सर्वोच्च न्यायालय में हिंदी को आधिकारिक कामकाजी जुबान बनाने की मांग खारिज, सीजेआई बोले यह बदलाव धीरे-धीरे होगा सुप्रीम कोर्ट ने कामकाज की भाषा हिंदी करने के लिए आयोग बनाने वाली याचिका खारिज कर दी है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि भाषाई बदलाव किसी अदालती आदेश से थोपने के बजाय प्रशासनिक स्तर पर चरणबद्ध रूप से ही संभव हैं। सर्वोच्च न्यायालय के दैनिक कामकाज और न्यायिक बहसों को पूर्ण रूप से हिंदी भाषा में आयोजित करने की गुहार लगाने वाली एक जनहित याचिका पर देश की शीर्ष अदालत ने विचार करने से साफ इनकार कर दिया है। ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रा की ओर से दायर इस याचिका में केंद्र सरकार को एक विशेष आयोग गठित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी, ताकि हिंदी को शीर्ष अदालत की आधिकारिक जुबान बनाने के संबंध में आवश्यक सिफारिशें तैयार की जा सकें। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने इस मांग को सिरे से नकारते हुए स्पष्ट कर दिया कि इस तरह के नीतिगत और भाषाई बदलाव किसी भी न्यायिक आदेश या डंडे के दम पर लागू नहीं किए जा सकते। पीठ के अनुसार यह समूचा विषय प्रशासनिक सूझबूझ और व्यावहारिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। अदालती आदेश से आयोग के गठन पर क्यों लगी रोक सुनवाई की शुरुआत में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने यह तर्क पेश किया कि भारतीय संविधान के नियमों और प्रावधानों के तहत अदालत केंद्र सरकार को इस संबंध में अध्ययन करने और एक समर्पित आयोग गठित करने का सीधा निर्देश जारी कर सकती है। इस दलील पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तत्काल टिप्पणी करते हुए स्थिति साफ की कि ऐसे गंभीर प्रशासनिक मुद्दे अदालती आदेश जारी करके तय नहीं किए जाते हैं। पीठ ने सख्त लहजे में अपनी बात रखते हुए कहा कि सुधारों के तहत यह प्रक्रिया बेहद धीरे-धीरे और क्रमवार तरीके से आगे बढ़ती है, तथा न्यायपालिका इस दिशा में स्वयं सक्रियता से आवश्यक कदम उठा रही है। शीर्ष अदालत का रुख पूरी तरह साफ था कि किसी न्यायिक निर्देश के सहारे समूची न्यायिक व्यवस्था की कामकाजी भाषा को रातोंरात बदलना कतई संभव नहीं है। फैसलों के सार में क्षेत्रीय भाषाओं और हिंदी का बढ़ता दायरा बहस के दौरान पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि देश की भाषाई विविधता और आम नागरिकों की जरूरतों को लेकर अदालत पहले से ही संवेदनशील और सतर्क दृष्टिकोण अपनाए हुए है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सुनवाई कक्ष में बताया कि सर्वोच्च न्यायालय अब अपने समस्त फैसलों का संक्षिप्त विवरण हिंदी में आम जनता को उपलब्ध करा रहा है, और आगे चलकर अन्य प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं में भी इस पहल को मजबूती से शुरू किया जाएगा। अदालत ने जोर देकर कहा कि देश की समृद्ध भाषाई संस्कृति का पूरा आदर और सम्मान कायम रखा जाएगा, जिसमें प्रत्येक क्षेत्रीय जुबान को उसकी गरिमा मिलेगी। व्यवस्था को हर वर्ग के लिए सुलभ और समावेशी बनाने के उद्देश्य से आधुनिक तकनीक और अनुवाद टूल्स का सहारा लगातार लिया जा रहा है, ताकि भाषा न्याय के मार्ग में बाधा न बने। भाषाई सुधारों पर शीर्ष अदालत की भावी कार्ययोजना न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस तीन जजों की पीठ ने याचिकाकर्ता को यह समझाया कि आंतरिक और प्रशासनिक स्तर पर भाषा सुधारों की यह प्रक्रिया निरंतर गतिमान है। किसी नए आयोग के गठन से व्यवस्था में रातोंरात क्रांतिकारी बदलाव आने के बजाय केवल नई प्रशासनिक जटिलताएं और अड़चनें ही खड़ी होंगी। सर्वोच्च न्यायालय हर नागरिक तक उसकी अपनी समझ योग्य भाषा में न्याय पहुंचाने के संकल्प के साथ ठोस और व्यावहारिक प्रगति कर रहा है। याचिकाकर्ता के लगातार आग्रह के बावजूद न्यायाधीशों ने इस जनहित याचिका को पूरी तरह खारिज करते हुए इस विषय की फाइल को औपचारिक रूप से बंद कर दिया। इसका आप पर असर सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से अदालती कार्यप्रणाली की भाषा को लेकर स्थिति साफ हो गई है और आम नागरिकों के लिए फैसलों के अनुवाद की मौजूदा प्रक्रिया सुचारु रहेगी। • राष्ट्रीय स्तर पर: शीर्ष अदालत में सभी सुनवाई और आधिकारिक कामकाज फिलहाल अंग्रेजी में ही जारी रहेंगे, जिससे देश भर के वकीलों और मुकदमों की व्यवस्था में कोई अचानक रुकावट नहीं आएगी। हालांकि, आम नागरिकों की सहूलियत के लिए निर्णयों के संक्षिप्त सार हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराने की व्यवस्था लगातार जारी रहेगी। • हिंदी भाषी राज्यों में: उत्तर भारत और हिंदी क्षेत्रों के वादियों को सीधे अदालती बहस हिंदी में सुनने की अनुमति तुरंत नहीं मिलेगी। इसके बावजूद, वे अपने मामलों के अंतिम फैसलों का मुख्य निष्कर्ष अपनी मातृभाषा में सरलता से पढ़ और समझ सकेंगे। • कानूनी पेशेवरों के लिए: विभिन्न राज्यों और गैर-हिंदी पृष्ठभूमि से आने वाले अधिवक्ताओं के लिए सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेजी ही मुख्य माध्यम बनी रहेगी। इससे भाषाई जटिलताओं के बिना सभी राज्यों के वकीलों के लिए शीर्ष अदालत में वकालत करना पहले जैसा सुगम रहेगा। • तकनीकी उपयोग पर: न्यायिक निर्णयों के अनुवाद के लिए आधुनिक अनुवाद प्रणालियों और तकनीक का विस्तार पहले की तरह जारी रहेगा। इससे आने वाले समय में आम लोगों को विभिन्न प्रांतीय भाषाओं में फैसले तेजी से पढ़ने को मिलेंगे। ऐसा क्यों हुआ यह याचिका इसलिए खारिज की गई क्योंकि अदालत का मानना है कि भाषाई बदलाव एक नीतिगत और प्रशासनिक विषय है, जिसे न्यायिक फरमान से लागू नहीं किया जा सकता। • न्यायिक सीमाओं का सिद्धांत: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि कामकाज की जुबान बदलना पूरी तरह नीतिगत और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा मामला है। अदालती निर्देशों के जरिए सरकार पर ऐसा कोई भाषाई फैसला थोपना व्यावहारिक सुधार के बजाय नई अड़चनें पैदा कर सकता है। • क्रमबद्ध सुधारों की नीति: सुप्रीम कोर्ट पहले से ही अपने फैसलों के संक्षिप्त विवरण हिंदी में उपलब्ध करा रहा है और भविष्य में इसे अन्य प्रांतीय भाषाओं में भी लागू करने की तैयारी में है। अचानक किसी आयोग के गठन से पूरी प्रणाली पर अनावश्यक दबाव बनता, इसलिए अदालत ने आंतरिक और चरणबद्ध विकास को प्राथमिकता दी। • देश की भाषाई विविधता: भारत के बहुभाषी ढांचे में केवल एक भाषा को तुरंत अनिवार्य बनाने से गैर-हिंदी भाषी वकीलों और राज्यों के लिए असंतुलन खड़ा हो सकता था। अदालत का जोर सभी क्षेत्रीय भाषाओं को सम्मान देने और तकनीक के माध्यम से न्याय को सुलभ बनाने पर है। सवाल-जवाब 1. सुप्रीम कोर्ट में क्या याचिका दायर की गई थी? याचिका में केंद्र सरकार को एक आयोग बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी, ताकि हिंदी को सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक कामकाजी भाषा बनाया जा सके। 2. यह जनहित याचिका किसने दायर की थी? यह याचिका ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रा द्वारा दायर की गई थी। 3. मामले की सुनवाई किस पीठ ने की? इस याचिका की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने की। 4. सुप्रीम कोर्ट ने आयोग गठित करने का आदेश देने से इनकार क्यों किया? अदालत ने कहा कि भाषाई बदलाव न्यायिक आदेशों से नहीं थोपे जा सकते, बल्कि यह व्यवस्था और प्रशासनिक स्तर पर चरणबद्ध रूप से होने वाले सुधार हैं। 5. आम लोगों के लिए सुप्रीम कोर्ट वर्तमान में क्या भाषाई कदम उठा रहा है? सुप्रीम कोर्ट अब अपने फैसलों का संक्षिप्त सार हिंदी में जारी कर रहा है और आगे इसे अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी विस्तारित करने की योजना है। https://trendkia.com/national/supreme-court-men-hindi-ko-adhikarika-kamakaji-jubana-banane-ki-manga-kharija-cji-bole-yaha-badalava-dhire-dhire-hoga-38479 TrendKia — Har trend, sabse pehle.