प्राचीन भारतीय शास्त्रों को लेकर फैलाए गए कई भ्रम, योग गुरु रामदेव ने हरिद्वार में रखी अपनी बात हरिद्वार में आयोजित संवाद के दौरान स्वामी रामदेव ने कहा कि सनातन धर्म पूरी तरह समानता और सद्भाव पर आधारित है, जबकि ऐतिहासिक कालखंडों में साजिश के तहत इसके ग्रंथों और सामाजिक व्यवस्था को गलत रूप में पेश किया गया। उत्तराखंड के हरिद्वार में एक विशेष परिचर्चा को संबोधित करते हुए योग गुरु स्वामी रामदेव ने भारतीय धर्मग्रंथों, ऐतिहासिक संदर्भों और सामाजिक व्यवस्था को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि सनातन धर्म के सिद्धांतों को लेकर जानबूझकर भ्रांतियां गढ़ी गईं और हिंदू मान्यताओं को निशाना बनाने का प्रयास हुआ। ऐतिहासिक ग्रंथों, तथ्यों पर आधारित ज्ञान तथा विविध मतों और आस्थाओं के बीच जारी वैचारिक मतभेदों के संदर्भ में उन्होंने यह बात रखी। स्वामी रामदेव ने रेखांकित किया कि सनातन परंपरा में सभी मनुष्य एक समान हैं और इसमें किसी भी प्रकार के ऊंच-नीच अथवा भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं है। मुगल और ब्रिटिश काल की नीतियों पर सवाल स्वामी रामदेव ने इतिहास की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि मुगल सल्तनत और ब्रिटिश हुकूमत के दौर में भारतीय शास्त्रों को लेकर बड़े पैमाने पर गलत धारणाएं फैलाई गईं। उनका कहना था कि भारतीय ग्रंथों पर इस तरह के घिनौने आक्षेप मढ़े गए जिससे कि भविष्य की पीढ़ियां अपनी ही जड़ों और संस्कृति से घृणा करने लगें। अपने वक्तव्य को पुख्ता करने के लिए उन्होंने प्राचीन शास्त्रों के कई श्लोकों का हवाला दिया। उन्होंने विशेष रूप से मनुस्मृति की चर्चा करते हुए कहा कि इस ग्रंथ की मूल भावना को विकृत करके इसे बदनाम करने का संगठित षड्यंत्र रचा गया। योग गुरु के अनुसार, सनातन की मूल शिक्षाओं में स्त्रियों अथवा शूद्रों के अपमान का कोई विचार मौजूद नहीं है। विदेशी ताकतों ने भारत के समाज में फूट डालने और अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए समाज को आंतरिक रूप से बांटने का काम किया। उन्होंने कहा कि सनातन की स्वाभाविक प्रवृत्ति हमेशा से सामाजिक समरसता और आपसी सद्भाव को आगे बढ़ाने की रही है, न कि किसी वर्ग को दबाने की। वर्ण व्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान की व्याख्या सामाजिक विभाजन की चर्चा करते हुए स्वामी रामदेव ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की अवधारणा पर भी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि प्राचीन व्यवस्था पूरी तरह व्यक्ति के कर्म और गुणों पर आधारित थी, लेकिन कालांतर में इसे गलत अर्थ देकर जन्म और भेदभाव से जोड़ दिया गया। उन्होंने दुख जताया कि आपसी फूट और विदेशी आक्रांताओं की निरंतर लूट ने इस ऐतिहासिक राष्ट्र को व्यापक क्षति पहुंचाई। सनातन मान्यताओं का तिरस्कार करना एक गहरा धार्मिक और सांस्कृतिक अपराध था, जिसे राजनीतिक तत्वों का संरक्षण प्राप्त रहा। उन्होंने कहा कि लोगों को उनकी मूल सांस्कृतिक पहचान से काटकर अन्य धर्मों, जैसे ईसाई और मुस्लिम पंथ की ओर धकेलने की साजिशें रची गईं। इसी प्रक्रिया के तहत देश के 30 से 40 करोड़ लोगों को अपनी मूल सनातनी परंपराओं से दूर कर दिया गया। उन्होंने उन लोगों पर भी कड़ा प्रहार किया जो बिना किसी वास्तविक अध्ययन या समझ के वेदों की ऋचाओं और सनातन धर्म की मनमानी व्याख्या करने में लग जाते हैं। विज्ञान, स्वास्थ्य और वैश्विक स्वीकार्यता सनातन परंपरा के दार्शनिक आधार की व्याख्या करते हुए स्वामी रामदेव ने कहा कि सत्य और धर्म को ही जीवन का सर्वोच्च आदर्श माना गया है। सनातन जीवन शैली पूरी तरह वैज्ञानिक सिद्धांतों की कसौटी पर खरी उतरती है। आज वैश्विक स्तर पर लोग अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के संवर्धन के लिए इन सनातनी नियमों को जीवन में शामिल कर रहे हैं। योग और आयुर्वेद के प्रति संपूर्ण विश्व में लोगों का विश्वास और निष्ठा लगातार बढ़ रही है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि वर्तमान दौर में ईश्वर की आराधना के भीतर भी अमीर और गरीब का अंतर पैदा करने की अनुचित कोशिशें दिखाई देती हैं। उन्होंने कहा कि लूट और झूठ के सहारे इस सनातन परंपरा को कमजोर करने का षड्यंत्र कभी सफल नहीं होगा, क्योंकि पूरी दुनिया में 150 करोड़ से अधिक लोग सनातन धर्म के सिद्धांतों में आस्था रखते हैं। स्वामी रामदेव ने यह भी जोड़ा कि यदि भारत में 99 प्रतिशत मुसलमानों से सच्चाई पूछी जाए तो वे भी स्वीकार करेंगे कि उनके पूर्वज प्राचीन ऋषि-महर्षि ही थे। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने सनातन धर्म को दुनिया के सभी मतों और धर्मों का आदिपिता बताया। इसका आप पर असर स्वामी रामदेव का यह वक्तव्य भारतीय सामाजिक इतिहास, सांस्कृतिक विमर्श और धर्मग्रंथों की समझ को लेकर चल रही बहसों को नई दिशा देता है। • सांस्कृतिक जागरूकता: प्राचीन ग्रंथों और वर्ण व्यवस्था के कर्म आधारित होने के तर्क से आम नागरिकों को ऐतिहासिक भ्रांतियों को दूर करने में सहायता मिलती है। लोग शास्त्रों को शाब्दिक अर्थ के बजाय उनके ऐतिहासिक और संदर्भगत दृष्टिकोण से समझने के लिए प्रेरित हो सकते हैं। • वैश्विक जीवनशैली: आयुर्वेद और योग के वैज्ञानिक आधार पर जोर देने से दैनिक स्वास्थ्य दिनचर्या में पारंपरिक भारतीय पद्धतियों का प्रसार तेज होता है। पाठक अपनी जीवनशैली में निवारक स्वास्थ्य उपायों को शामिल करने के प्रति अधिक जागरूक हो सकते हैं। • सामाजिक समरसता: धर्म में सभी की समानता और महिलाओं व वंचित वर्गों के सम्मान की बात सामाजिक भेदभाव को दूर करने में सहायक सिद्ध हो सकती है। इससे सामुदायिक स्तर पर आपसी भाईचारे और संवाद को प्रोत्साहन मिलता है। • ऐतिहासिक पड़ताल: विदेशी शासनकाल में रचे गए आख्यानों पर सवाल उठाने से युवा पीढ़ी को निष्पक्ष और तथ्यपरक इतिहास के अध्ययन की प्रेरणा मिलती है। इससे शैक्षणिक विमर्शों में भी भारतीय दृष्टिकोण को बल मिलने की संभावना बढ़ती है। ऐसा क्यों हुआ यह प्रेस कॉन्फ्रेंस ऐतिहासिक शास्त्रों, सामाजिक आख्यानों और विभिन्न संप्रदायों के बीच चल रही बहसों के संदर्भ में बुलाई गई थी, जिसमें स्वामी रामदेव ने सनातन मान्यताओं के पक्ष में तथ्य प्रस्तुत किए। • ग्रंथों की विकृत व्याख्या: स्वामी रामदेव के अनुसार, औपनिवेशिक और मध्यकालीन शासकों के समय भारतीय शास्त्रों का जानबूझकर ऐसा अनुवाद और प्रचार किया गया जिससे समाज में हीनभावना और विभाजन पनपे। इस ऐतिहासिक प्रभाव को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने प्राचीन श्लोकों का सहारा लिया। • धार्मिक और राजनीतिक विमर्श: हाल के दिनों में विभिन्न सार्वजनिक मंचों पर सनातन परंपराओं, मनुस्मृति और जाति व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों के बीच उन्होंने मूल दार्शनिक व्यवस्था को स्पष्ट करना आवश्यक समझा। उनका मत था कि राजनीतिक संरक्षण में सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने का प्रयास हुआ। • वैश्विक स्तर पर बढ़ती स्वीकार्यता: दुनिया भर में योग और प्राकृतिक चिकित्सा के विस्तार के बीच उन्होंने यह रेखांकित किया कि सनातन की मूल शिक्षाएं विज्ञान सम्मत हैं, इसलिए इसके विरुद्ध रचे जाने वाले आख्यानों का खंडन समय पर किया जाना जरूरी है। सवाल-जवाब 1. स्वामी रामदेव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कहां आयोजित की थी? स्वामी रामदेव ने यह प्रेस कॉन्फ्रेंस उत्तराखंड के हरिद्वार में आयोजित की थी। 2. स्वामी रामदेव के अनुसार सनातन धर्म में वर्ण व्यवस्था का क्या आधार था? उन्होंने बताया कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की व्यवस्था व्यक्ति के कर्म और कार्यों पर आधारित थी, न कि जन्मजात भेदभाव पर। 3. मनुस्मृति और महिलाओं के संबंध में स्वामी रामदेव ने क्या विचार रखे? उन्होंने कहा कि मनुस्मृति को दुर्भावना से बदनाम किया गया और सनातन परंपरा में शूद्रों अथवा स्त्रियों के अपमान का कोई विचार नहीं है। 4. स्वामी रामदेव के अनुसार दुनिया भर में कितने सनातन धर्मी हैं? स्वामी रामदेव ने बताया कि पूरे विश्व में 150 करोड़ से अधिक लोग सनातन धर्म में आस्था रखते हैं। 5. ऐतिहासिक धर्म परिवर्तन को लेकर उन्होंने क्या संख्या बताई? उन्होंने उल्लेख किया कि साजिशों और फूट के चलते देश के लगभग 30 से 40 करोड़ लोग अपनी मूल सनातनी परंपरा से अलग हो गए। https://trendkia.com/national/prachina-bharatiya-shastron-ko-lekara-phailae-gae-kai-bhrama-yoga-guru-ramdev-ne-haridwar-men-rakhi-apani-bata-52478 TrendKia — Har trend, sabse pehle.