रूसी तेल और वैश्विक व्यवस्था पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर का रुख, अमेरिका को बताया अकेली पड़ती ताकत विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि भारत अपनी विदेश नीति राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय करेगा, न कि पश्चिमी देशों के दबाव में। म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में उन्होंने वैश्विक बदलावों और रूस के साथ रणनीतिक संबंधों पर बेबाक राय रखी। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की कूटनीतिक आवाज लगातार मुखर और स्पष्ट होती जा रही है। म्यूनिख लीडर्स मीटिंग के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक भू-राजनीति की मौजूदा स्थिति का बेहद साफ आकलन पेश किया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि अमेरिका धीरे-धीरे एक अकेली पड़ती ताकत के रूप में खुद को ढाल चुका है। एक समय था जब अंतरराष्ट्रीय नियमों और पुरानी वैश्विक व्यवस्था की बागडोर पूरी तरह वॉशिंगटन के हाथों में केंद्रित थी, लेकिन अब उस मजबूत पकड़ में साफ ढीलापन दिखाई दे रहा है। भारत पर रूस से रियायती कच्चा तेल खरीदने को लेकर लगातार दबाव बनाने की कोशिशें होती रही हैं, मगर नई दिल्ली ने साफ संदेश दिया है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक जरूरतें किसी बाहरी निर्देश की मोहताज नहीं हैं। रूस के साथ ऐतिहासिक साझेदारी और शांति की पहल विदेश मंत्री ने मॉस्को के साथ भारत के गहरे और परखे हुए संबंधों की खुलकर वकालत की। उन्होंने याद दिलाया कि जब इतिहास के नाजुक मोड़ों पर पाकिस्तान जैसे पड़ोसी मुल्क के समर्थन में दुनिया के कई देश खड़े नजर आते थे, उस दौर में केवल रूस ने भारत का दृढ़ता से साथ निभाया था। यही वजह है कि भारत अपनी पुरानी मित्रता की अनदेखी नहीं कर सकता। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे सैन्य टकराव के मुद्दे पर भी भारत का नजरिया सिर्फ औपचारिक बयानों तक सीमित नहीं रहा है। अब भारत केवल शांति की सामान्य अपील करने के बजाय सक्रिय रूप से मध्यस्थता की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। अनाज की वैश्विक आपूर्ति और ऊर्जा निर्यात जैसे जटिल विवादों को सुलझाने के लिए भारत अपने व्यावहारिक शांति प्रस्तावों के साथ आगे आ रहा है, जिससे दोनों पक्षों के बीच अड़चनों को दूर किया जा सके। अमेरिका का बदलता स्वरूप और चीन का प्रसार जयशंकर ने रेखांकित किया कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य मुख्य रूप से दो बड़े बदलावों की गिरफ्त में है। पहला प्रमुख कारक अमेरिका का अपने पारंपरिक वैश्विक दृष्टिकोण को बदलना है, जबकि दूसरा बड़ा कारक चीन का बेहद तेजी से आर्थिक और सैन्य शक्ति के तौर पर उभरना है। इन दोनों महाशक्तियों के बीच की तनातनी अब इस स्तर पर पहुंच चुकी है कि हर देश अपने प्रभाव, संसाधनों और दूसरे देशों की कमजोरियों का इस्तेमाल दबाव बनाने के साधन के रूप में कर रहा है। ऐसी जटिल स्थिति में भारत ने बिना किसी संकोच के अपने राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखने की नीति अपनाई है। रणनीतिक साझेदारी बनाम रणनीतिक निर्भरता जयशंकर के बयानों का अर्थ अमेरिका से किसी तरह का अलगाव नहीं है। भारत के लिए वॉशिंगटन रक्षा, उच्च तकनीक, द्विपक्षीय व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा के मोर्चों पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण साझेदार बना हुआ है। हालांकि, रणनीतिक साझेदारी का अर्थ किसी पर रणनीतिक निर्भरता होना कतई नहीं है। भारत का कूटनीतिक ढांचा बहु-ध्रुवीय संतुलन पर आधारित है। भारत अमेरिका के साथ सहयोग जारी रखेगा, रूस के साथ अपने ऐतिहासिक रिश्तों की रक्षा करेगा, यूरोप के साथ व्यापारिक व रणनीतिक तालमेल बढ़ाएगा और साथ ही चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद का रास्ता खुला रखेगा। विदेश नीति का यह स्पष्ट नियम है कि सभी के साथ संतुलित संबंध रखे जाएं, लेकिन अंतिम निर्णय हमेशा अपने देश के हित में लिए जाएं। पश्चिमी दबाव से मुक्त स्वतंत्र कूटनीति पूर्व में विदेश मंत्री ने यूरोप के आत्म-केंद्रित दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए कहा था कि यूरोप यह मानता है कि उसकी समस्याएं पूरी दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं उसकी समस्याएं नहीं हैं। अब वही व्यावहारिक संदेश अमेरिका तक भी पहुंच चुका है। भारत पश्चिमी देशों के साथ बराबरी के आधार पर साझेदारी चाहता है, लेकिन वह किसी भी परिस्थिति में पश्चिमी प्राथमिकताओं या शर्तों पर अपनी विदेश नीति का संचालन स्वीकार नहीं करेगा। इसका आप पर असर भारत की स्वतंत्र विदेश नीति देश की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को सीधे तौर पर सुरक्षित करती है। • ईंधन की कीमतों पर प्रभाव: भारत द्वारा रूस से रियायती कच्चे तेल की खरीद जारी रखने से घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के दामों को स्थिर रखने में मदद मिलती है। इससे आम नागरिकों पर महंगाई का भारी बोझ नहीं पड़ता। • वैश्विक मंच पर साख: बिना किसी दबाव के स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता से भारतीय नागरिकों और कारोबारियों के वैश्विक हितों को मजबूती मिलती है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के कूटनीतिक रुख का असर व्यापारिक समझौतों पर भी पड़ता है। • रक्षा और तकनीक आपूर्ति: अमेरिका और रूस दोनों के साथ संतुलित संबंधों के कारण देश को उन्नत रक्षा प्रणालियों और आधुनिक तकनीक की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित होती है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण कदम है। • आयात-निर्यात स्थिरता: खाद्यान्न और ऊर्जा निर्यात में मध्यस्थता से भारतीय व्यापार जगत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आने वाले बड़े झटकों से सुरक्षा मिलती है। इससे विभिन्न आयातक उद्योगों को समय पर कच्चा माल मिलता रहता है। ऐसा क्यों हुआ यह कूटनीतिक बदलाव महाशक्तियों के आपसी टकराव और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भारत पर बनाए जा रहे अनुचित दबाव की वजह से सामने आया है। • पश्चिमी देशों का अनुचित दबाव: यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका लगातार भारत पर रूस से कच्चा तेल न खरीदने का दबाव बना रहा था। भारत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय ऊर्जा जरूरतें सर्वोपरि हैं और ऐतिहासिक मित्र की अनदेखी नहीं की जा सकती। • महाशक्तियों का बदलता संतुलन: वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका की पारंपरिक पकड़ कमजोर हो रही है, जबकि चीन तेजी से प्रभाव बढ़ा रहा है। इस द्वंद्व के बीच दोनों देश अन्य राष्ट्रों पर प्रभाव जमाने के लिए हर साधन का उपयोग कर रहे हैं। • ऐतिहासिक विश्वसनीयता: पूर्व के संकटों, विशेषकर पाकिस्तान से जुड़े विवादों के दौरान पश्चिमी देशों ने भारत का साथ नहीं दिया था, जबकि रूस मजबूती से साथ खड़ा रहा। इस रणनीतिक अनुभव ने भारत को अपनी स्वतंत्र नीति पर कायम रहने का आधार दिया है। सवाल-जवाब 1. एस. जयशंकर ने अमेरिका को लेकर क्या टिप्पणी की? उन्होंने म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में कहा कि अमेरिका ने खुद को एक अकेली पड़ती ताकत के रूप में ढाल लिया है और पुरानी वैश्विक व्यवस्था पर उसकी पकड़ अब ढीली पड़ रही है। 2. भारत रूस से तेल खरीद का बचाव क्यों कर रहा है? भारत का मानना है कि रणनीतिक फैसले राष्ट्रीय हितों के अनुसार होने चाहिए और रूस ने अतीत में पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों के मुद्दे पर हमेशा भारत का साथ दिया है। 3. रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत की वर्तमान भूमिका क्या है? भारत केवल शांति की अपील करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अनाज और ऊर्जा निर्यात जैसे जटिल विवादों को सुलझाने के लिए अपना शांति प्रस्ताव आगे रख रहा है। 4. क्या भारत और अमेरिका के संबंधों में दूरी आ रही है? नहीं, अमेरिका रक्षा, तकनीक और व्यापार में महत्वपूर्ण साझेदार बना हुआ है, लेकिन भारत रणनीतिक साझेदारी को रणनीतिक निर्भरता में बदलने के खिलाफ है। https://trendkia.com/national/rusi-tela-aura-vaishvika-vyavastha-para-videsha-mntri-s-jaishankar-ka-rukha-america-ko-bataya-akeli-parati-takata-43482 TrendKia — Har trend, sabse pehle.