राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा का परचम, यूपी में चुनावी बिसात पर जातिगत दांवपेंच तेज राजस्थान निकाय चुनावों में 198 शीर्ष पदों पर जीत दर्ज कर भाजपा ने मजबूत बढ़त हासिल की, जबकि उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर गठबंधन और जातीय समीकरणों की होड़ शुरू हो गई है। स्थानीय सरकार की सियासत में संख्याबल और सांगठनिक तालमेल के सहारे भारतीय जनता पार्टी ने राजस्थान के नगर निकाय चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया है। राज्य के विभिन्न कस्बों और शहरों में हुए इन चुनावों में कई स्थापित समीकरण उलट गए। कुछ वार्डों में निर्वाचित पार्षदों ने पार्टी लाइन छोड़कर पाला बदला, तो कई नगरों में निर्दलीय सदस्यों के रुख ने अंतिम पलों में हार-जीत का रुख मोड़ दिया। घोषित परिणामों के अनुसार, 303 नगर निकायों में से 198 में भाजपा ने अध्यक्ष और मेयर की कुर्सी अपने नाम की, जबकि कांग्रेस को 95 निकायों के प्रमुख पदों पर ही संतोष करना पड़ा। राजस्थान के निगमों, परिषदों और पालिकाओं के आंकड़े नतीजों के ब्योरे पर गौर करें तो बड़े शहरी केंद्रों में सत्ताधारी दल का दबदबा स्पष्ट नजर आया। कुल दस नगर निगमों में से सात के परिणाम सामने आए, जिनमें से छह पर भाजपा प्रत्याशियों ने विजय पताका फहराई। इसके अतिरिक्त 47 नगर परिषदों में से 31 परिषदों में भाजपा के उम्मीदवार विजयी रहे। वहीं छोटे शहरों की 252 नगर पालिकाओं में से 162 पालिकाओं के चेयरमैन पद पर भाजपा के प्रतिनिधियों ने कब्जा जमाया। इन परिणामों ने यह साफ कर दिया कि प्रांतीय स्तर पर सत्ताधारी दल ने निचले स्तर तक अपनी पकड़ बनाने में सफलता हासिल की है। अजमेर नगर निगम में मुकाबला बेहद नाटकीय रहा। कांग्रेस खेमा वहां अपना मेयर निर्वाचित कराने के प्रति पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रहा था। इसके लिए निर्दलीय पार्षदों को एकजुट रखने की नीयत से बेंगलुरु ले जाकर फाइव स्टार होटल में ठहराया गया। हालांकि जब मतदान का समय आया, तो नगर लौटकर उन्हीं निर्दलीय पार्षदों ने भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में वोट डाल दिया। नतीजतन, अजमेर में भाजपा का महापौर चुन लिया गया। वहीं तीन अलग-अलग नगर निकायों में मुकाबला बेहद रोमांचक रहा, जहां दोनों मुख्य दलों के प्रत्याशियों को बिल्कुल बराबर संख्या में मत मिले। इन तीनों जगहों पर टाई होने के बाद पर्ची निकालकर भाग्य का फैसला हुआ, और तीनों ही स्थानों पर पर्ची भाजपा प्रत्याशी के नाम की निकली। नेतृत्व की रणनीति और विपक्षी खेमे के आरोप इस चुनावी सफलता के बाद प्रांतीय भाजपा अध्यक्ष मदन राठौड़ ने पूरी जीत का श्रेय मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा को दिया। राठौड़ का कहना था कि मुख्यमंत्री द्वारा तैयार की गई पुख्ता चुनावी रणनीति का ही सुफल है कि पार्टी को इतनी व्यापक बढ़त मिली। दूसरी तरफ, चुनावी शिकस्त के बाद विपक्षी कांग्रेस में गहरी निराशा देखी गई। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद डोटासरा ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस जनता की अदालत में जीती है, जबकि भाजपा ने सत्ता और धनबल का इस्तेमाल करते हुए कांग्रेस पार्षदों को धमकाकर यह चुनाव अपने पाले में किया। इन स्थानीय चुनावों का राजनीतिक महत्व मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के अपने सियासी भविष्य के लिहाज से भी बहुत बड़ा माना जा रहा था। राज्य की बागडोर संभालने के बाद से ही राजनीतिक हलकों में उन्हें अनुभव की कमी के चलते कमजोर मुख्यमंत्री के रूप में देखा जा रहा था। यहां तक कि भाजपा के ही कुछ नेता राष्ट्रीय राजधानी जाकर यह चर्चा करते थे कि उनके नेतृत्व में आगे के चुनाव जीतना कठिन हो सकता है। सरकार चलाने का भले ही उनके पास पूर्व अनुभव नहीं था, लेकिन पार्टी संगठन के पुराने रणनीतिकार होने के नाते उन्होंने निकाय चुनावों में अपनी पूरी सांगठनिक ताकत झोंक दी। कांग्रेस ने भी अपने चुने हुए पार्षदों को टूटने से बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन शर्मा की घेराबंदी के आगे वह विफल रही। इस जीत ने जहां मुख्यमंत्री के पद को स्थायित्व दिया है, वहीं 95 निकायों में जीत दर्ज कर कांग्रेस ने भी यह संदेश दिया है कि उसे कम आंकना भारी पड़ सकता है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों की सरगर्मी और नए समीकरण राजस्थान में स्थानीय सरकार की उठापटक के बीच उत्तर प्रदेश में भी भविष्य के बड़े चुनावी दंगल की औपचारिक बिसात बिछनी शुरू हो गई है। मेरठ में आयोजित पार्टी सम्मेलन के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रदेश संगठन के वरिष्ठ नेता नितिन नवीन ने कार्यकर्ताओं को जातिगत आधार पर बंटने से बचने की नसीहत दी। मुख्यमंत्री ने कार्यकर्ताओं से विकास और सरकारी कामकाज को मुद्दा बनाकर जनता के बीच जाने का आह्वान किया। साथ ही उन्होंने सतर्क किया कि विपक्षी पार्टियां जनता को गुमराह करने के लिए तरह-तरह के झूठे आख्यान गढ़ने की फिराक में हैं। दूसरी तरफ, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने लखनऊ और आसपास के राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी। उन्होंने विपक्षी मतों के बिखराव को रोकने का तर्क देते हुए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन बनाने की इच्छा जताई, बशर्ते उन्हें सम्मानजनक और बराबरी की सीटें मिलें। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस प्रस्ताव को सिरे से ठुकरा दिया। अखिलेश ने दो टूक स्पष्ट किया कि राज्य में गठबंधन के मौजूदा स्वरूप में कोई फेरबदल नहीं होगा, जिससे साफ हो गया कि सपा-कांग्रेस तालमेल में ओवैसी के लिए कोई जगह नहीं है। इसी बीच कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने विपक्षी खेमे को आगाह करते हुए कहा कि सीटों के बंटवारे में जितनी देरी होगी, उसका सीधा चुनावी लाभ भाजपा को मिलेगा। वोट बैंक की चौसर पर जातीय गोलबंदी की जंग राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असदुद्दीन ओवैसी का सारा ध्यान मुख्य रूप से उन विधानसभा सीटों पर है जहां मुस्लिम मतदाता चुनावी नतीजों को पलटने की ताकत रखते हैं। सपा और कांग्रेस के नेता अक्सर उन्हें भाजपा को परोक्ष रूप से लाभ पहुंचाने वाली टीम करार देते रहे हैं। इसी आरोप की काट के तौर पर ओवैसी ने गठबंधन की पेशकश रखी थी। बिहार के पिछले चुनावों में भी तेजस्वी यादव ने ओवैसी से दूरी बनाई थी, जिसका खामियाजा विपक्षी गठबंधन को भुगतना पड़ा था। अब वही चुनौती अखिलेश यादव के सामने खड़ी है। इधर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओमप्रकाश राजभर ने पूर्वांचल की सियासत में नया विवाद छेड़ दिया है। राजभर ने अपने समुदाय के मतदाताओं को लामबंद करते हुए दावा किया कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश का विभाजन अवश्यंभावी है, और जब ऐसा होगा तब पूर्वांचल की कमान राजभर समाज के बेटे के हाथ में ही होगी। अखिलेश यादव पर लगातार हमलावर राजभर को जवाब देते हुए सपा प्रमुख ने कहा कि वह अपने संरक्षकों के इशारे पर लोगों को बहका रहे हैं, और राज्य को बांटने का उनका सपना कभी साकार नहीं होगा। उत्तर प्रदेश के चुनावी अखाड़े में विभिन्न जातियां हमेशा निर्णायक भूमिका निभाती रही हैं। वर्तमान में हर दल अपने सामाजिक आधार को सहेजने और बढ़ाने में व्यस्त है। जहां ओवैसी मुस्लिम मतदाताओं को साधने में जुटे हैं, वहीं ओमप्रकाश राजभर अपनी जाति को संगठित रखने का प्रयास कर रहे हैं। दूसरी ओर, निषाद समुदाय के नेता संजय निषाद अपनी मांगों को लेकर कैबिनेट मंत्री होते हुए भी सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ गए। अखिलेश यादव यादव और मुस्लिम गठजोड़ के साथ-साथ राज्य के 21 प्रतिशत दलित मतों को खींचने के लिए पीडीए का नारा बुलंद कर रहे हैं। छात्र सभा की वेशभूषा और अपने निजी परिधान में नीला रंग जोड़कर वह इस वर्ग को संदेश दे रहे हैं। वहीं, बसपा सुप्रीमो मायावती की हालिया सक्रियता पारिवारिक मामलों और सोशल मीडिया पर नियुक्तियों तक सीमित रहने का फायदा भाजपा भी उठाना चाहती है, जो 2024 में पिछड़े सामाजिक वर्गों में हुए नुकसान की भरपाई के लिए पूरी ताकत लगा रही है। इसका आप पर असर राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों से शहरी विकास और स्थानीय प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर सीधा असर पड़ेगा। • शहरी विकास योजनाओं पर: राजस्थान के 198 नगर निकायों में भाजपा के बोर्ड बनने से राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन के बीच योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी आने की संभावना है। स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों के लिए बजट आवंटन और शहरी नागरिक सुविधाओं में तेजी देखी जा सकती है। • उत्तर प्रदेश के मतदाताओं पर: उत्तर प्रदेश में विभिन्न दलों द्वारा सामाजिक और जातीय मुद्दों को तूल देने से विकास के स्थानीय बुनियादी मुद्दों पर चुनावी बहस प्रभावित हो सकती है। मतदाताओं को आगामी महीनों में राजनीतिक दलों के नए गठबंधन और वादों की रणनीति देखने को मिलेगी। • स्थानीय राजनीति में भागीदारी: निर्दलीय पार्षदों और स्थानीय प्रतिनिधियों की भूमिका अहम हो गई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि स्थानीय वार्डों की समस्याएं राजनीतिक दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहेंगी। नागरिक अपने स्थानीय प्रतिनिधियों से बेहतर जवाबदेही की मांग कर सकेंगे। • विपक्षी समन्वय पर: विपक्षी दलों के बीच सीटों और गठबंधनों को लेकर खींचतान से आम मतदाताओं के सामने विकल्प स्पष्ट होंगे। आने वाले चुनावों में गठबंधन की दिशा तय होने से चुनावी विकल्पों को लेकर तस्वीर साफ होगी। ऐसा क्यों हुआ राजस्थान के निकाय चुनाव परिणाम और उत्तर प्रदेश में शुरू हुई राजनीतिक हलचल के पीछे हालिया सत्ता परिवर्तन, सांगठनिक सक्रियता और आगामी चुनावों की रणनीतिक तैयारियां मुख्य वजह रही हैं। • सांगठनिक कुशलता का प्रभाव: राजस्थान में भाजपा नेतृत्व ने संगठन के पुराने तंत्र का पूरा उपयोग करते हुए पार्षदों को एकजुट किया और निर्दलियों का समर्थन हासिल किया। मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने अपनी सांगठनिक पृष्ठभूमि का लाभ उठाते हुए स्थानीय स्तर पर मजबूत चुनावी चक्रव्यूह रचा। • हॉर्स ट्रेडिंग और दलबदल: अजमेर सहित कई निकायों में निर्दलीय पार्षदों के पाला बदलने से परिणाम प्रभावित हुए, जहां सैर-सपाटे के बावजूद मतदान के वक्त प्रत्याशियों ने निष्ठा बदल ली। तीन निकायों में कड़े मुकाबले के चलते पर्ची के जरिए बराबरी का फैसला हुआ। • उत्तर प्रदेश में चुनावी जमीन तैयार करना: उत्तर प्रदेश में सभी प्रमुख दलों ने आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अपने-अपने सामाजिक आधार को सहेजने के लिए अभी से लामबंदी शुरू कर दी है। भाजपा विकास और एकजुटता पर जोर दे रही है, जबकि विपक्षी दल मुस्लिम और दलित वोट बैंक में अपनी हिस्सेदारी तय करने के लिए रणनीतिक दांव चल रहे हैं। सवाल-जवाब 1. राजस्थान के कुल कितने नगर निकायों के परिणाम घोषित हुए? राजस्थान के कुल 303 नगर निकायों के परिणाम घोषित हुए, जिनमें भाजपा ने 198 और कांग्रेस ने 95 निकायों में अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की। 2. अजमेर नगर निगम में मेयर का चुनाव कैसे तय हुआ? अजमेर में कांग्रेस द्वारा निर्दलीय पार्षदों को बेंगलुरु ठहराए जाने के बावजूद, उन्होंने लौटकर भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में मतदान कर दिया और भाजपा का मेयर बन गया। 3. बराबर मत मिलने वाले निकायों में फैसला किस आधार पर किया गया? तीन निकायों में दोनों दलों के उम्मीदवारों को बराबर वोट मिलने पर पर्ची निकालकर फैसला किया गया, और तीनों ही स्थानों पर भाजपा प्रत्याशी के नाम की पर्ची निकली। 4. अखिलेश यादव ने असदुद्दीन ओवैसी के गठबंधन प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाया? अखिलेश यादव ने असदुद्दीन ओवैसी के गठबंधन प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में सपा-कांग्रेस गठबंधन का स्वरूप नहीं बदलेगा। 5. ओमप्रकाश राजभर ने पूर्वांचल को लेकर क्या बयान दिया? ओमप्रकाश राजभर ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश का बंटवारा अवश्य होगा और जब ऐसा होगा तब पूर्वांचल का मुख्यमंत्री राजभर समाज का व्यक्ति ही बनेगा। https://trendkia.com/national/rajasthan-men-sthaniya-nikaya-chunavon-men-bjp-ka-parachama-up-men-chunavi-bisata-para-jatigata-danvapencha-teja-36508 TrendKia — Har trend, sabse pehle.