राष्ट्रपति के एडीसी पद तक कैसे पहुंचते हैं सैन्य अधिकारी, नव्या शेखावत और ऋषभ सिंह संब्याल के सफर से समझें पूरी प्रक्रिया देश के राष्ट्रपति के सैन्य सहायक यानी एडीसी का पद भारतीय सशस्त्र बलों के सबसे प्रतिष्ठित और कठिन दायित्वों में गिना जाता है। इस पद पर पहुंचने के लिए किन कड़े चरणों और चौदह दिनों की मैराथन चयन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, आइए जानते हैं। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन राष्ट्रपति के साथ साए की तरह रहने वाले सैन्य अधिकारियों की भूमिका हमेशा से लोगों के बीच जिज्ञासा का विषय रही है। राष्ट्रपति के एडीसी यानी एड-ए-कैंप का दायित्व भारतीय सेना के सबसे गौरवशाली और जिम्मेदारी भरे पदों में शामिल है। हाल ही में मेजर ऋषभ सिंह संब्याल के इस पद से अचानक अलग होने के बाद से यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर इस विशेष स्थान तक पहुंचने का मार्ग कैसा होता है और इसके लिए किन मानदंडों को पूरा करना अनिवार्य होता है। कौन अधिकारी हो सकता है इस पद के लिए पात्र यह पद किसी सामान्य या खुली भर्ती के अंतर्गत नहीं आता है, और इसके लिए देश का कोई भी आम नागरिक सीधे आवेदन नहीं कर सकता है। इस अति-विशिष्ट जिम्मेदारी के लिए केवल भारतीय थल सेना, नौसेना और वायु सेना के कमिशंड अधिकारी ही योग्य माने जाते हैं। सशस्त्र बलों में कमिशंड अफसर बनने की प्रक्रिया के तहत युवाओं को संघ लोक सेवा आयोग की कठिन एनडीए या सीडीएस परीक्षा को उत्तीर्ण करना होता है। जब कोई अधिकारी सेना में अपनी सेवा के कम से कम पाँच से सात वर्ष पूरे कर लेता है, तब उसके पिछले सेवा रिकॉर्ड, शारीरिक दक्षता और गोपनीय रिपोर्ट के आधार पर इस पद के लिए नाम छांटे जाते हैं। तीनों सेनाओं से कुल मिलाकर केवल बीस से तीस उत्कृष्ट अधिकारियों को ही इस चयन प्रक्रिया के शुरुआती चरण के लिए चुना जाता है, जिसके लिए यूनिट में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन होना जरूरी है। चौदह दिनों की मैराथन चयन प्रक्रिया और राष्ट्रपति भवन की परीक्षा इस पद के लिए चुनी जाने वाली चयन प्रणाली को देश की सबसे चुनौतीपूर्ण प्रक्रियाओं में शुमार किया जाता है। प्रारंभिक चरण में शॉर्टलिस्ट होने के बाद अधिकारियों को सेवा मुख्यालय के साक्षात्कार से गुजरना पड़ता है, जहाँ समसामयिक विषयों और परिस्थितियों से निपटने की उनकी समझ की कड़ी परीक्षा ली जाती है। इसके बाद केवल पाँच चुने हुए अधिकारियों को दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में बुलाया जाता है, जहाँ उनका लगातार चौदह दिनों तक चलने वाला मैराथन साक्षात्कार होता है। वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और राष्ट्रपति के सचिव द्वारा उम्मीदवारों पर भारी मानसिक दबाव बनाया जाता है। वे जानबूझकर ऐसे पहलुओं को टटोलते हैं जो किसी आपात स्थिति में सामने आ सकते हैं। जियोपॉलिटिक्स या किसी विशेष विषय पर ज्ञान कम होने पर चयन पैनल बार-बार उन्हीं बिंदुओं पर सवाल पूछता है। इन चौदह दिनों के दौरान अधिकारियों को उनकी गलतियाँ नहीं बताई जाती हैं, बल्कि यह परखा जाता है कि क्या वे रात में अध्ययन करके अगले दिन अपनी कार्यप्रणाली में सुधार ला पाते हैं या नहीं। व्यक्तिगत जीवन का त्याग और कड़ा अनुशासन इस प्रतिष्ठित दायित्व से जुड़ी कुछ ऐसी शर्तें और सीमाएँ हैं जिनके बारे में जानकर हर कोई हैरान रह जाता है। इस पद पर रहते हुए अधिकारी को अपने परिवार और निजी जीवन से पूरी तरह दूर रहना पड़ता है। राष्ट्रपति के साथ चौबीस घंटे तैनात रहने के कारण उन्हें सामान्य जीवन बिताने का अवसर नहीं मिल पाता है। हर पल चौकस रहना और देश-दुनिया की हर गतिविधि से अपडेट रहना उनकी दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा होता है। हालांकि यह पद देश में अपार शान और सम्मान का प्रतीक है, लेकिन इसके पीछे का अनुशासन और त्याग इसे दुनिया के सबसे कठिन उत्तरदायित्वों में से एक बनाता है। इसका आप पर असर यह नियुक्ति प्रक्रिया आम नागरिकों के लिए सीधे तौर पर वित्तीय या दैनिक जीवन को प्रभावित नहीं करती, लेकिन रक्षा सेवाओं के युवाओं और अभ्यर्थियों के लिए यह एक उच्च प्रेरणा और अनुशासन का मानक प्रस्तुत करती है। • भारत में: सशस्त्र बलों के सेवारत कमिशंड अधिकारियों के लिए यह देश के सर्वोच्च सेवा सम्मानों में से एक तक पहुँचने का मार्ग खोलती है। इसके कड़े चयन मानदंड देश भर के सैन्य कर्मियों को अपने पेशेवर रिकॉर्ड और दक्षता को उच्च स्तर पर बनाए रखने के लिए प्रेरित करते हैं। ऐसा क्यों हुआ यह प्रक्रिया इसलिए अत्यंत कठिन और विशिष्ट है क्योंकि राष्ट्रपति देश के सर्वोच्च संवैधानिक प्राधिकारी और सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर होते हैं, जिनकी सुरक्षा और दैनिक प्रशासनिक सहयोग के लिए त्रुटिहीन दक्षता की आवश्यकता होती है। • पात्रता के कड़े मानदंड: केवल थल सेना, नौसेना और वायु सेना के अनुभवी कमिशंड अधिकारियों को ही इस पद के लिए अनुमति दी जाती है ताकि उच्चतम स्तर की सैन्य पृष्ठभूमि सुनिश्चित हो सके। • रणनीतिक और मानसिक दबाव परीक्षण: राष्ट्रपति भवन में चौदह दिनों तक चलने वाला मैराथन साक्षात्कार यह परखने के लिए डिज़ाइन किया गया है कि अत्यधिक तनाव और आपातकालीन परिस्थितियों में अधिकारी किस प्रकार निर्णय लेते हैं। • व्यक्तिगत जीवन का समर्पण: चौबीसों घंटे कर्तव्य पर मुस्तैद रहने की आवश्यकता के कारण इस भूमिका में अधिकारियों को अपने परिवार और निजी गतिविधियों से पूरी तरह दूर रहना पड़ता है। सवाल-जवाब 1. राष्ट्रपति का एडीसी कौन बन सकता है? भारतीय थल सेना, नौसेना और वायु सेना के कमिशंड अधिकारी ही राष्ट्रपति के एडीसी पद के लिए पात्र होते हैं। 2. इस पद के लिए चयन प्रक्रिया कितने चरणों में होती है? सबसे पहले सेवा रिकॉर्ड के आधार पर अधिकारियों को शॉर्टलिस्ट किया जाता है, जिसके बाद सेवा मुख्यालय का इंटरव्यू और अंत में राष्ट्रपति भवन में 14 दिन का मैराथन इंटरव्यू होता है। 3. क्या इस पद के लिए आम युवा सीधे आवेदन कर सकते हैं? नहीं, यह पद खुली भर्ती वाला नहीं है और आम युवा इसके लिए आवेदन नहीं कर सकते। 4. एडीसी के रूप में चयन के लिए कितने अधिकारियों को दिल्ली बुलाया जाता है? तीनों सेनाओं से शुरुआती चरण के बाद केवल 5 सर्वश्रेष्ठ अधिकारियों को दिल्ली के राष्ट्रपति भवन बुलाया जाता है। 5. इस पद से जुड़े नियमों में क्या मुख्य चुनौती है? इस पद पर रहते हुए अधिकारियों को अपने परिवार और निजी जीवन से दूर रहना पड़ता है और 24 घंटे सतर्क रहना होता है। https://trendkia.com/national/rashtrapati-ke-edisi-pada-taka-kaise-pahunchate-hain-sainya-adhikari-navya-shekhavata-aura-rishabha-sinha-snbyala-ke-saphara-se-sa-32349 TrendKia — Har trend, sabse pehle.