# ट्रेन में तेज शोर और अनियंत्रित बर्ताव पर शिवश्री स्कंदप्रसाद ने जताई चिंता, पब्लिक स्पेस में सिविक सेंस पर उठाए सवाल

> बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या की पत्नी और संगीतकार शिवश्री स्कंदप्रसाद ने रेल यात्रा के दौरान यात्रियों के तेज शोर और सिविक सेंस की कमी पर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि पांच घंटे के सफर में बड़े समूह के हंगामे और टीटीई के ढुलमुल रवैये से अन्य यात्रियों को भारी असुविधा झेलनी पड़ी।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-09-24 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/trena-men-teja-shora-aura-aniyntrita-bartava-para-shivashree-skandaprasad-ne-jatai-chinta-pablika-spesa-men-sivika-sensa-para-utha-37762 · **Language:** Hindi
**Tags:** शिवश्री स्कंदप्रसाद, तेजस्वी सूर्या, भारतीय रेल, सिविक सेंस, ट्रेन यात्रा, पब्लिक स्पेस

सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते वक्त दूसरों की निजता और शांति का ख्याल रखना एक बुनियादी नागरिक कर्तव्य माना जाता है। इसी विषय पर मशहूर संगीतकार और बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या की पत्नी शिवश्री स्कंदप्रसाद ने रेल यात्रा के दौरान सामने आए अपने एक बेहद असहज अनुभव को साझा किया है। करीब पांच घंटे लंबे इस सफर में उन्हें सहयात्रियों के अनियंत्रित शोर और गैरजिम्मेदाराना व्यवहार का सामना करना पड़ा। उन्होंने इस पूरे प्रकरण को रेखांकित करते हुए कहा कि एक समाज के तौर पर हम सभी बुनियादी नागरिक बोध यानी सिविक सेंस के मामले में पीछे छूट रहे हैं।

## कोच में लगातार हंगामे से परेशान हुए अन्य मुसाफिर
शिवश्री स्कंदप्रसाद के अनुसार, वह जिस रेल कोच में यात्रा कर रही थीं, उसमें कुल 56 सीटें थीं। उस डिब्बे में करीब 40 मध्यम आयु वर्ग के लोग एक बड़े समूह में सफर कर रहे थे। किसी लंबी यात्रा की शुरुआत में दोस्तों या परिजनों के बड़े दल में उत्साह होना स्वाभाविक है, लेकिन समस्या तब गंभीर हो गई जब यह समूह लगातार पांच घंटे तक बेहद तेज आवाज में बातें और हंसी-मजाक करता रहा। उनकी आवाज इतनी ज्यादा थी कि पूरे डिब्बे का माहौल अशांत हो गया और बाकी यात्रियों का सफर करना दूभर हो गया।

उन्होंने कहा कि एक कलाकार के रूप में अक्सर मन में कई तरह के रचनात्मक विचार चलते रहते हैं, जिसके लिए मानसिक शांति और सुकून की आवश्यकता होती है। मगर सार्वजनिक जगहों पर लोग दूसरों के निजी दायरे और अधिकारों का बिल्कुल ध्यान नहीं रखते। देश में यह एक अघोषित नियम सा बन गया है कि अगर किसी सार्वजनिक वाहन में कोई बड़ा समूह हंगामा कर रहा हो, तो उस समूह से बाहर के बाकी बचे 16 यात्रियों को मजबूरी में सिर्फ परेशानी झेलनी पड़ती है, क्योंकि कोई भी उन्हें टोकने या रोकने का साहस नहीं जुटा पाता।

## सीट बदलने की कोशिश और टीटीई का हस्तक्षेप
लगातार हो रहे शोरगुल से तंग आकर उन्होंने टिकट चेकिंग स्टाफ यानी टीटीई से मदद मांगी। उन्होंने टीटीई से आग्रह किया कि यदि संभव हो तो उन्हें किसी दूसरे शांत कोच में सीट आवंटित कर दी जाए। टीटीई ने अन्य डिब्बों में जगह तलाशने का प्रयास किया, लेकिन पूरी ट्रेन खचाखच भरी होने के कारण कोई विकल्प उपलब्ध नहीं था। इस वजह से उन्हें उसी डिब्बे में किसी अन्य सीट पर बैठकर सफर पूरा करने के लिए विवश होना पड़ा।

कुछ समय बाद उस दल में से करीब 8 यात्रियों ने अचानक यूएनओ ताश का खेल खेलना शुरू कर दिया, जिससे शोर और अधिक बढ़ गया। इसके बाद जब दोबारा टीटीई का ध्यान इस समस्या की ओर आकर्षित कराया गया, तो रेलकर्मी ने उन यात्रियों से खेल रोकने को कहा। शुरुआत में यात्रियों ने उस निर्देश को मानकर खेल बंद कर दिया, मगर इसके तुरंत बाद जो हुआ उसने स्थिति को और निराशाजनक बना दिया।

## गंभीरता बरतने के बजाय मजाक में उड़ाया गया नियम
कुछ ही पलों में टीटीई वहां दोबारा पहुंचे और उन यात्रियों से कन्नड़ भाषा में हल्के-फुल्के अंदाज में कहने लगे कि वे इतना शोर क्यों मचा रहे हैं। टीटीई के इस दोस्ताना रुख को देखकर वह समूह जोर-जोर से हंसने लगा और उसने टीटीई को भी अपने साथ खेल में शामिल होने का न्योता दे दिया। समस्या का समाधान कराने के बजाय रेल अधिकारी द्वारा मामले को इस तरह हंसी-मजाक में उड़ाए जाने से नियमों के पालन की उम्मीद पूरी तरह खत्म हो गई।

शिवश्री स्कंदप्रसाद ने कहा कि यह मसला किसी खेल में हारने या जीतने का बिल्कुल नहीं है, बल्कि सच्चाई यह है कि भारतीय होने के नाते हम सभी सार्वजनिक शिष्टाचार की कसौटी पर विफल रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि एक जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में हम सार्वजनिक स्थानों पर शालीन और मर्यादित आचरण करना कब शुरू करेंगे।

## इसका आप पर असर
ट्रेनों और सार्वजनिक परिवहन में सहयात्रियों के गैरजिम्मेदाराना व्यवहार तथा शोरगुल से आम यात्रियों के मानसिक सुकून और सफर के बुनियादी अधिकारों पर सीधा असर पड़ता है।

- **यात्रियों के लिए:** ट्रेनों में सफर के दौरान नियमों का पालन करना हर मुसाफिर की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है। यात्रा के समय मोबाइल पर तेज आवाज में संगीत बजाने या समूह में अनावश्यक तेज शोर मचाने से बचना चाहिए ताकि अन्य लोगों को परेशानी न हो।
- **शिकायत निवारण:** यदि सहयात्री समझाने के बाद भी उपद्रव या तेज आवाज जारी रखें, तो आप रेल मदद ऐप अथवा 139 हेल्पलाइन नंबर पर सीधे शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इससे ऑन-ड्यूटी टिकट स्टाफ और आरपीएफ को तुरंत कार्रवाई के लिए निर्देशित किया जाता है।
- **रेलवे कर्मचारियों की भूमिका:** टीटीई और कोच अटेंडेंट को यात्रियों की शिकायतों को गंभीरता से लेकर नियमों का पालन कराना अनिवार्य होता है। नियमों की अनदेखी करने वाले अशांत यात्रियों पर रेलवे अधिनियम के तहत जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
- **सामूहिक शिष्टाचार:** सार्वजनिक स्थानों पर दूसरों के निजी दायरे और शांति का सम्मान करना एक जागरूक नागरिक का कर्तव्य है। ग्रुप में यात्रा करते समय यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि अपनी मौज-मस्ती से बाकी यात्रियों की यात्रा बाधित न हो।

## ऐसा क्यों हुआ
यह घटना एक 56 सीटों वाले रेल डिब्बे में 40 लोगों के एक बड़े समूह द्वारा बिना किसी रोक-टोक के लगातार पांच घंटे तक तेज आवाज में बातचीत करने और खेल खेलने की वजह से घटी। सार्वजनिक स्थानों पर नागरिक अनुशासन की कमी और कर्मचारियों द्वारा नियमों को कड़ाई से लागू न करने के कारण स्थिति अनियंत्रित बनी रही।

- **समूह की असंवेदनशीलता:** 56 यात्रियों की क्षमता वाले डिब्बे में लगभग 40 लोग एक साथ यात्रा कर रहे थे, जिनका ध्यान केवल अपने मनोरंजन पर था। उन्होंने इस बात की अनदेखी की कि उनके तेज शोर से बाकी 16 सहयात्री गंभीर रूप से परेशान हो रहे थे।
- **स्थान की कमी और लाचारी:** पीड़ित यात्री द्वारा डिब्बा बदलने की मांग करने पर भी टीटीई मदद नहीं कर सका क्योंकि पूरी ट्रेन पूरी तरह आरक्षित थी। ऐसे में सहयात्रियों के पास असहज माहौल में यात्रा जारी रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
- **कर्मचारियों का ढुलमुल रवैया:** टीटीई ने पहले खेल रुकवाया लेकिन बाद में उसी समूह के साथ हंसी-मजाक शुरू कर दिया। कड़े नियम लागू करने के बजाय स्थिति को हल्के में लेने से उपद्रवी यात्रियों को बढ़ावा मिला।

## सवाल-जवाब

### 1. शिवश्री स्कंदप्रसाद ने ट्रेन सफर को लेकर क्या अनुभव साझा किया?
उन्होंने बताया कि पांच घंटे के रेल सफर के दौरान एक बड़े समूह के तेज शोर और हंगामे के कारण उन्हें और अन्य यात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा।

### 2. कोच में कितने यात्री थे और शोर मचाने वाला समूह कितना बड़ा था?
कोच में कुल 56 सीटें थीं, जिनमें से करीब 40 यात्री मध्यम आयु वर्ग के एक ही बड़े समूह से जुड़े हुए थे।

### 3. क्या शिकायत के बाद शिवश्री को दूसरी सीट या कोच मिल सका?
पूरी ट्रेन खचाखच भरी होने के कारण टीटीई उन्हें किसी अन्य कोच में जगह नहीं दिला सका, जिससे उन्हें उसी डिब्बे में रहना पड़ा।

### 4. यात्रियों के समूह ने कौन सा खेल खेलना शुरू किया था?
लगातार तेज बातचीत के बीच उस समूह के करीब 8 लोगों ने यूएनओ ताश का खेल खेलना शुरू कर दिया था।

### 5. टीटीई की भूमिका पर क्या सवाल उठे?
टीटीई ने पहले खेल बंद कराया लेकिन कुछ ही देर बाद वह खुद उस समूह के साथ कन्नड़ में हंसी-मजाक करने लगा, जिससे नियमों का पालन नहीं हो सका।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._