# सिकंदराबाद का हस्मतपेट केर्न्स बना कूड़ाघर, तीन हजार साल पुरानी पुरातात्विक धरोहर पर उपेक्षा का संकट

> सिकंदराबाद के हस्मतपेट में स्थित लगभग 2,500 से 3,000 साल पुराना लौह युग का महापाषाण कालीन स्थल आज प्रशासनिक अनदेखी और कचरे के अंबार के बीच अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-09-30 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/secunderabad-ka-hashmatpet-cairns-bana-kuraghara-tina-hajara-sala-purani-puratatvika-dharohara-para-upeksha-ka-snkata-40323 · **Language:** Hindi
**Tags:** हस्मतपेट केर्न्स, हैदराबाद इतिहास, सिकंदराबाद, महापाषाण काल, पुरातत्व विभाग, धरोहर संरक्षण, तेलंगाना

तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद की ऐतिहासिक पहचान केवल मध्यकालीन चारमीनार अथवा भव्य गोलकोंडा किले तक सीमित नहीं है, बल्कि इस क्षेत्र की जड़ें हजारों वर्ष पूर्व प्रागैतिहासिक काल से जुड़ी हुई हैं। सिकंदराबाद के समीप हस्मतपेट इलाके में मौजूद महापाषाण कालीन स्थल हस्मतपेट केर्न्स इस प्राचीन सभ्यता का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करता है। लगभग 2,500 से लेकर 3,000 वर्ष प्राचीन यह स्थल वर्तमान समय में स्थानीय लोगों की असावधानी और प्रशासनिक उदासीनता के चलते एक अनाधिकृत कचरा स्थल में तब्दील हो चुका है।

## लौह युग की अनोखी अंत्येष्टि परंपरा और केर्न सर्किल
इतिहास विशेषज्ञ रमेश विनेयक के अनुसार, यह स्थान लौह युग से संबंधित एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंत्येष्टि अथवा कब्रगाह क्षेत्र है। उस कालखंड में समाज के लोगों द्वारा मृतकों के पार्थिव अवशेषों को बड़े ग्रेनाइट पाषाण खंडों से निर्मित डोलमेन के भीतर सुरक्षित रखा जाता था। इसके पश्चात उस संरचना के चारों ओर विशालकाय ग्रेनाइट के पत्थरों से एक सुव्यवस्थित गोलाकार घेरा तैयार किया जाता था, जिसे पुरातात्विक भाषा में केर्न सर्किल का नाम दिया गया है। तत्कालीन समाज में मरणोपरांत परलोक जीवन की प्रबल मान्यता थी, जिसके चलते शवों के साथ विशेष प्रकार के मिट्टी के बर्तन, लोहे के अस्त्र-शस्त्र एवं दैनिक उपयोग के औजार भी दफना दिए जाते थे।

## उत्खनन का इतिहास और बहुमूल्य पुरातात्विक साक्ष्य
इस ऐतिहासिक पुरातात्विक धरोहर की प्रारंभिक पहचान उन्नीसवीं सदी में हुई थी। इसके बाद 1930 के दशक में हैदराबाद के तत्कालीन निजाम के पुरातत्व विभाग द्वारा इस परिसर में विधिवत खुदाई का कार्य संपन्न कराया गया। कालांतर में 1970 के दशक और तत्पश्चात वर्ष 2001 में किए गए पुरातात्विक उत्खनन अभियानों के दौरान यहाँ की भूमि से मानव कंकाल, टेराकोटा से निर्मित मृदभांड तथा लोहे के विभिन्न औजार प्राप्त हुए थे। इन महत्वपूर्ण साक्ष्यों ने हैदराबाद के प्रागैतिहासिक जीवन चक्र और प्राचीन विकासक्रम को समझने में ऐतिहासिक दस्तावेज का कार्य किया।

## शहरीकरण, अतिक्रमण और कचरे का अंबार
सहस्राब्दियों पुराने गौरवशाली इतिहास के बावजूद वर्तमान समय में इस धरोहर की दशा अत्यंत दयनीय बनी हुई है। यद्यपि प्राचीन संरचना के ऊपर एक सुरक्षात्मक टीन शेड लगाया गया है, लेकिन उसके चारों तरफ भारी मात्रा में प्लास्टिक की थैलियां, घरेलू अपशिष्ट, खाली बोतलें और निर्माण कार्य का मलबा पसरा हुआ है। सुदृढ़ बाउंड्री और निरंतर देखरेख के अभाव में आसपास के निवासी इसे खुले कूड़ेदान की तरह उपयोग कर रहे हैं। इसके साथ ही, सिकंदराबाद के इस क्षेत्र में तेजी से फैल रहे अनियंत्रित शहरीकरण के कारण संरक्षित जमीन पर अवैध कब्जे और अतिक्रमण की आशंका लगातार गंभीर रूप ले रही है।

## धरोहर संरक्षण और सुरक्षा घेरे की मांग
क्षेत्रीय विरासत के प्रति संवेदनशील नागरिकों और इतिहास प्रेमियों का स्पष्ट मत है कि यह भूभाग पूरे शहर की सबसे प्राचीन बस्तियों और मानव सभ्यताओं की एकमात्र जीवित निशानी है। यदि संबंधित पुरातत्व विभाग अथवा स्थानीय नगर प्रशासन ने त्वरित संरक्षण कार्य आरंभ नहीं किया, तो भविष्य की पीढ़ियां अपने इस अनमोल पुरातात्विक अध्याय को सदा के लिए खो देंगी। नागरिकों ने मांग उठाई है कि सबसे पहले पूरे इलाके से कचरे का त्वरित निस्तारण कराया जाए, परिसर के चारों ओर एक मजबूत चारदीवारी का निर्माण हो, इतिहास को दर्शाने वाले स्पष्ट सूचना बोर्ड लगाए जाएं तथा स्थल की चौबीसों घंटे निगरानी के लिए सुरक्षाकर्मियों की तैनाती सुनिश्चित की जाए।

## इसका आप पर असर
सिकंदराबाद में प्राचीन पुरातात्विक स्थल की दुर्दशा नागरिक स्वच्छता, पर्यावरण और ऐतिहासिक पहचान को सीधे प्रभावित करती है।

- **भारत में:** यह घटना देश भर में असुरक्षित प्रागैतिहासिक स्मारकों की सुरक्षा और नीतिगत प्रबंधन की खामियों को दर्शाती है। यदि केंद्रीय और राज्य स्तर पर ऐसी धरोहरों की तारबंदी नहीं होती, तो प्राचीन सभ्यता के प्रमाण नष्ट हो जाएंगे।
- **सिकंदराबाद और हैदराबाद में:** हस्मतपेट के आसपास खुले में कचरा फेंकने से स्थानीय निवासियों के लिए दुर्गंध और संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। इसके साथ ही बेलगाम अतिक्रमण और गंदगी के कारण यह ऐतिहासिक भूभाग अपनी पुरातात्विक पहचान खोने की कगार पर पहुंच गया है।
- **छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए:** लौह युग के इस शोध केंद्र की बर्बादी से इतिहास के विद्यार्थियों को प्रत्यक्ष अध्ययन सामग्री से वंचित होना पड़ेगा। स्थल की उचित देखरेख और सूचना बोर्ड होने पर यह एक शैक्षिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो सकता था।
- **नागरिक समाज और प्रशासन के लिए:** स्थानीय निकाय को कचरा डंपिंग रोकने के लिए तत्काल निगरानी तंत्र और नियमित सफाई लागू करनी होगी। आसपास के लोगों को इस धरोहर के महत्व के प्रति जागरूक कर स्वच्छता बनाए रखने की सीधी जिम्मेदारी लेनी होगी।

## ऐसा क्यों हुआ
सिकंदराबाद के हस्मतपेट में इस प्राचीन ऐतिहासिक धरोहर के कूड़ाघर में बदलने के पीछे नागरिक लापरवाही और दीर्घकालिक प्रशासनिक अनदेखी मुख्य कारण है। इस महत्वपूर्ण स्थल की आवश्यक सुरक्षा और प्रबंधन व्यवस्था लंबे समय से अनुपस्थित रही है।

- **संरक्षण और बाउंड्री का अभाव:** स्मारक के चारों तरफ कोई मजबूत स्थायी चारदीवारी या प्रभावी सुरक्षा घेरा नहीं बनाया गया था। केवल एक साधारण टीन शेड खड़ा कर देने से खुला परिसर आसपास के लोगों के लिए अनियंत्रित डंपिंग यार्ड बन गया।
- **कचरा प्रबंधन तंत्र की विफलता:** स्थानीय निकाय द्वारा क्षेत्र में पर्याप्त कचरा संग्रहण व्यवस्था या नियमित डस्टबिन उपलब्ध न कराए जाने से घरेलू कचरा सीधे खुले ऐतिहासिक स्थल पर फेंका जाने लगा। सुरक्षाकर्मियों की अनुपस्थिति के कारण कचरा फेंकने वालों पर कोई जुर्माना या निगरानी नहीं रही।
- **शहरीकरण का भारी दबाव:** हैदराबाद और सिकंदराबाद के विस्तार के साथ आसपास तेजी से बस्तियां बस गईं, जिससे भूमि अतिक्रमण की आशंका बढ़ी। पुरातत्व विभाग द्वारा सूचना बोर्ड न लगाए जाने से नई आबादी को इस स्थल के 3,000 साल पुराने महत्व की जानकारी ही नहीं हो सकी।

## सवाल-जवाब

### 1. हस्मतपेट केर्न्स किस ऐतिहासिक काल से संबंधित है?
यह स्थल लगभग 2,500 से 3,000 साल पुराना है और लौह युग के महापाषाण काल से संबंधित है।

### 2. हस्मतपेट में केर्न सर्किल का निर्माण किस उद्देश्य से किया गया था?
यह एक अंत्येष्टि स्थल था जहां मृतकों के अवशेष डोलमेन में रखकर चारों ओर बड़े ग्रेनाइट पत्थरों का गोलाकार घेरा बनाया जाता था।

### 3. इस स्थल पर ऐतिहासिक उत्खनन कब-कब हुआ?
इसकी खोज 19वीं सदी में हुई, जिसके बाद 1930 के दशक, 1970 के दशक और वर्ष 2001 में यहाँ खुदाई कराई गई।

### 4. खुदाई के दौरान यहाँ से कौन से प्राचीन अवशेष प्राप्त हुए थे?
उत्खनन के दौरान मानव कंकाल, टेराकोटा के मिट्टी के बर्तन तथा लोहे के हथियार और औजार बरामद हुए थे।

### 5. वर्तमान में हस्मतपेट केर्न्स की स्थिति क्या है?
देखरेख और सुरक्षा घेरे के अभाव में यह प्राचीन स्थल घरेलू कचरे, मलबे और प्लास्टिक से भरे कूड़ेदान में तब्दील हो चुका है।

### 6. धरोहर संरक्षकों और स्थानीय लोगों की मुख्य मांगें क्या हैं?
लोग परिसर की तत्काल सफाई, मजबूत चारदीवारी का निर्माण, सूचना बोर्ड लगाने और सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की मांग कर रहे हैं।

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