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  "type": "article",
  "title": "शादी से पहले लिव-इन और बच्चे की सच्चाई छिपाना कानूनी अपराध, केरल उच्च न्यायालय ने खारिज की अग्रिम जमानत",
  "summary": "केरल उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि पहले से मौजूद रिश्ते और बच्चे की बात छिपाकर शारीरिक संबंध बनाना भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के तहत धोखे की श्रेणी में आता है। अदालत ने मामले के आरोपी को पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।",
  "content": "विवाह का रिश्ता तय होने के पश्चात अपनी भावी जीवनसंगिनी से पहले से चल रहे लिव-इन संबंध तथा उससे जन्मे बच्चे की सच्चाई को छिपाना अब कानूनन भारी पड़ सकता है। केरल उच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह व्यवस्था दी है कि यदि कोई व्यक्ति इस प्रकार की अहम व्यक्तिगत जानकारियों को दबाकर महिला के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करता है, तो यह कृत्य पहली नजर में भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के तहत कपटपूर्ण साधनों द्वारा बनाए गए यौन संबंध के दायरे में आता है। अदालत ने इस आधार पर आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका पूरी तरह निरस्त कर दी और उसे जांच अधिकारी के सामने पेश होने का आदेश दिया।\n\n \n\nअदालत का रुख और अग्रिम जमानत याचिका का निपटारा\n\nयह महत्वपूर्ण आदेश न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन की एकल पीठ ने कोझिकोड जिले के फेरोक पुलिस स्टेशन में दर्ज आपराधिक मामले से जुड़ी अपील की सुनवाई के दौरान जारी किया। आरोपी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, अदालत ने मामले के तथ्यों और महिला द्वारा लगाए गए आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उसे किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार कर दिया। पीठ ने आरोपी को निर्देश दिया कि वह तुरंत संबंधित जांच अधिकारी के समक्ष जाकर विधिवत आत्मसमर्पण करे, ताकि मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ सके।\n\n \n\nसगाई में खर्च हुए थे लाखों रुपये, छिपाया गया पुराना संबंध\n\nदर्ज कराई गई शिकायत के विवरण के अनुसार, आरोपी और शिकायतकर्ता महिला के बीच शादी की बात पक्की हुई थी। पीड़ित महिला अनुसूचित जाति समुदाय से संबंध रखती है। दोनों पक्षों की सहमति के बाद पारिवारिक स्तर पर विवाह से जुड़ी पारंपरिक रस्में भी पूरी की गई थीं। महिला के परिजनों ने इस पूरे आयोजन पर लगभग 10 लाख रुपये खर्च किए थे। महिला का गंभीर आरोप है कि सगाई और बातचीत के इस पूरे दौर में आरोपी ने अपने जीवन से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य को गुप्त रखा। आरोपी पहले से ही किसी अन्य महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा था और उस संबंध से उसका तीन साल का एक बच्चा भी था। शिकायतकर्ता का तर्क है कि यदि यह सच्चाई उसके सामने पहले उजागर कर दी जाती, तो वह विवाह और रिश्ते के संदर्भ में अपना निर्णय पूरी तरह अलग ले सकती थी।\n\n \n\nसगाई के उपरांत वायनाड की यात्रा और शारीरिक संबंध\n\nशिकायत में बताया गया है कि विवाह तय हो जाने के बाद महिला आरोपी के कहने पर उसके साथ वायनाड गई थी। वहां दोनों एक होटल में ठहरे। महिला का आरोप है कि उसी दौरान आरोपी ने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। महिला ने यह भी साफ किया कि उसने यह सहमति केवल इसलिए दी थी क्योंकि दोनों का विवाह पक्का हो चुका था और उसे रिश्ते के भविष्य पर पूरा भरोसा था। इसके बाद सच्चाई सामने आने पर फेरोक पुलिस स्टेशन में आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4), धारा 69 और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(va) के तहत विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया गया।\n\n \n\nआरोपी की दलील: शादी से इनकार नहीं, इसलिए धारा 69 नहीं बनती\n\nअदालत की कार्यवाही के दौरान आरोपी के वकील ने तर्क प्रस्तुत किया कि इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 का प्रावधान लागू नहीं होना चाहिए। बचाव पक्ष की दलील थी कि कानून की यह धारा मुख्य रूप से उन परिस्थितियों में लागू होती है जहां कोई व्यक्ति विवाह का झूठा वादा करके महिला के साथ संबंध बनाता है और बाद में शादी करने से साफ मुकर जाता है। आरोपी का कहना था कि वह महिला के साथ विवाह करने के लिए तैयार था और उसने शादी से पीछे हटने की कोई बात नहीं की थी, इसलिए उसके आचरण को धारा 69 के अंतर्गत अपराध नहीं माना जा सकता।\n\n \n\nकेरल उच्च न्यायालय की व्याख्या: केवल शादी का वादा ही आधार नहीं\n\nन्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज करते हुए भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के कानूनी ढांचे को विस्तार से समझाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 69 के तहत अपराध बनने की दो अलग-अलग स्वतंत्र स्थितियां होती हैं। पहली स्थिति तब उत्पन्न होती है जब यौन संबंध के लिए सहमति कपटपूर्ण साधनों या धोखे के जरिए हासिल की गई हो। दूसरी स्थिति वह होती है जहां शादी का ऐसा झूठा वादा किया गया हो जिसे निभाने का शुरुआत से कोई इरादा ही न रहा हो और उसी भरोसे पर संबंध बनाए गए हों।\n\nअदालत ने रेखांकित किया कि मौजूदा मामले में लगे आरोप पहली श्रेणी के तहत आते हैं। न्यायालय के अनुसार, आरोपी का केवल यह कह देना पर्याप्त बचाव नहीं हो सकता कि वह विवाह के लिए तैयार था। यदि शारीरिक संबंध के लिए सहमति लेते समय उसने अपने पहले से चल रहे लिव-इन संबंध और तीन साल के बच्चे की बात जानबूझकर छिपाई, तो प्रथम दृष्टया यह छल और धोखे से सहमति प्राप्त करने का मामला बनता है।\n\n \n\nसहमति का आधार और वैवाहिक स्थिति की मान्यता\n\nन्यायालय ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि जब विवाह के लिए बातचीत तय हुई थी, तब शिकायतकर्ता और उसके परिवार ने यह स्वाभाविक रूप से मान लिया था कि आरोपी अविवाहित है तथा वह किसी अन्य वैवाहिक जैसी प्रकृति के रिश्ते में शामिल नहीं है। इसी बुनियादी भरोसे पर वैवाहिक कार्यक्रम आयोजित किए गए और 10 लाख रुपये का भारी खर्च किया गया। बाद में इन बेहद अहम जानकारियों को छिपाकर शारीरिक संबंध स्थापित किए गए, जो प्राथमिक दृष्टि से धारा 69 के अपराध को आकर्षित करते हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि इस कृत्य को बलात्कार के रूप में नहीं देखा जा रहा है, लेकिन उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह छलपूर्ण तरीके से संबंध बनाने के कानूनी दायरे में पूरी तरह आता है।\n\n \n\nएससी/एसटी अधिनियम के तहत दर्ज मामला और निर्णय का दायरा\n\nचूंकि पीड़िता अनुसूचित जाति समुदाय से ताल्लुक रखती है, इसलिए इस मामले में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(2)(va) भी जोड़ी गई है। इसी कड़े कानून के प्रावधानों के चलते आरोपी ने उच्च न्यायालय से अग्रिम जमानत की गुहार लगाई थी। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल प्राथमिक आरोपों और अग्रिम जमानत के बिंदु पर आधारित है। इसे मुकदमे का अंतिम निष्कर्ष या आरोपी की पूर्ण दोषसिद्धि नहीं माना जाना चाहिए। तथ्यों और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने माना कि प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध बनता है, जिसके चलते अग्रिम जमानत की याचिका खारिज करते हुए आरोपी को पुलिस के समक्ष समर्पण करने के निर्देश दिए गए।\n\nइसका आप पर असर\nयह अदालती निर्णय वैवाहिक वार्ताओं और सहमति के कानूनी मानकों को स्पष्ट करते हुए उन लोगों के लिए सख्त मिसाल पेश करता है जो अहम निजी सच्चाइयों को दबाते हैं।\n\n• भारत में: विवाह तय होने के दौरान अपने पूर्व संबंधों अथवा बच्चों की जानकारी छिपाकर शारीरिक निकटता बनाना अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के तहत गंभीर कानूनी अपराध माना जाएगा। जो लोग शादी के नाम पर पारिवारिक सच छिपाते हैं, उनके खिलाफ बिना किसी छूट के कठोर आपराधिक कार्रवाई और गिरफ्तारी हो सकती है।\n• केरल में: कोझिकोड के इस मामले में उच्च न्यायालय के कड़े रुख के बाद राज्य भर की पुलिस जांच एजेंसियों को ऐसे मामलों में एससी/एसटी एक्ट और बीएनएस के तहत त्वरित कार्रवाई करने का स्पष्ट आधार मिला है। इससे विवाह से जुड़े विवादों में अग्रिम जमानत हासिल करना आरोपियों के लिए बेहद मुश्किल हो गया है।\n• पारिवारिक स्तर पर: वैवाहिक बातचीत में पारदर्शिता न बरतने वाले व्यक्तियों के खिलाफ वित्तीय नुकसान और भावनात्मक धोखे दोनों आधारों पर कानूनी शिकंजा कसा जा सकता है। पीड़ित पक्षों के पास अब विवाह की रस्मों में हुए लाखों के खर्च और धोखे की भरपाई के लिए मजबूत कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं।\n• युवाओं के लिए: किसी रिश्ते में दी जाने वाली सहमति पूर्ण पारदर्शिता पर आधारित होनी चाहिए और तथ्यों को छिपाकर ली गई सहमति को कानूनन अमान्य माना जाएगा। इस फैसले के बाद संबंध बनाने से पहले अपनी स्थिति स्पष्ट न करना सीधे तौर पर गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में खड़ा कर सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब विवाह तय होने के बाद आरोपी ने अपनी पुरानी जिंदगी की अहम सच्चाइयों को पूरी तरह छिपाए रखा। शारीरिक संबंध और सगाई के बाद जब सच्चाई सामने आई तो पीड़िता ने औपचारिक पुलिस प्राथमिकी दर्ज कराई।\n\n• सच्चाई का जानबूझकर छिपाव: आरोपी ने अपनी पूर्व लिव-इन साथी और तीन साल के बच्चे के अस्तित्व को छुपाए रखते हुए महिला के साथ शादी की बात पक्की की। इसी बुनियादी धोखे के आधार पर महिला को विश्वास में लेकर वायनाड के एक होटल में संबंध बनाए गए।\n• सहमति में कपटपूर्ण साधनों का उपयोग: शिकायतकर्ता ने स्पष्ट किया कि उसने शारीरिक संबंध के लिए सहमति केवल विवाह के पक्के भरोसे के आधार पर दी थी। कानून के अनुसार तथ्यों को जानबूझकर छिपाकर ली गई ऐसी सहमति धोखे से हासिल की गई मानी जाती है।\n• कानून की नई व्याख्या: भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 केवल शादी से मुकरने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कपटपूर्ण तरीकों से संबंध बनाने को भी दंडनीय बनाती है। उच्च न्यायालय ने इसी धारा के विस्तृत दायरे को रेखांकित करते हुए आरोपी की दलीलों को खारिज कर दिया।\n• जांच और गिरफ्तारी की जरूरत: महिला के अनुसूचित जाति वर्ग से होने के कारण एससी/एसटी एक्ट की धाराएं भी जुड़ी हुई हैं। आरोपों की गंभीरता और जांच को निष्पक्ष बनाए रखने के लिए अदालत ने आरोपी को राहत न देकर पुलिस के सामने समर्पण करने का आदेश दिया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. केरल उच्च न्यायालय ने किस मामले में आरोपी की अग्रिम जमानत खारिज की?\nअदालत ने शादी तय होने के बाद अपने पूर्व लिव-इन रिश्ते और तीन साल के बच्चे की बात छिपाकर संबंध बनाने के मामले में आरोपी की अग्रिम जमानत खारिज की।\n\n2. इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की कौन सी धाराएं लगाई गई हैं?\nइस मामले में बीएनएस की धारा 69 और धारा 318(4) के साथ-साथ एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(va) दर्ज की गई है।\n\n3. आरोपी ने अदालत में अपने बचाव में क्या दलील पेश की थी?\nआरोपी ने दलील दी कि वह महिला से शादी करने को तैयार था, इसलिए शादी का वादा तोड़ने से संबंधित धारा 69 उस पर लागू नहीं होती।\n\n4. उच्च न्यायालय ने बीएनएस की धारा 69 को लेकर क्या स्पष्टीकरण दिया?\nअदालत ने कहा कि धारा 69 केवल शादी का झूठा वादा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि जानबूझकर तथ्य छिपाकर धोखे से सहमति हासिल करने पर भी लागू होती है।\n\n5. महिला के परिवार ने विवाह कार्यक्रम पर कितना खर्च किया था?\nशिकायत के अनुसार दोनों परिवारों के बीच आयोजित रस्मों पर महिला के परिवार ने करीब 10 लाख रुपये खर्च किए थे।\n\n6. यह मामला किस पुलिस स्टेशन में दर्ज कराया गया है?\nयह आपराधिक मामला कोझिकोड जिले के फेरोक पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया है।",
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  "category": "भारत",
  "publishedAt": "2026-10-07",
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