संयुक्त राष्ट्र में भारत का कड़ा रुख, भाविका मंगलानंदन ने आतंकवाद को मानवाधिकारों का सबसे बड़ा खतरा बताया संयुक्त राष्ट्र में भारत की प्रथम सचिव भाविका मंगलानंदन ने मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट पर बहस के दौरान दोहरे मापदंडों और आतंकवाद पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने विकासशील देशों की प्राथमिकताओं, कर्ज के बोझ और तकनीकी चुनौतियों को भी वैश्विक मंच पर प्रमुखता से उठाया। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जब भी मानवाधिकारों के संरक्षण की चर्चा होती है, नई दिल्ली हमेशा से यह स्पष्ट करती आई है कि निर्दोष लोगों के जीवन के अधिकार की रक्षा सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए संयुक्त राष्ट्र में भारत की प्रथम सचिव भाविका मंगलानंदन ने मानवाधिकार परिषद की वार्षिक रिपोर्ट पर आयोजित बहस में वैश्विक समुदाय के समक्ष भारत का दृष्टिकोण पूरी दृढ़ता के साथ प्रस्तुत किया। उन्होंने दो टूक शब्दों में रेखांकित किया कि आतंकवाद मानवाधिकारों के उपभोग और उनके बुनियादी संरक्षण के मार्ग में खड़ा सबसे घातक अवरोध है। बिना किसी देश का सीधा नाम लिए उनका यह वक्तव्य सीमा पार से प्रायोजित हिंसा और आतंकवाद की शरणगाह बने तंत्रों के लिए एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है। आतंकवाद पर शून्य सहनशीलता की सख्त नीति का आह्वान संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन के दौरान भारतीय राजनयिक ने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक स्तर पर निरंतर और अडिग कार्रवाई की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि मानवाधिकारों के उपयोग और उनके विस्तार के सामने आतंकवाद सबसे गंभीर संकटों में शामिल है। इस साल अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर मानवाधिकार परिषद के प्रस्ताव में भी इस बात को विधिवत मान्यता दी गई है। भाविका मंगलानंदन ने मानवाधिकार परिषद से आग्रह किया कि वह इस खतरे पर लगातार अपनी नजर बनाए रखे और इसके प्रति शून्य सहनशीलता यानी जीरो टॉलरेंस के सिद्धांत पर सख्ती से काम करे। भारतीय विदेश नीति लंबे समय से यह मानती रही है कि हिंसा फैलाने वालों के खिलाफ किसी भी तरह की नरमी बरतना वैश्विक सुरक्षा तंत्र को कमजोर करता है, और इस संबोधन ने उसी स्थापित नीति को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने दोबारा दोहराया है। मानवाधिकारों का राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल बंद हो वैश्विक मंचों पर मानवाधिकारों के नाम पर चुनिंदा देशों को घेरने की प्रवृत्ति पर भी भारत ने गंभीर चिंता व्यक्त की। भारतीय प्रथम सचिव ने स्पष्ट किया कि मानवाधिकारों को आगे बढ़ाने का सबसे प्रामाणिक रास्ता संवाद, संस्थागत क्षमता निर्माण और वास्तविक वैश्विक साझेदारी है। उन्होंने आगाह किया कि राजनीतिकरण, चुनिंदा रुख अपनाने और दोहरे मापदंड तय करने से बुनियादी अधिकारों की रक्षा संभव नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि जब मानवाधिकारों का इस्तेमाल भू-राजनीतिक हथियार के रूप में किया जाता है, तो इससे संस्थागत विश्वसनीयता नष्ट होती है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय संगठनों को किसी देश विशेष पर चयनात्मक उंगली उठाने के बजाय समग्र सुधारों और पारदर्शी सहयोग को बढ़ावा देना चाहिए। ग्लोबल साउथ और विकास के अधिकार की बराबरी भाषण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विकासशील देशों यानी ग्लोबल साउथ की उन जमीनी कठिनाइयों पर केंद्रित था, जो अक्सर पश्चिमी देशों की बहस में पीछे छूट जाती हैं। भाविका मंगलानंदन ने पुरजोर तरीके से कहा कि आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों तथा विकास के अधिकार को नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के बराबर ही तवज्जो मिलनी चाहिए। उन्होंने वैश्विक समुदाय को याद दिलाया कि विकासशील देशों के करोड़ों नागरिकों के लिए गरीबी, भारी कर्ज का बोझ, वित्तीय संसाधनों का अभाव और आधुनिक तकनीक तक सीमित पहुंच मानवाधिकारों के रास्ते की सबसे तात्कालिक रुकावटें हैं। जब तक बुनियादी आर्थिक और ढांचागत चुनौतियों का समाधान नहीं होता, तब तक सामान्य नागरिक के लिए मानवाधिकारों का पूरा लाभ उठा पाना बेहद कठिन बना रहता है। मानवाधिकार परिषद की प्राथमिकताओं और कार्यप्रणाली पर संदेश मानवाधिकार परिषद की आंतरिक कार्यप्रणाली और वित्तीय निर्भरता को लेकर भी भारत ने बेहद व्यावहारिक सुझाव दिए। भाविका मंगलानंदन ने कहा कि परिषद के कामकाज को व्यवस्थित या कारगर बनाने की आड़ में विकास, आर्थिक और सामाजिक अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण अधिदेशों को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने एक महत्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए आगाह किया कि परिषद की प्राथमिकताओं को उन देशों के स्वैच्छिक वित्तीय योगदान के आधार पर तय नहीं किया जाना चाहिए, जो शर्तों के साथ धन उपलब्ध कराते हैं। किसी भी बहुपक्षीय संस्था का एजेंडा निष्पक्ष, पारदर्शी और सभी सदस्य देशों की सामूहिक आवश्यकताओं पर आधारित होना चाहिए, न कि चुनिंदा दाताओं की शर्तों पर। इंजीनियरिंग से कूटनीति तक भाविका मंगलानंदन का सफर संयुक्त राष्ट्र में भारत की आवाज बुलंद करने वाली भाविका मंगलानंदन भारतीय विदेश सेवा के 2015 बैच की अधिकारी हैं। वह वर्तमान में न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में प्रथम सचिव के पद पर कार्यरत हैं। अपने मौजूदा दायित्वों के तहत वह आतंकवाद निरोधक मामलों और साइबर सुरक्षा जैसे अतिसंवेदनशील अंतरराष्ट्रीय विषयों का कार्यभार संभालती हैं। इसके अलावा वह संयुक्त राष्ट्र की प्रथम समिति में भी भारत का पक्ष रखती हैं, जो मुख्य रूप से वैश्विक निरस्त्रीकरण और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को देखती है। कूटनीति में आने से पूर्व उनकी पृष्ठभूमि तकनीकी और कॉरपोरेट क्षेत्र से जुड़ी रही है। उन्होंने वर्ष 2011 में प्रतिष्ठित आईआईटी दिल्ली से अपनी उच्च शिक्षा पूरी की थी। सिविल सेवा में चयन से पहले उन्होंने कॉर्पोरेट जगत में भी काम किया। वह नवंबर 2007 से जून 2009 तक टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज में कार्यरत रहीं। इसके उपरांत उन्होंने श्नाइडर इलेक्ट्रिक में वरिष्ठ मार्केटिंग इंजीनियर के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। निजी क्षेत्र के तकनीकी और प्रबंधन अनुभव के साथ अब वह राजनयिक मोर्चे पर देश के सामरिक हितों की प्रभावी पैरवी कर रही हैं। इसका आप पर असर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत द्वारा उठाए गए इन बुनियादी मुद्दों का सीधा संबंध वैश्विक सुरक्षा नीतियों और विकासशील देशों के नागरिकों के अधिकारों से है। • भारत में प्रभाव: वैश्विक मंच पर आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को मजबूती मिलने से सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ देश की राजनयिक स्थिति मजबूत होती है। इससे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में भारत के सुरक्षा हितों और वैश्विक सहयोग को व्यापक समर्थन जुटाने में मदद मिलती है। • ग्लोबल साउथ के लिए: विकासशील देशों के लिए कर्ज राहत, आसान वित्तीय संसाधनों और नई तकनीक की मांग उठाने से आम जनता के बुनियादी अधिकारों को मजबूती मिलती है। इससे विकास परियोजनाओं और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दबाव बनाने में सहायता मिलेगी। • मानवाधिकार नीतियों में निष्पक्षता: मानवाधिकारों के चयनात्मक उपयोग और दोहरे मापदंडों का विरोध होने से अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की कार्यप्रणाली में सुधार आ सकता है। इससे विकासशील देशों पर अनुचित भू-राजनीतिक दबाव कम होगा और वास्तविक साझेदारी को प्रोत्साहन मिलेगा। • साइबर सुरक्षा और डिजिटल सहयोग: तकनीक तक समान पहुंच और साइबर सुरक्षा के मुद्दों को रेखांकित किए जाने से भविष्य में डिजिटल बुनियादी ढांचे को सुरक्षित रखने के लिए वैश्विक सहयोग को गति मिलने की संभावना है। ऐसा क्यों हुआ संयुक्त राष्ट्र महासभा में मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट पर आयोजित औपचारिक बहस के दौरान यह कड़ा कूटनीतिक रुख सामने आया। भारत ने इस अवसर का उपयोग बहुपक्षीय संस्थाओं की संरचनात्मक कमियों और आतंकवाद के गहरे असर को उजागर करने के लिए किया। • मानवाधिकार परिषद की वार्षिक रिपोर्ट पर चर्चा: संयुक्त राष्ट्र महासभा में परिषद की गतिविधियों और उसके कामकाज की समीक्षा की जा रही थी। भारत ने इस मंच का उपयोग मानवाधिकारों के चयनात्मक राजनीतिकरण के खिलाफ आवाज उठाने के लिए किया। • आतंकवाद की गंभीर चुनौती: आतंकवाद अंतरराष्ट्रीय शांति और नागरिकों के जीवित रहने के मौलिक अधिकार के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है। हालिया परिषद प्रस्ताव में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के तहत इस खतरे को मान्यता दिए जाने के बाद भारत ने इस पर निरंतर निगरानी की मांग की। • ग्लोबल साउथ की अनसुलझी समस्याएं: विकासशील देश लंबे समय से बढ़ती गरीबी, भारी बाहरी कर्ज और तकनीक की असमान उपलब्धता से जूझ रहे हैं। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने नागरिक अधिकारों के साथ-साथ विकास के अधिकार को भी समान प्राथमिकता देने की वकालत की। • संस्थागत प्राथमिकताओं का विचलन: चुनिंदा दाताओं द्वारा दिए जाने वाले सशर्त स्वैच्छिक अनुदानों के कारण मानवाधिकार संस्थाओं का ध्यान मूल प्राथमिकताओं से भटकने का अंदेशा बना रहता है। भारत ने आग्रह किया कि प्रशासनिक सुधारों के नाम पर आर्थिक और सामाजिक विकास से जुड़े जनादेशों को कमजोर न किया जाए। सवाल-जवाब 1. संयुक्त राष्ट्र में भारत की ओर से आतंकवाद पर किसने पक्ष रखा? संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में प्रथम सचिव भाविका मंगलानंदन ने मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट पर बहस के दौरान भारत का पक्ष रखा। 2. भाविका मंगलानंदन ने आतंकवाद और मानवाधिकारों को लेकर क्या कहा? उन्होंने कहा कि आतंकवाद मानवाधिकारों के संरक्षण और उनके उपयोग के मार्ग में सबसे गंभीर खतरों में से एक है, जिस पर शून्य सहनशीलता की नीति अपनाई जानी चाहिए। 3. मानवाधिकारों के राजनीतिकरण पर भारतीय राजनयिक ने क्या चेतावनी दी? उन्होंने कहा कि मानवाधिकारों को आगे बढ़ाने का सही तरीका संवाद और सहयोग है, जबकि राजनीतिकरण, चयनात्मक दृष्टिकोण और दोहरे मापदंड मानवाधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते। 4. ग्लोबल साउथ के संबंध में कौन से मुख्य मुद्दे उठाए गए? उन्होंने रेखांकित किया कि गरीबी, कर्ज का बोझ, वित्तीय संसाधनों और तकनीक तक सीमित पहुंच विकासशील देशों में मानवाधिकारों के उपभोग में सबसे बड़ी रुकावटें हैं। 5. मानवाधिकार परिषद की फंडिंग को लेकर क्या टिप्पणी की गई? उन्होंने आगाह किया कि परिषद की प्राथमिकताएं चुनिंदा स्वैच्छिक योगदान देने वाले देशों की प्राथमिकताओं के आधार पर तय नहीं होनी चाहिए। 6. राजनयिक भाविका मंगलानंदन का पेशावर और शैक्षणिक सफर क्या रहा है? वह 2015 बैच की आईएफएस अधिकारी हैं, जिन्होंने 2011 में आईआईटी दिल्ली से शिक्षा पूरी की और पूर्व में टीसीएस तथा श्नाइडर इलेक्ट्रिक में काम किया। https://trendkia.com/national/snyukta-rashtra-men-india-ka-kara-rukha-bhavika-mangalanandan-ne-atnkavada-ko-manavadhikaron-ka-sabase-bara-khatara-bataya-53681 TrendKia — Har trend, sabse pehle.