संवैधानिक पद से हटने की प्रक्रिया से बचने को दिया इस्तीफा, तो क्या बंद होंगी सरकारी सुविधाएं? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से मांगा जवाब जांच या पद से बर्खास्तगी की कार्रवाई से बचने के लिए इस्तीफा देने वाले संवैधानिक अधिकारियों के सरकारी लाभ और सुविधाएं बंद करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्यों को नोटिस जारी किया है। संवैधानिक पदों पर आसीन अधिकारियों द्वारा पद से हटाए जाने की महाभियोग या जांच प्रक्रिया से बचने के लिए दिए जाने वाले इस्तीफों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को कारण बताओ नोटिस जारी कर उनका जवाब तलब किया है। याचिका में मांग की गई है कि जो संवैधानिक पदाधिकारी जांच या बर्खास्तगी की कार्रवाई से बचने के लिए अपने पद से समय से पहले इस्तीफा दे देते हैं, उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली सभी तरह की सरकारी सुविधाओं, पेंशन और अन्य लाभों से पूरी तरह वंचित कर दिया जाना चाहिए। यह सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ द्वारा की जा रही है। इस्तीफा देकर सुविधाएं लेने की प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त सुप्रीम कोर्ट में दायर इस जनहित याचिका में तर्क दिया गया है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग जब अपने खिलाफ अनुशासनात्मक या हटाने की प्रक्रिया शुरू होने पर इस्तीफा देते हैं, तो उनका उद्देश्य केवल अपने बाद के लाभों को सुरक्षित रखना होता है। शीर्ष अदालत की पीठ के सामने याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि हटाने की कानूनी प्रक्रिया से बचने के इरादे से त्यागपत्र देने वाले अधिकारियों को भविष्य में किसी भी प्रकार का राजकीय सम्मान, भत्ता या पेंशन देना पूरी तरह अनुचित है। पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र और राज्यों से विस्तृत रुख प्रस्तुत करने को कहा है, ताकि इस तरह के नैतिक और संवैधानिक संकट का स्थायी समाधान निकाला जा सके। अनुच्छेद 14 और 'कानून के शासन' के उल्लंघन का तर्क याचिका में मौजूदा नियमों और प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस्तीफा देने के बावजूद इन पदाधिकारियों को वे तमाम लाभ मिलते रहते हैं जो अपना पूरा कार्यकाल निष्ठापूर्वक समाप्त करने वाले अधिकारियों को प्राप्त होते हैं। याचिका में कहा गया है कि यह व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 यानी समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन करती है। इसके साथ ही, यह परिपाटी 'कानून के शासन' की मूल भावना को चोट पहुंचाती है, जो कि हमारे संविधान का बुनियादी ढांचा माना गया है। अगर कोई व्यक्ति कार्रवाई के डर से पद छोड़ता है और फिर भी जीवन भर सरकारी खजाने से लाभ लेता है, तो यह जनता के विश्वास के साथ खिलवाड़ है। याचिका के दायरे में आने वाले 11 प्रमुख संवैधानिक पद इस जनहित याचिका में देश के 11 सबसे शीर्ष और महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों को शामिल किया गया है। याचिका के अनुसार, इन पदों पर आसीन व्यक्तियों के लिए जवाबदेही के कड़े नियम तय होना आवश्यक है। याचिका में शामिल प्रमुख पद इस प्रकार हैं • भारत के राष्ट्रपति: देश का सर्वोच्च संवैधानिक प्रमुख पद। • भारत के उपराष्ट्रपति: राज्यसभा के पदेन सभापति और द्वितीय सर्वोच्च पद। • राज्यों के राज्यपाल: राज्यों में संवैधानिक व्यवस्था के प्रमुख। • प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रिपरिषद: केंद्र सरकार की कार्यपालिका का मुख्य अंग। • मुख्यमंत्री और राज्य मंत्रिपरिषद: राज्य सरकारों का प्रशासनिक व संवैधानिक ढांचा। • सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश: देश की शीर्ष अदालत के न्यायधीश। • हाई कोर्ट के न्यायाधीश: विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश। • भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG): देश के सार्वजनिक वित्त की निगरानी करने वाली संस्था के प्रमुख। • मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC): स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने वाले आयोग के प्रमुख। • भारत के महान्यायवादी (Attorney General): केंद्र सरकार के मुख्य कानूनी सलाहकार। • राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General): राज्यों के प्रमुख कानूनी सलाहकार। संवैधानिक जवाबदेही और कार्यकाल पूरा करने का दायित्व याचिकाकर्ता ने अदालत को अवगत कराया कि जब किसी व्यक्ति को निश्चित अवधि के लिए संवैधानिक जिम्मेदारी दी जाती है, तो उस पर कार्यकाल पूरा करने या फिर पारदर्शी प्रक्रिया के तहत जांच का सामना करने का अलिखित संवैधानिक दायित्व होता है। पद से हटाए जाने की प्रक्रिया से बचने के लिए बीच में ही इस्तीफा दे देना कोई न्यायसंगत या उचित विकल्प नहीं है। याचिका में जोर दिया गया है कि ऐसे असंवैधानिक और सिद्धांतहीन इस्तीफों की मुख्य वजह यही है कि इन अधिकारियों को पता होता है कि पद छोड़ते ही उन्हें पेंशन, आवास और सुरक्षा जैसे सारे लाभ बरकरार रहेंगे। जब तक इस अनुचित लाभ पर रोक नहीं लगेगी, तब तक संवैधानिक पदों की गरिमा और जन-विश्वास को खतरा बना रहेगा। अब अदालत इस मामले में सभी पक्षों के जवाब आने के बाद अगली सुनवाई करेगी। इसका आप पर असर यह मामला देश की प्रशासनिक व्यवस्था और करदाताओं के पैसों के उपयोग पर दूरगामी असर डाल सकता है। • भारत में: यदि सुप्रीम कोर्ट याचिका के पक्ष में फैसला देता है, तो सार्वजनिक धन की भारी बचत होगी क्योंकि जांच से बचने के लिए त्यागपत्र देने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों के जीवनभर के लाभ बंद हो जाएंगे। इससे शीर्ष प्रशासनिक व्यवस्था में ईमानदारी सुनिश्चित होगी। • संवैधानिक ढांचे पर: उच्च पदों पर बैठे अधिकारी अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करने से बचने के लिए तुरंत इस्तीफा देने का आसान रास्ता नहीं चुन सकेंगे। उन्हें पूरी प्रक्रिया का सामना करना पड़ेगा। • आम नागरिकों के लिए: यह कदम सुनिश्चित करेगा कि जनता के टैक्स के पैसों का दुरुपयोग ऐसे लोगों पर न हो जिन्होंने जांच से बचने के लिए अपने संवैधानिक दायित्वों को बीच में छोड़ दिया। • कानूनी नियमों में बदलाव: भविष्य में केंद्र और राज्य सरकारों को संवैधानिक पदों से जुड़े सेवानिवृत्ति सेवा नियमों में व्यापक संशोधन करने पड़ सकते हैं। सवाल-जवाब 1. सुप्रीम कोर्ट में याचिका किस मुद्दे पर दायर की गई है? यह याचिका उन संवैधानिक पदाधिकारियों के सरकारी लाभ और सुविधाएं बंद करने की मांग करती है जो अपने खिलाफ हटाने की प्रक्रिया से बचने के लिए इस्तीफा देते हैं। 2. इस मामले की सुनवाई कौन सी पीठ कर रही है? इस याचिका की सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ कर रही है। 3. याचिका में किन-किन संवैधानिक पदों को शामिल किया गया है? याचिका में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के जज, सीएजी, सीईसी, महान्यायवादी और महाधिवक्ता सहित 11 पद शामिल हैं। 4. याचिकाकर्ता का मुख्य कानूनी तर्क क्या है? याचिकाकर्ता का तर्क है कि जांच से बचने के लिए इस्तीफा देने के बाद भी सुविधाएं मिलना संविधान के अनुच्छेद 14 और कानून के शासन का उल्लंघन है। https://trendkia.com/national/snvaidhanika-pada-se-hatane-ki-prakriya-se-bachane-ko-diya-istipha-to-kya-bnda-hongi-sarakari-suvidhaen-supreme-court-ne-kendra-au-27144 TrendKia — Har trend, sabse pehle.