सहारनपुर की कान्हा उपवन गौशाला में वॉटर लेट्यूस से चमकाया जा रहा गंदा पानी, 11 चेंबर प्लांट से बना इको-फ्रेंडली मॉडल सहारनपुर नगर निगम की मां शाकंभरी कान्हा उपवन गौशाला ने मवेशियों की धुलाई से निकलने वाले दूषित जल को फिर से उपयोगी बनाने के लिए एक अभिनव बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट सिस्टम स्थापित किया है। पिस्टिया पौधे और ओजोनेशन तकनीक के सहारे यह गौशाला अब शून्य जल बर्बादी के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रही है। सहारनपुर नगर निगम द्वारा संचालित मां शाकंभरी कान्हा उपवन गौशाला ने पर्यावरण संरक्षण और जल पुनर्चक्रण की दिशा में एक प्रेरणादायक मिसाल पेश की है। गोवंश की सेवा के साथ-साथ संस्थागत आत्मनिर्भरता हासिल करने के उद्देश्य से इस परिसर में एक आधुनिक वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट चालू किया गया है। गौशाला में मवेशियों की नहलाई और बाड़ों की साफ-सफाई के दौरान प्रतिदिन भारी मात्रा में पानी इस्तेमाल होता है। पहले यह प्रयुक्त पानी व्यर्थ बह जाता था, लेकिन अब नई वैज्ञानिक व्यवस्था के तहत इस अपशिष्ट जल को जैविक पद्धतियों से शुद्ध करके परिसर में ही दोबारा इस्तेमाल में लाया जा रहा है। जल संरक्षण के सरकारी अभियानों को धरातल पर उतारते हुए इस केंद्र ने अपने पूरे दैनिक जल चक्र को रिसाइकलिंग नेटवर्क से जोड़ दिया है। जल शोधन के लिए पिस्टिया पौधे का प्राकृतिक इस्तेमाल इस वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें पानी को स्वच्छ करने के लिए किसी भारी रासायनिक प्रक्रिया के बजाय प्राकृतिक वनस्पतियों का सहारा लिया जा रहा है। इस हरित प्रक्रिया में पिस्टिया (Pistia stratiotes) नाम के जलीय पौधे का उपयोग मुख्य फ़िल्टर के रूप में हो रहा है, जिसे सामान्य भाषा में वॉटर लेट्यूस भी कहा जाता है। यह पानी की सतह पर तैरने वाली एक ऐसी वनस्पति है जो प्राकृतिक फाइटोरेमेडिएशन विधि से पानी को शुद्ध करती है। पिस्टिया की घनी जड़ें प्रदूषित जल में घुले हानिकारक तत्वों, भारी धातुओं, अत्यधिक नाइट्रोजन और फास्फोरस को तेजी से सोख लेती हैं। इस जैविक अवशोषण के बाद पानी की विषाक्तता समाप्त हो जाती है और वह दोबारा उपयोग लायक बन जाता है। 11 चेंबर वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट की कार्यप्रणाली गौशाला परिसर में स्थापित यह शोधन प्रणाली कुल 11 अलग-अलग चेंबरों में बांटी गई है, जिससे होकर अपशिष्ट जल चरणबद्ध तरीके से गुजरता है। मवेशियों के बाड़ों से निकलने वाले गंदे पानी को सबसे पहले प्राथमिक चेंबरों में एकत्र किया जाता है, जहां पिस्टिया पौधे प्राकृतिक रूप से दूषित कणों को अवशोषित करते हैं। इसके पश्चात पानी को और अधिक स्वच्छ बनाने के लिए ओजोनेशन प्रक्रिया से गुजारा जाता है और बाहर से अतिरिक्त ऑक्सीजन प्रवाहित की जाती है। इस संपूर्ण उपचार के बाद जब पानी पूरी तरह साफ हो जाता है, तब इसे विशेष टैंकरों के माध्यम से फ्लश स्टोरेज चेंबर तक पहुंचाया जाता है। वर्तमान में इस रिसायकल किए गए शुद्ध जल का उपयोग गौशाला के शौचालयों और फ्लशिंग सिस्टम में किया जा रहा है। वेस्ट टू वेल्थ सिद्धांत और गौशाला का आत्मनिर्भर मॉडल मां शाकंभरी कान्हा उपवन गौशाला में इस समय 547 गोवंश को संरक्षित किया गया है। पशु चिकित्सा एवं कल्याण अधिकारी डॉक्टर संदीप कुमार मिश्रा के अनुसार, गौशाला प्रशासन पूरी तरह से वेस्ट टू वेल्थ यानी कचरे से संसाधन बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। डॉक्टर संदीप कुमार मिश्रा ने कहा, "हमारा लक्ष्य गौशाला से निकलने वाली हर वस्तु का पुनर्चक्रण करना है ताकि एक बूंद पानी भी बेकार न जाए।" इसी विचार के तहत गोमूत्र का व्यावसायिक इस्तेमाल करते हुए उससे फिनायल तैयार किया जा रहा है, जबकि गोबर का उपयोग करके विभिन्न प्रकार के पर्यावरण-अनुकूल गौ-उत्पाद बनाए जा रहे हैं। पानी के इस 11 चेंबर रिसाइक्लिंग प्लांट ने गौशाला की दैनिक जल निर्भरता को कम करके इसे स्वच्छता और संसाधन प्रबंधन का एक आदर्श केंद्र बना दिया है। इसका आप पर असर भारत में: यह मॉडल साबित करता है कि स्थानीय निकाय बिना महंगे रसायनों के केवल जलीय पौधों की मदद से गंदे पानी को रिसायकल करके जल संकट से निपट सकते हैं। सहारनपुर में: गौशाला में प्रतिदिन सैकड़ों लीटर ताजे पानी की बचत हो रही है और स्वच्छता कार्यों के लिए पूरी तरह रिसायकल किया गया जल इस्तेमाल हो रहा है। सवाल-जवाब 1. सहारनपुर गौशाला में पानी साफ करने के लिए किस पौधे का उपयोग किया जा रहा है? पानी को प्राकृतिक रूप से साफ करने के लिए पिस्टिया (Pistia stratiotes) नाम के तैरने वाले जलीय पौधे का उपयोग किया जा रहा है, जिसे वॉटर लेट्यूस भी कहते हैं। 2. पिस्टिया पौधा पानी को कैसे शुद्ध करता है? पिस्टिया पौधे की जड़ें दूषित पानी में मौजूद हानिकारक तत्वों, भारी धातुओं, अतिरिक्त नाइट्रोजन और फास्फोरस को सोख लेती हैं, जिससे पानी प्राकृतिक रूप से साफ हो जाता है। 3. गौशाला का वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट कितने चेंबर का है? यह वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट 11 चेंबरों में बना है, जिसमें ओजोनेशन और ऑक्सीजन सप्लाई के जरिए पानी को पूरी तरह शोधित किया जाता है। 4. शोधित किए गए पानी का उपयोग कहां किया जा रहा है? ट्रीटमेंट के बाद साफ हुए पानी को टैंकरों के जरिए फ्लश चेंबर में भेजा जाता है और इसका इस्तेमाल गौशाला के शौचालयों में फ्लशिंग के लिए होता है। 5. मां शाकंभरी कान्हा उपवन गौशाला में कितने गोवंश संरक्षित हैं? मां शाकंभरी कान्हा उपवन गौशाला में वर्तमान में 547 गोवंश संरक्षित हैं। 6. गौशाला में गोबर और गोमूत्र का क्या उपयोग किया जा रहा है? वेस्ट टू वेल्थ योजना के तहत गोमूत्र से फिनायल बनाया जा रहा है और गोबर का उपयोग करके विभिन्न उपयोगी गौ-उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। प्रेरणा और सबक वेस्ट टू वेल्थ की सोच: गौशाला ने दिखाया कि गोबर, गोमूत्र और अपशिष्ट जल में से कुछ भी बेकार नहीं है, सही वैज्ञानिक सोच से हर कचरे को संसाधन बनाया जा सकता है। प्राकृतिक समाधानों पर भरोसा: महंगी मशीनों की जगह पिस्टिया पौधे (फाइटोरेमेडिएशन) जैसी कुदरती तकनीकों का चयन करके कम लागत में टिकाऊ मॉडल तैयार किया गया। शून्य बर्बादी का संकल्प: 547 गोवंश की देखभाल करते हुए पानी की एक-एक बूंद को रीसायकल करने का यह प्रयास हर संस्थान के लिए जल प्रबंधन की मिसाल है। https://trendkia.com/national/saharanpur-ki-kanha-upvan-gaushala-men-votara-letyusa-se-chamakaya-ja-raha-gnda-pani-11-chenbara-planta-se-bana-iko-phrendali-moda-17320 TrendKia — Har trend, sabse pehle.