# ट्विशा शर्मा मौत मामला: जानिए अदालत में कैसे साबित होती है मानसिक क्रूरता और क्या कहता है कानून

> मॉडल और अभिनेत्री ट्विशा शर्मा की मौत के मामले में सीबीआई द्वारा चार्जशीट दायर किए जाने के बाद कानूनी गलियारों में मानसिक क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों को साबित करने की प्रक्रिया को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

**Type:** article · **Category:** भारत · **Published:** 2026-08-18 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/national/twisha-sharma-death-case-janie-adalata-men-kaise-sabita-hoti-hai-manasika-krurata-aura-kya-kahata-hai-kanuna-18066 · **Language:** Hindi
**Tags:** ट्विशा शर्मा केस, मानसिक क्रूरता, सीबीआई चार्जशीट, भारतीय न्याय संहिता, घरेलू प्रताड़ना कानून, आत्महत्या के लिए उकसाना

मॉडल और अभिनेत्री ट्विशा शर्मा की मौत के मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई द्वारा चार्जशीट दाखिल किए जाने के बाद से एक पुराना और बेहद गंभीर कानूनी सवाल फिर से देश भर में चर्चा का विषय बन गया है। यह सवाल यह है कि क्या अदालत में मानसिक क्रूरता को विधिवत साबित किया जा सकता है तथा क्या क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों को कानून की कसौटी पर परखा जा सकता है। इस पूरे कानूनी और तथ्यात्मक पहलू को गहराई से समझने के लिए इस दुखद घटना के घटनाक्रम को विस्तार से देखना होगा। ट्विशा शर्मा ने वकील समर्थ सिंह के साथ विवाह किया था और शादी के मात्र पांच महीने बाद ही 12 मई 2026 को वह भोपाल स्थित अपने ससुराल में फंदे से लटकी हुई पाई गईं। चौंकाने वाली बात यह है कि उनकी सास कोई और नहीं बल्कि सेवानिवृत्त जिला जज गिरिबाला सिंह हैं।

मामले की जांच पूरी करने के बाद सीबीआई ने भोपाल की अदालत में अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी है। इस रिपोर्ट में केंद्रीय एजेंसी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि गहन जांच से यह बात सामने आई है कि दोनों आरोपियों ने मृतका के साथ इस हद तक मानसिक क्रूरता की थी कि बेचारी ट्विशा के पास अपनी जीवन लीला समाप्त करने के अलावा और कोई अन्य मार्ग शेष नहीं बचा था। इस चार्जशीट में भारतीय न्याय संहिता यानी बीएनएस की धारा 85 का हवाला दिया गया है जो क्रूरता से संबंधित है, और इसके साथ ही आत्महत्या के लिए उकसाने के जुर्म में धारा 108 जैसे कठोर कानूनी प्रावधानों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है।

इस बीच अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स के प्रतिष्ठित चिकित्सा बोर्ड द्वारा तैयार की गई पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी यह बात साफ हो गई है कि ट्विशा शर्मा की मृत्यु केवल फंदे से लटकने के कारण ही हुई थी। डॉक्टरों को उनके शरीर पर किसी भी प्रकार के शारीरिक हमले या संघर्ष के कोई अन्य निशान नहीं मिले हैं। यह बात ध्यान देने योग्य है कि चार्जशीट में केवल सीबीआई के आरोप और उसके द्वारा जुटाए गए तमाम साक्ष्य शामिल होते हैं, और इसे अदालत का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता है। किसी भी व्यक्ति के दोषी या निर्दोष होने का निर्णय केवल लंबी न्यायिक सुनवाई के बाद ही आता है, जहां दस्तावेजों और बयानों की जिरह होती है और अदालत सभी पहलुओं को परखकर अपना अंतिम आदेश सुनाती है।

 

## भारतीय न्याय प्रणाली के अंतर्गत क्रूरता की परिभाषा

इस पूरे मामले के कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए वकील ध्रुव चौधरी बताते हैं कि पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा किसी महिला के साथ की जाने वाली क्रूरता को पहली बार साल 1986 में तत्कालीन भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धारा 498ए के अंतर्गत एक दंडनीय अपराध के रूप में शामिल किया गया था। इसके बाद जब नया कानून भारतीय न्याय संहिता, 2023 आया तो इसे धारा 85 और धारा 86 के तहत लगभग उसी रूप में सुरक्षित रखा गया। यही कारण है कि देश की अदालतों के पास इस विशिष्ट प्रावधान के दायरे, इसके गहरे अर्थ, इसके आवश्यक तत्वों और इसकी कानूनी सीमाओं को विकसित करने और समझने के लिए लगभग चार दशकों का लंबा समय रहा है।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 के अनुसार, यदि कोई पति या उसके परिवार का कोई रिश्तेदार किसी महिला के साथ क्रूरता करता है तो उसे एक गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इस अपराध के लिए दोषी पाए जाने पर अधिकतम तीन साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान तय किया गया है। इसी उद्देश्य को स्पष्ट करने के लिए धारा 86 में क्रूरता को बहुत ही व्यापक तरीके से परिभाषित किया गया है। इसके तहत किसी भी व्यक्ति द्वारा जान-बूझकर किया गया ऐसा कोई भी व्यवहार शामिल है जिससे किसी महिला को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़े या फिर उसके शरीर, उसके किसी अंग या उसके स्वास्थ्य चाहे वह मानसिक हो या शारीरिक को गंभीर चोट या खतरा पहुंचने की पूरी संभावना पैदा हो जाए। इसके अलावा इसमें किसी महिला से या उससे जुड़े किसी अन्य व्यक्ति से किसी भी प्रकार की संपत्ति या कीमती वस्तु की गैर-कानूनी मांग को पूरा करने के लिए उसे लगातार प्रताड़ित करना या परेशान करना भी शामिल है।

 

## न्यायालयों के पुराने और महत्वपूर्ण फैसले

देश की माननीय अदालतों द्वारा समय-समय पर दिए गए विभिन्न फैसले इस तरह के अपराधों की वास्तविक प्रकृति को समझने में बहुत मददगार साबित होते हैं। ध्रुव चौधरी के अनुसार कुछ ऐसे क्लासिक और ऐतिहासिक न्यायिक उदाहरण मौजूद हैं जो आज के समय में भी पूरी तरह से प्रासंगिक बने हुए हैं। एस. हनुमंत राव बनाम एस. रमानी के चर्चित मामले में अदालत ने बहुत स्पष्ट रूप से माना था कि मानसिक क्रूरता का सीधा और व्यापक मतलब यह होता है कि जब वैवाहिक जीवन में कोई एक पक्ष दूसरे पक्ष को इतना अधिक मानसिक दर्द, पीड़ा या यातना देता है कि पति-पत्नी के बीच का पवित्र रिश्ता पूरी तरह से टूट जाता है और इसके परिणामस्वूप पीड़ित पक्ष के लिए अपराधी पक्ष के साथ आगे जीवन बिताना पूरी तरह से असंभव हो जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो गलत आचरण करने वाले व्यक्ति के साथ सामान्य जीवन जीने की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

एक अन्य महत्वपूर्ण मामले यानी वी. भगत बनाम श्रीमती डी. भगत में अदालत ने यह बात रेखांकित की थी कि यह साबित करना कतई आवश्यक नहीं है कि मानसिक क्रूरता हमेशा ऐसी ही हो जिससे याचिकाकर्ता के शारीरिक स्वास्थ्य को कोई प्रत्यक्ष नुकसान पहुंचे। इस तरह के किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचते समय अदालत को दोनों पक्षों की सामाजिक स्थिति, उनके शिक्षा के स्तर, वे जिस समाज और परिवेश में रहते हैं, और यदि वे पहले से ही अलग रह रहे हैं तो भविष्य में उनके कभी एक साथ रहने की कोई संभावना है या नहीं, इन तमाम तथ्यों और परिस्थितियों को बेहद गंभीरता से ध्यान में रखना चाहिए। एक पारिवारिक मामले में जो कृत्य क्रूरता की श्रेणी में आ सकता है, वही कृत्य किसी अन्य मामले में क्रूरता नहीं भी माना जा सकता है। यह पूरी तरह से प्रत्येक मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

इसके अलावा श्रीमती राज रानी बनाम दिल्ली प्रशासन के मामले में अदालत ने यह स्पष्ट किया था कि धारा 498ए के प्रावधानों के अंतर्गत जब भी क्रूरता के किसी मामले पर विचार किया जाए तो अदालत को यह भली-भांति देखना चाहिए कि लगाए गए आरोप अत्यंत गंभीर प्रकृति के हों और उन्हें बिना किसी उचित संदेह के पूरी तरह से साबित किया जाना अनिवार्य है। इसी प्रकार सुशील कुमार शर्मा बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक मुकदमे में न्यायालय ने आईपीसी की धारा 306 और धारा 498ए के बीच के अंतर को बहुत बारीकी से समझाया था। कोर्ट ने कहा था कि धारा 498ए के तहत पति या उसके परिजनों द्वारा की जाने वाली क्रूरता महिला को आत्महत्या जैसे चरम कदम उठाने के लिए विवश करती है, जबकि धारा 306 मुख्य रूप से आत्महत्या के लिए उकसाने और उसके पीछे के आपराधिक इरादे से जुड़ी होती है। इसलिए इन दोनों कानूनी प्रावधानों को लागू करते समय आरोपी के मूल इरादे में एक स्पष्ट अंतर होता है। इसके अतिरिक्त गिरधर शंकर तावड़े बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में भी अदालत ने यह दोहराया था कि क्रूरता का अर्थ वही होना चाहिए जो कानून में निर्धारित है और इसमें एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को निरंतर प्रताड़ित किए जाने का एक लंबा सिलसिला शामिल होता है।

 

## मानसिक क्रूरता को प्रमाणित करने के मुख्य आधार

चूंकि वैवाहिक जीवन अत्यंत निजी और घरेलू दायरों में होता है और शादी के भीतर होने वाली अधिकांश घटनाएं घर की चारदीवारी के अंदर बाहरी दुनिया की नजरों से दूर घटित होती हैं, इसलिए वकील ध्रुव चौधरी का यह कहना है कि मानसिक क्रूरता को हमेशा किसी प्रत्यक्ष गवाह के बयानों के माध्यम से साबित नहीं किया जा सकता है। इस तरह के मामलों में क्रूरता को आमतौर पर मौखिक बयानों, विभिन्न प्रकार के दस्तावेजों, चिकित्सीय रिकॉर्ड यानी मेडिकल रिपोर्ट, डिजिटल बातचीत और आसपास की संपूर्ण परिस्थितियों के मिले-जुले असर पर गौर करके साबित किया जाता है। व्हाट्सएप पर किए गए चैट संदेश, इलेक्ट्रॉनिक ईमेल, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की बातचीत, वॉयस नोट्स और कॉल रिकॉर्डिंग जैसी चीजें अक्सर धमकियों, अपमानजनक टिप्पणियों, बेइज्जती, चरित्र पर लांछन लगाने, आर्थिक दबाव डालने, गैर-कानूनी मांगों को थोपने और पीड़ित व्यक्ति को परिवार तथा समाज से अलग-थलग करने या बार-बार मानसिक रूप से परेशान करने के अहम सबूत बन जाती हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. ट्विशा शर्मा मौत मामले में चार्जशीट किसने दाखिल की है?
इस मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई ने भोपाल की अदालत में अपनी अंतिम चार्जशीट दाखिल की है।

### 2. ट्विशा शर्मा की मौत किस तारीख को और कहां हुई थी?
ट्विशा शर्मा की मौत 12 मई 2026 को भोपाल स्थित उनके ससुराल में हुई थी जहां वह फंदे से लटकी पाई गई थीं।

### 3. सीबीआई चार्जशीट में किन कानूनी धाराओं का जिक्र किया गया है?
चार्जशीट में क्रूरता के लिए भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 और आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए धारा 108 का उल्लेख किया गया है।

### 4. एम्स की मेडिकल बोर्ड रिपोर्ट के अनुसार मौत का कारण क्या था?
एम्स के मेडिकल बोर्ड ने पुष्टि की कि ट्विशा शर्मा की मौत फंदे से लटकने के कारण हुई थी और शरीर पर संघर्ष के कोई निशान नहीं थे।

### 5. भारतीय कानून में पति द्वारा क्रूरता को पहली बार किस धारा के तहत शामिल किया गया था?
पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता को पहली बार 1986 में भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत दंडनीय अपराध बनाया गया था।

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