त्रिपुरा में तीन दिन का चक्का जाम, सात पूर्व विद्रोही गुटों ने सरकार के खिलाफ खोला मोर्चा त्रिपुरा में आत्मसमर्पण करने वाले सात विद्रोही संगठनों ने असम-अगरतला राष्ट्रीय राजमार्ग को अनिश्चितकाल के लिए अवरुद्ध करते हुए बहत्तर घंटे का बंद शुरू कर दिया है। ये संगठन सरकार के साथ हुए शांति समझौतों को तेजी से लागू करने और अपनी ग्यारह सूत्रीय मांगों को पूरा करने की पुरजोर मांग कर रहे हैं। त्रिपुरा की वादियों में उस वक्त तनाव बढ़ गया जब मुख्यधारा में लौट चुके सात पूर्व विद्रोही संगठनों ने असम-अगरतला राष्ट्रीय राजमार्ग पर बहत्तर घंटे के पूर्ण बंद और चक्का जाम का बिगुल फूंक दिया। शुक्रवार की सुबह से ही बरामुरा के चंद्र साधुपाड़ा क्षेत्र में इन संगठनों के सदस्य और समर्थक बड़ी संख्या में जमा हो गए। सड़क के बीचों-बीच टायर जलाए गए और आवाजाही पूरी तरह से बाधित कर दी गई। इस विरोध प्रदर्शन के चलते परिवहन व्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई और हाईवे पर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं, जिससे यात्रियों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। कौन से संगठन कर रहे हैं प्रदर्शन इस बड़े आंदोलन में कुल सात प्रमुख गुट मिलकर हिस्सा ले रहे हैं। इनमें नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा यानी एनएलएफटी ओरिजिनल, एनएलएफटी परिमल देबारमा गुट, ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स, एनएलएफटी नयन बाशी गुट, ज्वाइंट एक्शन रिहैबिलिटेशन कमेटी, ज्वाइंट एक्शन कमेटी और ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स का पुराना धड़ा शामिल है। इन सभी समूहों का मुख्य उद्देश्य सरकार को उन पुराने वादों की याद दिलाना है जो उन्होंने हथियार छोड़ने के वक्त किए थे। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि दशकों के संघर्ष के बाद वे सामान्य जीवन में लौटे थे, लेकिन प्रशासन उनकी अनदेखी कर रहा है। बंद का असर और यातायात संकट सड़क मार्ग के अलावा इस राष्ट्रव्यापी या क्षेत्रीय बंद का असर अन्य परिवहन माध्यमों पर भी साफ देखा गया। रेलवे ट्रैक पर बिघुदास के पास और सड़क मार्ग पर खोवाई चौमुहानी इलाके में भी ब्लॉकेड किए जाने की खबरें सामने आई हैं। जगह-जगह टायर जलाकर विरोध जताए जाने के कारण स्थिति तनावपूर्ण हो गई। हजारों यात्री विभिन्न स्थानों पर फंस गए। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी संख्या में पुलिस बल को तैनात किया गया है। पश्चिम त्रिपुरा के जिला पुलिस अधीक्षक नमित पाठक खुद घटनास्थल पर पहुंचे और स्थिति का जायजा लेते हुए प्रदर्शनकारियों से बातचीत के प्रयास शुरू किए ताकि किसी तरह यातायात को सुचारू बनाया जा सके। विद्रोहियों की पुरानी शिकायतें आंदोलन की अगुवाई कर रहे धड़ों का तर्क है कि वे लंबे वक्त तक सशस्त्र संघर्ष का हिस्सा रहे थे और बाद में शासकीय समझौतों के तहत सामान्य जीवन में वापस आए। उनका मुख्य आरोप है कि समझौतों के बावजूद कागजी वादों को जमीन पर नहीं उतारा गया है। इस संदर्भ में नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा के नेता थॉमस त्रिपुरा ने जानकारी दी कि उनके संगठन ने करीब पैंतीस साल तक संघर्ष का रास्ता अपनाया था। उनके अनुसार कुल सात से आठ संगठन इस पूरी शांति प्रक्रिया से गहराई से जुड़े रहे हैं, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती के कारण असंतोष लगातार बढ़ रहा है। समझौते की समयसीमा और शर्तें थॉमस त्रिपुरा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि त्रिपक्षीय समझौते के दौरान यह तय हुआ था कि आगामी दो हजार अट्ठाइस तक यानी चार वर्षों की समयसीमा के भीतर सभी बिंदुओं को पूरी तरह से लागू कर दिया जाएगा। लेकिन वर्तमान हालात को देखते हुए ऐसा लगता है कि सरकार की तरफ से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। उन्होंने दोहराया कि केंद्रीय और राज्य स्तर पर जिन बातों पर सहमति बनी थी, उन्हें अमल में लाने के लिए ही आज उन्हें इस कठोर आंदोलन का मार्ग चुनना पड़ा है। उनके मुताबिक यह सिर्फ कुछ नेताओं का विरोध नहीं है, बल्कि इसमें नागरिक समाज और स्थानीय जनता का भी पूरा समर्थन मिल रहा है. चार सितंबर का त्रिपक्षीय शांति समझौता इन तमाम प्रदर्शनों के केंद्र में चार सितंबर दो हजार चौबीस को हुआ वह ऐतिहासिक त्रिपक्षीय शांति समझौता है, जिसे केंद्र सरकार, त्रिपुरा प्रशासन और संबंधित समूहों के बीच शांति स्थापना का एक बड़ा मील का पत्थर माना गया था। मुख्यधारा में लौटे कैडरों का कहना है कि समझौते के दस्तावेजों में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर रजामंदी हुई थी, परंतु धरातल पर उसकी अनुपालना नहीं हो सकी। संगठन अब यही चाहते हैं कि उन सभी वचनों को तय समयसीमा के भीतर पूरा किया जाए ताकि पूर्व उग्रवादियों का भविष्य सुरक्षित हो सके। ग्यारह प्रमुख मांगें सरकार के समक्ष प्रस्तुत किए गए ज्ञापन में कुल ग्यारह सूत्रीय मांगें शामिल हैं, जो पूर्व कैडरों के हितों के साथ-साथ स्थानीय जनजातीय समुदायों के अधिकारों से जुड़ी हुई हैं। सबसे पहली और अहम मांग इन सभी नेताओं और पूर्व कैडरों को तत्काल प्रभाव से पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने की है। इसके अलावा मुख्यधारा में वापसी करने वाले सभी कैडरों की आधिकारिक सूची को स्वीकार करने की बात कही गई है। सूचियों में चार सितंबर के शांति समझौते के त्वरित क्रियान्वयन के साथ-साथ अनुसूचित जनजाति वर्ग की लंबित बैकलॉग रिक्तियों को तुरंत भरे जाने का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है। आत्मसमर्पण कर चुके सदस्यों पर दर्ज पुराने पुलिस मुकदमों को बिना शर्त वापस लिया जाना भी इनकी प्राथमिक सूची में शामिल है। विकास के मोर्चे पर, सामाजिक-आर्थिक विकास पैकेज के तहत विभिन्न परियोजनाओं को फौरन धरातल पर उतारने की मांग रखी गई है, जिसमें व्यक्तिगत और निजी भूमि पर प्रस्तावित प्रोजेक्ट भी शामिल हैं। टिपरासा समुदाय की जमीनों और उनके पारंपरिक भूमि अधिकारों की रक्षा के लिए एक विशेष कानूनी व्यवस्था बनाने की पुरजोर मांग की गई है। स्वायत्त परिषद और भाषा के अधिकार जनजातीय हितों की रक्षा के लिए एक अलग प्रशासन के गठन की बात भी इन मांगों का हिस्सा है। इसके अलावा कोकबोरोक भाषा के लिए रोमन लिपि को आधिकारिक रूप से अपनाए जाने और उसे लागू करने का आग्रह किया गया है। सभी टिपरासा समुदायों के लिए एक समान प्रथागत कानून लागू करने तथा प्राचीन गांवों के मूल नाम बहाल करने की मांग भी उठाई गई है। संगठन यह भी चाहते हैं कि भूमि अधिग्रहण और जमीन के आवंटन से जुड़े तमाम अधिकार सीधे त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल को सौंपे जाएं। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि इस परिषद को अधिकार मिलने से आदिवासी क्षेत्रों की जमीनों की अनधिकृत खरीद-फरोख्त पर रोक लगेगी और स्थानीय लोगों के हितों की बेहतर सुरक्षा हो सकेगी। लोकतांत्रिक आंदोलन और प्रशासन की चुनौतियां हाईवे पर ब्लॉकेड शुरू होने से पहले ही इन समूहों ने पूरे राज्य में बहत्तर घंटे के बंद का ऐलान कर दिया था। इन सबका एकमात्र उद्देश्य सितंबर के समझौते को अमलीजामा पहनाना है। इन समूहों ने अपने इस कदम को एक शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलन करार दिया है। उनका साफ कहना है कि वे अपने अधिकारों और आने वाली पीढ़ियों के सम्मान के लिए लड़ रहे हैं। दूसरी तरफ, स्थानीय प्रशासन और पुलिस के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यातायात को जल्द से जल्द सामान्य करना और कानून व्यवस्था को नियंत्रित रखना है। अधिकारियों और प्रदर्शनकारियों के बीच बैठकों का दौर जारी है। सातों संगठनों ने दो टूक कह दिया है कि जब तक उनकी मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई नहीं होती, उनका यह प्रतिरोध अभियान यूं ही जारी रहेगा। इसका आप पर असर त्रिपुरा में चल रहे इस बहत्तर घंटे के बंद और हाईवे जाम का सीधा असर आम नागरिकों, यात्रियों और स्थानीय व्यापार पर पड़ रहा है। • भारत में: पूर्वोत्तर राज्यों के बीच सड़क मार्ग से होने वाली आवाजाही और माल ढुलाई पर अस्थायी रोक लग गई है, जिससे लंबी दूरी के ट्रकों और यात्रियों को वैकल्पिक मार्गों का सहारा लेना पड़ रहा है। • त्रिपुरा में: असम-अगरतला राष्ट्रीय राजमार्ग और खोवाई चौमुहानी क्षेत्र में यातायात ठप होने से रोजमर्रा की जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और स्थानीय बाजारों में कामकाज धीमा पड़ गया है। • यात्रियों के लिए: सड़क और रेलवे मार्गों पर अवरोध के कारण यात्रा का समय बढ़ गया है, जिससे सफर करने वाले लोगों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। • कानून व्यवस्था: प्रशासन और पुलिस बल को हाई अलर्ट पर रखा गया है ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके और जल्द से जल्द रास्ता साफ कराया जा सके। सवाल-जवाब 1. त्रिपुरा में किसने और क्यों बंद बुलाया है? त्रिपुरा में आत्मसमर्पण कर चुके सात पूर्व विद्रोही संगठनों ने चार सितंबर के शांति समझौते को लागू करने की मांग को लेकर बहत्तर घंटे का बंद बुलाया है। 2. यह ब्लॉकेड मुख्य रूप से कहां किया गया है? मुख्य ब्लॉकेड असम-अगरतला राष्ट्रीय राजमार्ग पर बरामुरा के चंद्र साधुपाड़ा इलाके में किया गया है, जहां टायर जलाकर रास्ता रोका गया है। 3. इस आंदोलन में कुल कितने संगठन शामिल हैं? इस आंदोलन में एनएलएफटी के विभिन्न गुटों और एटीटीएफ सहित कुल सात पूर्व विद्रोही संगठन और समितियां शामिल हैं। 4. प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग क्या है? उनकी प्रमुख मांगों में चार सितंबर दो हजार चौबीस के त्रिपक्षीय शांति समझौते को लागू करना और पूर्व कैडरों के लिए सुरक्षा व मामले वापस लेना शामिल है। 5. पुलिस और प्रशासन क्या कदम उठा रहे हैं? जिला पुलिस अधीक्षक नमित पाठक सहित कई अधिकारी मौके पर मौजूद हैं और यातायात को सामान्य बनाने के लिए प्रदर्शनकारियों से लगातार बातचीत कर रहे हैं। https://trendkia.com/national/three-day-highway-blockade-cripples-tripura-as-seven-former-militant-groups-launch-major-protest-27642 TrendKia — Har trend, sabse pehle.