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  "type": "article",
  "title": "सैन्य कूटनीति के दम पर जंग रोकने की रणनीति, जनरल वीके सिंह ने बताया 140 देशों में सुरक्षा नेटवर्क बनाने का मास्टर प्लान",
  "summary": "पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने रक्षा कूटनीति को राष्ट्रीय शक्ति का मुख्य आधार बताते हुए 140 देशों तक भारत की पहुंच बढ़ाने और नए दौर के डिफेंस अटाशे तैयार करने की रूपरेखा पेश की.",
  "content": "आधुनिक दौर में किसी भी राष्ट्र की सैन्य क्षमता की वास्तविक परीक्षा केवल सीमा पर तोपें दागने या प्रत्यक्ष युद्ध लड़ने तक सीमित नहीं रह गई है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा का असली संतुलन इस बात पर निर्भर करता है कि कोई देश अपनी कूटनीतिक धमक और रणनीतिक प्रभाव से युद्ध की नौबत आने से पहले ही उसे टालने में कितना सक्षम है. राष्ट्रीय सुरक्षा की इस समकालीन दिशा पर प्रकाश डालते हुए पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने एक स्पष्ट विचार रखा है कि सशस्त्र बलों का मूल ध्येय केवल टकराव के मैदान में जीत हासिल करना नहीं, बल्कि प्रभावी कूटनीतिक दबाव के जरिए जंग को पूरी तरह बेअसर करना भी होना चाहिए. बदलती वैश्विक व्यवस्था में मिलिट्री डिप्लोमेसी यानी सैन्य कूटनीति को भारत के सामरिक सामर्थ्य का केंद्रीय स्तंभ बताते हुए उन्होंने पुरानी और जड़ रक्षा प्राथमिकताओं से आगे बढ़कर एक नई सोच अपनाने की वकालत की है.\n\nपारंपरिक सीमाओं से परे सैन्य निवारक क्षमता का विस्तार\nदशकों से चली आ रही रूढ़िवादी सोच सशस्त्र सेनाओं को केवल सरहदों की रखवाली और संकट के समय सीधे सैन्य ऑपरेशन चलाने वाली ताकत के तौर पर देखती रही है. जनरल वीके सिंह के अनुसार यह दृष्टिकोण आज के भू-राजनीतिक परिदृश्य के अनुकूल नहीं है. उनका तर्क है कि असली सामरिक शक्ति वह होती है जो विरोधियों के मन में ऐसा रणनीतिक डिटरेंस पैदा कर दे जिससे वे टकराव का विचार तक छोड़ दें. अंतरराष्ट्रीय पटल पर जब कोई राष्ट्र अपनी सैन्य तैयारी, तकनीकी क्षमता और संगठनात्मक कुशलता का निरंतर और सुदृढ़ प्रदर्शन करता है, तो शत्रु पक्ष किसी भी दुस्साहस से पहले कई बार सोचने पर विवश होता है. आधुनिक युग का बुनियादी सिद्धांत यह बन चुका है कि एक भी गोली चलाए बिना और रक्तपात से बचकर भी अपनी संप्रभुता तथा सुरक्षा को पूरी तरह चाक-चौबंद रखा जा सकता है.\n\nइस लक्ष्य को साधने के लिए देश की विदेश नीति और रक्षा नीति के बीच बने पारंपरिक फासले को पाटना अनिवार्य हो गया है. अब तक इन दोनों क्षेत्रों को प्रायः अलग-अलग चश्मों से देखा जाता रहा है, जबकि वास्तविक वैश्विक शक्ति बनने के लिए इन दोनों नीतियों का एक सुर में काम करना जरूरी है. जब कूटनीति और रक्षा तंत्र साझा लक्ष्यों के साथ कदमताल करते हैं, तभी किसी देश की आवाज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रभावी ढंग से सुनी जाती है. विभिन्न मित्र देशों के साथ होने वाले द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते, रणनीतिक संवाद और नियमित संयुक्त युद्धाभ्यास ही किसी राष्ट्र की कूटनीतिक रीढ़ को ठोस मजबूती प्रदान करते हैं.\n\nदूतावासों में तैनात सैन्य अटाशे व्यवस्था का पुनर्गठन\nविदेशी मिशनों में काम करने वाले रक्षा प्रतिनिधियों के पुराने ढर्रे पर सवाल उठाते हुए जनरल वीके सिंह ने एक बड़े संरचनात्मक सुधार का आह्वान किया है. वर्षों से भारतीय दूतावासों में तैनात डिफेंस अटाशे का दायरा केवल औपचारिक निगरानी रखने, मुख्यालय को रिपोर्ट भेजने और राजनयिक शिष्टाचार व स्वागत कार्यक्रमों में भाग लेने तक सिमटा हुआ रहा है. उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की निष्प्रभावी व्यवस्था को अब पूरी तरह अलविदा कहने का समय आ चुका है. नए भू-राजनीतिक युग में इन सैन्य अधिकारियों को ठोस रणनीतिक परिणाम हासिल करके दिखाने होंगे.\n\nउनकी प्राथमिक जिम्मेदारी केवल कागजी काम निपटाना नहीं, बल्कि विदेशी जमीन पर भारतीय हितों की रक्षा करना और संबंधित देशों के साथ द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग को नई ऊंचाइयों पर ले जाना है. इसके लिए डिफेंस अटाशे के रूप में चुने जाने वाले अफसरों में केवल सैन्य विषयों की समझ होना काफी नहीं है, बल्कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की पेचीदगियों और वैश्विक राजनीति की गहरी परख भी होनी चाहिए. इसके अलावा, तैनाती वाले देश की स्थानीय भाषा पर अच्छी पकड़ और वहां के राजनीतिक मिजाज की गहरी समझ का होना नितांत आवश्यक है. किसी भी देश की अपनी जुबान में संवाद करना केवल शिष्टाचार का दिखावा नहीं होता, बल्कि यह रणनीतिक साझेदारी को प्रगाढ़ बनाने और नीतिगत असर डालने का एक शक्तिशाली हथियार साबित होता है.\n\nहब एंड स्पोक मॉडल और 140 देशों तक सुरक्षा पहुंच का खाका\nवैश्विक मंच पर भारत की सैन्य उपस्थिति को संस्थागत रूप देने के लिए जनरल वीके सिंह ने एक व्यावहारिक रोडमैप का प्रस्ताव दिया है. इस योजना के तहत उन्होंने 'हब एंड स्पोक' मॉडल अपनाने पर बल दिया है, जिससे सीमित संसाधनों में अधिकतम भौगोलिक क्षेत्रों को कवर किया जा सके. इस प्रारूप के तहत अगले 5 से 7 वर्षों की अवधि में लगभग 80 से 90 नए डिफेंस विंग स्थापित किए जाने का लक्ष्य रखा जाना चाहिए. ऐसा मजबूत नेटवर्क तैयार होने से करीब 130 से 140 देशों तक भारत की सीधी और औपचारिक सैन्य पहुंच सुनिश्चित हो सकेगी.\n\nइस व्यापक तंत्र में प्रमुख रणनीतिक साझेदारों और नए उभरते सहयोगी देशों के लिए उनकी प्राथमिकताओं के अनुसार अलग-अलग स्तरों पर कूटनीतिक कार्य किया जाएगा. इस विस्तृत सुरक्षा संजाल को कुशलतापूर्वक संचालित करने के लिए लगभग 150 से 200 बेहद प्रशिक्षित और दक्ष सैन्य राजनयिकों का एक विशिष्ट कोर ग्रुप तैयार करना होगा. केवल पद सृजित करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि इन अधिकारियों को जमीन पर त्वरित फैसले लेने के लिए पर्याप्त अधिकार, जरूरी बजट और कार्यपालिका की आजादी देनी होगी. उनका मानना है कि जब तक किसी देश की जमीन पर सक्रिय और सशक्त उपस्थिति नहीं होगी, तब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वास्तविक कूटनीतिक प्रभाव कायम नहीं किया जा सकता.\n\nरक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता और तकनीक की साझा साझेदारी\nवर्तमान समय में भारत अपने घरेलू सैन्य उद्योग को अभूतपूर्व गति से सुदृढ़ कर रहा है, जिससे वैश्विक स्तर पर देश की नई औद्योगिक छवि उभर रही है. जनरल वीके सिंह के मुताबिक इस बदलाव को रक्षा कूटनीति के साथ जोड़कर देखना होगा. भारत में तैयार होने वाली आधुनिक स्वदेशी मिसाइल प्रणालियां, सटीक आर्टिलरी गन, अत्याधुनिक नौसैनिक प्लेटफॉर्म और युद्धक ड्रोन आज कई विकासशील और मित्र देशों की रक्षा आवश्यकताओं के अनुकूल हैं. ऐसे में विदेशी मिशनों में तैनात डिफेंस अटाशे को अपने देश के हथियारों की तकनीकी खूबियों और उपयोगिताओं की बारीक जानकारी होनी चाहिए.\n\nसैन्य राजनयिकों को मेजबान देशों के रक्षा तंत्र से निरंतर संपर्क बनाकर उनकी जरूरतों को समझना होगा और उन्हें भारतीय रक्षा साजो-सामान अपनाने के लिए प्रेरित करना होगा. हालांकि उन्होंने यह भी आगाह किया कि इस पूरी कवायद का आशय यह कतई नहीं है कि भारतीय कूटनीति को केवल हथियार बेचने की दुकान बना दिया जाए. इसका वास्तविक उद्देश्य हथियारों की साधारण खरीद-फरोख्त से आगे बढ़कर उच्च रक्षा तकनीक में संयुक्त विकास (को-डेवलपमेंट) और संयुक्त उत्पादन (को-प्रोडक्शन) की दीर्घकालिक और विश्वसनीय साझेदारी स्थापित करना होना चाहिए.\n\nहिंद महासागर से लेकर अफ्रीका तक रणनीतिक विस्तार\nग्लोबल साउथ के विभिन्न क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए वैश्विक शक्तियों के बीच तीव्र होड़ चल रही है. चीन जैसे प्रतिस्पर्धी देश छोटे और आर्थिक रूप से कमजोर देशों को अपने रणनीतिक दायरे में खींचने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं. ऐसी स्थिति में भारत उदासीन नहीं रह सकता. आज पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित करने में भारतीय नौसेना की उपस्थिति एक भरोसेमंद गारंटी के रूप में स्थापित हो चुकी है. विभिन्न तटीय मुल्कों में नौसैनिक जहाजों के पोर्ट कॉल, शिप विजिट, एंटी पायरेसी ऑपरेशन और मैरिटाइम डोमेन अवेयरनेस जैसे अभियानों ने तटीय देशों के साथ भारत के सामरिक रिश्तों को नई गहराई दी है.\n\nइसके साथ ही, समुद्री आपदाओं और संकट के समय राहत अभियानों के माध्यम से भारतीय सेना ने दुनिया भर में अपना मानवीय और संवेदनशील चेहरा प्रस्तुत किया है. भारत के पास आज हिंद महासागर से आगे बढ़कर दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के विशाल महाद्वीप तक सुरक्षा साझेदारियों का जाल बिछाने की असीम संभावनाएं मौजूद हैं. भारत की यह उभरती शक्ति किसी भी देश की संप्रभुता के लिए खतरा पैदा नहीं करती, क्योंकि देश हमेशा से नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और क्षेत्रीय शांति का दृढ़ समर्थक रहा है.\n\nसूचना का खालीपन और रणनीतिक संवाद की अनिवार्यता\nराष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में अत्यधिक गोपनीयता बरतने की पुरानी आदत पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि रणनीतिक संवाद को बंद कमरों में सीमित रखना घातक साबित हो सकता है. जरूरत से ज्यादा पर्दादारी रखने से सूचना के स्तर पर एक बड़ा खालीपन पैदा हो जाता है. जब कोई देश अपने दृष्टिकोण और पक्ष को वैश्विक समुदाय के सामने खुलकर नहीं रखता, तो विरोधी ताकते उस खाली जगह का फायदा उठाकर अपने मनगढ़ंत आख्यान और भ्रामक प्रचार से माहौल को प्रभावित करने लगती हैं.\n\nअंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की सही और मजबूत छवि का निर्माण करना भी रक्षा कूटनीति का ही एक अभिन्न अंग है. इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्वतंत्र विचारकों, पत्रकारों और सामरिक विश्लेषकों को भी राष्ट्रीय रणनीतिक इकोसिस्टम के साथ जोड़ना होगा. आज का युग साइबर वारफेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोनॉमस ड्रोन और अंतरिक्ष तकनीक का है, जहां सूचना युद्ध यानी इंफॉर्मेशन वारफेयर सबसे बड़ा निर्णायक मोर्चा बन चुका है, और भारत को इस मोर्चे पर अपनी पकड़ बेहद मजबूत रखनी होगी.\n\nइसका आप पर असर\nभारत की रक्षा और विदेश नीति के एकीकरण से देश की सुरक्षा क्षमता और अंतरराष्ट्रीय साख में बड़ा बदलाव आएगा.\n\n• राष्ट्रीय सुरक्षा पर: सशक्त सैन्य कूटनीति से सरहदों पर अनावश्यक युद्ध का खतरा टल सकेगा. इससे देश की सेनाओं को अनावश्यक टकराव से बचाकर रणनीतिक बढ़त हासिल होगी.\n• रक्षा उद्योग पर: मित्र देशों को स्वदेशी हथियार और तकनीक निर्यात करने से घरेलू कंपनियों को नए बाजार मिलेंगे. इससे देश के भीतर रक्षा विनिर्माण और अनुसंधान के क्षेत्र में रोजगार और निवेश के नए अवसर तैयार होंगे.\n• राजनयिक स्तर पर: दूतावासों में प्रशिक्षित सैन्य अफसरों की तैनाती से विदेशी संकटों के समय भारतीय नागरिकों की सुरक्षा बेहतर होगी. किसी भी वैश्विक आपात स्थिति में त्वरित फैसले लेकर राहत अभियान चलाना पहले से कहीं अधिक सुगम हो जाएगा.\n• वैश्विक प्रभाव पर: हिंद महासागर से लेकर अफ्रीका तक सुरक्षा साझेदारियां बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आवाज मजबूत होगी. इससे व्यापारिक समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और कच्चे तेल व व्यापार की आपूर्ति बिना बाधा जारी रह सकेगी.\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह रणनीतिक खाका वैश्विक भू-राजनीतिक परिवर्तनों और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के जवाब में तैयार किया गया है.\n\n• बदलती भू-राजनीति: विश्व भर में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है और पारंपरिक युद्ध के बजाय कूटनीतिक दबाव का महत्व बढ़ा है. प्रमुख प्रतिस्पर्धी देश छोटे राष्ट्रों को अपने प्रभाव में ले रहे हैं, जिसके प्रत्युत्तर में भारत को अपनी सक्रिय मौजूदगी दर्ज करानी पड़ रही है.\n• आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन: भारत ने पिछले कुछ वर्षों में मिसाइल, तोप और ड्रोन तकनीक में उल्लेखनीय स्वदेशी क्षमता हासिल की है. इस घरेलू उत्पादन क्षमता को वैश्विक पहचान दिलाने और रणनीतिक साझीदारियां बनाने के लिए सैन्य कूटनीति का पुनर्गठन जरूरी समझा गया है.\n• पुराने मॉडल की विफलता: दूतावासों में तैनात रक्षा प्रतिनिधियों की भूमिका लंबे समय से केवल औपचारिक शिष्टाचार तक सीमित रही थी. रणनीतिक प्रभाव पैदा करने में इस व्यवस्था के अप्रभावी साबित होने के बाद नए अधिकारों और दक्षताओं से लैस सैन्य कैडर की आवश्यकता महसूस हुई.\n• सूचना युद्ध का मुकाबला: अत्यधिक गोपनीयता के कारण वैश्विक पटल पर भारत के पक्ष को लेकर पैदा होने वाले सूचना शून्य को विरोधी देश भुना रहे थे. इस भ्रामक प्रचार का मुकाबला करने के लिए संस्थागत रणनीतिक संवाद को सार्वजनिक और प्रभावी बनाना अनिवार्य हो गया है.\n\nसवाल-जवाब\n\n1. जनरल वीके सिंह के अनुसार सैन्य ताकत का मुख्य उद्देश्य क्या होना चाहिए?\nउनके अनुसार सेना का असली काम केवल युद्ध लड़ना नहीं, बल्कि कूटनीतिक दबाव और रणनीतिक प्रभाव से युद्ध को टालना है.\n\n2. भारत कितने देशों तक अपनी रक्षा कूटनीति का विस्तार करने की योजना बना रहा है?\nअगले 5 से 7 वर्षों में करीब 80 से 90 नए विंग स्थापित कर लगभग 130 से 140 देशों तक सीधी पहुंच बनाने का प्रस्ताव है.\n\n3. डिफेंस अटाशे की भूमिका में क्या बड़ा बदलाव सुझाया गया है?\nउन्हें केवल औपचारिक बैठकों तक सीमित रहने के बजाय स्थानीय भाषा, कूटनीतिक कौशल और रणनीतिक परिणाम देने में दक्ष होना होगा.\n\n4. डिफेंस एक्सपोर्ट को लेकर क्या रणनीति बताई गई है?\nकूटनीति को केवल हथियार बेचने की दुकान न बनाकर स्वदेशी हथियारों के संयुक्त विकास और संयुक्त उत्पादन की साझेदारी स्थापित करनी होगी.\n\n5. सूचना का खालीपन रणनीतिक रूप से नुकसानदेह क्यों माना गया है?\nअत्यधिक गोपनीयता से बने खालीपन का फायदा उठाकर विरोधी देश अपने मनगढ़ंत आख्यान और भ्रामक प्रचार से माहौल को प्रभावित करने लगते हैं.",
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