पराली जलाने से बचें किसान, अवशेषों से खाद और मल्चिंग बनाकर जमीन को बनाएं उपजाऊ कटाई के बाद खेतों में बचे अवशेषों को जलाने के बजाय खाद, मल्चिंग और चारे के तौर पर इस्तेमाल करने से लागत घटती है और मिट्टी की सेहत बेहतर होती है। फसलों की कटाई संपन्न होने के बाद खेतों में ठूंठ और अवशेषों को जलाना कई बार काम निपटाने का सबसे तेज जरिया समझ लिया जाता है, परंतु यह कदम भूमि की उपजाऊ क्षमता को गहरी चोट पहुंचाता है और भारी वायु प्रदूषण फैलाता है। पर्यावरण को धुएं के हवाले करने की जगह यदि इन अवशेषों को खेत की जुताई कर मिट्टी के भीतर दबा दिया जाए, तो जमीन में प्राकृतिक कार्बनिक तत्वों की मात्रा तेजी से सुधरती है। वक्त बीतने के साथ यही डंठल और पत्तियां गलकर मिट्टी को कुदरती पोषण देने वाला स्थायी माध्यम बन जाते हैं। मल्चिंग तकनीक से नमी का संरक्षण और खरपतवार पर रोक कृषि अवशेषों को व्यवस्थित करने का एक बेहद कारगर माध्यम खेत की सतह पर मल्चिंग बिछाना है। कटाई के बाद बचे हुए अवशेषों को बारीक टुकड़ों में काटकर जब जमीन के ऊपर परत के रूप में फैलाया जाता है, तो मिट्टी के भीतर मौजूद नमी लंबे समय तक सुरक्षित रहती है। इस चादरनुमा आवरण के चलते सूरज की तीखी किरणें सीधी जमीन पर नहीं पड़तीं, जिससे वाष्पीकरण रुकता है और अनचाहे खरपतवारों का फैलाव भी काफी हद तक थम जाता है। सब्जियों की खेती, बागवानी के फलदार वृक्षों और विभिन्न मौसमी फसलों की उपज सुधारने में मल्चिंग का यह तरीका अत्यधिक असरदार साबित होता है। जैविक अपघटन से कम्पोस्ट तैयार करने का उपाय खेत में बचे भूसे, डंठल और सूखे पत्तों को खाद में बदलने का विकल्प भी काफी लाभदायक है। इन सभी अवशेषों को एक जगह इकट्ठा कर सही मात्रा में पानी और जैविक अपघटन की वैज्ञानिक विधि अपनाकर सड़ने के लिए छोड़ दिया जाए, तो उत्तम दर्जे की जैविक कम्पोस्ट खाद तैयार हो जाती है। इस देशी खाद को दोबारा खेतों में बिखेरने से जमीन की संरचना मजबूत होती है और बाजार से मिलने वाले महंगे रासायनिक उर्वरकों पर किसानों का गैर-जरूरी खर्च घट जाता है। पशु आहार, बायोगैस और बायोचार के नए विकल्प फसलों के कई तरह के बचे हुए हिस्से पशुओं के लिए बेहतरीन सूखा चारा भी बन सकते हैं। गेहूं का भूसा सदियों से चारे के तौर पर उपयोग में लाया जाता रहा है, हालांकि अन्य फसलों के डंठलों को खिलाने योग्य बनाने के लिए उनका सही प्रसंस्करण आवश्यक होता है। चारे के अतिरिक्त अवशेषों से ऊर्जा उत्पादन की दिशा में बायोगैस तैयार करने और जमीन की उर्वरता बढ़ाने वाले बायोचार जैसे उत्पाद विकसित करने के रास्ते भी मौजूद हैं। कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह से करें सही प्रबंधन अवशेषों को खेत के लिए समस्या मानने के बजाय उनका पुनः उपयोग पर्यावरण और आर्थिक स्थिति दोनों के लिए वरदान साबित हो सकता है। किसी भी फसल के कचरे को मिट्टी में मिलाने, कम्पोस्ट बनाने या चारे के रूप में उपयोग में लाने से पहले फसल की किस्म और क्षेत्रीय जलवायु को समझना आवश्यक है। सुरक्षित और वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए कृषि विभाग अथवा कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों से परामर्श लेकर काम आगे बढ़ाना सबसे सुरक्षित मार्ग है। इसका आप पर असर फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनका पुनर्चक्रण करने से किसानों की खेती की लागत सीधे घटती है और खेतों की उत्पादकता में दीर्घकालिक सुधार होता है। • भारत में: पराली के वैज्ञानिक प्रबंधन से देश भर में कटाई के मौसम में होने वाले वायु प्रदूषण और स्मॉग पर रोक लगेगी। इससे ग्रामीण और शहरी आबादी को सांस संबंधी बीमारियों से राहत मिलेगी और रासायनिक खाद पर सरकारी सब्सिडी का बोझ घटेगा। • भीलवाड़ा में: जिले के किसान अवशेषों की मल्चिंग अपनाकर सिंचाई के पानी की खपत में उल्लेखनीय कटौती कर सकते हैं। शुष्क मौसम में मिट्टी की नमी बची रहने से भीलवाड़ा क्षेत्र में रबी और सब्जी फसलों की पैदावार में बड़ा सुधार होगा। • लागत में बचत: खेतों में ही देशी कम्पोस्ट बनाने से बाजार के रासायनिक खादों पर निर्भरता तुरंत घट जाती है। प्रति एकड़ फसल उत्पादन में खाद पर लगने वाला पैसा बचने से किसान का शुद्ध मुनाफा बढ़ जाता है। • मिट्टी की सुरक्षा: मल्चिंग से खेत की सतह पर सीधी धूप नहीं पड़ती और मिट्टी का कटाव रुकता है। इससे जमीन में केंचुए और मित्र जीवाणु लंबे समय तक सक्रिय रहते हैं। ऐसा क्यों हुआ कटाई के बाद खेत की त्वरित सफाई और अगली बुआई की जल्दी के कारण अवशेषों को जलाने की परंपरा बनी रहती है, जबकि इसके वैज्ञानिक विकल्पों के कई ठोस आधार हैं। • सीधे जलाने का कारण: किसान अगली फसल की बुआई के लिए खेत को तुरंत साफ करना चाहते हैं और अवशेषों को जलाना सबसे सस्ता व आसान रास्ता लगता है। इस त्वरित निपटारे से मिट्टी के सूक्ष्म पोषक तत्व और लाभकारी मित्र कीट आग में जलकर नष्ट हो जाते हैं। • अपघटन का वैज्ञानिक चक्र: सूखे डंठल और भूसे को जब उचित नमी और जीवाणुओं के साथ दबाया जाता है, तो कुदरती सड़न से ह्यूमस का निर्माण होता है। यही प्राकृतिक प्रक्रिया जमीन में नमी सोखने की क्षमता और पोषण स्तर को दोबारा लौटाती है। • सलाह की आवश्यकता: प्रत्येक फसल का डंठल और उसकी कठोरता अलग होती है, जिससे सभी अवशेषों पर एक जैसी विधि लागू नहीं हो सकती। इसलिए कृषि विज्ञान केंद्र के परामर्श से सही तकनीक चुनने पर ही अवशेषों का सुरक्षित निपटारा संभव हो पाता है। सवाल-जवाब 1. फसल अवशेषों को जलाने से मिट्टी को क्या नुकसान होता है? अवशेषों को जलाने से मिट्टी की ऊपरी परत में मौजूद जैविक पदार्थ नष्ट हो जाते हैं और जमीन में रहने वाले मित्र जीवाणु खत्म हो जाते हैं। 2. खेत में मल्चिंग करने के मुख्य लाभ क्या हैं? मल्चिंग से मिट्टी की नमी लंबे समय तक सुरक्षित रहती है, तेज धूप से जमीन का बचाव होता है और हानिकारक खरपतवारों की वृद्धि रुकती है। 3. फसल अवशेषों से कम्पोस्ट खाद कैसे तैयार की जा सकती है? डंठल, भूसा और पत्तियों को पर्याप्त नमी और जैविक अपघटन की वैज्ञानिक प्रक्रिया से सड़ाकर उत्तम जैविक खाद बनाई जा सकती है। 4. पशु आहार के लिए किन फसल अवशेषों का उपयोग होता है? गेहूं का भूसा जैसे अवशेष पशुओं के चारे के रूप में सीधे इस्तेमाल होते हैं, जबकि अन्य फसलों के अवशेषों को उचित प्रसंस्करण के बाद खिलाया जा सकता है। 5. अवशेषों से अन्य कौन से उत्पाद बनाए जा सकते हैं? कृषि अवशेषों का उपयोग बायोगैस ऊर्जा उत्पादन और जमीन सुधारने वाले बायोचार जैसे मूल्यवान उत्पाद तैयार करने में किया जा सकता है। 6. अवशेष प्रबंधन से पहले किसान को किससे परामर्श लेना चाहिए? फसल के प्रकार और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सही प्रबंधन के लिए कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों से सलाह लेनी चाहिए। https://trendkia.com/national/parali-jalane-se-bachen-kisana-avasheshon-se-khada-aura-malchinga-banakara-jamina-ko-banaen-upajau-35921 TrendKia — Har trend, sabse pehle.