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  "type": "article",
  "title": "राष्ट्रपति और राज्यपाल के एडीसी पद से जुड़े नियम, जानिए किन रैंक के अफसरों को मिलता है यह मौका",
  "summary": "सशस्त्र बलों में एडीसी बनने के लिए केवल मेजर रैंक होना अनिवार्य नहीं है, बल्कि कैप्टन और लेफ्टिनेंट कर्नल स्तर के अधिकारी भी कड़े चयन के बाद इस पद पर तैनात होते हैं।",
  "content": "गणतंत्र दिवस समारोह, स्वतंत्रता दिवस या किसी राजकीय आयोजन में जब देश के राष्ट्रपति या राज्यों के राज्यपाल मंच पर उपस्थित होते हैं, तो उनके साथ हमेशा एक या दो बेहद अनुशासित, स्मार्ट वर्दीधारी सैन्य अधिकारी साए की तरह तैनात दिखाई देते हैं। इन सैन्य अधिकारियों को औपचारिक रूप से एडीसी यानी एड-डे-कैंप (Aide-de-Camp) कहा जाता है। आम जनमानस में अक्सर यह आम धारणा बन चुकी है कि एडीसी की यह अत्यंत संवेदनशील और प्रतिष्ठा से भरी जिम्मेदारी सिर्फ मेजर रैंक के अधिकारियों के लिए ही तय की गई है। हालांकि, सैन्य नियमों और ऐतिहासिक परंपराओं का बारीकी से अध्ययन करें तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है।\n\nक्या एडीसी बनने के लिए सिर्फ मेजर रैंक होना जरूरी है?\nसशस्त्र बलों के स्थापित नियमों के मुताबिक, एडीसी बनने के लिए मेजर होना कोई एकमात्र या अनिवार्य शर्त नहीं है। आधिकारिक परंपराओं और सेवा नियमों के तहत आमतौर पर सेना में कैप्टन, मेजर या लेफ्टिनेंट कर्नल रैंक के सैन्य अधिकारियों को इस भूमिका के लिए शॉर्टलिस्ट किया जाता है। यही व्यवस्था भारतीय नौसेना और भारतीय वायुसेना में भी लागू होती है, जहाँ इन सेनाओं के समकक्ष रैंक वाले प्रतिभाशाली अफसरों को अवसर मिलता है।\n\nनियुक्ति का प्राथमिक पैमाना कोई एक बंधी-बंधाई रैंक नहीं होता, बल्कि संबंधित अधिकारी का अब तक का असाधारण सर्विस रिकॉर्ड देखा जाता है। इसके अलावा उनका अनुशासित कार्य व्यवहार, शारीरिक फिटनेस, मानसिक सजगता, संकट के पलों में त्वरित निर्णय क्षमता और उच्च पदस्थ महानुभावों के साथ सहज समन्वय कौशल जैसे गुण देखे जाते हैं। राष्ट्रपति के एडीसी और किसी राज्य के राज्यपाल के एडीसी के चयन मानकों में जरूरत के आधार पर विविधता हो सकती है, जिसके चलते कैप्टन अथवा लेफ्टिनेंट स्तर के युवा अधिकारी भी इस भूमिका में चुने जा सकते हैं।\n\nमेजर ऋषभ सिंह संब्याल और नव्या शेखावत के उदाहरण\nइस प्रतिष्ठित जिम्मेदारी को समझने के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ तैनात रहे अधिकारियों के उदाहरण को देखा जा सकता है। राष्ट्रपति के पूर्व एडीसी मेजर ऋषभ सिंह संब्याल ने अपनी कार्यकुशलता और अनुकरणीय सैन्य अनुशासन के बल पर इस पद पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी इसी तैनाती के चलते कई लोगों के मन में यह ख्याल बैठ गया कि यह दायित्व केवल मेजर स्तर पर ही सीमित है।\n\nवहीं दूसरी ओर, मौजूदा एडीसी नव्या शेखावत की जिम्मेदारी यह साफ करती है कि भारतीय सेना में अब जेंडर की कोई सीमा इस भूमिका के आड़े नहीं आती। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समारोहों, आधिकारिक कार्यक्रमों और वीवीआईपी दौरों में महिला सैन्य अधिकारियों, चाहे वे कैप्टन हों या अन्य युवा रैंक की अधिकारी, उन्होंने एडीसी के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा के साथ किया है। इससे स्पष्ट होता है कि योग्यता और दक्षता के सामने रैंक अथवा जेंडर की कोई दीवार नहीं ठहरती।\n\nकड़ी चयन प्रक्रिया और एडीसी की प्रमुख जिम्मेदारियां\nएडीसी का पद सिर्फ एक औपचारिक रुतबा या आकर्षक पोशाक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बेहद भारी प्रशासनिक जिम्मेदारी, निरंतर सतर्कता और अटूट निष्ठा का प्रतीक माना जाता है।\n\nचयन प्रक्रिया का प्रारूप: इस भूमिका के लिए सशस्त्र बलों के भीतर से ही सबसे बेहतरीन, निष्ठावान और अनुशासित अफसरों की पहचान की जाती है। यह चयन प्रक्रिया काफी लंबी और कठोर कसौटियों से होकर गुजरती है। इसमें अधिकारी के पिछले पूरे सेवा रिकॉर्ड, ड्रिल और टर्नआउट का स्तर, यूनिट के कमांडिंग अफसर की गोपनीय सिफारिशें और गहन व्यक्तिगत साक्षात्कार शामिल होते हैं। सभी पहलुओं पर खरा उतरने के बाद ही अंतिम चयन सूची तैयार होती है।\n\nदैनिक कार्य और दायित्व: एडीसी का मुख्य कार्य राष्ट्रपति, राज्यपाल अथवा सैन्य बलों के शीर्ष कमांडरों को उनके आधिकारिक कार्यक्रमों, सुरक्षा व्यवस्था और उच्चस्तरीय बैठकों में सहायता प्रदान करना होता है। वे हर क्षण अपने वीवीआईपी के साथ रहते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि निर्धारित प्रोटोकॉल, समय सारिणी और सुरक्षा मानकों का अक्षरशः पालन हो।\n\nऐतिहासिक सैन्य परंपरा और डेपुटेशन की व्यवस्था\nऐतिहासिक संदर्भों पर नजर डालें तो एडीसी की परंपरा ब्रिटिश काल के दौरान सैन्य ढांचे में विकसित हुई थी। आजादी के बाद भारतीय सशस्त्र बलों ने इस गौरवशाली परंपरा को अपने सर्वोच्च सम्मान, गरिमा और उच्च पेशेवर मूल्यों के साथ सहेज कर रखा है।\n\nसैन्य नियमों के तहत चुने गए अधिकारी अपनी मूल पेरेंट यूनिट से कुछ वर्षों के लिए डेपुटेशन पर वीवीआईपी सुरक्षा और प्रोटोकॉल प्रबंधन के लिए भेजे जाते हैं। इस प्रतिनियुक्ति के दौरान इन युवा अफसरों को देश के सर्वोच्च नेतृत्व के साथ सीधे तौर पर काम करने, शीर्ष प्रशासनिक निर्णयों की कार्यशैली देखने और राष्ट्रीय स्तर के प्रोटोकॉल को समझने का अनूठा अनुभव प्राप्त होता है। यह पद इस वास्तविकता को रेखांकित करता है कि भारतीय सेना में प्रतिष्ठा का आधार केवल सेवा के वर्ष या उम्र नहीं, बल्कि व्यक्तिगत योग्यता, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्र सेवा का जज्बा है।\n\nइसका आप पर असर\nसैन्य नियुक्तियों और प्रोटोकॉल से जुड़ी यह जानकारी रक्षा सेवा के उम्मीदवारों और जागरूक नागरिकों के लिए व्यावहारिक महत्व रखती है।\n\n• रक्षा उम्मीदवारों के लिए: यह स्पष्टता बताती है कि एडीसी जैसे प्रतिष्ठित पद के लिए सिर्फ मेजर होना अनिवार्य नहीं है। युवा कैप्टन और समकक्ष नौसेना व वायुसेना अधिकारी भी अपने शुरुआती करियर में शानदार सेवा रिकॉर्ड बनाकर इस भूमिका के लिए चुने जा सकते हैं।\n• महिला अधिकारियों के लिए: नव्या शेखावत जैसी अधिकारियों की तैनाती यह दर्शाती है कि उच्च पदों पर लैंगिक समानता बढ़ रही है। इससे तीनों सेनाओं में सेवारत महिला अधिकारियों के लिए सर्वोच्च प्रशासनिक कार्यालयों में डेपुटेशन के नए रास्ते खुलते हैं।\n• आम नागरिकों के लिए: वीवीआईपी कार्यक्रमों में राष्ट्रपति और राज्यपाल के साथ दिखने वाले अधिकारियों की भूमिका को समझने में मदद मिलती है। इससे सेना के आंतरिक चयन नियमों और प्रोटोकॉल प्रबंधन की सटीक जानकारी मिलती है।\n• करियर योजना के लिए: सशस्त्र बलों में कमीशन प्राप्त युवा अफसरों को यह समझ आता है कि डेपुटेशन के लिए निरंतर उच्च प्रदर्शन जरूरी है। यूनिट स्तर पर कमांडिंग अफसर की उत्कृष्ट सिफारिशें ही ऐसे विशेष अवसरों का मार्ग प्रशस्त करती हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह विषय इसलिए चर्चा में आया क्योंकि राष्ट्रपति और राज्यपाल के साथ दिखने वाले एडीसी को लेकर जनता में यह गलत धारणा बन गई थी कि यह पद केवल मेजर रैंक के लिए आरक्षित है।\n\n• प्रचलित भ्रांतियों का निवारण: सार्वजनिक कार्यक्रमों में मेजर ऋषभ सिंह संब्याल जैसे अधिकारियों की प्रमुख उपस्थिति के चलते कई लोग इसे केवल मेजर रैंक तक सीमित मानने लगे थे। सेवा नियमों की वास्तविक स्थिति सामने आने से यह साफ हुआ कि कैप्टन और लेफ्टिनेंट कर्नल स्तर के अधिकारी भी इसके पात्र होते हैं।\n• सशस्त्र बलों में बढ़ता समावेशन: हाल के वर्षों में भारतीय रक्षा सेवाओं ने महिला अधिकारियों को प्रमुख नेतृत्व और औपचारिक भूमिकाओं में आगे बढ़ाया है। नव्या शेखावत का एडीसी बनना इसी निरंतर परिवर्तन और योग्यता आधारित चयन का प्रत्यक्ष प्रमाण है।\n• कड़े प्रशासनिक मानदंड: एडीसी की तैनाती स्थायी न होकर डेपुटेशन पर आधारित होती है, जिसके लिए बहुआयामी प्रतिभा की जरूरत होती है। सैन्य प्रशासन किसी एक रैंक के बजाय समग्र सेवा क्षमता और अनुशासन को प्राथमिकता देता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. एडीसी (Aide-de-Camp) का क्या अर्थ होता है?\nएडीसी सशस्त्र बलों का एक विशेष अधिकारी होता है, जो राष्ट्रपति, राज्यपाल या वरिष्ठ सैन्य कमांडरों के साथ सुरक्षा, प्रशासनिक बैठकों और प्रोटोकॉल समन्वय में सहायता करता है।\n\n2. क्या एडीसी बनने के लिए मेजर रैंक होना अनिवार्य है?\nनहीं, मेजर होना अनिवार्य नहीं है। सेवा नियमों के तहत सेना के कैप्टन, मेजर या लेफ्टिनेंट कर्नल और नौसेना व वायुसेना के समकक्ष अधिकारी भी इस पद के लिए चुने जा सकते हैं।\n\n3. एडीसी के चयन का मुख्य आधार क्या होता है?\nअधिकारी का पिछला सेवा रिकॉर्ड, ड्रिल दक्षता, टर्नआउट, कमांडिंग अफसर की सिफारिश और साक्षात्कार में प्रदर्शन इसके चयन का प्रमुख आधार होता है।\n\n4. क्या महिला सैन्य अधिकारी भी एडीसी बन सकती हैं?\nहाँ, महिला सैन्य अधिकारी भी एडीसी के रूप में तैनात होती हैं, जैसा कि राष्ट्रपति की एडीसी नव्या शेखावत के मामले में देखा गया है।\n\n5. एडीसी की नियुक्ति कितने समय के लिए होती है?\nएडीसी अपनी मूल सैन्य यूनिट से वीवीआईपी सुरक्षा और प्रोटोकॉल के लिए कुछ वर्षों की सीमित अवधि के लिए डेपुटेशन पर आते हैं।",
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  "category": "भारत",
  "publishedAt": "2026-09-20",
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