# सैन्य कार्रवाई का हौसला है तो इस्लामाबाद से मेज पर संवाद क्यों नहीं, मणिशंकर अय्यर ने केंद्र की नीति को घेरा

> पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर ने भारत और पाकिस्तान के बीच ठप संवाद को लेकर केंद्र सरकार और भाजपा पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने अटारी-वाघा सीमा पर बैठक करने और घरेलू राजनीति में गैर-हिंदुत्व ताकतों को एकजुट होने की सलाह दी।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-10-05 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/sainya-karravai-ka-hausala-hai-to-islamabad-se-meja-para-snvada-kyon-nahin-mani-shankar-aiyar-ne-kendra-ki-niti-ko-ghera-42973 · **Language:** Hindi
**Tags:** मणिशंकर अय्यर, भारत पाकिस्तान संबंध, अटारी वाघा सीमा, विदेश नीति, महबूबा मुफ्ती, अनुच्छेद 370

पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को लेकर केंद्र सरकार की मौजूदा कूटनीतिक नीति पर सवाल उठाते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर ने द्विपक्षीय बातचीत तुरंत बहाल करने की वकालत की है। उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार के रुख की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि जब सीमा पार सैन्य कार्रवाई करने का साहस दिखाया जा सकता है, तो फिर लंबित मामलों के समाधान के लिए आमने-सामने बैठकर चर्चा करने में हिचकिचाहट क्यों है। उनके अनुसार, केवल पुराने विवादों पर बहस करते रहना कूटनीति का हिस्सा नहीं हो सकता।

## सीमा पार संवाद की बहाली पर जोर
मणिशंकर अय्यर ने दोनों देशों के रिश्तों में संवादहीनता पर गहरी चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि भारत के पास सर्जिकल स्ट्राइक करने का हौसला है, लेकिन बातचीत की मेज पर आने की इच्छाशक्ति नजर नहीं आ रही। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि कूटनीति का असली मकसद दुश्मनी बढ़ाना नहीं, बल्कि मैत्रीपूर्ण रिश्ते कायम करना होना चाहिए।

उन्होंने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक निकटता की ओर इशारा करते हुए पूछा कि क्या दुनिया में ऐसा कोई अन्य देश मौजूद है, जिसके साथ भारत के लोग पाकिस्तान से अधिक सहज महसूस कर सकें। इसी तरह उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान के लिए भी दुनिया में ऐसा कोई दूसरा मुल्क नहीं है, जिसके साथ वह भारत से अधिक सहजता और स्वाभाविकता के साथ चर्चा कर सके।

## अटारी-वाघा सीमा पर वार्ता का अनूठा प्रस्ताव
पूर्व में दोनों देशों के बीच चली विभिन्न वार्ता प्रक्रियाओं को याद दिलाते हुए मणिशंकर अय्यर ने कहा कि दोनों पक्षों को एक-दूसरे के मुल्क का दौरा करने का साहस दिखाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि अगर किसी प्रतिनिधिमंडल को दूसरे देश की जमीन पर जाने में असहजता महसूस होती है, तो अटारी-वाघा सीमा पर ही बातचीत की व्यवस्था की जा सकती है।

इस प्रस्ताव का ब्योरा देते हुए उन्होंने कहा कि दोनों देशों की सीमा रेखा पर एक मेज लगाई जा सकती है। इस व्यवस्था से पाकिस्तानी दल को पाकिस्तान से बाहर पैर रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी और भारतीय दल को भारत की सीमा लांघने की आवश्यकता नहीं होगी। उनका मुख्य जोर इस बात पर रहा कि किसी भी परिस्थिति में दोनों पक्षों के बीच संवाद का सिलसिला टूटना नहीं चाहिए।

## लंबित विवादों और अमेरिका-रूस का उदाहरण
वार्ता के स्वरूप पर चर्चा करते हुए मणिशंकर अय्यर ने कहा कि लगातार बातचीत के जरिए ही यह साफ हो सकता है कि किन मसलों का हल फौरन मुमकिन है और किन विवादों में वक्त लगेगा। जिन मुद्दों पर सहमति बन जाए, उन पर तत्काल अमल शुरू होना चाहिए। वहीं जिन विषयों पर असहमति बनी रहे, उन्हें यह कहकर कुछ समय के लिए टाला जा सकता है कि अभी इन पर एक राय नहीं बन पा रही है, लेकिन चर्चा जारी रहेगी। जब राजनीतिक और कूटनीतिक माहौल बदलेगा, तब उन बाकी बचे मामलों पर दोबारा बात की जा सकती है।

उन्होंने ऐतिहासिक कूटनीति की मिसाल देते हुए कहा कि किसी भी सार्थक नतीजे तक पहुंचने का इकलौता जरिया बातचीत ही है, भले ही इसमें लंबा समय क्यों न लगे। उन्होंने ध्यान दिलाया कि शीत युद्ध के दौर में भी अमेरिकियों ने रूसियों के साथ कूटनीतिक संबंध कभी पूरी तरह खत्म नहीं किए और न ही आपस में बातचीत बंद की। समझदार मुल्क हमेशा आपस में चर्चा का रास्ता खुला रखते हैं, जबकि संवाद बंद करने का फैसला विवेकपूर्ण नहीं होता।

## राष्ट्रीय राजनीति और जम्मू-कश्मीर की स्थिति
देश के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य पर बात करते हुए मणिशंकर अय्यर ने दावा किया कि मौजूदा राजनीतिक माहौल की कमियों को दूर करना बेहद आसान है। उन्होंने पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती के उस बयान का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने कश्मीर के लोगों को एकजुट होने की नसीहत दी थी। महबूबा मुफ्ती ने कहा था कि जब तक कश्मीर के सभी लोग एक स्वर में एकजुट नहीं होंगे, तब तक अलग-अलग नेताओं के दिल्ली जाने का केंद्र पर कोई असर नहीं पड़ने वाला।

अय्यर ने स्पष्ट किया कि यही सिद्धांत पूरे देश की राजनीति पर भी लागू होता है। उनका मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर बदलाव तभी मुमकिन है, जब सभी गैर-हिंदुत्व राजनीतिक दल आपसी मतभेद भुलाकर एक मंच पर आएं। उन्होंने कहा कि अगर उनकी विचारधारा के लोग दिल्ली की सत्ता में होते, तो जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस मिल चुका होता। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि ऐसी स्थिति में संभवतः थोड़े बदले हुए स्वरूप में अनुच्छेद 370 और 35ए की वापसी भी हो सकती थी। उन्होंने निष्कर्ष के तौर पर कहा कि आगे बढ़ने के लिए असहमति रखने वाले दलों का एकजुट होना जरूरी है, क्योंकि ऐसी एकता ही पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की नई पहल की नींव रख सकती है।

## इसका आप पर असर
इस राजनीतिक बयानबाजी का सीधा असर भारत और पाकिस्तान के बीच सीमाई सुरक्षा, व्यापार और द्विपक्षीय आवाजाही की नीति पर पड़ता है।

- **भारत में:** दोनों देशों के बीच आधिकारिक वार्ता ठप रहने से सीमा पार व्यापार, सीधी उड़ानों और द्विपक्षीय खेल आयोजनों पर रोक जारी रहने की संभावना है। आम नागरिकों और कारोबारियों के लिए सामान्य यात्रा अथवा आर्थिक अवसरों की बहाली फिलहाल दूर की कौड़ी बनी रहेगी।
- **पंजाब और सीमावर्ती इलाकों में:** अटारी-वाघा सीमा पर व्यापार और सामान्य आवागमन फिर से शुरू न होने से स्थानीय सीमावर्ती अर्थव्यवस्था पर असर बना रहेगा। सीमावर्ती क्षेत्रों के कुलियों, व्यापारियों और ट्रांसपोर्टरों को सामान्य व्यापारिक गतिविधियां शुरू होने का इंतजार करना होगा।
- **जम्मू और कश्मीर में:** राज्य के दर्जे और विशेष संवैधानिक प्रावधानों पर उठने वाली राजनीतिक मांगें स्थानीय राजनीतिक बहस को तेज करती हैं। केंद्र सरकार की मौजूदा स्थिति में किसी बदलाव के बिना केंद्र शासित प्रदेश के मौजूदा प्रशासनिक ढांचे पर कोई तात्कालिक असर नहीं पड़ेगा।
- **राष्ट्रीय राजनीति में:** विपक्षी दलों के एकजुट होने के सुझाव से आने वाले दिनों में गठबंधन की राजनीति और चुनावी गोलबंदी पर बहस बढ़ सकती है। विभिन्न राजनीतिक दल अपने चुनावी समीकरणों के आधार पर इस रुख पर अपना रुख तय करेंगे।

## ऐसा क्यों हुआ
यह बयान भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से जारी कूटनीतिक गतिरोध और घरेलू राजनीति में विपक्ष द्वारा केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने की पृष्ठभूमि में आया है।

- **द्विपक्षीय वार्ता का अभाव:** दोनों देशों के बीच कई वर्षों से उच्च स्तरीय आधिकारिक संवाद बंद है और भारत ने आतंकवाद के खात्मे को वार्ता की अनिवार्य पूर्व शर्त बना रखा है। इसी रुख के जवाब में विपक्षी नेता बातचीत फिर से शुरू करने का दबाव बना रहे हैं।
- **सैन्य कार्रवाई बनाम कूटनीति:** केंद्र सरकार द्वारा सीमा पार की गई पिछली सैन्य कार्रवाइयों को रेखांकित करते हुए राजनीतिक हलकों में अक्सर यह बहस छिड़ती है कि क्या सैन्य शक्ति के साथ-साथ राजनयिक संवाद की भी जरूरत है। इसी परिप्रेक्ष्य में यह तर्क दिया गया कि सैन्य साहस के साथ राजनीतिक संवाद की इच्छाशक्ति भी होनी चाहिए।
- **जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन:** साल 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने और राज्य के पुनर्गठन के बाद से दोनों मुल्कों के कूटनीतिक संबंध और अधिक तनावपूर्ण हो गए थे। घाटी में राज्य का दर्जा बहाल करने और राजनीतिक दलों की एकजुटता का मुद्दा इस संपूर्ण विवाद से गहराई से जुड़ा हुआ है।

## सवाल-जवाब

### 1. मणिशंकर अय्यर ने केंद्र सरकार के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि सरकार के पास पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक करने का साहस तो है, लेकिन बातचीत के जरिए मुद्दों को हल करने की इच्छाशक्ति नहीं है।

### 2. अय्यर ने दोनों देशों की बातचीत के लिए क्या सुझाव दिया?
उन्होंने अटारी-वाघा सीमा रेखा पर ही एक मेज रखकर बातचीत शुरू करने का प्रस्ताव दिया ताकि किसी भी प्रतिनिधिमंडल को दूसरे देश की सीमा में न जाना पड़े।

### 3. उन्होंने अमेरिका और रूस का उदाहरण क्यों दिया?
उन्होंने बताया कि अमेरिका ने भीषण मतभेदों के बावजूद रूस के साथ कभी राजनयिक संबंध नहीं तोड़े और बातचीत जारी रखी, जो समझदार देशों की पहचान है।

### 4. जम्मू-कश्मीर को लेकर अय्यर का क्या रुख रहा?
उन्होंने कहा कि अगर उनकी विचारधारा की सरकार केंद्र में होती, तो कश्मीर को राज्य का दर्जा और संभवतः संशोधित रूप में अनुच्छेद 370 और 35ए वापस मिल जाते।

### 5. उन्होंने महबूबा मुफ्ती के किस बयान का जिक्र किया?
उन्होंने महबूबा मुफ्ती की उस सलाह का जिक्र किया जिसमें कश्मीरियों से एकजुट होकर एक आवाज में बात करने को कहा गया था ताकि दिल्ली पर असर पड़े।

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