# तलाक के बाद दोबारा शादी करना मानवाधिकार, अपील के नाम पर सालों तक रोकना गलत - मद्रास हाईकोर्ट

> मद्रास हाईकोर्ट ने तलाक के बाद दूसरी शादी से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए शादी के अधिकार को मानवाधिकार बताया है। अदालत ने हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 15 में संशोधन की जरूरत पर बल दिया।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-08-21 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/talaka-ke-bada-dobara-shadi-karana-manavadhikara-apila-ke-nama-para-salon-taka-rokana-galata-madras-high-court-19636 · **Language:** Hindi
**Tags:** मद्रास हाईकोर्ट, हिंदू मैरिज एक्ट, तलाक कानून, मानवाधिकार, दूसरी शादी नियम, फैमिली कोर्ट, कानूनी खबर

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने वैवाहिक अधिकारों पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि विवाह करने का अधिकार मनुष्य का एक मौलिक मानवाधिकार है। जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस एमडी सुमति की खंडपीठ ने कहा कि कानून में शादी करने पर लगाई गई किसी भी पाबंदी या शर्त की व्याख्या बहुत सख्ती से की जानी चाहिए। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि तलाक के फैसलों के खिलाफ सालों तक लंबित रहने वाली अपीलों के कारण व्यक्ति दूसरी शादी नहीं कर पाता, जो कि किसी भी दृष्टिकोण से न्यायसंगत नहीं है। इस स्थिति को सुधारने के लिए हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और विधायिका को हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 15 में जरूरी बदलाव करने का महत्वपूर्ण सुझाव दिया है।

## फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील और पत्नी की दूसरी शादी
यह पूरा मामला साल 2001 में हुए एक विवाह से जुड़ा हुआ है। इस शादी से दंपति के दो बच्चे भी हैं। वैवाहिक जीवन में कड़वाहट आने के बाद पत्नी ने पति पर मानसिक क्रूरता और प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाते हुए तलाक की याचिका दाखिल की थी। फैमिली कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए 2001 में हुए इस विवाह को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया था। फैमिली कोर्ट के इस आदेश को पति ने मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी। हालांकि, हाईकोर्ट में अपील दायर होने के बाद भी पति को तलाक के फैसले पर कोई अंतरिम स्टे हासिल नहीं हुआ था। इसी बीच, निचली अदालत से तलाक की मंजूरी मिलने के आधार पर पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया।

## धारा 15 की कानूनी व्याख्या और संशोधन का सुझाव
जब पति की अपील पर हाईकोर्ट में सुनवाई शुरू हुई, तो अदालत को सूचित किया गया कि पत्नी पहले ही दूसरा विवाह कर चुकी है। ऐसे में पति की लंबित अपील के भविष्य और दूसरी शादी की वैधता को लेकर कानूनी सवाल खड़े हो गए। इस पर हाईकोर्ट ने हिंदू मैरिज एक्ट 1955 की धारा 15 के प्रावधानों का बारीकी से विश्लेषण किया। वर्तमान में लागू कानून के अनुसार, तलाक के बाद कोई व्यक्ति केवल तीन स्थितियों में ही दूसरा विवाह कर सकता है। पहली स्थिति यह है कि जब तलाक के फैसले के खिलाफ अपील करने का कोई कानूनी अधिकार न बचा हो। दूसरी स्थिति में अपील करने के लिए तय की गई समय सीमा समाप्त हो चुकी हो, और तीसरी स्थिति तब बनती है जब अपील दायर ही न की गई हो या फिर दायर अपील खारिज हो चुकी हो।

हाईकोर्ट की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि महज इसलिए कि किसी व्यक्ति ने तय समय सीमा के भीतर तलाक के खिलाफ अपील दाखिल कर दी है, दूसरे पक्ष को सालों तक दूसरी शादी करने से रोक कर नहीं रखा जा सकता। अदालत ने सुझाव दिया कि यदि अपील दायर करने वाला व्यक्ति चाहता है कि दूसरा पक्ष शादी न करे, तो उसे अपील दाखिल करने के दो महीने के भीतर अदालत से अंतरिम स्टे प्राप्त करना अनिवार्य होना चाहिए। पीठ ने कहा कि हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 15 में इसी व्यवस्था के अनुसार संशोधन किया जाना चाहिए ताकि अपील लंबित रहने के नाम पर किसी का जीवन अधर में न लटका रहे।

## गैर-पैरवी में खारिज अपील और सुप्रीम कोर्ट के नज़ीर का जिक्र
मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने एक और गंभीर कानूनी स्थिति पर प्रकाश डाला। अदालत ने कहा कि यदि तलाक के खिलाफ दायर अपील डिफॉल्ट यानी गैर-पैरवी के कारण खारिज हो जाती है, तो धारा 15 के तहत लगाई गई पाबंदी का कानूनी प्रभाव स्वतः समाप्त हो जाता है। यदि बाद में उस खारिज हुई अपील को दोबारा बहाल कराने की अर्जी दी जाती है और तब तक दूसरा पक्ष अपनी दूसरी शादी कर चुका होता है, तो ऐसी स्थिति में बहाल हुई अपील को बिना किसी परिणाम वाली मानकर निरस्त कर दिया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उस समय यह बात पूरी तरह अप्रासंगिक होगी कि दूसरा विवाह किस विशिष्ट तारीख को हुआ था।

अपने इस ऐतिहासिक निर्णय को मजबूती देने के लिए मद्रास हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध लैला गुप्ता बनाम लक्ष्मी नारायण मामले का विशेष रूप से उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में व्यवस्था दी थी कि धारा 15 के नियमों का उल्लंघन करके किया गया विवाह अपने आप में न तो अवैध (शून्य) होता है और न ही निरस्त करने योग्य। हाईकोर्ट ने चिंता व्यक्त की कि स्पष्ट कानून के अभाव में एक वैध दूसरे विवाह का भविष्य लंबे समय तक चलने वाली अनिश्चित अपीलों पर निर्भर हो जाता है, जिसे खत्म करना अत्यंत आवश्यक है।

## पति द्वारा चरित्र पर शक करना मानसिक क्रूरता
मूल मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पति द्वारा पत्नी के चरित्र पर उठाए गए सवालों को बेहद गंभीरता से लिया। पीठ ने कड़े शब्दों में कहा कि जीवनसाथी के चरित्र या निष्ठा पर संदेह करना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। चाहे यह संदेह प्रत्यक्ष रूप से बोलकर व्यक्त किया गया हो या फिर इशारों और आचरण के जरिए दर्शाया गया हो, दोनों ही स्थितियां पीड़ित पक्ष के लिए असहनीय मानसिक पीड़ा का कारण बनती हैं।

अदालत ने माना कि पत्नी के चरित्र पर निराधार आरोप लगाना ही अपने आप में विवाह को समाप्त करने का पर्याप्त आधार है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी के हक में सुनाए गए तलाक के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया और उसे बरकरार रखा। अदालत के इस फैसले से यह संदेश साफ हो गया है कि वैवाहिक संबंधों में चरित्र हनन को कानून किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं करेगा।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** यह फैसला तलाक के मामलों से गुजर रहे देश भर के लोगों के लिए राहत भरा है, क्योंकि अब केवल अपील पेंडिंग रहने के नाम पर दूसरी शादी को सालों तक नहीं लटकाया जा सकेगा।

**तमिलनाडु में:** मद्रास हाईकोर्ट के इस आदेश से राज्य की फैमिली कोर्ट्स में पेंडिंग अपीलों के निपटारे में तेजी आएगी और अंतरिम स्टे की 2 महीने की समय सीमा को लेकर स्पष्टता बनेगी।

## सवाल-जवाब

### 1. मद्रास हाईकोर्ट ने शादी के अधिकार पर क्या फैसला दिया?
अदालत ने कहा कि शादी करने का अधिकार एक मौलिक मानवाधिकार है और तलाक के बाद अपील लंबित रहने के कारण किसी व्यक्ति की दूसरी शादी को सालों तक रोकना अनुचित है।

### 2. हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 15 में क्या बदलाव का सुझाव दिया गया है?
हाईकोर्ट ने सुझाव दिया कि यदि अपीलकर्ता चाहता है कि दूसरा पक्ष दोबारा शादी न करे, तो उसे 2 महीने के भीतर अंतरिम स्टे प्राप्त करना अनिवार्य होना चाहिए।

### 3. क्या अपील लंबित रहने के दौरान हुई दूसरी शादी रद्द हो जाती है?
सुप्रीम कोर्ट के लैला गुप्ता मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 15 के उल्लंघन में की गई शादी स्वतः अमान्य या रद्द करने योग्य नहीं होती।

### 4. जीवनसाथी के चरित्र पर शक करने को लेकर कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति या पत्नी के चरित्र पर संदेह करना मानसिक क्रूरता है, चाहे वह प्रत्यक्ष रूप से कहा गया हो या इशारों में दर्शाया गया हो।

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