संसदीय व विधानसभा सीटों के रोटेशन पर शीर्ष अदालत सख्त, संसद के पाले में डाली गेंद सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षित चुनावी क्षेत्रों के चक्रीय बदलाव की मांग वाली अर्जी ठुकराते हुए स्पष्ट किया कि नीतिगत बदलाव केवल संसद का काम है, न्यायपालिका का नहीं। देश में अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के लिए निर्धारित चुनावी क्षेत्रों में समय-समय पर चक्रीय बदलाव यानी रोटेशन लागू कराने के प्रयास को न्यायिक मंच पर कामयाबी नहीं मिली। शीर्ष अदालत की खंडपीठ ने इस विषय पर दायर विशेष अनुमति याचिका पर विचार करने से स्पष्ट मना कर दिया। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता को याद दिलाया कि कानून गढ़ने अथवा मौजूदा संवैधानिक व्यवस्थाओं में संशोधन का विशेष अधिकार संसद और निर्वाचित सदनों के पास सुरक्षित है, जिस पर न्यायालय अपना नियंत्रण स्थापित नहीं कर सकता। अदालती कक्ष में रोचक संवाद और विरोध की सलाह सुनवाई आरंभ होते ही मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मामले को अदालती चौखट पर लाए जाने पर चुटीली प्रतिक्रिया दी। उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में वादी पक्ष के अधिवक्ता से कहा कि उन्होंने गलत जगह दस्तक दे दी है। मुख्य न्यायाधीश का कहना था कि देश में अपनी बात मनवाने के लिए यह दौर नारों और सार्वजनिक प्रदर्शनों का चल रहा है, लिहाजा उन्हें भी अपनी आवाज बुलंद करने के लिए यही रास्ता चुनना चाहिए। इस व्यंग्यात्मक टिप्पणी पर याचिकाकर्ता के वकील ने मुस्कुराते हुए असमर्थता जताई। वकील ने विनम्रतापूर्वक पीठ को बताया कि उनका धरना-प्रदर्शन करने का कोई मानस नहीं है और गले में खराबी होने की वजह से वे ऊंची आवाज में नारेबाजी करने की स्थिति में भी नहीं हैं। प्रधान न्यायाधीश ने इस पर चुटकी लेते हुए कहा कि वे जनप्रतिनिधियों के पास जाकर यह कह सकते हैं कि संसद के स्तर पर अब इस कानूनी ढांचे में तब्दीली का वक्त आ गया है। इस पूरे संवाद से पीठ ने यह साफ कर दिया कि चुनावी ढांचे में किसी बड़े सुधार के लिए न्यायपालिका पर निर्भर रहने के बजाय सांसदों और विधायकों को राजी करना ही उचित माध्यम है। उत्तर प्रदेश के कादीपुर निर्वाचन क्षेत्र से जुड़ा विवाद यह कानूनी लड़ाई उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में पड़ने वाले 191-कादीपुर विधानसभा क्षेत्र के निवासी जगदीश सिंह द्वारा शुरू की गई थी। याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उनका तर्क था कि देश के पहले आम चुनाव यानी वर्ष 1952 से लेकर आज तक कादीपुर सीट लगातार अनुसूचित जाति के प्रत्याशियों के लिए ही आरक्षित रखी गई है। वादी पक्ष का गंभीर आक्षेप था कि सात दशकों से अधिक समय तक किसी एक इलाके को आरक्षित सूची में बांधे रखने से स्थानीय राजनीति कुछ चुनिंदा प्रभावशाली घरानों तक सिमट कर रह गई है। याचिका में दावा किया गया कि बार-बार महज तीन से पांच परिवारों के सदस्य ही चुनावी मैदान में उतरते हैं, जिससे सामान्य वर्ग के साथ-साथ अन्य योग्य दावेदारों को विधायिका में पहुंचने का समान अवसर नहीं मिल पाता। याचिकाकर्ता ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 के तहत मिलने वाले मूल अधिकारों का हनन बताया। स्थानीय निकायों और विधायिका के नियमों में मौलिक अंतर याचिकाकर्ता के पैरोकार ने अपनी दलीलों को मजबूती देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 243D तथा 243T का सहारा लिया। इन प्रावधानों के जरिए ग्राम पंचायतों और शहरी नगर पालिकाओं में वार्डों और प्रमुख पदों के लिए आरक्षण को रोटेट करने की अनिवार्य व्यवस्था की गई है। वकील ने जोर देकर कहा कि जिस तरह जमीनी स्तर पर हर चुनाव में आरक्षित सीटें बदलती हैं, उसी न्यायसंगत सिद्धांत को संसद और राज्य विधानसभाओं के लिए भी अनिवार्य किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने इस तर्क से पूर्ण असहमति व्यक्त की। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्थानीय स्वशासन और देश की सर्वोच्च विधायी संस्थाओं के लिए संविधान निर्माताओं ने बिल्कुल अलग-अलग संरचनाएं तैयार की हैं। पंचायत चुनावों के नियम अपने आप सीधे संसदीय सीटों पर लागू नहीं किए जा सकते। पीठ ने टिप्पणी की कि अदालत संविधान के स्पष्ट अनुच्छेदों में अपनी तरफ से नई शर्तें या रोटेशन का नियम नहीं जोड़ सकती। न्यायाधीशों ने कहा कि वे किसी भी सूरत में संसद के तीसरे सदन की तरह काम नहीं करेंगे। मताधिकार और चुनावी भागीदारी पर अदालत का दृष्टिकोण कार्यवाही के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने मताधिकार के बुनियादी स्वरूप को रेखांकित किया। उन्होंने टिप्पणी की कि भले ही किसी हलके के आरक्षित होने से चुनाव लड़ने के इच्छुक उम्मीदवारों की सूची सीमित हो जाती है, किंतु इससे वहां के सामान्य नागरिकों का वोट डालने का बुनियादी अधिकार कतई समाप्त नहीं होता। मतदाता पूर्ववत अपने मताधिकार का इस्तेमाल करते हैं। पीठ ने इस धारणा को भी खारिज कर दिया कि बहुसंख्यक आबादी केवल जाति अथवा बिरादरी को देखकर ही मतदान करती है। न्यायमूर्ति बागची ने रेखांकित किया कि जीवंत बहुदलीय लोकतंत्र में वोटर राजनीतिक दलों, उनके संगठनात्मक कार्यक्रमों और नीतियों के आधार पर अपना प्रतिनिधि चुनते हैं। न्यायपालिका किसी भी नागरिक की मतदान प्राथमिकता पर सवाल नहीं उठा सकती। इसके अतिरिक्त पीठ ने यह पहलू भी जोड़ा कि यदि कोई आकांक्षी व्यक्ति किसी आरक्षित क्षेत्र से पर्चा नहीं भर सकता, तो भी उसके पास अन्य अनारक्षित सामान्य सीटों से चुनावी किस्मत आजमाने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार हमेशा मौजूद रहता है। परिसीमन कानून और सिफारिशों का दायरा अर्जी में परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(c) की वैधानिकता पर भी प्रश्नचिह्न लगाया गया था। याचिकाकर्ता ने वर्ष 2008 के परिसीमन आयोग की उस रिपोर्ट का विशेष उल्लेख किया, जिसमें आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन पद्धति शुरू करने पर विचार का मशविरा दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर व्यवस्था दी कि आयोग की मार्गदर्शिकाएं उस तात्कालिक कसरत के लिए थीं, उनसे कोई कानूनी बाध्यता पैदा नहीं होती कि हर हाल में सीटों को रोटेट किया जाए। खंडपीठ ने कहा कि जब तक किसी वैधानिक प्रावधान में स्पष्ट मनमानी या असंवैधानिकता सिद्ध न हो, अदालत केवल इसलिए किसी नियम को अमान्य नहीं कर सकती क्योंकि उसमें सुधार करना बेहतर लग रहा हो। इन आधारों के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी, हालांकि याचिकाकर्ता को अपने इलाके के सांसदों और विधायकों के समक्ष परिसीमन आयोग के सुझावों के आधार पर विधायी संशोधन की मांग उठाने की पूरी छूट दी गई। इसका आप पर असर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह साफ हो गया है कि संसद और विधानसभा सीटों पर लंबे समय से चले आ रहे आरक्षण के स्वरूप में न्यायपालिका के जरिए तत्काल कोई बदलाव नहीं होगा। • भारत में: देश भर के मतदाताओं और संभावित उम्मीदवारों को मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के तहत ही चुनावी राजनीति में भाग लेना होगा। आरक्षण चक्र में किसी भी नए सुधार के लिए जनता को अदालतों के बजाय संसद में विधायी संशोधन की मांग उठानी होगी। • कादीपुर और उत्तर प्रदेश में: सुल्तानपुर जिले की 191-कादीपुर सीट पर दशकों से लागू अनुसूचित जाति आरक्षण की मौजूदा स्थिति फिलहाल बरकरार रहेगी। स्थानीय गैर-आरक्षित वर्ग के दावेदारों को विधानसभा पहुंचने के लिए निकटवर्ती सामान्य सीटों का ही विकल्प चुनना पड़ेगा। • चुनावी उम्मीदवारों के लिए: आरक्षित क्षेत्रों के सामान्य वर्ग के नेता उस सीट से अपनी उम्मीदवारी का दावा नहीं कर सकेंगे। उन्हें अपनी राजनीतिक सक्रियता अन्य अनारक्षित विधानसभा अथवा संसदीय क्षेत्रों में स्थानांतरित करनी होगी। • नागरिक अधिकारों पर प्रभाव: सामान्य मतदाताओं का वोट डालने का बुनियादी अधिकार अप्रभावित रहेगा। वे अपने हलके में मौजूद राजनीतिक दलों की विचारधारा और प्रत्याशियों में से अपनी पसंद तय करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। ऐसा क्यों हुआ सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षित सीटों के रोटेशन की मांग को खारिज किया क्योंकि शक्तियों के पृथक्करण के तहत चुनावी और संवैधानिक नियमों में संशोधन का अधिकार न्यायपालिका के पास नहीं है। • संवैधानिक शक्तियों का दायरा: संविधान में संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनाव नियमों को तय करने का विशेष अधिकार सिर्फ विधायिका को दिया गया है। अदालतें स्वयं नई शर्तें तय करके संसद के तीसरे सदन की भूमिका नहीं निभा सकती हैं। • पंचायतों और विधानसभा के नियम अलग: संविधान के अनुच्छेद 243D और 243T केवल स्थानीय निकायों और नगर पालिकाओं में रोटेशन की बात करते हैं। यह व्यवस्था अपने आप संसदीय और विधानसभा सीटों पर लागू नहीं होती क्योंकि दोनों का कानूनी ढांचा भिन्न है। • परिसीमन नियमों की प्रकृति: परिसीमन आयोग की 2008 की रिपोर्ट में रोटेशन का सुझाव केवल विचारणीय सिफारिश के तौर पर था। इसे अदालत द्वारा अनिवार्य और कानूनी तौर पर बाध्यकारी नियम नहीं माना गया। सवाल-जवाब 1. सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की मुख्य मांग क्या थी? याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि विधानसभा और संसद की आरक्षित सीटों को समय-समय पर रोटेट करने यानी बदलने की व्यवस्था लागू की जाए। 2. यह मामला किस विधानसभा सीट से संबंधित था? यह याचिका उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की 191-कादीपुर विधानसभा सीट से जुड़ी थी, जो 1952 से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। 3. मुख्य न्यायाधीश ने वकील से प्रदर्शन करने की बात क्यों कही? मुख्य न्यायाधीश ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि चुनावी नियमों में बदलाव का काम अदालत का नहीं बल्कि संसद का है, इसलिए अपनी आवाज जन प्रतिनिधियों तक पहुंचानी चाहिए। 4. अदालत ने स्थानीय निकायों के रोटेशन नियम को विधानसभा पर क्यों नहीं लागू किया? अदालत ने स्पष्ट किया कि स्थानीय निकायों और संसद-विधानसभा के लिए संविधान में अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं, जिन्हें अदालत अपनी मर्जी से नहीं जोड़ सकती। 5. क्या किसी सीट के आरक्षित होने से नागरिकों का वोटिंग अधिकार खत्म होता है? नहीं, अदालत ने कहा कि उम्मीदवारों के विकल्प सीमित हो सकते हैं लेकिन मतदाता का वोट डालने का बुनियादी अधिकार हमेशा बना रहता है। https://trendkia.com/national/snsadiya-va-vidhanasabha-siton-ke-roteshana-para-shirsha-adalata-sakhta-parliament-ke-pale-men-dali-genda-56542 TrendKia — Har trend, sabse pehle.