पीओके पर भारत का दावा क्यों है अकाट्य? जानिए उस ऐतिहासिक दस्तावेज का पूरा सच जो दिल्ली में है सुरक्षित पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आजादी की सुलगती आग और विरोध प्रदर्शनों के बीच आइए जानते हैं उस कानूनी दस्तावेज के बारे में, जो यह साबित करता है कि पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है। पाकिस्तान के अवैध नियंत्रण वाले क्षेत्र यानी PoK में इन दिनों पाकिस्तान शासन के खिलाफ असंतोष और मुक्ति की मांग तेज होती जा रही है। फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की सेना द्वारा निहत्थे नागरिकों पर ढहाए जा रहे जुल्मों और सैन्य कार्रवाइयों के बावजूद वहां के बाशिंदे भारत में शामिल होने के लिए बेताब हैं और लगातार मदद की गुहार लगा रहे हैं। भारत के पास इस क्षेत्र पर अपना दावा मजबूत करने और वहां के लोगों की मदद करने का कानूनी अधिकार है। यह अधिकार एक ऐसे ऐतिहासिक दस्तावेज से आता है, जिसकी हर एक पंक्ति पाकिस्तान और चीन जैसी ताकतों को बेचैन करने के लिए काफी है। वर्तमान में यह बेहद अहम दस्तावेज देश की सबसे सुरक्षित जगह पर संरक्षित है। विलय पत्र: PoK पर भारत के अधिकार का कानूनी प्रमाण भारत सरकार दुनिया के मंचों पर यह स्पष्ट करती रही है कि संपूर्ण कश्मीर देश का अभिन्न अंग है। यह महज कोई राजनीतिक बयानबाजी नहीं है, बल्कि इसके समर्थन में ठोस और अकाट्य दस्तावेज मौजूद हैं। कश्मीर के अतीत का यह अहम पन्ना ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेस’ यानी विलय पत्र कहलाता है। यही वो कानूनी और ऐतिहासिक प्रलेख है जो इस बात की गवाही देता है कि PoK समेत पूरा जम्मू-कश्मीर कानूनी तौर पर भारत का हिस्सा है। साल 1947 का वह दौर जिसने कश्मीर के भाग्य को बदला इस पूरी कानूनी और राजनीतिक यात्रा की नींव वर्ष 1947 में पड़ी, जब उपमहाद्वीप में भारत और पाकिस्तान के रूप में दो नए संप्रभु राष्ट्रों का उदय हुआ। ब्रिटिश राज के समाप्त होने पर रियासतों को यह विकल्प दिया गया था कि वे अपनी इच्छा से भारत या पाकिस्तान में से किसी एक का चुनाव कर सकती हैं अथवा स्वतंत्र रह सकती हैं। रियासत के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने शुरुआत में अपनी रियासत को स्वतंत्र बनाए रखने का निर्णय लिया था, जिसका सभी पक्षों ने सम्मान किया था। हालांकि पाकिस्तान की नीयत में खोट था और वह किसी भी तरह इस भूभाग को हड़पना चाहता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान ने कबायलियों की आड़ में अपनी सेना को कश्मीर में घुसपैठ के लिए भेज दिया। पाकिस्तानी हमलावरों का एकमात्र उद्देश्य बल प्रयोग कर घाटी पर कब्जा जमाना था। जब हमलावर श्रीनगर के बाहरी इलाकों तक पहुंच गए और वहां भारी रक्तपात तथा तबाही मचाने लगे, तब महाराजा हरि सिंह को अहसास हुआ कि पाकिस्तानी नेतृत्व पर भरोसा करना उनकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल थी। 26 अक्टूबर 1947: जब कानूनी रूप से तय हुआ कश्मीर का भविष्य जब पाकिस्तानी घुसपैठिए तेजी से आगे बढ़ रहे थे, तब महाराजा हरि सिंह ने भारतीय प्रशासनिक नेतृत्व से सैन्य सहायता का आग्रह किया। देश के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का रुख इस मामले में बिल्कुल स्पष्ट था कि जब तक जम्मू-कश्मीर विधिवत रूप से भारत का कानूनी हिस्सा नहीं बन जाता, तब तक भारतीय सेना अपने सैनिकों के प्राण जोखिम में डालकर वहां हस्तक्षेप नहीं करेगी। परिणामस्वरूप 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह ने ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेस’ पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके ठीक अगले दिन यानी 27 अक्टूबर 1947 को तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने इस विलय समझौते को अपनी औपचारिक स्वीकृति प्रदान कर दी। इन हस्ताक्षरों के साथ ही संपूर्ण जम्मू-कश्मीर कानूनी तौर पर भारत संघ का अभिन्न अंग बन गया। इसके तुरंत बाद भारतीय सेना के वीर जवानों को विमानों के जरिए श्रीनगर पहुंचाया गया, जिन्होंने तेजी से आगे बढ़ते हुए पाकिस्तानी हमलावरों को पीछे खदेड़ना शुरू कर दिया। कहां सुरक्षित रखा गया है वह ऐतिहासिक दस्तावेज? आम जनमानस के मन में अक्सर यह जिज्ञासा होती है कि वह कौन सा कागजात है जिसके आधार पर भारत वैश्विक मंचों पर PoK पर अपना दावा पेश करता है और आज वह मूल दस्तावेज कहां सुरक्षित है। क्या यह केवल इतिहास की पुस्तकों तक सीमित है या भौतिक रूप से हमारे पास मौजूद है? इसका सीधा उत्तर यह है कि 26 अक्टूबर 1947 का वह मूल विलय पत्र आज भी भारत सरकार के पास अत्यंत सुरक्षित स्थिति में संरक्षित है। यह ऐतिहासिक दस्तावेज नई दिल्ली स्थित ‘नेशनल आर्काइव ऑफ इंडिया’ में एक विशेष जलवायु-नियंत्रित और सुरक्षित वातावरण में रखा गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अभिलेखों के अंतर्गत सहेजे गए इस कागज पर महाराजा हरि सिंह के वास्तविक हस्ताक्षर और लॉर्ड माउंटबेटन की आधिकारिक मुहर अंकित है। यही वह अकाट्य कानूनी साक्ष्य है जिसके कारण दुनिया का कोई भी अन्य राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय अदालतों या मंचों पर भारत के इस संप्रभु दावे को चुनौती नहीं दे सकता है। युद्धविराम और आधा हिस्सा पाकिस्तान के अवैध कब्जे में कैसे गया? जब भारतीय सेना ने वर्ष 1947 के उत्तरार्ध में पाकिस्तानी घुसपैठियों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई तेज की, तो वे रियासत के एक बड़े भूभाग को मुक्त करा चुके थे। हालांकि, पाकिस्तानी घुसपैठियों का पूरी तरह सफाया होने से पहले ही यह कूटनीतिक मामला संयुक्त राष्ट्र में पहुंच गया और 1 जनवरी 1949 को युद्धविराम लागू कर दिया गया। संघर्ष विराम की घोषणा के समय दोनों सेनाएं जिस स्थिति में थीं, वहीं एक सीमा रेखा खींच दी गई जिसे बाद में नियंत्रण रेखा यानी लाइन ऑफ कंट्रोल के रूप में जाना गया। जम्मू-कश्मीर का जो क्षेत्र पाकिस्तानी सेना के अवैध नियंत्रण में छूट गया, उसे आज PoK के नाम से पुकारा जाता है। पाकिस्तान ने इस क्षेत्र का नाम भले ही ‘आजाद कश्मीर’ रख छोड़ा हो, परंतु वास्तविकता यह है कि वहां के नागरिक आज भी भीषण अभाव, गरीबी और दमनकारी गुलामी का जीवन जीने को अभिशप्त हैं। भारतीय संविधान और संसद में PoK के लिए आरक्षित सीटें भारतीय संविधान इस बात को स्पष्ट रूप से स्वीकार करता है कि संपूर्ण जम्मू-कश्मीर राज्य भारत भूभाग का अटूट हिस्सा है। इसी संवैधानिक भावना के तहत जम्मू-कश्मीर विधानसभा में PoK के नेतृत्व के प्रतिनिधित्व के लिए 24 सीटें आज भी रिक्त छोड़ी जाती हैं। जब भी इस केंद्र शासित प्रदेश में लोकतांत्रिक चुनाव संपन्न होते हैं, तब इन 24 सीटों पर किसी उम्मीदवार का चुनाव नहीं कराया जाता, बल्कि इन्हें इस विश्वास के साथ सुरक्षित रखा जाता है कि भविष्य में जब PoK भारत में पुनर्मिलित होगा, तब वहां के स्थानीय लोग अपने प्रतिनिधि चुनकर विधानसभा में भेजेंगे। इसके अतिरिक्त, 22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद के दोनों सदनों द्वारा सर्वसम्मति से एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया गया था। इस संकल्प के माध्यम से वैश्विक समुदाय को एक स्पष्ट संदेश दिया गया था कि PoK भारत का अभिन्न अंग है और पाकिस्तान को अपने अवैध कब्जे वाले इस क्षेत्र को हर हाल में खाली करना होगा। PoK के बाशिंदे भारत वापसी के लिए क्यों हैं व्यग्र? वर्तमान समय में PoK के हालात किसी से छिपे नहीं हैं। वहां के स्थानीय निवासी पाकिस्तानी हुक्मरानों और सेना के अत्याचारों तथा दमन चक्र से पूरी तरह त्रस्त आ चुके हैं। PoK क्षेत्र में आसमान छूते बिजली के बिल, आटा और चावल जैसी बुनियादी खाद्य वस्तुओं की गंभीर किल्लत तथा मानवाधिकारों का निरंतर हनन रोजमर्रा की आम बात बन चुकी है। पाकिस्तान इस क्षेत्र का उपयोग केवल अपने स्वार्थ के लिए करता आ रहा है। इसका आप पर असर भारत में: यह दस्तावेज भारत की संप्रभुता और भौगोलिक अखंडता के कानूनी आधार को मजबूत करता है। जम्मू-कश्मीर में: यह स्पष्ट करता है कि राज्य की विधानसभा में PoK के लिए आरक्षित 24 सीटें राजनीतिक और संवैधानिक रूप से वैध हैं। सवाल-जवाब 1. PoK भारत का हिस्सा है, यह बात किस दस्तावेज से साबित होती है? PoK समेत पूरे कश्मीर पर भारत का हक 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेस' यानी विलय पत्र से साबित होता है। 2. विलय पत्र पर कब हस्ताक्षर किए गए थे? महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को इस विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। 3. वर्तमान में मूल विलय पत्र कहां सुरक्षित रखा गया है? यह ऐतिहासिक दस्तावेज नई दिल्ली स्थित 'नेशनल आर्काइव ऑफ इंडिया' में सुरक्षित रखा गया है। 4. भारतीय विधानसभा में PoK के लिए कितनी सीटें खाली रखी जाती हैं? जम्मू-कश्मीर विधानसभा में PoK के प्रतिनिधित्व के लिए 24 सीटें आज भी खाली रखी जाती हैं। https://trendkia.com/national/the-historic-document-proving-pok-belongs-to-india-and-why-residents-are-demanding-reintegration-21875 TrendKia — Har trend, sabse pehle.