सरकार बदलने की मांग जनता का संवैधानिक अधिकार, विपक्ष की आवाज दबाना गलत: प्रशांत भूषण वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार बदलने की मांग करना संवैधानिक अधिकार है और हिंसा के बिना विरोध प्रदर्शन अपराध नहीं हो सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में मौजूदा सत्ता को बदलने की मांग उठाना किसी भी नागरिक का मौलिक और संवैधानिक अधिकार है, न कि कोई गैर-कानूनी गतिविधि। वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दिल्ली में मीडियाकर्मियों को संबोधित करते हुए यह स्पष्ट विचार रखा। उन्होंने कहा कि देश में निश्चित तौर पर व्यवस्था और सत्ता में बदलाव होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब वह विपक्ष में थी तब वह भी तत्कालीन सरकारों के खिलाफ बड़े पैमाने पर आंदोलन करती थी, मगर आज दूसरों की ऐसी ही मांगों को साजिश करार दे रही है। संवैधानिक मर्यादा और राजद्रोह पर सुप्रीम कोर्ट की नजीर प्रशांत भूषण ने अपने संबोधन में देश की शीर्ष अदालत के कानूनी फैसलों का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि जब तक किसी विरोध या प्रदर्शन में हिंसा का सहारा न लिया जाए अथवा सार्वजनिक व्यवस्था को सीधे तौर पर नुकसान न पहुंचाया जाए, तब तक सरकार के खिलाफ आवाज उठाना या असंतोष जताना अपराध की श्रेणी में नहीं आता। उन्होंने अंग्रेजों के जमाने के राजद्रोह कानून का उदाहरण देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इसे असंवैधानिक ठहरा चुका है, क्योंकि केवल सत्ता के प्रति असहमति व्यक्त करने से कोई जुर्म साबित नहीं होता। “सत्ता परिवर्तन की मांग करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अंग्रेजों द्वारा बनाया गया राजद्रोह कानून असंवैधानिक है। इसलिए, जब तक हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था को बढ़ावा न दिया जाए, तब तक केवल सरकार के खिलाफ असंतोष पैदा करना हमारे संविधान के तहत कोई अपराध नहीं है।” सत्ता परिवर्तन की मुहिम और दोहरे मापदंड के आरोप वरिष्ठ अधिवक्ता ने इस बात पर बल दिया कि वर्तमान में चल रहे आंदोलन को वह पूरी तरह से व्यवस्था और शासन बदलने का संघर्ष मानते हैं। उनका कहना था कि सत्ता में बैठे दल को यह नहीं भूलना चाहिए कि पूर्व में उसने भी शासन बदलने के लिए अनगिनत धरने और प्रदर्शन किए थे। “सत्ता परिवर्तन तो जरूर होगा। हम सभी सत्ता परिवर्तन चाहते हैं। क्या इसमें कुछ गलत है?” उन्होंने सवाल किया कि जब सत्ताधारी दल स्वयं ऐसे आंदोलनों के जरिए आगे बढ़ा, तो आज विपक्ष या आम नागरिकों की ऐसी ही लोकतांत्रिक मांगों को किसी षड्यंत्र का हिस्सा क्यों बताया जा रहा है। चुनाव आयोग की प्रक्रिया और दिल्ली में कड़े सुरक्षा प्रतिबंध प्रशांत भूषण का यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के मतदाता सूची से जुड़े ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ यानी एसआईआर (SIR) कार्यक्रम को लेकर राजनीतिक माहौल गर्माया हुआ है। इस प्रक्रिया के विरोध में राजधानी में कई संगठन और विपक्षी दल सड़क पर उतरे हैं। इसी क्रम में कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने भी प्रशासन द्वारा दिल्ली में लागू किए गए बेहद कड़े सुरक्षा इंतजामों और पाबंदियों की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि विरोध जता रहे छात्रों, नेताओं और प्रदर्शनकारियों के लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने के लिए प्रशासन ने अत्यधिक बल प्रयोग और सख्ती का रास्ता अपनाया है। इसका आप पर असर यह बयान देश में राजनीतिक असहमति और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के कानूनी अधिकारों को रेखांकित करता है। • भारत में: नागरिकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार स्पष्ट होता है। इससे यह साफ होता है कि बिना हिंसा के सरकार की नीतियों का विरोध करना कानूनन वैध है। • दिल्ली में: राजधानी में चल रहे विभिन्न प्रदर्शनों पर सुरक्षा व्यवस्था की चर्चा तेज होगी। प्रदर्शनकारियों और छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पर प्रशासनिक जवाबदेही की मांग बढ़ेगी। • मतदाताओं पर: मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर चल रहे विवाद से नागरिकों में जागरूकता बढ़ेगी। लोग अपनी प्रविष्टियों की जांच करने के प्रति अधिक सतर्क होंगे। • कानूनी समझ: आम जनता को राजद्रोह और असहमति के बीच का कानूनी अंतर समझने में मदद मिलेगी। इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे को लेकर स्पष्टता आएगी। ऐसा क्यों हुआ यह बयान मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्यक्रम के विरोध प्रदर्शनों के दौरान आया। • सीईसी और चुनाव आयोग का विरोध: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम को लेकर विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं। इसी सिलसिले में राजधानी दिल्ली में बड़े पैमाने पर धरने आयोजित किए जा रहे हैं। • सुरक्षा पाबंदियां और कार्रवाई: प्रदर्शनों के दौरान प्रशासन द्वारा दिल्ली में कड़ी सुरक्षा पाबंदियां लागू की गईं। छात्रों, प्रदर्शनकारियों और नेताओं के खिलाफ सख्त कदम उठाने से नाराजगी बढ़ी। • सत्ता परिवर्तन पर आरोप-प्रत्यारोप: सत्ताधारी दल ने विपक्ष पर सरकार गिराने की साजिश का आरोप लगाया। इसी के जवाब में प्रशांत भूषण ने यह तर्क दिया कि शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता बदलने की मांग करना संवैधानिक रूप से वैध है। सवाल-जवाब 1. प्रशांत भूषण ने सत्ता परिवर्तन को लेकर क्या कहा? प्रशांत भूषण ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार बदलने की मांग करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और इसमें कुछ भी गलत या गैर-कानूनी नहीं है। 2. राजद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट के किस रुख का जिक्र किया गया? उन्होंने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने औपनिवेशिक राजद्रोह कानून को असंवैधानिक माना था और कहा था कि बिना हिंसा के असंतोष जताना अपराध नहीं है। 3. दिल्ली में विरोध प्रदर्शन किस मुद्दे को लेकर हो रहे हैं? प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम के खिलाफ हो रहे हैं। 4. अभिजीत दिपके ने प्रशासन पर क्या आरोप लगाए? अभिजीत दिपके ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने प्रदर्शनकारी छात्रों और नेताओं के खिलाफ अत्यधिक सख्त सुरक्षा पाबंदियां लगाई हैं। https://trendkia.com/national/sarakara-badalane-ki-manga-janata-ka-snvaidhanika-adhikara-vipaksha-ki-avaja-dabana-galata-prashant-bhushan-47789 TrendKia — Har trend, sabse pehle.