{
  "type": "article",
  "title": "पैकेज्ड फूड पर चेतावनी लेबल में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, एफएसएसएआई और केंद्र सरकार से दो हफ्ते में मांगा अंतिम जवाब",
  "summary": "सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड फूड पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल लागू करने में हो रही देरी पर केंद्र सरकार और एफएसएसएआई को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने बच्चों की सेहत पर गहरी चिंता जताते हुए अंतिम निर्णय रिकॉर्ड पर रखने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है।",
  "content": "भारत में पैकेज्ड खाद्य पदार्थों में चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की अत्यधिक मात्रा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। पैकेज्ड फूड के फ्रंट पर स्पष्ट चेतावनी लेबल लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) और केंद्र सरकार को तीखी फटकार लगाई। अदालत ने बच्चों में अस्वास्थ्यकर खानपान की बढ़ती आदत और इससे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों पर गहरी चिंता जताई। पीठ ने कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के मामले में किसी भी तरह की ढिलाई स्वीकार नहीं की जाएगी और सरकार तथा नियामक संस्था को अपनी अंतिम नीति स्पष्ट करने के लिए 14 दिनों की मोहलत दी।\n\nबच्चों की सेहत और पैकेज्ड स्नेक्स की बढ़ती पहुंच पर अदालत की चिंता\nअदालत की सुनवाई के दौरान देश में बच्चों के खानपान के विकल्पों पर गंभीर चर्चा हुई। आज के दौर में आम परिवारों के लिए महंगे सूखे मेवे नियमित रूप से खरीद पाना कठिन है, जबकि चिप्स, नमकीन और तरह-तरह के पैकेज्ड स्नैक्स हर छोटी-बड़ी दुकान पर आसानी से उपलब्ध हैं। यही वजह है कि बच्चे इन पैकेटबंद खाद्य पदार्थों की तरफ तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि जब छोटे बच्चे इन चीजों के आदी हो रहे हैं, तो अभिभावकों और उपभोक्ताओं को यह जानने का पूरा अधिकार है कि पैकेट के अंदर क्या है। अगर किसी उत्पाद में चीनी, वसा या नमक की मात्रा तय सीमा से अधिक है, तो उसकी जानकारी पैकेट के सामने साफ शब्दों में दिखाई देनी चाहिए ताकि लोग खरीदारी के वक्त सही फैसला ले सकें।\n\nजस्टिस पारदीवाला की सख्त टिप्पणी: क्या जनस्वास्थ्य प्राथमिकता नहीं है?\nसुनवाई के दौरान जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने सरकार और नियामक संस्था के सुस्त रवैये पर भारी नाराजगी जताई। जस्टिस पारदीवाला ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बृजेंद्र चहार से तीखे सवाल करते हुए पूछा कि क्या सरकार देश के नागरिकों और खास तौर पर बढ़ते बच्चों को स्वस्थ नहीं देखना चाहती? उन्होंने स्पष्ट किया कि यह याचिका पूरी तरह से जनहित से जुड़ी है और अदालत इसे बेहद गंभीरता से ले रही है। पीठ ने सरकार से पूछा कि क्या नियामक संस्था पर किसी प्रकार का दबाव है या वह स्वयं आदेश का पालन करेगी, अन्यथा अदालत को अपनी ओर से सख्त दिशा-निर्देश जारी करने पड़ेंगे।\n\nपारंपरिक खाद्य उद्योग का तर्क और एफएसएसएआई की दलीलें\nसरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बृजेंद्र चहार ने अदालत में उद्योग जगत की व्यावहारिक कठिनाइयों को सामने रखा। उन्होंने दलील दी कि देश में लगभग एक-तिहाई व्यापारिक उद्यम पारंपरिक खाद्य पदार्थों से जुड़े हुए हैं। अगर चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट के कड़े मापदंडों के आधार पर पैकेट के सामने चेतावनी लेबल लगाना अनिवार्य किया गया, तो नमकीन जैसे पारंपरिक भारतीय स्नैक्स भी अनहेल्दी या अस्वास्थ्यकर श्रेणी में आ जाएंगे। इससे इस व्यापक कुटीर और लघु उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि व्यावसायिक हितों के कारण आम जनता और बच्चों के स्वास्थ्य के मानकों से समझौता नहीं किया जा सकता।\n\nकेरल के एनजीओ की याचिका और वैश्विक मानकों की आवश्यकता\nयह पूरा मामला केरल स्थित गैर-सरकारी संगठन 3S एंड आवर हेल्थ सोसाइटी द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि भारत में मिलने वाले पैकेज्ड फूड पर पोषण संबंधी जानकारी इतनी जटिल या छोटे अक्षरों में लिखी होती है कि आम उपभोक्ता उसे समझ नहीं पाता। इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाई जाने वाली फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग प्रणाली को भारत में भी लागू किया जाना चाहिए। एफएसएसएआई ने अपने पिछले हलफनामे में स्वीकार किया था कि ऐसी चेतावनी व्यवस्था वैश्विक प्रथाओं के अनुकूल है और इससे उपभोक्ताओं को आसान भाषा में पोषण की जानकारी मिलती है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसके क्रियान्वयन की रफ्तार बेहद धीमी रही है।\n\nदो सप्ताह का अल्टीमेटम: अवहेलना पर सुप्रीम कोर्ट खुद जारी करेगा निर्देश\nसुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गहरा असंतोष व्यक्त किया कि लंबे समय से चल रही इस प्रक्रिया में अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। पीठ ने केंद्र सरकार और एफएसएसएआई को अपनी अंतिम नीति और निर्णय को रिकॉर्ड पर लाने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि निर्धारित समयसीमा के भीतर नियामक और सरकार अपना रुख साफ नहीं करते हैं, तो अगली सुनवाई में शीर्ष अदालत स्वयं इस विषय पर अंतिम फैसला और बाध्यकारी दिशा-निर्देश सुना देगी।\n\nइसका आप पर असर\nभारत भर में: पैकेज्ड फूड खरीदने वाले परिवारों को जल्द ही चिप्स, स्नैक्स और बिस्कुट के पैकेट के सामने चीनी, नमक और फैट की अधिकता के साफ चेतावनी लेबल देखने को मिल सकते हैं।\n\nउपभोक्ताओं और अभिभावकों के लिए: बच्चों के लिए डिब्बाबंद या पैकेटबंद खाना खरीदते समय माता-पिता को पोषण संबंधी जानकारी आसानी से समझ आ सकेगी, जिससे अस्वास्थ्यकर स्नैक्स से बचा जा सकेगा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सुप्रीम कोर्ट ने एफएसएसएआई और केंद्र सरकार को क्यों फटकार लगाई?\nपैकेज्ड फूड पर चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की अधिकता के लिए फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल लागू करने में हो रही देरी के कारण कोर्ट ने फटकार लगाई।\n\n2. यह मामला किस याचिका से जुड़ा हुआ है?\nयह मामला केरल स्थित एनजीओ 3S एंड आवर हेल्थ सोसाइटी द्वारा दायर याचिका पर आधारित है, जिसमें पैकेज्ड फूड पर स्पष्ट पोषण संबंधी चेतावनी की मांग की गई है।\n\n3. सरकार ने अदालत में पारंपरिक खाद्य उद्योग के पक्ष में क्या दलील दी?\nसरकार की ओर से कहा गया कि देश में करीब एक-तिहाई उद्यम पारंपरिक खाद्य पदार्थों से जुड़े हैं और सख्त नियमों से नमकीन जैसी पारंपरिक चीजें भी अस्वास्थ्यकर श्रेणी में आ सकती हैं।\n\n4. सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला पेश करने के लिए कितना समय दिया है?\nअदालत ने केंद्र सरकार और एफएसएसएआई को अपनी अंतिम नीति और निर्णय रिकॉर्ड पर रखने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है।",
  "url": "https://trendkia.com/national/supreme-court-ne-fssai-aura-kendra-sarakara-se-paikejda-phuda-para-chetavani-lebala-ke-lie-2-haphte-men-manga-javaba-16529",
  "category": "भारत",
  "publishedAt": "2026-08-14",
  "tags": [
    "सुप्रीम कोर्ट",
    "एफएसएसएआई",
    "पैकेज्ड फूड",
    "जनस्वास्थ्य",
    "बच्चों का स्वास्थ्य",
    "खाद्य सुरक्षा",
    "जस्टिस जेबी पारदीवाला"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}