संवैधानिक संस्थाओं पर आरोपों के बीच कांग्रेस की संगठनात्मक विफलताओं पर गृह मंत्री का तीखा पलटवार मतदाता सूची और निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे राहुल गांधी को अमित शाह ने चार दशकों के चुनावी आंकड़ों के जरिए संगठन की बुनियादी कमजोरियों पर मंथन करने की सलाह दी है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी की चुनावी सफलताएं जनता के समर्थन के बजाय निर्वाचन आयोग की कथित मदद पर टिकी हैं। कांग्रेस पार्टी के साथ कई अन्य विपक्षी दल भी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों और सत्तापक्ष का मानना है कि केवल चुनाव संचालन तंत्र पर दोष मढ़ने से कांग्रेस की उन गहरी कमजोरियों का समाधान नहीं निकल सकता, जो पिछले चार दशकों से उसे केंद्र और राज्यों में कमजोर करती आ रही हैं। इस पूरे विवाद ने भारतीय राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या विपक्षी दल अपनी संगठनात्मक और वैचारिक विफलता को छिपाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं पर ठीकरा फोड़ रहे हैं। गंभीर आरोपों के सामने पुख्ता साक्ष्यों की दरकार राहुल गांधी के राजनीतिक हमलों के दायरे में सिर्फ निर्वाचन आयोग ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी प्रत्यक्ष तौर पर शामिल हैं। कांग्रेस का स्पष्ट दावा रहा है कि स्वायत्त चुनाव मशीनरी सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए काम कर रही है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी राजनीतिक दल के पास स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की मांग उठाने का पूरा अधिकार है। फिर भी, जब देश की प्रमुख संवैधानिक संस्थाओं पर सत्तापक्ष के साथ मिलीभगत का लांछन लगाया जाता है, तो उसके समर्थन में ठोस साक्ष्य और अकाट्य दस्तावेज पेश किए जाने आवश्यक होते हैं। कोरी राजनीतिक बयानबाजी से किसी भी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाना दीर्घकालिक लोकतांत्रिक मर्यादाओं के लिहाज से उचित नहीं माना जाता। कांग्रेस को यह समझना होगा कि उसकी चुनावी दुर्गति के पीछे केवल मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण नहीं, बल्कि दशकों से उपेक्षित पड़े सांगठनिक ढांचे की कमियां भी शामिल हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने उठाया कांग्रेस के चुनावी इतिहास का आईना कांग्रेस के इन तीखे आरोपों के जवाब में गृह मंत्री अमित शाह ने दलगत बयानबाजी से परे पार्टी के वास्तविक चुनावी इतिहास का ब्योरा सामने रख दिया। अमित शाह ने सीधा तर्क रखा कि यदि निर्वाचन आयोग की कार्यशैली और मतदाता सूची का पुनरीक्षण ही कांग्रेस की हर असफलता का मूल कारण है, तो फिर पार्टी उन तमाम राज्यों में दशकों से लगातार पराजित क्यों होती आ रही है जहां वह वर्षों से सत्ता में वापसी तक नहीं कर पाई है। गृह मंत्री का कहना था कि पराजय का ठीकरा संस्थाओं पर फोड़ने से बेहतर होगा कि कांग्रेस नेतृत्व अपनी चुनावी विफलता के जमीनी कारणों की निष्पक्ष समीक्षा करे। अमित शाह के इस पलटवार के फौरन बाद कांग्रेस के प्रमुख रणनीतिकारों ने अलग-अलग मोर्चों पर प्रतिक्रियाएं व्यक्त कीं। वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने तीखे सवाल दागते हुए पूछा कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान देश में कितने घुसपैठियों की पहचान की गई, कितने लोगों के नाम मतदाता सूची से काटे गए और वास्तव में कितनों को देश से बाहर खदेड़ा गया। इसी क्रम में पवन खेड़ा ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर भारी पुलिस बल तैनात किए जाने पर कड़ा विरोध दर्ज कराया। वहीं अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव केसी वेणुगोपाल ने अमित शाह के बयान को भावी चुनावों के परिणामों की समय पूर्व घोषणा करार देते हुए आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी चुनाव प्रक्रिया को अनुचित रूप से प्रभावित करने का प्रयास कर रही है। आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में बुनियादी सवालों से भटकाव नेताओं की इन तीखी बयानबाजियों के बीच चुनावी प्रदर्शन की निष्पक्ष समीक्षा का मुख्य मुद्दा पृष्ठभूमि में चला गया। मतदाता सूची की प्रामाणिकता और एसआईआर की प्रक्रिया पर तकनीकी सवाल खड़े करना अपनी जगह वाजिब हो सकता है, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व को इस बात का स्पष्ट उत्तर तलाशना होगा कि जिन सूबों में वह लंबे अरसे से राजनीतिक हाशिए पर है, वहां जनता का विश्वास फिर से जीतने के लिए उसने क्या ठोस कदम उठाए हैं। गृह मंत्री अमित शाह की टिप्पणी का केंद्रीय संदेश यही रेखांकित करता है कि सत्तापक्ष की नीतियों का विरोध करने के साथ-साथ किसी भी दल को अपने आंतरिक ढांचों, नेतृत्व की विश्वसनीयता और नीतिगत दिशा का भी वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करना चाहिए। चार दशक से लोकसभा में अपने दम पर बहुमत को तरसती पार्टी अगर चुनावी सांख्यिकी पर नजर डालें, तो कांग्रेस पार्टी को लोकसभा में अपने बूते पर पूर्ण बहुमत प्राप्त किए चार दशक से अधिक का लंबा समय बीत चुका है। अंतिम बार वर्ष 1984 के आम चुनाव में, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या के उपरांत उपजी असाधारण राजनीतिक और भावनात्मक परिस्थितियों में कांग्रेस ने लोकसभा की 543 निर्वाचित सीटों में से 404 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। उस प्रचंड बहुमत के बाद से आज तक कांग्रेस कभी भी अकेले दम पर 272 के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी। इसके बाद वर्ष 1989 और 1991 के आम चुनावों में पार्टी ने राजीव गांधी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों ही बार कांग्रेस अपने दम पर पूर्ण बहुमत जुटाने में नाकाम रही। कई वर्षों के सत्ता संघर्ष के बाद सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी ने वर्ष 2004 और 2009 के चुनावों में उल्लेखनीय वापसी जरूर की। पार्टी ने 2004 के चुनाव में 145 सीटें और 2009 के चुनाव में 206 सीटें हासिल कीं और विभिन्न क्षेत्रीय दलों के साथ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन बनाकर केंद्र में दस वर्षों तक शासन चलाया। हालांकि इन दोनों कार्यकालों में भी पार्टी अकेले बहुमत के आंकड़े से काफी दूर रही और धीरे-धीरे उसका राष्ट्रीय जनाधार सिकुड़ता चला गया। वर्ष 2014 के आम चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन अपने ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया, जब वह लोकसभा में महज 44 सीटों पर सिमट गई। इसके बाद 2019 के आम चुनाव में मामूली बढ़त के साथ कांग्रेस 52 सीटों पर पहुंची। हालिया 2024 के आम चुनाव में पार्टी ने अपनी स्थिति सुधारते हुए 99 सीटें जरूर जीतीं, लेकिन यह संख्या भी 543 सदस्यीय सदन में सरकार बनाने या बहुमत हासिल करने के आंकड़े से कोसों दूर है। इन चुनावी परिणामों की निरंतरता यह प्रमाणित करती है कि कांग्रेस की संगठनात्मक और राजनीतिक चुनौतियां वर्तमान एसआईआर प्रक्रिया या तात्कालिक मतदाता सूची विवाद से कहीं अधिक पुरानी और संरचनात्मक हैं। प्रमुख सूबों में लगातार सिकुड़ता कांग्रेस का राजनीतिक आधार स्वाधीनता के बाद कई दशकों तक देश के अधिकांश राज्यों पर एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस आज कई महत्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक जमीन गंवा चुकी है। दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण राज्य तमिलनाडु में कांग्रेस का अपना मुख्यमंत्री बने छह दशक से भी अधिक का समय व्यतीत हो चुका है, जहां वह क्षेत्रीय द्रविड़ दलों की बैसाखियों पर निर्भर है। पश्चिम बंगाल में भी पार्टी दशकों से सत्ता की मुख्य धारा से बाहर होकर नाममात्र की उपस्थिति में सिमट चुकी है। उत्तर भारत के सबसे बड़े राजनीतिक राज्य उत्तर प्रदेश में, जिसने कभी देश को कई कांग्रेस प्रधानमंत्री दिए, पार्टी वर्षों से अपने बूते पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं पहुंच पाई है। इसी तरह पश्चिमी भारत के गुजरात और पूर्वी भारत के ओडिशा में भी कांग्रेस को अनगिनत वर्षों से सत्ता से बाहर रहना पड़ा है। हालांकि हर राज्य की सामाजिक, क्षेत्रीय और राजनीतिक परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। कुछ राज्यों में मजबूत क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस के पारंपरिक सामाजिक आधार में सेंध लगाकर अपनी स्थाई पकड़ बनाई है, तो दूसरी तरफ कई राज्यों में भारतीय जनता पार्टी ने अपने सुदृढ़ कैडर और निरंतर जनसंपर्क के बल पर कांग्रेस को बेदखल किया है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह हर सूबे की बदली हुई जमीनी सच्चाइयों को समझे और उसी के अनुसार अपने स्थानीय नेतृत्व को अधिकार संपन्न बनाए। अपने पुराने ऐतिहासिक गौरव और स्वतंत्रता आंदोलन की उपलब्धियों को दोहराते रहने भर से नए दौर के युवा मतदाताओं का समर्थन हासिल नहीं किया जा सकता। इसके लिए बूथ स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं की फौज, जुझारू क्षेत्रीय नेतृत्व और जनता के दैनिक मुद्दों पर निरंतर संवाद की आवश्यकता होती है। सड़क पर प्रदर्शन से आगे स्थायी जनसंपर्क की जरूरत राजनीतिक विश्लेषक बिक्रम उपाध्याय के अनुसार गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस को राजनीतिक यथार्थ का बिल्कुल सटीक आईना दिखाया है। केवल देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर कुछ हजार कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटाकर या धरना-प्रदर्शन करके बड़े आम चुनाव नहीं जीते जा सकते। राजनीतिक दलों को विजय प्राप्त करने के लिए दूरदराज के देहातों, कस्बों, बस्तियों और वंचित तबकों के बीच लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करानी पड़ती है। आम जनता के सुख-दुख को गहराई से समझना और उनकी स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए सड़कों से लेकर विधानसभाओं तक निरंतर संघर्ष करना ही किसी पार्टी को दोबारा सत्ता के केंद्र तक पहुंचाता है। यह सिद्धांत सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के तमाम राजनीतिक दलों पर समान रूप से लागू होता है। शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन और सभाएं निस्संदेह किसी भी जीवंत लोकतंत्र की धड़कन हैं। निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर निगरानी रखना, पारदर्शिता की मांग करना और मतदाता सूची की अशुद्धियों को उजागर करना भी सजग विपक्ष का प्राथमिक कर्तव्य है। लेकिन जब इन सवालों का इस्तेमाल अपनी संगठनात्मक कमियों, सांगठनिक बिखराव और जनसंपर्क के अभाव से ध्यान भटकाने के लिए किया जाने लगे, तो मतदाता इसे राजनीतिक ढाल मानकर खारिज कर देते हैं। चुनावी जीत अंततः मजबूत सांगठनिक ढांचे, स्थानीय पकड़ और जनता के विश्वास से ही हासिल होती है। इसका आप पर असर यह राजनीतिक टकराव आम नागरिकों के मताधिकार, चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता और राजनीतिक दलों की जवाबदेही को सीधे प्रभावित करता है। • नागरिकों के लिए: मतदाता सूची में नाम जुड़वाने और एसआईआर जैसी प्रक्रियाओं पर उठ रहे सवालों से सतर्क रहने की जरूरत है। हर पात्र नागरिक को समय रहते अपना नाम मतदाता सूची में जांच लेना चाहिए ताकि वोट देने के दिन कोई बाधा न आए। • लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा: निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता पर लगातार बहस से संस्थागत विश्वास पर असर पड़ता है। इससे मतदाताओं में चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर निष्पक्ष निगरानी की मांग मजबूत होती है। • विपक्षी राजनीति की दिशा: केवल कानूनी या संस्थागत आपत्तियों के बजाय जनता से जुड़े स्थानीय मुद्दों पर दबाव बढ़ेगा। आम जनता अपनी समस्याओं पर राजनीतिक दलों से ठोस और जमीनी समाधान की उम्मीद करेगी। • चुनावी जागरूकता: दोनों पक्षों के बयानों से मतदाता पहचान पत्र और चुनावी नियमों के प्रति सामान्य जनता में सक्रियता बढ़ेगी। लोग अपने क्षेत्र की स्थानीय मतदाता सूचियों और बूथ स्तर की गतिविधियों के प्रति अधिक सचेत होंगे। ऐसा क्यों हुआ यह विवाद विपक्षी दलों द्वारा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठाए गए सवालों और उसके जवाब में सत्तापक्ष द्वारा ऐतिहासिक चुनावी आंकड़े पेश करने के कारण पैदा हुआ है। • आरोपों की पृष्ठभूमि: राहुल गांधी और विपक्षी दलों ने लगातार दावा किया है कि सत्तारूढ़ दल को चुनाव आयोग और मतदाता सूची पुनरीक्षण से अनुचित लाभ मिल रहा है। विपक्ष का तर्क है कि एसआईआर प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है और निष्पक्ष चुनाव के लिए सख्त जांच आवश्यक है। • सत्तापक्ष का पलटवार: गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के चार दशक के चुनावी इतिहास का हवाला देकर इन आरोपों को खारिज किया। उन्होंने रेखांकित किया कि कांग्रेस 1984 के बाद से कभी भी अपने दम पर लोकसभा में बहुमत हासिल नहीं कर सकी है। • राज्यों में दीर्घकालिक कमजोरी: तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, गुजरात और ओडिशा जैसे राज्यों में कांग्रेस दशकों से सत्ता से बाहर है। सत्तापक्ष का तर्क है कि इन राज्यों की पराजय के लिए चुनाव आयोग को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। • राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन: जानकारों का मानना है कि केवल दिल्ली में धरना-प्रदर्शन करने से चुनाव नहीं जीते जा सकते। राजनीतिक दलों को जमीनी स्तर पर संगठन मजबूत करने और जनता के मुद्दों पर निरंतर काम करने की आवश्यकता होती है। सवाल-जवाब 1. राहुल गांधी ने चुनाव आयोग और भाजपा पर क्या आरोप लगाए हैं? राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि भाजपा जनता के समर्थन से नहीं बल्कि चुनाव आयोग की मदद से चुनाव जीत रही है और मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर भी सवाल उठाए हैं। 2. अमित शाह ने कांग्रेस के आरोपों का क्या जवाब दिया? अमित शाह ने कहा कि यदि चुनाव आयोग और एसआईआर ही हार की वजह हैं, तो कांग्रेस उन राज्यों में दशकों से क्यों नहीं जीत पा रही जहां वह लंबे समय से सत्ता से बाहर है। 3. कांग्रेस ने आखिरी बार अपने दम पर लोकसभा में बहुमत कब हासिल किया था? कांग्रेस ने आखिरी बार 1984 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 543 में से 404 सीटें जीतकर अपने दम पर पूर्ण बहुमत प्राप्त किया था। 4. हाल के वर्षों में 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का क्या प्रदर्शन रहा? कांग्रेस ने 2014 के लोकसभा चुनाव में 44 सीटें, 2019 में 52 सीटें और 2024 के आम चुनाव में 99 सीटें जीतीं। 5. अमित शाह के बयान पर जयराम रमेश ने क्या सवाल उठाए? जयराम रमेश ने पूछा कि एसआईआर में कितने घुसपैठियों की पहचान की गई, कितनों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए और कितनों को देश से बाहर भेजा गया। 6. पवन खेड़ा और केसी वेणुगोपाल की क्या प्रतिक्रिया रही? पवन खेड़ा ने जंतर-मंतर पर भारी पुलिस बल की तैनाती का विरोध किया, जबकि केसी वेणुगोपाल ने शाह के बयान को अगले चुनाव परिणामों की अग्रिम घोषणा बताया। 7. किन प्रमुख राज्यों में कांग्रेस लंबे समय से सत्ता से बाहर है? कांग्रेस तमिलनाडु में छह दशक से, तथा पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, गुजरात और ओडिशा में भी लंबे समय से सत्ता से बाहर चल रही है। 8. राजनीतिक विश्लेषक बिक्रम उपाध्याय ने चुनाव जीतने को लेकर क्या सलाह दी है? बिक्रम उपाध्याय ने कहा कि दिल्ली में कुछ हजार लोगों की भीड़ जुटाने से चुनाव नहीं जीते जा सकते, बल्कि गांवों और कस्बों में जाकर लोगों की समस्याएं सुलझानी होंगी। https://trendkia.com/national/snvaidhanika-snsthaon-para-aropon-ke-bicha-congress-ki-sngathanatmaka-viphalataon-para-amit-shah-ka-tikha-palatavara-48729 TrendKia — Har trend, sabse pehle.