{
  "type": "article",
  "title": "पूसा संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अमित कुमार गोस्वामी ने बताए अमरूद के बाग से बंपर पैदावार पाने के 8 अचूक नियम",
  "summary": "भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अमित कुमार गोस्वामी ने अमरूद की खेती में भारी नुकसान से बचने और बंपर मुनाफा कमाने के लिए 8 वैज्ञानिक तरीके साझा किए हैं।",
  "content": "अमरूद की बागवानी करने वाले बहुत से किसान अक्सर इस बात से परेशान रहते हैं कि कड़ी मेहनत के बावजूद उनके बाग में न तो अच्छी गुणवत्ता के फल आ रहे हैं और न ही बेहतर पैदावार मिल पा रही है। देखरेख में अनजाने में की गई छोटी-छोटी गलतियां किसानों की पूरी लागत और समय को बर्बाद कर देती हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के डिवीजन ऑफ फ्रूट एंड हॉर्टिकल्चर में कार्यरत वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अमित कुमार गोस्वामी के अनुसार, यदि किसान पौध चुनने से लेकर सिंचाई और फलों की छटाई तक की सही तकनीकों को अपनाएं, तो वे नुकसान से बचकर भारी मुनाफा कमा सकते हैं। पूसा के इस वैज्ञानिक फॉर्मूले में अमरूद की खेती से जुड़ी उन मुख्य गलतियों को सुधारने के तरीके बताए गए हैं जो फसल की पैदावार और गुणवत्ता को सीधा फायदा पहुंचाते हैं।\n\nपौध की खरीदारी में न करें लापरवाही\nबाग लगाने का सबसे पहला और जरूरी कदम सही किस्म और स्वस्थ पौधे का चुनाव करना होता है। कई बार किसान स्थानीय या अनधिकृत जगहों से पौधे खरीद लेते हैं, जिससे बाद में फल की गुणवत्ता खराब निकलती है। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अमित कुमार गोस्वामी का कहना है कि अमरूद का नया बाग लगाने की सोच रहे किसानों को हमेशा नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड से मान्यता प्राप्त नर्सरी, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद या फिर किसी स्टेट एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से ही पौधे खरीदने चाहिए। इन प्रमुख संस्थानों में अमरूद की उन्नत, प्रमाणित और असली प्रजातियां उपलब्ध रहती हैं। यदि पौधा शुरुआती दौर में ही रोगमुक्त और बेहतर गुणवत्ता वाला होगा, तो आगे चलकर फसल की पैदावार खुद-ब-खुद शानदार होगी।\n\nउखटा बीमारी और जलभराव से बचाव की तरकीब\nअमरूद के बाग में सबसे ज्यादा तबाही मचाने वाली बीमारी उखटा रोग है, जिसे तकनीकी भाषा में अमरूद विल्ट भी कहा जाता है। यह गंभीर समस्या मुख्य रूप से मिट्टी में मौजूद फफूंद, जैसे फ्यूजेरियम प्रजाति, और अन्य रोगजनकों के आपस में मिलने से पैदा होती है। जिस जमीन में पानी रुकता है, वहां यह बीमारी बहुत तेजी से फैलती है और पूरे के पूरे पौधे को सुखा देती है। इस जानलेवा बीमारी से बचाव के लिए अमरूद के पौधों को कभी भी जलभराव वाले निचले स्थानों पर नहीं लगाना चाहिए। इसके अलावा, सिंचाई करते समय खुले में पानी बहाने के बजाय टपक सिंचाई प्रणाली या फिर थाल सिंचाई की विधि अपनानी चाहिए ताकि पानी सीधा जड़ों तक ही सीमित रहे।\n\nपौधरोपण की दूरी और तने की सुरक्षा\nपौधों को खेत में लगाते समय उनके बीच की दूरी और जमीन की ऊंचाई का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। वैज्ञानिक सलाह के मुताबिक अमरूद के पौधों को तीन बाय तीन मीटर या फिर चार बाय चार मीटर के फासले पर लगाना चाहिए। रोपाई करते समय पौधे को समतल जमीन की तुलना में थोड़ा ऊंचाई पर स्थापित करें ताकि सिंचाई या बारिश का पानी सीधे पौधे के मुख्य तने के संपर्क में न आने पाए। जब पौधा धीरे-धीरे बड़ा होने लगता है, तो उसके निचले हिस्से से छोटे-छोटे नए कल्ले निकलने लगते हैं। तने की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए इन निचले कल्लों को समय-समय पर काटकर अलग कर देना चाहिए।\n\nशुरुआती तीन साल तक न लें फसल\nअमरूद की खेती से लंबा और स्थिर मुनाफा कमाने के लिए धैर्य रखना बहुत जरूरी होता है। डॉ. अमित कुमार गोस्वामी के अनुसार, जब अमरूद का नया पौधा लगाया जाता है, तो शुरुआती तीन वर्षों तक उससे फल उत्पादन नहीं लेना चाहिए। यदि इन तीन सालों में फूल या फल आते भी हैं, तो उन्हें हटा देना बेहतर रहता है। तीन साल बीत जाने के बाद जब पेड़ पूरी तरह से मजबूत और परिपक्व हो जाता है, तब उससे मिलने वाली पहली फसल बेहद बंपर होती है। इस वैज्ञानिक तरीके से न केवल फलों का आकार और गुणवत्ता उत्कृष्ट रहती है, बल्कि किसान को बाजार में उसके बहुत अच्छे दाम भी मिलते हैं।\n\nरसायन मुक्त खेती और फलों की छटाई का नियम\nआजकल भारत सरकार भी विषमुक्त और रसायन मुक्त कृषि को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दे रही है। इसलिए किसानों को अमरूद के बाग में किसी भी तरह के हानिकारक रासायनिक उर्वरकों या कीटनाशकों के प्रयोग से बचना चाहिए और जैविक तरीकों पर ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही, फलों का आकार बड़ा और सुंदर बनाने के लिए छटाई का नियम अपनाना चाहिए। आमतौर पर जब अमरूद में फल लगते हैं, तो एक ही गुच्छे या जड़ पर तीन अमरूद एक साथ निकलते हैं। ऐसे में किनारे पर उग रहे दो छोटे अमरूदों को काटकर हटा देना चाहिए और केवल बीच वाले मजबूत अमरूद को ही पेड़ पर बढ़ने देना चाहिए। ऐसा करने से पोषण केवल एक फल को मिलता है, जिससे वह अमरूद बेहतरीन गुणवत्ता, बड़े आकार और ज्यादा वजन वाला तैयार होता है।\n\nइसका आप पर असर\nकिसानों के लिए प्रभाव:\n\n• लागत की बचत: पूसा वैज्ञानिक के इन 8 नियमों को अपनाने से अमरूद के बाग में उखटा (विल्ट) बीमारी का खतरा कम होगा, जिससे पौधों के सूखने का नुकसान बचेगा।\n• मुनाफे में बढ़ोतरी: शुरुआती 3 साल तक फल न लेने और एक गुच्छे में केवल बीच का अमरूद छोड़ने की तकनीक से फलों का आकार और गुणवत्ता बेहतर होगी, जिससे बाजार में ज्यादा दाम मिलेंगे।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. अमरूद का पौधा किस स्थान पर नहीं लगाना चाहिए?\nअमरूद के पौधे को कभी भी जलभराव वाले निचले स्थानों पर नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि पानी रुकने से उखटा (विल्ट) रोग का खतरा बढ़ जाता है।\n\n2. अमरूद के असली और उन्नत किस्म के पौधे कहां से खरीदने चाहिए?\nनेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड से मान्यता प्राप्त नर्सरी, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) या राज्य कृषि विश्वविद्यालयों से पौधे खरीदने चाहिए।\n\n3. अमरूद लगाने के कितने साल बाद पहली फसल लेनी चाहिए?\nनए पौधे लगाने के शुरुआती 3 साल तक फसल नहीं लेनी चाहिए; 3 साल बाद जब पौधा मजबूत हो जाता है तब बंपर पैदावार मिलती है।\n\n4. अमरूद में उखटा (विल्ट) रोग क्यों होता है?\nयह रोग मुख्य रूप से मिट्टी में रहने वाले फफूंद (जैसे फ्यूजेरियम प्रजाति) और अन्य रोगजनकों के संक्रमण तथा जलभराव के कारण होता है।\n\n5. अमरूद के फल की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए छटाई कैसे करें?\nजब एक जगह 3 अमरूद का गुच्छा निकले, तो किनारे वाले 2 अमरूद काटकर हटा दें और सिर्फ बीच वाले अमरूद को बढ़ने दें।",
  "url": "https://trendkia.com/national/pusa-snsthana-ke-varishtha-vaijnanika-dr-amit-kumar-goswami-ne-batae-amaruda-ke-baga-se-bnpara-paidavara-pane-ke-8-achuka-niyama-12428",
  "category": "भारत",
  "publishedAt": "2026-07-31",
  "tags": [
    "अमरूद की खेती",
    "पूसा कृषि वैज्ञानिक",
    "डॉ अमित कुमार गोस्वामी",
    "अमरूद विल्ट रोग",
    "टपक सिंचाई",
    "कृषि सलाह"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}