और 10 के अनुसार संपत्तियों का स्वत: बंटवारा होता है। इस नियम के तहत विधवा, मां, बेटे और बेटी को समान वारिस मानकर कानूनी विवादों को सुलझाया जाता है। सवाल-जवाब 1. क्या पैतृक संपत्ति में बेटी का हिस्सा बेटे के बराबर होता है? हां, साल 2005 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार पैतृक संपत्ति में बेटी का अधिकार जन्म से होता है और वह बेटे के बराबर हिस्सेदार होती है। 2. क्या शादी के बाद बेटी का पैतृक संपत्ति से हक समाप्त हो जाता है? नहीं, अदालत के आदेशानुसार बेटी चाहे विवाहित हो या अविवाहित, पैतृक संपत्ति पर उसका अधिकार कभी खत्म नहीं होता। 3. क्या कोई व्यक्ति अपनी खुद की कमाई से खरीदी संपत्ति किसी एक को दे सकता है? हां, स्व-अर्जित संपत्ति पर व्यक्ति का पूरा अधिकार होता है और वह अपनी मर्जी से किसी को भी उपहार या वसीयत के जरिए दे सकता है। 4. यदि बिना वसीयत किए किसी की मृत्यु हो जाए तो संपत्ति कैसे बांटी जाती है? ऐसी स्थिति में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत मृतक की पत्नी, मां, बेटा और बेटी के बीच संपत्ति का बराबर बंटवारा होता है। 5. यदि 60 लाख रुपये की खुद कमाई संपत्ति बिना वसीयत रह जाए तो प्रत्येक को कितना मिलेगा? चार प्राथमिक वारिसों यानी पत्नी, मां, बेटा और बेटी प्रत्येक को 15-15 लाख रुपये का बराबर हिस्सा प्राप्त होगा। https://trendkia.com/national/paitrika-aura-khuda-kharidi-snpatti-men-patni-va-beti-ki-hissedari-kanuni-niyama-aura-bntavare-ki-puri-prakriya-47952 TrendKia — Har trend, sabse pehle.