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  "type": "article",
  "title": "वोटर फॉर्म 6 में बदलाव पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक, कहा- हमने नहीं दिया आदेश; चुनाव आयोग और केंद्र को भेजा नोटिस",
  "summary": "मतदाता सूची संशोधन और फॉर्म 6 में बदलाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालत ने ऐसे कोई निर्देश नहीं दिए थे। वहीं अदालत ने मुख्य चुनाव आयुक्त के अधिकारों और कार्यशैली को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर चुनाव आयोग तथा केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।",
  "content": "सर्वोच्च न्यायालय ने देश के विभिन्न राज्यों में जारी विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए तय फॉर्म 6 में किए गए विवादास्पद बदलावों से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया है। इस मामले में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि मतदाता सूची से जुड़े नियमों और वैधानिक फॉर्म में किसी भी तरह के फेरबदल के निर्देश अदालत की ओर से जारी नहीं किए गए थे। इसके साथ ही अदालत ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज के तौर-तरीकों, एकतरफा फैसलों के आरोपों और कानूनी सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को लेकर दायर याचिकाओं पर भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) तथा केंद्र सरकार को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।\n\nफॉर्म 6 संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी\nभारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए साफ कहा कि फॉर्म 6 में जो भी संशोधन किए गए हैं, वे अदालत के आदेश पर नहीं हुए हैं। मुख्य न्यायाधीश ने पीठ का रुख स्पष्ट करते हुए दो टूक शब्दों में कहा कि हम यह साफ कर रहे हैं कि फॉर्म 6 में कोई भी बदलाव हमारी तरफ से नहीं किया गया है। कानूनी व्यवस्था के तहत फॉर्म 6 निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 की अनुसूची में शामिल एक वैधानिक प्रारूप है। इसमें किसी भी तरह का संशोधन उचित विधायी प्रक्रिया के माध्यम से ही किया जाना चाहिए, न कि केवल प्रशासनिक आदेशों के जरिए एकतरफा तरीके से इसे बदला जा सकता है।\n\nइस अदालती टिप्पणी के सामने आते ही विपक्षी दलों ने निर्वाचन आयोग के दावों पर सवाल खड़े कर दिए। कांग्रेस पार्टी ने सोशल मीडिया मंच X पर साझा किए गए अपने बयान में आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने 26 सितंबर को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दावा किया था कि फॉर्म 6 में संशोधन सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप किए गए हैं। विपक्षी दल ने कहा कि अब जब शीर्ष अदालत ने खुद स्पष्ट कर दिया है कि उसने किसी भी संशोधित फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी है, तो इससे साबित होता है कि निर्वाचन आयोग देश को गुमराह करने का प्रयास कर रहा था। पार्टी ने आरोप लगाया कि देश भर में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के अधिकार छीने जा रहे हैं और पकड़े जाने पर ऐसी भ्रामक बातें कही जा रही हैं।\n\nयाचिकाकर्ताओं की दलीलें और अदालत की प्रतिक्रिया\nअदालत में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने शुरुआत में टिप्पणी की कि चुनाव आयोग पर लगाए जा रहे आरोप केवल अखबारों की खबरों पर आधारित हैं। इस पर याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने दलील दी कि निर्वाचन आयोग ने स्वयं प्रेस विज्ञप्ति जारी की थी और उन प्रकाशित समाचारों का कोई खंडन नहीं किया था। वरिष्ठ वकील ने 2023 के नए अधिनियम का हवाला देते हुए कहा कि इसके जरिए मुख्य चुनाव आयुक्त को कानूनी कार्रवाई से मिलने वाली छूट का दायरा काफी बढ़ा दिया गया है। उन्होंने चिंता जताई कि संस्था की साख इस कदर गिरी है कि आम नागरिकों में असुरक्षा की भावना पैदा हो रही है। वरिष्ठ वकील का तर्क था कि चुनाव आयोग के भीतर कामकाज के तौर-तरीके भले ही आम सहमति पर आधारित होने चाहिए, लेकिन अंतिम निर्णय बहुमत से लिए जा सकते हैं।\n\nपीठ में शामिल न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने इस बिंदु पर गौर करते हुए टिप्पणी की कि 2023 के अधिनियम की धारा 16 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को जो सुरक्षा दी गई है, वह तो न्यायाधीशों तक को उपलब्ध नहीं है। धारा 16 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त पद छोड़ने के बाद भी कानूनी कार्रवाई से सुरक्षित रहते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने सुनवाई के दौरान आग्रह किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से तुरंत निलंबित किया जाना चाहिए और उनकी जगह बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों को जिम्मेदारी संभालनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में अंतरिम राहत की मांग करते हुए कहा कि यदि तुरंत कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति बेकाबू हो जाएगी। उन्होंने पीठ से अनुरोध किया कि जब तक सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर अंतिम फैसला नहीं सुनाता, तब तक निर्वाचन आयोग के भीतर सभी निर्णय केवल सर्वसम्मति से लेने का आदेश दिया जाए ताकि मुख्य चुनाव आयुक्त कोई भी एकतरफा फैसला न ले सकें।\n\nहालांकि, न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि याचिकाएं संविधान की कार्यप्रणाली को ध्यान में रखकर दायर की जानी चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि क्या अदालत सभी आदेशों को पहले से ही एकतरफा मानकर व्यवस्था को उलट सकती है। मुख्य न्यायाधीश ने रिकॉर्ड की जांच करने की बात कही और अदालत ने निर्वाचन आयोग तथा केंद्र को नोटिस जारी किया, लेकिन याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। जब अदालत की ओर से फैसलों को वापस लेने के अधिकारों का जिक्र आया, तो वरिष्ठ वकील ने सवाल उठाया कि चुनाव संपन्न हो जाने के बाद क्या सुप्रीम कोर्ट उन्हें वापस ले सकता है।\n\n13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाने की जांच की मांग\nशीर्ष अदालत ने इसी विषय से जुड़ी एक दूसरी याचिका पर भी सुनवाई की, जिसे अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दायर किया था। इस याचिका में मांग की गई है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र उच्चाधिकार प्राप्त न्यायिक जांच आयोग या विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया जाए। याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि जांच का दायरा निर्वाचन आयोग के पूरे डेटाबेस के ऑडिट तक विस्तृत होना चाहिए। साथ ही यह पड़ताल की जानी चाहिए कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की आड़ में किन संस्थागत परिस्थितियों के तहत 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए।\n\nश्री त्रिपाठी की ओर से अदालत में दलील पेश करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त के कदमों को कम से कम पक्षपातपूर्ण तो कहा ही जाना चाहिए। उन्होंने गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटे गए हैं। उन्होंने कहा कि देश के नागरिक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के माहौल में बड़े हुए हैं, लेकिन मौजूदा हालात वैसे नहीं रहे हैं। याचिका में यह मांग भी उठाई गई कि गंभीर आरोपों के मद्देनजर ज्ञानेश कुमार को किसी भी वैधानिक या संवैधानिक सुरक्षा से वंचित किया जाना चाहिए और कानून के तहत उन पर एक सामान्य आरोपी की तरह पुलिस जांच, सबूत जुटाने और नियमित अदालती मुकदमे की प्रक्रिया चलाई जानी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने इस दूसरी याचिका को भी पहले वाली याचिका के साथ संलग्न कर दिया।\n\nकांग्रेस के वरिष्ठ नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त पर हमला बोलते हुए कहा कि ज्ञानेश कुमार ने पूरी तरह से गैरकानूनी तरीके से काम किया है और चुनाव आयुक्तों के अधिकारों से जुड़े संसदीय कानून का उल्लंघन किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त अपनी पक्षपातपूर्ण नीतियों के जरिए किसी को गैरकानूनी ढंग से चुनाव जिताने में मदद कर रहे थे। उन्होंने खुलासा किया कि पिछले 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया से जुड़े निर्णयों और आदेशों पर कम से कम 14 बार लिखित रूप में आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराई थी। दोनों आयुक्तों का कहना था कि ये आदेश उनकी जानकारी या सिफारिश के बिना ही जारी कर दिए गए थे।\n\nसड़क पर उतरा विपक्ष और तीन प्रमुख मांगें\nसोमवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के सामने अपनी पार्टी की तीन गैर-समझौतावादी मांगें रखीं। उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का तत्काल इस्तीफा लिया जाए, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की पूरी प्रक्रिया को तत्काल रद्द किया जाए और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM के बजाय मतपत्रों (बैलेट पेपर) के जरिए चुनाव कराए जाएं। खरगे ने कहा कि इन तीन मुद्दों को लेकर पूरे देश में कांग्रेस कार्यकर्ता और विपक्षी इंडिया गठबंधन के सहयोगी दल सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देश भर के विभिन्न हिस्सों में इन मुद्दों पर संघर्ष कर रहे नागरिक समाज के प्रतिनिधियों और युवा संगठनों के साथ उनकी पार्टी पूरी मजबूती से खड़ी है। इसके साथ ही खरगे ने दिल्ली में महिला पत्रकारों के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार की भी कड़ी निंदा की।\n\nकांग्रेस संचार विभाग के प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को तुरंत पद छोड़ देना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि शीर्ष स्तर के गैरकानूनी आदेशों को लागू करने की उनकी कार्यशैली ने उन्हें देश के लिए एक बड़ी देनदारी बना दिया है। जयराम रमेश का यह बयान सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की उस टिप्पणी के एक दिन बाद आया, जिसमें उन्होंने कहा था कि करोड़ों भारतीय नागरिकों को मताधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से मनमानी है और संवैधानिक व्यवस्था का नकार है, जिसे किसी भी तर्क से सही नहीं ठहराया जा सकता। कांग्रेस ने यह भी कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के इशारे पर संविधान की मूल भावना के साथ विश्वासघात किया है। विपक्षी दल का मानना है कि चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर सामने आए चौंकाने वाले तथ्यों के बाद अब सुप्रीम कोर्ट के पास इस संस्था में जनता का भरोसा बहाल करने का एक ऐतिहासिक अवसर है।\n\nशिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने सोमवार को कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त को देश का शत्रु करार दिया और आरोप लगाया कि विपक्षी दलों के व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद वे भूमिगत हो गए हैं। राउत ने कहा कि जिन राज्यों में चुनाव आयोग ने सत्तारूढ़ दल की मदद की और विपक्षी सांसदों के साथ अन्याय हुआ, आयोग को उनसे मुलाकात करनी चाहिए। उन्होंने घोषणा की कि सभी विपक्षी सांसद मंगलवार को नई दिल्ली स्थित भारत निर्वाचन आयोग के कार्यालय तक विरोध मार्च निकालेंगे। इसके अलावा दिल्ली कांग्रेस ने घोषणा की कि राजधानी में इंडिया गठबंधन के घटक दल 7 अक्टूबर को कश्मीरी गेट स्थित दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी अशोक कुमार के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन करेंगे।\n\nछात्रों का सांकेतिक प्रदर्शन और जंतर मंतर पर विवाद\nमुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और गिरफ्तारी की मांग को लेकर नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) ने नई दिल्ली के रायसीना रोड स्थित अपने मुख्यालय पर एक अनूठा सांकेतिक विरोध प्रदर्शन किया। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने सफेद चादरें ओढ़कर खुद को शवों के रूप में प्रदर्शित किया और वोट चोरी के गंभीर आरोप लगाए। प्रदर्शनकारी छात्रों ने तख्तियां थाम रखी थीं, जिन पर नारे लिखे थे कि वोट की चोरी नहीं चलेगी, जनता की आवाज नहीं दबेगी। जाखड़ ने कहा कि यह प्रदर्शन चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता को बचाने और निर्वाचन आयोग की गिरती साख को रेखांकित करने के लिए किया गया है। दूसरी ओर, जादवपुर विश्वविद्यालय में आइसा (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने पश्चिम बंगाल और पूरे देश में मतदाताओं के अधिकारों से जुड़े संकट पर छात्रों को संबोधित किया।\n\nराष्ट्रीय राजधानी में प्रदर्शनों को लेकर पुलिस की सख्ती का मामला भी सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को संकेत दिया कि वह उस याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करेगा जिसमें आरोप लगाया गया है कि दिल्ली पुलिस मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों और जंतर मंतर तक निकाले जाने वाले मार्चों को रोक रही है। याचिका में अदालत से निर्देश देने की मांग की गई है ताकि नागरिकों को जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराने की अनुमति मिल सके। राजधानी में रविवार को भी विरोध प्रदर्शन के तीसरे दिन करीब 500 लोगों को हिरासत में लिया गया था, जबकि मुंबई में ठाकरे परिवार के नेतृत्व में बड़ा विरोध मार्च निकाला गया था।\n\nपत्रकारों से बदसलूकी के आरोप और यूपी सीएम का बयान\nराजधानी में एक महिला पत्रकार के साथ कथित दुर्व्यवहार का मामला भी तूल पकड़ चुका है। एक महिला पत्रकार, जिसने एसीपी विवेक भगत पर विरोध प्रदर्शन की रिपोर्टिंग के दौरान यौन उत्पीड़न और हाथापाई करने का आरोप लगाया था, उसे सोमवार सुबह दोबारा हिरासत में लेकर दिल्ली कैंट पुलिस थाने ले जाया गया। इस घटना के विरोध में स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता संसद मार्ग थाने के बाहर लगातार दूसरी रात धरने पर बैठे रहे और आरोपी पुलिस अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की। सीजेपी की कानूनी प्रमुख रत्ना सिंह ने बताया कि हिरासत में ली गई महिलाओं ने पुलिस द्वारा मारपीट किए जाने की जानकारी दी है और हिरासत में मौजूद दो लोगों की कथित तौर पर बर्बर पिटाई की गई है। इसके चलते सोमवार को संसद मार्ग पुलिस स्टेशन के बाहर प्रदर्शन कर रहे लोगों को भी पुलिस ने हिरासत में लिया।\n\nदूसरी तरफ, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के खिलाफ हो रहे राष्ट्रव्यापी विरोध के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस प्रक्रिया का पुरजोर बचाव किया है। सोमवार को सोशल मीडिया मंच X पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि मतदाता सूची में अवैध रूप से शामिल किए गए अपात्र नामों की पहचान करना और उन्हें नियमों के तहत बाहर निकालना भारत की सुरक्षा, एकता और अखंडता के लिए बेहद आवश्यक है। मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत सदियों से लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षक रहा है और यह संशोधन अभियान देश की लोकतांत्रिक विरासत को और अधिक मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। उन्होंने रेखांकित किया कि मृत व्यक्तियों, स्थायी रूप से पलायन कर चुके लोगों और दोहरे नामों का सत्यापन करना व्यवस्था की पारदर्शिता के लिए जरूरी है। साथ ही उन्होंने 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके सभी युवाओं से मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाने की अपील की।\n\nइसका आप पर असर\nमतदाता पंजीकरण नियमों और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट के रुख से आम नागरिकों के वोटिंग अधिकारों और कानूनी प्रक्रिया पर सीधा असर पड़ेगा।\n\n• नए मतदाताओं के लिए: फॉर्म 6 के जरिए नाम दर्ज कराने वाले युवाओं के आवेदनों पर कानूनी और प्रशासनिक स्पष्टता जरूरी होगी। मतदाताओं को अपने आवेदन की स्थिति और आवश्यक दस्तावेजों की पुष्टि चुनाव आयोग के पोर्टल पर दोबारा जांचनी चाहिए।\n• मतदाता सूची में नाम की पुष्टि: देश भर के 30 राज्यों में नामों के सत्यापन और हटाए जाने की प्रक्रिया के बीच नागरिकों को मतदाता सूची में अपनी प्रविष्टि देखनी होगी। यदि किसी वैध नागरिक का नाम सूची से हटा है, तो उसे समय रहते पुनर्विचार या अपील के लिए कदम उठाने होंगे।\n• नागरिक अधिकारों और विरोध प्रदर्शन: दिल्ली में जंतर मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की अनुमति से जुड़ा अदालती निर्णय सार्वजनिक सभाओं के अधिकार को प्रभावित करेगा। इससे शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्र संगठनों और कार्यकर्ताओं को सुरक्षा व स्पष्ट नियम मिल सकेंगे।\n• राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव: आयोग के कामकाज में सर्वसम्मति और न्यायिक निगरानी की मांग से चुनावी प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर असर पड़ेगा। इससे आगामी चुनावों में प्रशासनिक जवाबदेही और मतदाताओं के भरोसे से जुड़े मानक तय होंगे।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता पंजीकरण फॉर्म 6 पर क्या स्पष्टीकरण दिया?\nमुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ कहा कि फॉर्म 6 में किसी भी तरह के बदलाव अदालत के निर्देशों पर नहीं किए गए हैं।\n\n2. सुप्रीम कोर्ट ने किन पक्षों को नोटिस जारी किया है?\nअदालत ने मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली और वैधानिक सुरक्षा को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर भारतीय निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है।\n\n3. कांग्रेस पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर क्या मांगें रखी हैं?\nकांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को रद्द करने और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की है।\n\n4. याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने अदालत से क्या राहत मांगी है?\nयाचिका में 13 करोड़ नाम हटाए जाने की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग या एसआईटी गठित करने और डेटाबेस के ऑडिट की मांग की गई है।\n\n5. 2023 के अधिनियम की धारा 16 पर अदालत में क्या चर्चा हुई?\nन्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने रेखांकित किया कि धारा 16 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को पद छोड़ने के बाद भी कानूनी कार्रवाई से ऐसी सुरक्षा मिलती है, जो जजों तक को हासिल नहीं है।\n\n6. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मतदाता सूची पुनरीक्षण पर क्या कहा?\nमुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि मतदाता सूची से अपात्र और फर्जी नामों को हटाना देश की सुरक्षा, एकता और लोकतांत्रिक शुचिता के लिए आवश्यक है।",
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  "category": "भारत",
  "publishedAt": "2026-10-07",
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