# शाहजहांपुर के धान खेतों पर मंडराया झंडा रोग का साया, 50 फीसदी तक फसल बर्बादी से बचने के उपाय जानें

> शाहजहांपुर के धान खेतों में फ्यूजेरियम फ्यूजीकुरोई फंगस के कारण झंडा रोग का प्रकोप तेजी से फैल रहा है, जिससे फसल पैदावार 20 से 50 प्रतिशत तक घटने का खतरा है। कृषि विशेषज्ञों और प्रगतिशील किसानों ने तत्काल बचाव के लिए सही फंगीसाइड छिड़काव और यूरिया का इस्तेमाल रोकने की सलाह दी है।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-08-06 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/shahjahanpur-ke-dhana-kheton-para-mndaraya-jhnda-roga-ka-saya-50-phisadi-taka-phasala-barbadi-se-bachane-ke-upaya-janen-14187 · **Language:** Hindi
**Tags:** धान की खेती, झंडा रोग, शाहजहांपुर कृषि, फसल सुरक्षा, फंगीसाइड उपचार, बीज शोधन

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में धान उत्पादक किसानों के लिए 'झंडा रोग' एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। मानसूनी सीजन में खेतों में लहराती धान की फसल के बीच अचानक पौधे असामान्य रूप से लंबे और हल्के पीले रंग के दिखाई देने लगे हैं। दूर से देखने पर ये संक्रमित पौधे झंडे की भांति नजर आते हैं, जिसके कारण इसे स्थानीय स्तर पर झंडा रोग कहा जाता है। यह फंगल संक्रमण यदि समय पर नियंत्रित न किया जाए तो पूरी फसल को सुखाकर नष्ट कर सकता है। कृषि विशेषज्ञों का आकलन है कि इस बीमारी के चलते फसल की उपज में 20 से 50 प्रतिशत तक की सीधी गिरावट दर्ज की जा सकती है। नुकसान से बचने के लिए किसानों को तुरंत प्रभाव से सतर्कता बरतने और रोकथाम के वैज्ञानिक उपाय अपनाने के निर्देश दिए गए हैं।

## झंडा रोग के मुख्य लक्षण और पहचान का तरीका
धान के खेतों में झंडा रोग की समय पर पहचान करना बेहद जरूरी है ताकि शुरुआती चरण में ही संक्रमण को नियंत्रित किया जा सके। इस रोग का सबसे स्पष्ट संकेत यह है कि प्रभावित पौधे सामान्य और स्वस्थ पौधों की तुलना में काफी तेजी से लंबाई पकड़ते हैं, लेकिन वे बेहद पतले और कमजोर बने रहते हैं। इन पौधों की पत्तियां धीरे-धीरे अपना गहरा हरा रंग खोकर हल्की पीली पड़ने लगती हैं। ध्यान से देखने पर तने के निचले हिस्से तथा जड़ों के करीब सफेद या हल्के गुलाबी रंग की फंगस जमी हुई साफ दिखाई देती है। जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता है, पौधे का अंदरूनी तना खोखला होने लगता है और अंततः पौधा गिरकर सूख जाता है। इसके अतिरिक्त, संक्रमित पौधों में या तो बालियां निकलती ही नहीं हैं, और यदि बालियां बनती भी हैं तो वे बेहद हल्की, दाना रहित और बांझ रह जाती हैं।

## संक्रमण का कारण और तत्काल उठाए जाने वाले कदम
प्रगतिशील युवा किसान रनजोद सिंह के अनुसार, यह बीमारी 'फ्यूजेरियम फ्यूजीकुरोई' नामक हानिकारक फंगस के कारण फैलती है। यदि खेत में झंडा रोग के लक्षण दिखाई देने लगें, तो किसानों को बिना देरी किए कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले संक्रमित पौधों को सावधानीपूर्वक जड़ समेत उखाड़ लेना चाहिए और उन्हें खेत से दूर किसी गहरे गड्ढे में दबा देना चाहिए या जलाकर नष्ट कर देना चाहिए। इसके बाद खेत में भरे अतिरिक्त पानी को तुरंत बाहर निकालना अनिवार्य है, क्योंकि खेत में जमा पानी इस फंगस के बीजाणुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक फैलाने में मुख्य भूमिका निभाता है। पानी निकालने के बाद मिट्टी को हल्का सूखने दें। इसके साथ ही, खेत में नाइट्रोजन यानी यूरिया उर्वरक का प्रयोग पूरी तरह बंद कर देना चाहिए। यूरिया के अधिक उपयोग से पौधों की असामान्य लंबाई और तेजी से बढ़ती है, जिससे बीमारी का असर और अधिक भयंकर हो जाता है।

## रासायनिक एवं जैविक फंगीसाइड का सही इस्तेमाल
झंडा रोग के फैलाव को रोकने के लिए सही फंगीसाइड का समय पर छिड़काव करना अत्यंत कारगर साबित होता है। रोग की रोकथाम के लिए प्रति लीटर पानी में 2 ग्राम कार्बेंडाजिम 12% + मैनकोजेब 63% डब्ल्यूपी (जैसे साफ) मिलाकर पत्तियों पर अच्छी तरह छिड़काव करना चाहिए। इसके विकल्प के रूप में ट्राइसाइक्लाजोल का घोल भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि खेत में संक्रमण का प्रकोप अधिक गंभीर रूप ले चुका हो, तो टेबूकोनाज़ोल और ट्राइफ्लॉक्सीस्ट्रोबिन के संयोजन का उपयोग करना अधिक परिणामदायक रहता है। जो किसान जैविक खेती पद्धतियों को प्राथमिकता देते हैं, वे सिंचाई के पानी के साथ 2 से 3 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से ट्राइकोडर्मा को अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर प्रयोग कर सकते हैं। यह जैविक फंगस मिट्टी में मौजूद नुकसानदेह फंगस को नष्ट करने में मदद करती है।

## भविष्य में बचाव के लिए बीज शोधन और फसल चक्र
धान की फसल को झंडा रोग से स्थायी सुरक्षा प्रदान करने के लिए सबसे प्रभावी रणनीति बुवाई के दौरान ही अपनाई जाती है। बुवाई से पूर्व प्रति किलोग्राम धान के बीज को 2 से 3 ग्राम ट्राइकोडर्मा या कार्बेंडाजिम रसायन से उपचारित करना अनिवार्य है। पौधशाला यानी नर्सरी तैयार करते समय तथा मुख्य खेत में रोपाई के वक्त पौधों की जड़ों को कम से कम 30 मिनट तक फंगीसाइड के घोल में डुबोकर ही लगाना चाहिए। इसके अलावा, किसानों को हमेशा रोग-प्रतिरोधी धान किस्मों का ही चयन करना चाहिए। खेत की मिट्टी में मौजूद हानिकारक फंगल बीजाणुओं को पूरी तरह खत्म करने के लिए हर साल एक ही खेत में लगातार धान उगाने के बजाय फसल चक्र अपनाना बेहद फायदेमंद होता है।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** देश भर के धान किसानों को बीज शोधन और जल प्रबंधन अपनाकर फ्यूजेरियम फंगस से होने वाले 20 से 50 प्रतिशत तक के पैदावार नुकसान से फसल को बचाने में मदद मिलेगी।

**शाहजहांपुर में:** शाहजहांपुर और आसपास के जिलों के किसानों को धान में असामान्य लंबाई दिखने पर तुरंत यूरिया का प्रयोग रोककर और साफ या ट्राइकोडर्मा फंगीसाइड का छिड़काव कर अपनी फसल सुर‌क्षित करनी चाहिए।

## सवाल-जवाब

### 1. धान की फसल में झंडा रोग क्या है?
झंडा रोग (बाकानाए) फ्यूजेरियम फ्यूजीकुरोई फंगस के कारण होने वाली एक बीमारी है, जिसमें धान के पौधे असामान्य रूप से लंबे, पतले और हल्के पीले हो जाते हैं और अंततः सूख जाते हैं।

### 2. झंडा रोग से धान की पैदावार पर कितना असर पड़ता है?
यदि समय पर रोकथाम न की जाए, तो झंडा रोग के कारण धान की कुल उपज में 20 से 50 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आ सकती है।

### 3. झंडा रोग दिखने पर खेत में तुरंत क्या उपाय करने चाहिए?
संक्रमित पौधों को जड़ से उखाड़कर खेत से दूर दबा दें या जला दें, खेत का अतिरिक्त पानी बाहर निकालें और यूरिया का उपयोग तुरंत रोक दें।

### 4. झंडा रोग के इलाज के लिए कौन सा फंगीसाइड छिड़कना चाहिए?
प्रति लीटर पानी में 2 ग्राम कार्बेंडाजिम + मैनकोजेब (साफ) या ट्राइसाइक्लाजोल मिलाकर छिड़काव करें। गंभीर स्थिति में टेबूकोनाज़ोल + ट्राइफ्लॉक्सीस्ट्रोबिन का प्रयोग करें।

### 5. भविष्य की फसलों को झंडा रोग से कैसे बचाया जा सकता है?
बुवाई से पहले प्रति किलो बीज को 2-3 ग्राम ट्राइकोडर्मा या कार्बेंडाजिम से उपचारित करें, रोपाई से पहले जड़ों को फंगीसाइड घोल में 30 मिनट डुबोएं और फसल चक्र अपनाएं।

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