राजस्थान में शराबबंदी की मिसाल बनी काछबली पंचायत, 10 साल के आंदोलन के बाद 50 से अधिक युवाओं को मिली सरकारी नौकरी राजसमंद जिले की काछबली पंचायत में महिलाओं की ऐतिहासिक मुहिम ने न सिर्फ शराब के ठेके बंद करवाए, बल्कि पूरे इलाके में अपराध घटाकर शिक्षा और सरकारी नौकरियों के नए रास्ते खोल दिए हैं। राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित भीम-देवगढ़ तहसील की काछबली ग्राम पंचायत ने जनभागीदारी और महिला सशक्तिकरण की एक अनूठी नजीर पेश की है। करीब एक दशक पहले तक इस गांव की तस्वीर आज से पूरी तरह जुदा थी। गांव की गलियों में धड़ल्ले से बिकने वाली अवैध शराब ने पारिवारिक कलह, घरेलू हिंसा और अपराध को बढ़ावा दे रखा था, जिससे युवाओं का भविष्य बर्बादी की कगार पर पहुंच रहा था। इस गंभीर संकट से अपने परिवारों को उबारने के लिए गांव की महिलाओं ने संगठित होकर एक बड़े जनआंदोलन का बिगुल फूंका। इस जमीनी संघर्ष की कमान तत्कालीन सरपंच गीता रावत और जिला परिषद सदस्य हीरा कंवर ने संभाली, जिन्होंने पूरे क्षेत्र को नशामुक्त बनाने की दिशा में प्रेरित किया। मार्च 2016 का ऐतिहासिक जनमत संग्रह और राजस्थान का पहला शराबमुक्त गांव महिलाओं के अनवरत दबाव और कड़े विरोध के आगे आबकारी विभाग को झुकना पड़ा और पंचायत में बाकायदा मतदान कराने का फैसला हुआ। मार्च 2016 में हुए इस ऐतिहासिक मतदान में काछबली के लगभग 95 प्रतिशत मतदाताओं ने शराबबंदी के पक्ष में अपना मत दिया। इस जनादेश के साथ ही काछबली राजस्थान की ऐसी पहली ग्राम पंचायत बन गई, जहां लोकतांत्रिक वोटिंग के जरिए शराब का ठेका स्थायी रूप से बंद कर दिया गया। हालांकि, महिलाओं ने ठेका बंद होने के बाद भी अपनी सतर्कता में कोई कमी नहीं आने दी। गांव में किसी भी गुप्त रास्ते या अवैध माध्यम से शराब की आवक रोकने के लिए महिलाओं ने खुद के विशेष निगरानी दल गठित कर दिए। सरपंच प्रत्याशियों के लिए अनिवार्य हुआ नशामुक्ति का सार्वजनिक संकल्प काछबली के ग्रामीणों के लिए शराबबंदी का फैसला लागू करवाना जितना चुनौतीपूर्ण था, उससे कहीं अधिक कठिन काम इसे बीते 10 वर्षों तक लगातार कायम रखना रहा। ग्रामीणों ने इसे किसी एक व्यक्ति का काम मानने के बजाय पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी में तब्दील कर दिया। गांव में यह नियम बन चुका है कि पंचायत चुनाव में सरपंच पद के लिए ताल ठोकने वाले हर उम्मीदवार को पहले शराबबंदी को सख्ती से जारी रखने का संकल्प लेना होता है। तत्कालीन सरपंच गीता रावत के अनुसार, गांव के जागरूक नागरिक और महिलाएं आज भी हर वार्ड और मोहल्ले पर पूरी मुस्तैदी से अपनी नजर बनाए रखते हैं ताकि नियमों का उल्लंघन न हो। चार पड़ोसी पंचायतों में भी फैला अभियान, शिक्षा और रोजगार में जबरदस्त उछाल काछबली की इस क्रांतिकारी पहल का असर आसपास की अन्य पंचायतों पर भी तेजी से पड़ा। इसी प्रेरणा से मंडावर में वर्ष 2018 के दौरान 95 प्रतिशत वोट के साथ शराबबंदी लागू हुई। इसके बाद वर्ष 2021 में थानेटा पंचायत में 95 प्रतिशत ग्रामीणों के समर्थन से शराब पर पाबंदी लगाई गई, जबकि बरार और हामेला पंचायतों ने वर्ष 2020 से ही शराबबंदी को प्रभावी कर रखा है। इन सभी गांवों में एक सशक्त व्यवस्था तैयार की गई है, जिसके तहत समिति का प्रत्येक सदस्य अपने इलाके के करीब 20 घरों पर सीधी निगरानी रखता है। शराब के खात्मे से गांवों में अपराधों में भारी गिरावट दर्ज की गई और अध्ययन का सकारात्मक माहौल विकसित हुआ। इसी सामाजिक बदलाव का नतीजा है कि पिछले 10 वर्षों में इन नशामुक्त पंचायतों के 50 से अधिक युवाओं ने सरकारी नौकरियों में सफलता हासिल की है। इसका आप पर असर काछबली और आसपास के गांवों की यह पहल दिखाती है कि सामाजिक नशामुक्ति से ग्रामीण सुरक्षा, पारिवारिक बचत और युवाओं के करियर में सीधा सुधार आता है। • भारत में: यह घटनाक्रम देश भर की ग्राम पंचायतों के लिए एक व्यावहारिक रूपरेखा पेश करता है कि कैसे स्थानीय वोटिंग से सामाजिक समस्याओं को दूर किया जा सकता है। इससे अन्य राज्यों के ग्रामीण समुदाय भी अपने क्षेत्रों में नशामुक्ति के लिए आबकारी नियमों के तहत लोकतांत्रिक पहल कर सकते हैं। • राजसमंद में: स्थानीय स्तर पर अपराध और घरेलू कलह खत्म होने से युवाओं के लिए पढ़ाई का सुरक्षित माहौल तैयार हुआ है। ग्रामीण युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए सकारात्मक वातावरण मिला, जिसके दम पर 50 से अधिक युवा सरकारी पदों पर चयनित हो चुके हैं। • पंचायत व्यवस्था के लिए: चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के लिए सामाजिक सुधार की पूर्व-शर्त तय करने से स्थानीय राजनीति में शुचिता और जवाबदेही बढ़ी है। इससे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों पर जनता की प्राथमिकताओं के प्रति ईमानदार बने रहने का दबाव रहता है। • महिलाओं की सुरक्षा के लिए: मुहल्लों में शराब की बिक्री और जमावड़ा बंद होने से महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों पर लगाम लगी है। महिलाएं अब बिना किसी भय के सार्वजनिक जीवन और गांव की निगरानी व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभा पा रही हैं। ऐसा क्यों हुआ काछबली पंचायत में शराबबंदी का यह फैसला अचानक नहीं हुआ, बल्कि लंबे समय से घर-घर में हो रहे उत्पीड़न और युवाओं के बर्बाद होते भविष्य के खिलाफ उपजे असंतोष का परिणाम था। • अवैध शराब और अपराध का प्रसार: गांव के हर नुक्कड़ पर अवैध शराब की बेरोकटोक बिक्री के कारण घरेलू हिंसा, आर्थिक तंगी और आए दिन झगड़े बढ़ रहे थे। इस बदहाली ने गांव के युवाओं के भविष्य को पूरी तरह अंधकारमय बना दिया था। • महिला नेतृत्व का संगठित संघर्ष: तत्कालीन सरपंच गीता रावत और जिला परिषद सदस्य हीरा कंवर ने महिलाओं को लामबंद कर प्रशासन के खिलाफ एक सुनियोजित आंदोलन खड़ा किया। इस जमीनी दबाव के चलते आबकारी विभाग को गांव में बाकायदा जनमत संग्रह आयोजित करने की अनुमति देनी पड़ी। • अभूतपूर्व जनसमर्थन और निरंतर निगरानी: मार्च 2016 के मतदान में 95 प्रतिशत ग्रामीणों ने शराबबंदी के पक्ष में वोट देकर एकतरफा जनादेश दिया। इसके बाद महिलाओं ने स्वयं निगरानी समितियां बनाईं ताकि शराब माफिया किसी भी रूप में गांव में दोबारा पैर न पसार सके। सवाल-जवाब 1. काछबली ग्राम पंचायत किस जिले और तहसील में स्थित है? काछबली ग्राम पंचायत राजस्थान के राजसमंद जिले की भीम-देवगढ़ तहसील में स्थित है। 2. काछबली में शराबबंदी के लिए मतदान कब हुआ था? काछबली में शराबबंदी के लिए आबकारी विभाग ने मार्च 2016 में मतदान कराया था। 3. मार्च 2016 के जनमत संग्रह में कितने प्रतिशत ग्रामीणों ने शराबबंदी के पक्ष में वोट दिया? इस मतदान में करीब 95 प्रतिशत ग्रामीणों ने शराब के ठेके को बंद कराने के पक्ष में मतदान किया था। 4. इस शराबबंदी आंदोलन का नेतृत्व किन प्रमुख महिलाओं ने किया था? इस आंदोलन की अगुवाई तत्कालीन सरपंच गीता रावत और जिला परिषद सदस्य हीरा कंवर ने की थी। 5. काछबली से प्रेरित होकर किन अन्य पंचायतों में शराबबंदी लागू हुई? काछबली से प्रेरित होकर मंडावर में 2018, बरार व हामेला में 2020 और थानेटा में 2021 से शराबबंदी लागू है। 6. नशामुक्त होने के बाद इन पंचायतों में शिक्षा के क्षेत्र में क्या बड़ा परिणाम सामने आया? शराबबंदी और शांत माहौल के चलते बीते 10 वर्षों में इन पंचायतों के 50 से अधिक युवाओं ने सरकारी नौकरियां हासिल की हैं। 7. गांवों में अवैध शराब की बिक्री रोकने के लिए निगरानी की क्या व्यवस्था है? इन गांवों में निगरानी दल का प्रत्येक सदस्य अपने मोहल्ले के 20 घरों पर मुस्तैदी से नजर रखता है। प्रेरणा और सबक काछबली की महिलाओं की यह सामूहिक यात्रा यह सिखाती है कि संगठित इच्छाशक्ति और लोकतांत्रिक उपायों से दशकों पुरानी सामाजिक कुरीतियों को भी जड़ से मिटाया जा सकता है। • एकजुटता ही सबसे बड़ा बल है: जब समाज की पीड़ित महिलाएं अपने अधिकारों और परिवार की रक्षा के लिए एक मंच पर आईं, तो उन्होंने पूरे प्रशासनिक तंत्र को जनमत संग्रह कराने पर विवश कर दिया। सामूहिक प्रयास से बड़े से बड़े बदलाव को संभव बनाया जा सकता है। • लोकतांत्रिक अधिकारों का सटीक उपयोग: केवल शिकायत करने के बजाय ग्रामीणों ने मतदान के अधिकार का उपयोग कर शराब के ठेके को स्थायी तौर पर बंद करवाया। संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल समस्याओं के समाधान का सबसे टिकाऊ रास्ता है। • सतत सतर्कता से ही सफलता टिकती है: शराबबंदी लागू होने के बाद भी महिलाओं ने ढिलाई नहीं बरती और मोहल्ला स्तर पर निगरानी कमेटियां बनाकर नियमों का पालन कराया। कोई भी सुधार केवल नियम बनाने से नहीं, बल्कि निरंतर निगरानी से ही प्रभावी रहता है। • नकारात्मकता हटने से विकास का मार्ग प्रशस्त होता है: जब गांव से नशे और अपराध का खात्मा हुआ, तो वही ऊर्जा पढ़ाई और करियर निर्माण में लगी। अनुकूल माहौल मिलने पर ग्रामीण परिवेश के 50 से अधिक युवाओं ने सरकारी नौकरियां हासिल कर अपनी क्षमता सिद्ध की। https://trendkia.com/national/rajasthan-men-sharababndi-ki-misala-bani-kachbali-pnchayata-10-sala-ke-andolana-ke-bada-50-se-adhika-yuvaon-ko-mili-sarakari-nauka-54722 TrendKia — Har trend, sabse pehle.