# पशु परीक्षण के नए ड्राफ्ट नियमों पर पशु अधिकार कार्यकर्ता गौरी मौलेखी ने उठाए कड़े सवाल

> प्रयोगशालाओं में जानवरों के परीक्षण से जुड़े नए मसौदा नियमों को लेकर पशु अधिकार कार्यकर्ता गौरी मौलेखी ने तीखा विरोध जताया है। उनका कहना है कि निगरानी में ढील देने से न सिर्फ जानवरों पर बर्बरता बढ़ेगी, बल्कि दवाओं की गुणवत्ता और देश की वैज्ञानिक साख को भी गहरा नुकसान पहुंचेगा।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-10-31 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/pashu-parikshana-ke-nae-draphta-niyamon-para-pashu-adhikara-karyakarta-gauri-maulekhi-ne-uthae-kare-savala-54073 · **Language:** Hindi
**Tags:** गौरी मौलेखी, पशु परीक्षण, प्रयोगशाला नियम, पशु कल्याण, पीपल फॉर एनिमल्स, दवा परीक्षण, वैज्ञानिक शोध

प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक और मेडिकल परीक्षणों के लिए जानवरों के इस्तेमाल से जुड़े नए ड्राफ्ट नियमों ने एक बड़ी बहस छेड़ दी है। पीपल फॉर एनिमल्स की ट्रस्टी और पशु कल्याण कार्यकर्ता गौरी मौलेखी ने केंद्र सरकार के प्रस्तावित मसौदे पर कड़ा ऐतराज जताते हुए आगाह किया है कि अगर ये नियम लागू हुए, तो प्रयोगशालाओं में जानवरों के संरक्षण की वर्षों पुरानी व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी। उनका तर्क है कि निगरानी तंत्र को कमजोर करने और परीक्षण केंद्रों को मनमानी शक्तियां देने से प्रयोगशालाएं दर्दनाक प्रयोगों का अड्डा बन जाएंगी, जिसका सीधा प्रतिकूल प्रभाव भारतीय शोध और दवा उद्योग की वैश्विक विश्वसनीयता पर पड़ेगा।

## निगरानी तंत्र में ढील और आंतरिक समितियों के हाथों में फैसले का संकट
प्रस्तावित व्यवस्था में सबसे बड़ी खामी प्रयोगशालाओं को खुद अपने प्रयोगों को हरी झंडी देने की स्वायत्तता सौंपना है। मौजूदा नियामक ढांचे के तहत किसी भी जीव पर शोध शुरू करने से पहले एक सख्त प्रोटोकॉल तैयार किया जाता है, जिसमें स्वतंत्र विशेषज्ञ यह परखते हैं कि क्या वाकई उस प्रयोग के लिए जीव की बलि देना अनिवार्य है, पशुओं की संख्या को घटाया जा सकता है या फिर बिना जीवित पशुओं के आधुनिक वैज्ञानिक विकल्पों से नतीजे निकाले जा सकते हैं। नए मसौदे में प्रयोगशालाओं को यह तय करने की छूट दी जा रही है कि कौन से शोध के लिए बाहरी सरकारी अनुमति जरूरी है और किसे उनकी आंतरिक समिति स्वयं मंजूरी दे सकती है। इस आंतरिक समिति की संरचना में छह सदस्यों का प्रावधान है, जिनमें चार सदस्य सीधे तौर पर उसी संस्थान के वेतनभोगी या प्रतिनिधि होंगे और मात्र दो बाहरी सदस्य रखे जाएंगे। ऐसे ढांचे में निष्पक्षता और मानवीय संवेदनाओं की उपेक्षा होना लगभग तय है क्योंकि संस्थान का बहुमत हमेशा अपने व्यावसायिक और शोध हितों को प्राथमिकता देगा। इसके अलावा बिना किसी पूर्व सूचना के होने वाले औचक छापों की व्यवस्था को बदलकर अब पूर्व सूचना देकर निरीक्षण करने का प्रस्ताव रखा गया है, जिससे लापरवाहियों और क्रूरताओं को पहले ही छिपाने का खुला अवसर मिल जाएगा।

## खुले बाजारों से पशुओं की खरीद और अमानक रिसर्च का दोहरा खतरा
नए मसौदे में यह व्यवस्था भी शामिल की गई है कि यदि पंजीकृत और प्रमाणित ब्रीडर्स से पशु उपलब्ध न हों, तो अनुसंधान संस्थान खुले बाजार से फार्म पशुओं, पक्षियों तथा मछलियों की खरीद कर सकते हैं। इस नियम को बेहद खतरनाक बताते हुए चिंता जताई गई है कि इसके जरिए आवारा कुत्तों, बंदरों और पशु मेलों व मंडियों से गाय-बैलों को अवैध तरीके से प्रयोगशालाओं तक पहुंचाने का रास्ता खुल सकता है। सड़क या खुले बाजार से लाए गए पशुओं का कोई मेडिकल रिकॉर्ड नहीं होता और वे अज्ञात संक्रमणों, परजीवियों तथा गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हो सकते हैं। जब ऐसे अस्वस्थ जीवों पर दवाओं का परीक्षण होगा, तो मिलने वाले वैज्ञानिक आंकड़े पूरी तरह भ्रामक और अमानक होंगे। इन त्रुटिपूर्ण आंकड़ों के आधार पर तैयार की जाने वाली दवाएं जब इंसानों के इलाज के लिए बाजार में आएंगी, तो वे मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं।

## वन्यजीवों के पारिस्थितिकी तंत्र पर असर और जंगलों से पकड़ने की छूट
प्रस्तावित दिशा-निर्देशों में जंगली जीवों को उनके प्राकृतिक आवासों से पकड़कर शोध केंद्रों में बंद करने के रास्ते भी खुले दिखाई देते हैं। जंगलों में जाल, शिकंजे और फंदे लगाकर वन्यजीवों को पकड़ने से न केवल दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में पड़ेगा, बल्कि पूरा स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और खाद्य श्रृंखला असंतुलित हो जाएगी। संरक्षण का अर्थ केवल किसी एक विशेष वन्यजीव को बचाना नहीं, बल्कि उसके समूचे प्राकृतिक परिवेश को सुरक्षित रखना होता है। वन्यजीवों को पकड़कर अनुसंधान के नाम पर पिंजरों में कैद करने की छूट से गंभीर कानूनी और पर्यावरणीय संकट पैदा होने की पूरी आशंका है।

## दर्द निवारक दवाओं की अनदेखी और पांच साल तक निरंतर यातनाएं
प्रस्तावित नियमों के तहत किसी एक बेजुबान जीव पर लगातार पांच वर्षों तक बार-बार प्रयोग दोहराए जाने की व्यवस्था की गई है। हड्डियों से जुड़ी दवाओं के परीक्षण के लिए जीवित खरगोशों की हड्डियां तोड़ दी जाती हैं और फिर दवा देकर उनके जुड़ने की धीमी प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है। पहले के कड़े नियमों में दर्द निवारक और एनेस्थीसिया का अनिवार्य इस्तेमाल तय था ताकि परीक्षण के दौरान जीवों को असहनीय पीड़ा से बचाया जा सके, मगर नए मसौदे से इन रक्षात्मक पाबंदियों को काफी हद तक हटा दिया गया है। इसी तरह किसी रसायन या दवा के घातक असर को परखने के लिए परीक्षण तब तक जारी रखा जाता है जब तक कि बैच के पचास प्रतिशत जानवर तड़प-तड़प कर दम न तोड़ दें। खरगोशों की आंखों में दवाएं और कॉस्मेटिक तत्व डालकर जलन और अंधापन जांचने के पुराने तरीकों को भी बढ़ावा मिलने की आशंका है। दर्द की श्रेणियों को हल्के, मध्यम और गंभीर जैसे वर्गों में बांटने का अधिकार भी जब प्रयोगशाला की अपनी समिति के पास होगा, तो अत्यंत दर्दनाक प्रयोगों को भी कागजों पर हल्का बताकर अंजाम दिया जा सकता है।

## शारीरिक पीड़ा के साथ मानसिक तनाव और क्रूर प्रयोगों की हकीकत
अनुसंधान के नाम पर जानवरों को दी जाने वाली यातनाएं केवल शारीरिक घावों तक सीमित नहीं हैं। सुरक्षा उपकरणों और हेलमेट की क्षमता जांचने के लिए बंदरों को पूरी तरह होश में रखकर लोहे की कुर्सियों में कसकर बांध दिया जाता है और उनके सिर पर भारी यांत्रिक दबाव डालकर खोपड़ी तोड़ दी जाती है ताकि यह दर्ज किया जा सके कि किस तीव्रता पर जीव की मौत होती है। वैज्ञानिक शोध के नाम पर यह नजरअंदाज कर दिया जाता है कि ये मूक प्राणी भी इंसानों की तरह ही भय, तनाव, अवसाद और अपने परिवार से बिछड़ने का गहरा संताप महसूस करते हैं। अत्यधिक संकरे और अंधेरे पिंजरों में लंबे समय तक बंद रखना तथा दिनों तक भूखा-प्यासा छोड़ देना उनके मानसिक संतुलन को पूरी तरह नष्ट कर देता है।

## भारत के ग्लोबल टेस्टिंग डंपिंग ग्राउंड बनने का अंदेशा
यूरोपीय संघ जैसे विकसित क्षेत्रों में वर्ष 2010 से ही अत्यंत कड़ा कानून लागू है, जिसके तहत वैज्ञानिक को प्रत्येक प्रयोग से पहले यह कानूनी तौर पर साबित करना पड़ता है कि बिना पशुओं के यह काम क्यों संभव नहीं है और परीक्षण में पशुओं की संख्या को न्यूनतम स्तर पर क्यों नहीं रखा जा सकता। ऐसे में यदि भारत अपने नियमों को शिथिल करता है, तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां और विदेशी दवा निर्माता अपने उन अत्यधिक क्रूर और जटिल परीक्षणों को भारत स्थानांतरित कर देंगे जिन्हें उनके अपने देशों में कड़े कानूनों के कारण मंजूरी नहीं मिलती। आधुनिक दुनिया में जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई, मॉलिक्यूलर मॉडलिंग, ऑर्गन-ऑन-चिप और उन्नत कंप्यूटर सिमुलेशन के जरिए बिना पशुओं को मारे सटीक परिणाम हासिल किए जा रहे हैं, तब भारत का पुराने और बर्बर तरीकों की तरफ लौटना देश के विज्ञान और दवा निर्माण उद्योग की अंतरराष्ट्रीय साख को मिट्टी में मिला सकता है।

## आपत्तियां और सुझाव दर्ज कराने के लिए 5 नवंबर तक का समय
प्रस्तावित मसौदे की इन घातक विसंगतियों को देखते हुए आम जनता, डॉक्टरों, वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और नागरिक संगठनों से अपील की गई है कि वे लोकतंत्र में मिले अधिकारों का उपयोग करें और सरकार के सामने अपना विरोध दर्ज कराएं। पशु कल्याण नियमों को अंतिम रूप देने से पहले सभी संबंधित पक्षों की चिंताओं को सुना जाना आवश्यक है। नागरिक इस मसौदे पर अपने रचनात्मक सुझाव और औपचारिक आपत्तियां 5 नवंबर से पहले आधिकारिक ईमेल cpcsea-mef@gov.in पर भेज सकते हैं, ताकि देश में विज्ञान की प्रगति और पशुओं के प्रति मानवीय संवेदनाओं के बीच एक जिम्मेदार संतुलन बना रहे।

## इसका आप पर असर
प्रयोगशालाओं में जानवरों के परीक्षण नियमों में बदलाव का सीधा असर इंसानी दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और जैव विविधता पर पड़ता है।

- **दवाओं की सुरक्षा पर असर:** खुले बाजार और सड़कों से लाए गए अस्वस्थ पशुओं पर परीक्षण करने से दवाओं के वैज्ञानिक आंकड़े दूषित हो सकते हैं। इससे बाजार में आने वाली इंसानी दवाओं के अप्रत्याशित और गंभीर साइड इफेक्ट्स का खतरा बढ़ जाएगा।
- **पर्यावरण और वन्यजीव संतुलन:** जंगलों से जंगली जानवरों को पकड़कर प्रयोगशालाओं में भेजने की छूट से वन्यजीवों का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ेगा। शिकार और फंदे लगाने की गतिविधियों से कई लुप्तप्राय प्रजातियों पर सीधा संकट आ सकता है।
- **भारत की वैज्ञानिक साख:** कड़े नियमों के अभाव में भारत बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए क्रूर प्रयोगों का सस्ता ठिकाना बन सकता है। इससे भारतीय फार्मा उद्योग और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त शोध पर सवालिया निशान लगेंगे।
- **नागरिकों की भागीदारी का मौका:** आम नागरिकों के पास 5 नवंबर तक इस मसौडे के खिलाफ अपनी आपत्तियां दर्ज कराने का खुला अवसर है। लोग आधिकारिक ईमेल पते पर अपनी बात भेजकर नीतिगत बदलाव में हिस्सेदार बन सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
केंद्रीय स्तर पर प्रयोगशाला नियमों में प्रस्तावित संशोधन अनुसंधान प्रक्रियाओं को सरल बनाने के नाम पर आगे बढ़ाए गए हैं, जिससे पुरानी नियामक संस्थाओं की भूमिका घट रही है।

- **प्रक्रियात्मक छूट की मांग:** अनुसंधान संस्थानों और दवा कंपनियों द्वारा प्रयोगों की अनुमति में लगने वाले समय को कम करने के लिए इन नए नियमों का मसौदा तैयार किया गया है। सरकारी लालफीताशाही घटाने के चक्कर में आंतरिक समितियों को ही सर्वेसर्वा बना दिया गया है।
- **आपूर्ति की कमी का हवाला:** पंजीकृत ब्रीडर्स से पर्याप्त संख्या में जानवर न मिलने की स्थिति से निपटने के लिए खुले बाजार से पशु खरीद का विवादित नियम जोड़ा गया है। इस प्रावधान से बिना चिकित्सकीय जांच वाले आवारा और फार्म पशुओं के लैब में जाने का रास्ता खुला है।
- **अंतरराष्ट्रीय मानकों से अलगाव:** विकसित देश जहां कंप्यूटर सिमुलेशन और गैर-पशु परीक्षणों को अनिवार्य बना रहे हैं, वहीं भारत में पुराने तरीकों को ही छूट देकर जारी रखने की कोशिश की जा रही है। पशु कल्याण संगठनों के विरोध के चलते इस मसौदे पर 5 नवंबर तक राय मांगी गई है।

## सवाल-जवाब

### 1. गौरी मौलेखी ने नए ड्राफ्ट नियमों का विरोध क्यों किया है?
उनका मानना है कि ये नियम प्रयोगशालाओं की जवाबदेही खत्म करते हैं, जानवरों पर बर्बरता बढ़ाते हैं और अमानक रिसर्च से इंसानी स्वास्थ्य को खतरे में डालते हैं।

### 2. प्रस्तावित नियमों के तहत आंतरिक समिति में कौन लोग शामिल होंगे?
समिति में कुल छह सदस्य होंगे, जिनमें चार संबंधित संस्थान के आंतरिक लोग होंगे और केवल दो बाहरी प्रतिनिधि शामिल किए जाएंगे।

### 3. खुले बाजार से जानवर खरीदने की अनुमति से क्या जोखिम पैदा होगा?
इससे अज्ञात बीमारियों और संक्रमण वाले आवारा व फार्म पशु लैब में आएंगे, जिससे दवाओं के परीक्षण परिणाम पूरी तरह गलत हो सकते हैं।

### 4. परीक्षणों के दौरान दर्द रोकने के नियमों में क्या बदलाव प्रस्तावित है?
पुराने नियमों में बेहोशी और दर्द निवारक दवाओं की जो अनिवार्यता थी, नए मसौदे में उन रक्षात्मक प्रावधानों को काफी हद तक हटा दिया गया है।

### 5. नागरिक अपनी आपत्तियां और सुझाव किस तारीख तक भेज सकते हैं?
नागरिक 5 नवंबर से पहले सरकार के आधिकारिक ईमेल cpcsea-mef@gov.in पर अपने सुझाव और आपत्तियां भेज सकते हैं।

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