संयुक्त राष्ट्र में भारत ने उठाया पहलगाम नरसंहार का मुद्दा, सीमा पार आतंक के खिलाफ कड़े वैश्विक कानून की मांग संयुक्त राष्ट्र महासभा की कानूनी मामलों की समिति में भारत ने तीन दशकों से लंबित सीसीआईटी समझौते को तुरंत लागू करने और पहलगाम हमले के जिम्मेदारों को सजा दिलाने की जोरदार वकालत की। संयुक्त राष्ट्र महासभा की कानूनी मामलों से जुड़ी छठी समिति की बैठक के दौरान भारत ने वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कानूनी कार्रवाई की जोरदार मांग उठाई है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य, भाजपा सांसद, पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब ने मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्पष्ट किया कि सीमा पार आतंकवाद को पालने-पोसने वालों, वित्तीय मदद पहुंचाने वालों और आयोजकों की जवाबदेही तय होना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक सम्मेलन यानी सीसीआईटी (CCIT) को शीघ्र स्वीकार करने का आह्वान किया, जो पिछले 30 वर्षों से अंतरराष्ट्रीय पटल पर लंबित पड़ा है। पहलगाम आतंकी नरसंहार के दोषियों पर जवाबदेही की मांग बैठक को संबोधित करते हुए बिप्लब कुमार देब ने पिछले वर्ष पहलगाम में हुए नृशंस आतंकवादी हमले का विशेष उल्लेख किया। इस कायराना हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की जान चली गई थी। पाकिस्तान स्थित आतंकी गिरोह लश्कर-ए-तैयबा के छद्म संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट ने इस नरसंहार की जिम्मेदारी ली थी। भारत ने इस बात पर कड़ा जोर दिया कि इस तरह के हमलों के पीछे सक्रिय हर अपराधी, योजनाकार, वित्तीय पोषक और प्रायोजक को कानून के दायरे में लाकर कठोरतम सजा दी जानी चाहिए। सीमा पार आतंक और आत्मरक्षा का अधिकार भारतीय प्रतिनिधि ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद का सरकारी प्रायोजक है। पहलगाम की वारदात के बाद भारत ने वहां उसकी देखरेख और सुरक्षा में संचालित आतंकी ठिकानों के खिलाफ निर्णायक जवाबी कार्रवाई की थी। भारत ने मंच से दोहराया कि सीमा पार से प्रायोजित होने वाली आतंकी वारदातों के खिलाफ अपने नागरिकों के जीवन और सुरक्षा की रक्षा करना देश का संप्रभु और अडिग अधिकार है, जिससे कभी समझौता नहीं किया जा सकता। तीस साल से अटके सीसीआईटी पर गतिरोध खत्म करने की अपील भारत ने वर्ष 1996 में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक कानूनी संधि सीसीआईटी का मसौदा पेश किया था, ताकि आतंकवाद के खिलाफ एक मजबूत और वैश्विक कानूनी ढांचा तैयार हो सके। हालांकि कुछ देशों के अड़ियल रवैये के चलते यह समझौता पिछले तीन दशकों से अटका हुआ है। ये देश आतंक के मामले में 'अच्छे आतंकवादी' और 'बुरे आतंकवादी' का बनावटी अंतर गढ़ते हैं और पहली श्रेणी को 'स्वतंत्रता सेनानी' बताकर छूट देने की वकालत करते हैं। बिप्लब कुमार देब ने इस दोहरे रवैये को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि आतंकवाद में किसी भी तरह का अच्छा या बुरा वर्गीकरण स्वीकार्य नहीं हो सकता, और बेगुनाह नागरिकों को निशाना बनाए जाने का कोई भी औचित्य नहीं ठहराया जा सकता। आतंकवाद से निपटने की छह प्राथमिकताएं और तकनीकी चुनौतियां भारत ने इस बात पर भी गहरी चिंता जताई कि आतंकी संगठन नए जमाने की तकनीकों का दुरुपयोग कर रहे हैं। इनमें नए लोगों की भर्ती, युवाओं को कट्टरपंथी बनाना, दुष्प्रचार फैलाना, घातक अभियानों की योजना तैयार करना और अवैध आतंकी वित्तपोषण जुटाना शामिल है। यह पहलू आतंकवाद के खात्मे से जुड़ी भारत की छह प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। अन्य महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं का ब्योरा देते हुए उन्होंने बताया कि इनमें आतंकी फंडिंग पर पूरी तरह रोक लगाना, पीड़ितों को राहत और न्याय के केंद्र में रखना, राष्ट्रीय स्तर पर क्षमता निर्माण को सुदृढ़ करना, आतंकी विचारधारा का मजबूती से मुकाबला करना और उनके पूरे बुनियादी ढांचे को ध्वस्त करना शामिल है। इसका आप पर असर संयुक्त राष्ट्र में भारत के इस रुख से सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक कानून और नागरिकों की सुरक्षा नीतियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है। • राष्ट्रीय सुरक्षा पर: सीमा पार से होने वाले हमलों के खिलाफ भारत की जवाबी कार्रवाई और आत्मरक्षा नीति को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत आधार मिला है। यह नीतिगत स्पष्टता देश के सीमावर्ती क्षेत्रों और नागरिकों की रक्षा के प्रति सरकार की अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाती है। • वैश्विक आतंक-विरोधी नियमों पर: 30 साल से लंबित सीसीआईटी संधि लागू होने पर सभी देशों के लिए आतंकियों को शरण देना या उनकी फंडिंग करना गैरकानूनी हो जाएगा। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकी नेटवर्कों पर आर्थिक और राजनयिक पाबंदियां लगना बेहद आसान हो जाएगा। • साइबर सुरक्षा और आम जनजीवन पर: नई तकनीकों और सोशल मीडिया के जरिए युवाओं के कट्टरपंथीकरण और आतंकी प्रचार पर वैश्विक निगरानी बढ़ेगी। इसके परिणामस्वरूप डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निगरानी के नियम सख्त होंगे और ऑनलाइन सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होगी। • पीड़ितों के अधिकारों पर: भारत ने आतंक पीड़ितों को न्याय के केंद्र में रखने का प्रस्ताव दिया है। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकी हमलों के शिकार परिवारों को कानूनी समर्थन और मुआवजा दिलाने के तंत्र को मान्यता मिलेगी। ऐसा क्यों हुआ संयुक्त राष्ट्र महासभा की कानूनी मामलों से जुड़ी छठी समिति में भारत ने यह सख्त रुख इसलिए अपनाया क्योंकि 1996 से प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी समझौता कई देशों के दोहरे मानकों की वजह से अटका हुआ है। • पहलगाम हमले का प्रभाव: पिछले साल पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की जान चली गई थी, जिसकी जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा के छद्म संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट ने ली थी। भारत ने इस घटना के जरिए दुनिया को याद दिलाया कि सीमा पार से प्रायोजित नेटवर्क अब भी बेगुनाह लोगों को निशाना बना रहे हैं। • सीसीआईटी पर 30 साल का गतिरोध: भारत ने 1996 में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक सम्मेलन (सीसीआईटी) का मसौदा पेश किया था, लेकिन कुछ देशों ने इसमें अड़ंगा लगा रखा है। ये देश आतंकियों को 'अच्छे' और 'बुरे' में बांटते हैं और कुछ को 'स्वतंत्रता सेनानी' कहकर कानूनी कार्रवाई से बचाना चाहते हैं। • नई तकनीकों का बढ़ता दुरुपयोग: आतंकी गुट अब भर्ती, कट्टरपंथ फैलाने, प्रोपेगैंडा और फंडिंग के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन तकनीकी खतरों से निपटने के लिए पुराने नियम नाकाफी साबित हो रहे हैं, जिसके चलते नए वैश्विक कानूनी तंत्र की जरूरत पैदा हुई है। सवाल-जवाब 1. संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व किसने किया? भाजपा सांसद, पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब ने संयुक्त राष्ट्र में भारत का पक्ष रखा। 2. भारत ने किस आतंकी हमले का विशेष उल्लेख किया? भारत ने पिछले साल पहलगाम में हुए आतंकी हमले का उल्लेख किया, जिसमें 26 निर्दोष नागरिक मारे गए थे। 3. पहलगाम आतंकी हमले की जिम्मेदारी किस संगठन ने ली थी? पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा के छद्म संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट ने इस हमले की जिम्मेदारी ली थी। 4. सीसीआईटी (CCIT) क्या है और यह कब से अटका हुआ है? यह अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर एक व्यापक सम्मेलन का मसौदा है जिसे भारत ने 1996 में प्रस्तावित किया था, और यह पिछले 30 वर्षों से अटका हुआ है। 5. आतंकवाद से निपटने के लिए भारत की मुख्य प्राथमिकताएं क्या हैं? भारत की छह प्राथमिकताओं में आतंकी फंडिंग रोकना, नई तकनीकों के दुरुपयोग का मुकाबला करना, पीड़ितों को केंद्र में रखना, राष्ट्रीय क्षमता मजबूत करना, आतंकी बुनियादी ढांचे को ध्वस्त करना और आतंकी विचारधारा का सामना करना शामिल है। https://trendkia.com/national/snyukta-rashtra-men-india-ne-uthaya-pahalgam-narasnhara-ka-mudda-sima-para-atnka-ke-khilapha-kare-vaishvika-kanuna-ki-manga-44409 TrendKia — Har trend, sabse pehle.