# पारदर्शिता की कमी से न्यायपालिका में घुस आते हैं नफरती बयान देने वाले लोग, जस्टिस उज्जल भुइयां का बड़ा बयान

> सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम में पारदर्शिता की कमी की वजह से समुदायों को 'चींटी' कहने वाले लोग भी बिना जवाबदेही जज बन जाते हैं. उन्होंने नियुक्तियों पर सार्वजनिक चर्चा और कारण बताने की मांग की.

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-08-01 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/paradarshita-ki-kami-se-nyayapalika-men-ghusa-ate-hain-napharati-bayana-dene-vale-loga-justice-ujjal-bhuyan-ka-bara-bayana-12826 · **Language:** Hindi
**Tags:** कॉलेजियम सिस्टम, जस्टिस उज्जल भुइयां, सुप्रीम कोर्ट, न्यायिक नियुक्ति, जुडिशियल ट्रांसपेरेंसी इंडेक्स, सीजेआई सूर्यकांत, इलाहाबाद हाईकोर्ट

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने जजों की नियुक्ति की मौजूदा कॉलेजियम व्यवस्था पर खुलकर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि नियुक्तियों में पारदर्शिता की भारी कमी की वजह से कई बार ऐसे लोग भी अदालत में जज की कुर्सी तक पहुंच जाते हैं, जो किसी समुदाय या वर्ग के लोगों की तुलना 'चींटी' जैसी उपमा से करते हैं, और बाद में इसके लिए किसी तरह की जवाबदेही से भी बच निकलते हैं. जस्टिस भुइयां ने ऐसी टिप्पणियों को संविधान की मूल भावना के पूरी तरह खिलाफ बताया.

उन्होंने साफ कहा कि अगर न्यायपालिका में नियुक्ति की प्रक्रिया आज से ज्यादा पारदर्शी होती और उम्मीदवारों को लेकर पहले से सार्वजनिक चर्चा होती रहती, तो ऐसे लोगों की न्यायपालिका में एंट्री को शुरुआत में ही रोका जा सकता था.

## जज बनने वालों पर चर्चा से आखिर परहेज क्यों?
यह बयान जस्टिस भुइयां ने नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में दिया. इस मौके पर वे 'द ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी इंडेक्स' नाम की रिपोर्ट जारी कर रहे थे. उन्होंने कार्यक्रम में मौजूद लोगों से सीधा सवाल पूछा कि आखिर जज बनने वाले लोगों के बारे में सार्वजनिक तौर पर चर्चा होने में दिक्कत क्या है.

जस्टिस भुइयां ने कहा कि अगर ऐसे लोगों की नियुक्ति को रोकना है, जो आगे चलकर विवादित टिप्पणियां करते हैं, तो उनके नाम पर पहले से खुली चर्चा होनी जरूरी है. उन्होंने कहा, "लोगों को यह जानने का अधिकार है कि देश में किन लोगों को जज बनाया जा रहा है." उनका तर्क था कि जितनी ज्यादा पारदर्शिता होगी, न्यायपालिका पर जनता का भरोसा उतना ही मजबूत होता जाएगा, इसलिए उम्मीदवारों की जानकारी जनता के सामने रखने में कोई नुकसान नहीं, बल्कि फायदा ही है.

## कॉलेजियम की गोपनीयता पर उठे सवाल
जस्टिस भुइयां ने कॉलेजियम व्यवस्था की कार्यशैली पर भी टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि जजों की नियुक्ति और तबादलों से जुड़ी पूरी प्रक्रिया अभी भी बेहद गोपनीय ढंग से चलती है. कई बार तो यह तक साफ नहीं किया जाता कि किसी नाम को मंजूरी क्यों दी गई, या किसी सिफारिश को आखिर किन वजहों से टाल दिया गया.

उन्होंने खासतौर पर साल 2025 में हुई कॉलेजियम की तीन बैठकों का हवाला दिया. उनके मुताबिक, इन बैठकों में लिए गए फैसलों के पीछे नियुक्ति या तबादले की कोई स्पष्ट वजह सार्वजनिक नहीं की गई. जबकि इससे पहले कई मामलों में कॉलेजियम अपने फैसलों के पीछे विस्तृत कारण भी जारी किया करता था. यानी बीते कुछ समय में कॉलेजियम की पारदर्शिता उलटा घटी है, बढ़ी नहीं.

## बिना वजह बताए फैसले लेने का नुकसान किसे?
जस्टिस भुइयां ने कहा, "कारण न बताकर, संस्थान असल में उन कई न्यायाधीशों का नुकसान करता है जो सचमुच बेहतरीन हैं और जिन्होंने बहुत अच्छा काम किया है." उनका मतलब था कि जब किसी सक्षम जज के तबादले या पदोन्नति के पीछे की वजह सार्वजनिक नहीं की जाती, तो कई बार उस जज की काबिलियत पर ही गलत तरीके से सवाल उठने लगते हैं.

इसके साथ ही उन्होंने आगाह किया कि यही गोपनीयता एक दूसरी तरह का खतरा भी पैदा करती है. उनका कहना था कि कारण न बताने की यही आदत न्यायपालिका में ऐसे लोगों के आने की गुंजाइश भी बना देती है, जो आगे चलकर किसी समुदाय या वर्ग के लोगों को 'चींटी' जैसे शब्दों से पुकार सकते हैं, यानी ऐसी टिप्पणियां कर सकते हैं जो पूरी तरह असंवैधानिक हों और संविधान के मूल्यों के सीधे खिलाफ जाती हों. उनके मुताबिक ऐसे लोगों को न्यायपालिका में आने से रोकने के लिए कम से कम नियुक्तियों पर कुछ चर्चा जरूर होनी चाहिए और कुछ ठोस कारण भी सार्वजनिक किए जाने चाहिए.

## हाईकोर्ट के एक जज की टिप्पणी का इशारा
जस्टिस भुइयां ने कहा कि हाल ही में एक हाईकोर्ट जज ने भी ऐसी ही एक टिप्पणी की थी, हालांकि उन्होंने बोलते हुए किसी का नाम नहीं लिया. गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक पूर्व जज ने साल 2024 में विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में दिए अपने बयान से जबरदस्त विवाद खड़ा कर दिया था. इसके बाद विपक्षी नेताओं ने उनके इस बयान को 'घृणा भाषण' करार देते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई थी.

उस जज ने अपने बयान में यह दावा किया था कि भारतीय संस्कृति में बचपन से ही सबसे छोटे जीव-जंतुओं को भी नुकसान न पहुंचाने और चींटियों तक को न मारने की सीख दी जाती है, और यही सीख आगे चलकर लोगों को सहनशील और दयालु बनाती है, जिससे उन्हें दूसरों के दुख का एहसास भी होता है. उन्होंने आगे यह भी कह दिया था कि इसके उलट कुछ अन्य संस्कृतियों में बच्चों को कम उम्र से ही जानवरों को मारे जाने के दृश्य दिखा दिए जाते हैं, इसलिए उनसे सहनशीलता और दया की उम्मीद रखना मुश्किल है. यही टिप्पणी विवाद की जड़ बनी थी.

## कॉलेजियम के पिछले फैसलों पर भी सवाल
जस्टिस भुइयां ने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के पिछले तीन बयानों में भी जजों की पदोन्नति की सिफारिश के पीछे कोई ठोस वजह सार्वजनिक नहीं की गई थी. उनका कहना था कि भले ही कुछ लोग इन सिफारिशों को एक जैसे ढांचे पर आधारित या लगभग 'हूबहू कॉपी की गई' जैसा बता सकते हैं, लेकिन कम से कम इतना तो हुआ था कि उन सुझावों को सही ठहराने के लिए कुछ न कुछ कारण गिनाए गए थे. यानी मौजूदा हालात इससे भी एक कदम पीछे चले गए हैं, जहां अब वो थोड़े-बहुत कारण भी नहीं बताए जा रहे.

## सीजेआई सूर्यकांत की 'कॉकरोच' टिप्पणी पर भी मचा था बवाल
यह पहला मौका नहीं है जब किसी शीर्ष न्यायिक पद पर बैठे व्यक्ति की टिप्पणी को लेकर विवाद हुआ हो. कुछ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने भी कुछ लोगों को 'कॉकरोच' कहकर विवाद खड़ा कर दिया था. इस बयान के बाद 'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम से एक ऑनलाइन आंदोलन भी शुरू हो गया था, जिसने नीट पेपर लीक के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शनों की अगुआई की.

कॉलेजियम व्यवस्था की आलोचना का जिक्र करते हुए सीजेआई सूर्यकांत पहले कह चुके हैं कि जब कॉलेजियम सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के लिए किसी नाम की सिफारिश करता है, तो कई पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है, जैसे उम्मीदवार का कामकाज, जज के तौर पर उसका अनुभव और कार्यकाल, इससे पहले वह किन-किन पदों पर रह चुका है, और यहां तक कि उसका पूरा पेशेवर जीवन भी.

## इसका आप पर असर
- **आम नागरिक और वादियों के लिए:** अगर जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रहेगी, तो अदालत में आपका मामला किस सोच वाले जज सुनेंगे, इसका पता जनता को पहले से नहीं चल पाएगा.
- **न्यायपालिका पर भरोसे के लिए:** नियुक्तियों में जवाबदेही की यह बहस आगे चलकर जज बनाने की प्रक्रिया में बदलाव और ज्यादा पारदर्शिता की मांग को बल दे सकती है.

## सवाल-जवाब

### 1. जस्टिस उज्जल भुइयां ने क्या कहा है?
उन्होंने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम में पारदर्शिता की कमी की वजह से ऐसे लोग भी जज बन जाते हैं जो समुदायों को 'चींटी' जैसी उपमा देते हैं और बाद में बिना जवाबदेही के बच निकलते हैं.

### 2. यह बयान उन्होंने कहां दिया?
यह बयान उन्होंने नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के एक कार्यक्रम में दिया, जहां वे 'द ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी इंडेक्स' रिपोर्ट जारी कर रहे थे.

### 3. उन्होंने 2025 की कॉलेजियम बैठकों को लेकर क्या कहा?
उन्होंने कहा कि 2025 की तीन कॉलेजियम बैठकों में लिए गए नियुक्ति या तबादले के फैसलों के पीछे कोई स्पष्ट वजह सार्वजनिक नहीं की गई.

### 4. किस हाईकोर्ट जज की टिप्पणी का जिक्र हुआ?
जस्टिस भुइयां ने नाम नहीं लिया, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक पूर्व जज ने 2024 में विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रम में की गई टिप्पणी से विवाद खड़ा किया था.

### 5. सीजेआई सूर्यकांत की 'कॉकरोच' टिप्पणी से क्या हुआ था?
उनकी इस टिप्पणी के बाद 'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम से एक ऑनलाइन आंदोलन शुरू हुआ था, जिसने नीट पेपर लीक मुद्दे पर विरोध प्रदर्शनों की अगुआई की.

### 6. जस्टिस भुइयां किस बदलाव की मांग कर रहे हैं?
वे चाहते हैं कि जजों की नियुक्ति से पहले उम्मीदवारों पर सार्वजनिक चर्चा हो और नियुक्ति या तबादले के फैसलों के पीछे स्पष्ट कारण भी बताए जाएं.

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