प्रजनन दर में बड़ी गिरावट के बाद भारत में परिवार नियोजन के बजट पर पुनर्विचार की मांग, चीन के संकट से सीख लेने की सलाह भारत की कुल प्रजनन दर घटकर 1.9 रह जाने पर प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सन्याल ने आबादी घटाने वाली योजनाओं के भारी खर्च पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि समय रहते नीति न बदलने पर भारत भी चीन की तरह तेजी से बुजुर्ग होती आबादी की समस्या में फंस सकता है। भारत में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर दशकों से चली आ रही पुरानी सोच पर अब गंभीर आर्थिक और सामाजिक सवाल खड़े होने लगे हैं। देश की प्रजनन क्षमता अब उस सीमा से भी नीचे पहुंच चुकी है जहां आबादी स्वाभाविक रूप से स्थिर रहती है। ऐसे में नीति विशेषज्ञों का मानना है कि आबादी कम करने के पुराने सरकारी अभियानों और उन पर खर्च किए जा रहे भारी भरकम बजट की दिशा पर तुरंत पुनर्विचार करने का समय आ गया है। प्रधानमंत्री की आर्थिक मामलों की समिति के सदस्य संजीव सन्याल ने स्पष्ट किया है कि भारत की असल चुनौती अब अधिक आबादी नहीं, बल्कि भविष्य में तेजी से उम्रदराज होती आबादी और सिकुड़ता कार्यबल बनने जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत में महिलाओं के औसतन बच्चों की संख्या अब 2.1 के रिप्लेसमेंट स्तर से काफी नीचे खिसक चुकी है। इसके बावजूद वर्तमान में कुल आबादी में जो हल्की वृद्धि दिख रही है, उसका मुख्य कारण जनसांख्यिकीय गति यानी डेमोग्राफिक मोमेंटम है। देश में पिछले दशकों के दौरान बड़ी संख्या में बच्चे पैदा हुए थे, और वही विशाल पीढ़ी अब वयस्क होकर स्वयं माता-पिता की भूमिका में है। इसी वजह से प्रति महिला जन्म लेने वाले बच्चों की दर में भारी कमी आने के बावजूद कुल आबादी का आंकड़ा कुछ और वर्षों तक धीरे-धीरे ऊपर की ओर जाता दिखाई देगा, लेकिन इसके बाद इसमें तेज गिरावट शुरू हो सकती है। प्रजनन दर में ऐतिहासिक गिरावट के आंकड़े भारत सरकार के वर्ष 2023 के सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम यानी एसआरएस द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक देश की कुल प्रजनन दर गिरकर 1.9 पर आ चुकी है। इसका सीधा अर्थ यह है कि एक भारतीय महिला अपने पूरे प्रजनन काल के दौरान औसतन 1.9 बच्चों को ही जन्म दे रही है। जनसांख्यिकी विज्ञान में 2.1 की दर को प्रतिस्थापन स्तर माना जाता है, जिससे किसी देश की आबादी बिना घटे या बढ़े स्थिर बनी रहती है। भारत की राष्ट्रीय प्रजनन दर इस महत्वपूर्ण स्तर से नीचे आ चुकी है, जिसका साफ संकेत है कि आने वाले कुछ दशकों में देश का सामाजिक और आर्थिक ढांचा पूरी तरह बदलने वाला है। वर्तमान में भारत के पास युवाओं की भारी तादाद जरूर मौजूद है, परंतु समय बीतने के साथ यही युवा आबादी वृद्ध श्रेणी में शामिल होने लगेगी। संजीव सन्याल और आकांक्षा अरोड़ा द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किए गए अध्ययन पत्र जिसका शीर्षक 'द घोस्ट ऑफ पॉपुलेशन पास्ट' है, में इस बात पर विस्तार से चर्चा की गई है कि भारत की जनसांख्यिकीय चिंताओं की प्रकृति अब पूरी तरह बदल चुकी है। इस अध्ययन के अनुसार पूरे देश की राष्ट्रीय प्रजनन दर 1.9 जरूर दिखती है, लेकिन अगर बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे घनी आबादी वाले राज्यों को अलग कर दिया जाए, तो शेष भारत की दर घटकर केवल 1.6 रह जाती है। इसका आशय यह हुआ कि देश के एक बड़े हिस्से में जन्म दर खतरनाक स्तर तक नीचे जा चुकी है। दक्षिण और पूर्व के राज्यों में गंभीर हालात रिपोर्ट यह उजागर करती है कि दक्षिण भारत और पूर्वी भारत के कई राज्यों में प्रजनन दर राष्ट्रीय औसत से भी कहीं ज्यादा नीचे जा चुकी है। आंकड़ों पर नजर डालें तो आंध्र प्रदेश में प्रजनन दर महज 1.4 है, जबकि तेलंगाना और कर्नाटक दोनों राज्यों में यह 1.5 दर्ज की गई है। केरल और तमिलनाडु की स्थिति और भी चौंकाने वाली है, जहां यह दर घटकर मात्र 1.3 रह गई है। पूर्वी राज्य पश्चिम बंगाल में भी प्रजनन दर 1.3 के बेहद निचले स्तर पर पहुंच चुकी है। इन आंकड़ों से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि पूरे देश की जनसांख्यिकी को एक ही नजरिए से देखना एक बड़ी नीतिगत भूल साबित हो सकता है। उत्तर भारत के कुछ राज्यों में आबादी अब भी बढ़ रही है, जबकि दक्षिण और पूर्वी भारत के कई प्रमुख राज्य उस संवेदनशील दौर में पहुंच चुके हैं जहां भविष्य में कामकाजी युवाओं की भारी कमी और आश्रित बुजुर्गों की बढ़ती तादाद एक विकट आर्थिक संकट पैदा कर सकती है। चीन के जनसांख्यिकीय संकट से सीखने की आवश्यकता इस पूरे मामले में पड़ोसी देश चीन का कड़वा अनुभव भारत के लिए एक बहुत बड़ी चेतावनी के रूप में सामने आता है। चीन ने अपनी आबादी को जबरन नियंत्रित करने के लिए दशकों तक बेहद सख्त नीतियों को लागू किया था, जिसमें एक बच्चे की नीति भी शामिल थी। उस दौर में चीन का मकसद बेकाबू होती आबादी की रफ्तार को थामना था, लेकिन समय के साथ उसकी प्रजनन दर इतनी पाताल में चली गई कि आज वहां की सरकार आबादी बढ़ाने के लिए हाथ-पैर मार रही है। चीन में आज जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या इतनी घट गई है कि सरकार परिवारों को नकद प्रोत्साहन और सुविधाएं देकर बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित कर रही है। लेकिन जनसांख्यिकी का यह बुनियादी नियम है कि जब समाज का प्रजनन व्यवहार एक बार बदल जाता है, तो उसे किसी सरकारी आदेश, नियम या लालच से दोबारा पुरानी स्थिति में नहीं लाया जा सकता। चीन इसी गंभीर गलती की भारी कीमत चुका रहा है और ईएसी-पीएम के विशेषज्ञों की रिपोर्ट इसे भारत के लिए समय रहते संभलने का स्पष्ट संकेत बताती है। भारत को उस तरह के संकट में फंसने से बचने के लिए अभी से अपनी पुरानी सोच को अलविदा कहना होगा। शहरों में घटती जन्म दर के सामाजिक और आर्थिक कारण किसी भी देश में सख्त नियम बनाकर या प्रचार करके आबादी की रफ्तार को धीमा करना अपेक्षाकृत आसान होता है, परंतु जब प्रजनन दर अत्यधिक नीचे गिर जाती है तो उसे दोबारा ऊपर उठाना लगभग असंभव कार्य बन जाता है। बच्चों की संख्या केवल सरकारी अपीलों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि यह लोगों के व्यक्तिगत और आर्थिक फैसलों से तय होती है। आधुनिक शहरी जीवन में बढ़ती महंगाई, मकानों की आसमान छूती कीमतें, बच्चों की उच्च शिक्षा का भारी भरकम खर्च, महिलाओं की बढ़ती आर्थिक भागीदारी, देर से होने वाली शादियां और बच्चों के पालन-पोषण का वित्तीय दबाव ऐसे प्रमुख कारक हैं जो परिवारों को छोटे परिवार की ओर धकेलते हैं। आज अधिकांश शहरी दंपति एक ही बच्चे तक सीमित रहना चाहते हैं या फिर बच्चे न पैदा करने का फैसला ले रहे हैं। ऐसी गहरी सामाजिक परिस्थितियों में केवल कुछ वित्तीय रियायतें या भत्ते देकर जन्म दर को फिर से बढ़ा पाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं रहता। परिवार नियोजन के नए अर्थ और नीतिगत बदलाव संजीव सन्याल द्वारा उठाए गए मुद्दों का यह अर्थ कदापि नहीं निकाला जाना चाहिए कि देश में मातृ स्वास्थ्य सेवाएं, पोषण अभियान या गर्भनिरोधक सुविधाओं को बंद कर दिया जाए। रिपोर्ट का मुख्य उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि परिवार नियोजन को केवल 'जनसंख्या घटाने के सरकारी लक्ष्य' के रूप में देखना बंद किया जाना चाहिए। नीतिगत स्तर पर यह अंतर समझना बहुत आवश्यक है कि यदि कोई परिवार अपनी मर्जी और सामर्थ्य के अनुसार छोटा परिवार रखना चाहता है, तो उसे तमाम जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं, परिवार नियोजन के साधन और परामर्श सुलभ होने चाहिए। लेकिन सरकारी मशीनरी का समग्र एजेंडा हर हाल में जन्म दर को जबरन और नीचे धकेलना नहीं होना चाहिए। विशेष रूप से उन राज्यों में जहां जन्म दर पहले ही रिप्लेसमेंट स्तर 2.1 से बहुत नीचे जा चुकी है, वहां जनसंख्या घटाने वाली पुरानी योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये का सरकारी बजट खर्च करना पूरी तरह अनुपयोगी साबित हो रहा है। इसका आप पर असर भारत की घटती प्रजनन दर और जनसंख्या नीति में संभावित बदलाव का सीधा असर नागरिकों के भविष्य, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा पर पड़ेगा। • नागरिकों पर प्रभाव: गर्भनिरोधक और मातृ स्वास्थ्य की सरकारी सेवाएं बंद नहीं होंगी, बल्कि व्यक्ति को अपनी इच्छा अनुसार परिवार नियोजन का अधिकार पहले की तरह मिलता रहेगा। लोगों को छोटा या बड़ा परिवार चुनने के लिए किसी तरह के प्रशासनिक दबाव का सामना नहीं करना पड़ेगा। • करदाताओं पर असर: आबादी घटाने वाले पुराने सरकारी अभियानों पर खर्च होने वाले हजारों करोड़ रुपये की बचत हो सकेगी। सरकार इस बजट को स्वास्थ्य, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और वृद्धों की सामाजिक सुरक्षा पर लगा सकती है। • भविष्य के कार्यबल पर: दक्षिण और पूर्वी राज्यों में कामकाजी युवाओं की संख्या कम होने से आने वाले समय में श्रम बाजार में बदलाव दिखेंगे। इसका असर उद्योगों के वेतन ढांचे और राज्यों के बीच कामगारों के पलायन पर पड़ेगा। • वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल: आने वाले दशकों में बुजुर्गों की बढ़ती हिस्सेदारी के कारण पेंशन, जेरियाट्रिक केयर और स्वास्थ्य बीमा की मांग तेजी से बढ़ेगी। परिवारों और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर वृद्धजनों की देखरेख की वित्तीय जिम्मेदारी बढ़ जाएगी। ऐसा क्यों हुआ भारत में आबादी नियंत्रण से जुड़ी नीतियों पर सवाल इसलिए खड़े हुए हैं क्योंकि देश की जन्म दर अनुमान से कहीं अधिक तेजी से नीचे गिरी है। आर्थिक विकास, शहरीकरण और महिलाओं की शिक्षा ने समाज के प्रजनन व्यवहार को पूरी तरह बदल दिया है। • प्रजनन दर का गिरना: वर्ष 2023 के एसआरएस आंकड़ों से पुष्टि हुई है कि देश की कुल प्रजनन दर 1.9 रह गई है, जो 2.1 के रिप्लेसमेंट स्तर से नीचे है। उत्तर प्रदेश और बिहार को छोड़कर बाकी देश में यह औसतन 1.6 तक आ चुकी है। • शहरीकरण और बढ़ती लागत: शहरों में आवास की भारी लागत, बच्चों की शिक्षा के भारी खर्च और महिलाओं की बढ़ती आर्थिक भागीदारी ने छोटे परिवारों को प्राथमिकता बना दिया है। आर्थिक दबावों के चलते दंपति अब अधिक बच्चे पैदा करने से बच रहे हैं। • चीन के संकट का सबक: चीन द्वारा दशकों तक चलाई गई एक बच्चे की कठोर नीति के कारण वहां कामगारों की भारी कमी और बुजुर्गों की आबादी बेतहाशा बढ़ गई है। भारत के नीति विशेषज्ञ आगाह कर रहे हैं कि समय रहते नीति न बदली गई तो भारत भी उसी अपरिवर्तनीय जनसांख्यिकीय जाल में फंस जाएगा। सवाल-जवाब 1. भारत की वर्तमान कुल प्रजनन दर कितनी दर्ज की गई है? सरकारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) 2023 के आंकड़ों के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर गिरकर 1.9 हो चुकी है। 2. आबादी को स्थिर रखने के लिए प्रजनन दर का कौन सा स्तर आवश्यक माना जाता है? जनसांख्यिकी के अनुसार किसी देश की आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए 2.1 का रिप्लेसमेंट स्तर जरूरी माना जाता है। 3. प्रजनन दर गिरने के बावजूद भारत की कुल आबादी अभी क्यों बढ़ रही है? जनसंख्या की गति (डेमोग्राफिक मोमेंटम) के कारण ऐसा हो रहा है, क्योंकि पहले की बड़ी पीढ़ी अब माता-पिता बनने की उम्र में है। 4. दक्षिण और पूर्वी भारत के किन राज्यों में प्रजनन दर सबसे कम है? केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में प्रजनन दर 1.3, आंध्र प्रदेश में 1.4, जबकि कर्नाटक और तेलंगाना में 1.5 दर्ज की गई है। 5. संजीव सन्याल और आकांक्षा अरोड़ा की रिपोर्ट का शीर्षक क्या है? इस रिपोर्ट का शीर्षक 'द घोस्ट ऑफ पॉपुलेशन पास्ट' है, जिसमें जनसंख्या की बदलती प्राथमिकताओं का विश्लेषण किया गया है। 6. चीन की जनसंख्या नीति से भारत को क्या चेतावनी मिलती है? चीन ने आबादी रोकने के कड़े नियम बनाए जिससे वहां प्रजनन दर अत्यधिक गिर गई, और अब तमाम कोशिशों के बावजूद वहां जन्म दर नहीं बढ़ पा रही है। 7. क्या परिवार नियोजन और गर्भनिरोधक सेवाओं को पूरी तरह बंद करने की बात कही गई है? नहीं, रिपोर्ट का कहना है कि स्वास्थ्य और गर्भनिरोधक सेवाएं जारी रहनी चाहिए, लेकिन आबादी घटाने के सरकारी अभियानों पर हजारों करोड़ खर्च बंद होने चाहिए। https://trendkia.com/national/prajanana-dara-men-bari-giravata-ke-bada-india-men-parivara-niyojana-ke-bajata-para-punarvichara-ki-manga-china-ke-snkata-se-sikha-37729 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