राजधानी में संपत्ति धारकों को मिलेगी बड़ी सुविधा, डीडीए के नए मास्टर प्लान से बिक सकेगा निर्माण का अधिकार दिल्ली विकास प्राधिकरण के नए मास्टर प्लान में मुंबई की तर्ज पर ट्रांसफेरबल डेवलपमेंट राइट्स का प्रावधान शामिल किया गया है, जिसके तहत मकान मालिकों को अपने अप्रयुक्त निर्माण अधिकार बेचने की अनुमति मिलेगी। राजधानी दिल्ली के रियल एस्टेट क्षेत्र और शहरी विकास के ढांचे में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने दिल्ली मास्टर प्लान 2047 के तहत एक नया बाजार आधारित तंत्र लागू करने की सिफारिश की है। इस व्यवस्था के अंतर्गत संपत्ति मालिकों को न केवल अपनी जमीन या मकान बेचने की आजादी होगी, बल्कि वे अपनी जमीन पर मिलने वाले निर्माण अधिकारों (डेवलपमेंट राइट्स) का व्यापार भी कर सकेंगे। यदि किसी भूखंड पर स्वीकृत सीमा के अनुसार पूरा निर्माण नहीं हो पाता है, तो बचे हुए निर्माण अधिकार को प्रमाणपत्र के माध्यम से दूसरे बिल्डरों या डेवलपर्स को बेचा जा सकेगा। डीडीए की ओर से इस प्रस्ताव को मंजूरी दी जा चुकी है और अब इसे आवास एवं शहरी मामलात मंत्रालय की अंतिम स्वीकृति का इंतजार है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य निजी संपत्ति मालिकों को शहरी पुनर्विकास, विरासत संरचनाओं के संरक्षण और झुग्गी बस्तियों के पुनर्वास में सक्रिय भागीदार बनाना है। ट्रांसफेरबल डेवलपमेंट Rights व्यवस्था और मुंबई का मॉडल डीडीए का यह नया ड्राफ्ट मुंबई में वर्षों से सफलतापूर्वक चल रहे ट्रांसफेरबल डेवलपमेंट राइट्स (टीडीआर) मॉडल से प्रेरित है। मुंबई में शहरी झुग्गी झोपड़ी पुनर्वास और सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण के दौरान टीडीआर का व्यापक उपयोग किया जाता रहा है। थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के एक शोध अध्ययन के आंकड़े दर्शाते हैं कि साल 2021 तक के दो दशकों के भीतर मुंबई में स्लम बस्तियों के विकास और उनके पुनर्वास कार्यों के लिए लगभग 8 करोड़ वर्गफुट जगह का टीडीआर प्रणाली के तहत इस्तेमाल किया गया। इसी तर्ज पर दिल्ली में भी शहरी भूमि का अधिकतम और कुशल उपयोग सुनिश्चित करने के लिए यह व्यवस्था बनाई जा रही है। इससे डेवलपर्स को झुग्गी बस्तियों के पुनर्विकास में वित्तीय प्रोत्साहन मिलेगा और शहर के अविकसित क्षेत्रों का कायाकल्प हो सकेगा। सार्वजनिक निजी भागीदारी से स्लम पुनर्वास का खाका राजधानी में इस कानून के लागू होने के बाद पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मोड पर झुग्गी झोपड़ी बस्तियों के कायाकल्प का मार्ग प्रशस्त होगा। इस मॉडल के तहत प्राइवेट डेवलपर्स स्लम बस्तियों की भूमि पर वहां रहने वाले निवासियों के लिए बहुमंजिला पक्के मकानों का निर्माण करेंगे। इसके बाद जमीन का जो हिस्सा शेष बचेगा, उस पर डेवलपर्स व्यावसायिक या आवासीय संपत्तियां बनाकर अपना मुनाफा और निर्माण लागत वसूल कर सकेंगे। दिल्ली में कई प्रमुख स्लम बस्तियां अत्यंत कीमती और प्राइम लोकेशन वाली जमीनों पर स्थित हैं। इसी कारण डीडीए को उम्मीद है कि इस बाजार आधारित व्यवस्था से डेवलपर्स को वित्तीय प्रोत्साहन मिलेगा और स्लम पुनर्वास की लंबित योजनाएं तेजी से आगे बढ़ेंगी। जेनरेटिंग साइट और रिसीविंग साइट का तकनीकी ढांचा दिल्ली के कई घनी आबादी वाले इलाकों और पुरानी दिल्ली के हिस्सों में इमारतों की ऊंचाई पर सख्त नियम लागू हैं। इसके अलावा अनेक स्थानों पर प्लाट का आकार बेहद छोटा होता है। ऐसे सीमित क्षेत्रों में बिल्डर्स या संपत्ति मालिक अपनी मंजूरशुदा निर्माण क्षमता का पूरा इस्तेमाल करके फ्लैट, दुकान या कार्यालय नहीं बना पाते, जिससे उनका वित्तीय नुकसान होता है। टीडीआर व्यवस्था इसी समस्या का समाधान प्रदान करती है। इस मैकेनिज्म में जिस स्थान पर निर्माण अधिकार का पूरा उपयोग नहीं हो पाता, उसे जेनरेटिंग साइट कहा जाएगा। वहीं जिस दूसरे प्लॉट या प्रोजेक्ट पर उन बचे हुए अधिकारों को स्थानांतरित करके उपयोग में लाया जाएगा, उसे रिसीविंग साइट कहा जाएगा। इससे छोटे या ऊंचाई की पाबंदी वाले भूखंड मालिकों को भी अपने अप्रयुक्त निर्माण अधिकारों का आर्थिक मूल्य मिल सकेगा। फ्लोर एरिया रेशियो 500 और ऊंची इमारतों का गणित डीडीए का मानना है कि दिल्ली में टीडीआर का कुल इस्तेमाल एक नियंत्रित सीमा के भीतर रहेगा, क्योंकि नए मास्टर प्लान में स्लम बस्तियों के पुनर्वास प्रोजेक्ट्स के लिए फ्लोर एरिया रेशियो (एफएआर) 500 निर्धारित किया गया है। एफएआर वह गणितीय मानक है जो यह तय करता है कि किसी निश्चित भूखंड पर कुल कितना फ्लोर स्पेस निर्मित किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी डेवलपर के पास 2,000 वर्गफुट की जमीन है और वह उसमें से 50 प्रतिशत हिस्से यानी 1,000 वर्गफुट पर निर्माण करता है, तो वह 1,000 वर्गफुट क्षेत्र वाले 10 फ्लोर बना सकता है। इसके विपरीत, यदि उसी एफएआर पर डेवलपर केवल 25 प्रतिशत भूमि यानी 500 वर्गफुट का इस्तेमाल करता है, तो वह 500 वर्गफुट क्षेत्र वाले 20 फ्लोर की ऊंची इमारत खड़ी कर सकता है। इस नियम से स्लम क्षेत्रों में ऊंची इमारतें बनाना आसान हो जाएगा। टीडीआर प्रमाणपत्र के मुख्य नियम और नियंत्रण शर्तें डीडीए ने इस पूरी व्यवस्था को पारदर्शी और नियंत्रित रखने के लिए कई महत्वपूर्ण शर्तें निर्धारित की हैं • टीडीआर का उपयोग विरासत वाली ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण और देखरेख के लिए प्रोत्साहन के रूप में किया जाएगा। • पुरानी दिल्ली के भीड़भाड़ वाले और संवेदनशील हिस्सों में निर्माण संबंधी नियमों में विशेष छूट दी जाएगी। • स्लम बस्तियों के पुनर्वास, झुग्गी मुक्त शहर के निर्माण और अवसंरचना विकास में इस अधिकार का इस्तेमाल होगा। • निर्माण अधिकारों के हस्तांतरण के लिए डीडीए द्वारा एक आधिकारिक टीडीआर प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा। • यह टीडीआर प्रमाणपत्र केवल दिल्ली की सीमाओं के भीतर स्थित अचल संपत्तियों पर ही मान्य और ट्रांसफर योग्य होगा। • मास्टर प्लान के तहत डीडीए द्वारा अधिसूचित विशिष्ट क्षेत्रों में ही इसे लागू किया जाएगा ताकि पूरी प्रक्रिया पर प्रशासनिक नियंत्रण बना रहे। इसका आप पर असर भारत में: देश के अन्य बड़े शहरों के लिए यह नीति शहरी पुनर्विकास और स्लम पुनर्वास का एक अनुकरणीय मॉडल बन सकती है। दिल्ली में: राजधानी के संपत्ति मालिक अपने अप्रयुक्त निर्माण अधिकारों को बेचकर आर्थिक लाभ उठा सकेंगे और झुग्गी बस्तियों का तेजी से कायाकल्प होगा। सवाल-जवाब 1. डीडीए के नए मास्टर प्लान में कौन सा नया प्रावधान जोड़ा गया है? डीडीए ने दिल्ली मास्टर प्लान 2047 में ट्रांसफेरबल डेवलपमेंट राइट्स (टीडीआर) का नया प्रावधान जोड़ा है, जिसके तहत मकान मालिक अपनी जमीन पर अप्रयुक्त निर्माण अधिकार दूसरों को बेच सकते हैं। 2. इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए किस मंत्रालय की मंजूरी आवश्यक है? डीडीए द्वारा पारित इस प्रस्ताव को अंतिम स्वीकृति के लिए केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलात मंत्रालय के पास भेजा गया है। 3. टीडीआर व्यवस्था में जेनरेटिंग साइट और रिसीविंग साइट क्या होती हैं? जिस जगह पर ऊंचाई या साइज की पाबंदी के कारण निर्माण अधिकार का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता उसे जेनरेटिंग साइट कहते हैं, और जहां उन अधिकारों को ट्रांसफर करके इस्तेमाल किया जाता है उसे रिसीविंग साइट कहते हैं। 4. मुंबई में टीडीआर व्यवस्था के तहत कितना निर्माण कार्य किया गया है? ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के शोध के अनुसार, साल 2021 तक दो दशकों में मुंबई में स्लम विकास के लिए लगभग 8 करोड़ वर्गफुट जगह का टीडीआर के तहत इस्तेमाल हुआ। 5. दिल्ली में स्लम पुनर्वास के लिए फ्लोर एरिया रेशियो (एफएआर) कितना तय किया गया है? नए मास्टर प्लान में झुग्गी बस्तियों के पुनर्वास और विकास के लिए फ्लोर एरिया रेशियो (एफएआर) 500 निर्धारित किया गया है। https://trendkia.com/national/rajdhani-mein-sampatti-dharkon-ko-milegi-badi-suvidha-dda-ke-naye-master-plan-se-bik-sakega-nirman-ka-adhikar-18885 TrendKia — Har trend, sabse pehle.