संघ लोक सेवा आयोग ने पूरे किए 100 वर्ष, औपनिवेशिक दौर के पब्लिक सर्विस कमीशन से आधुनिक परीक्षा प्रणाली तक का सफर 1 अक्टूबर 1926 को स्थापित संघ लोक सेवा आयोग ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं। दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई प्रमुख हस्तियों ने शिरकत की। भारत की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने अपनी स्थापना के 100 गौरवशाली वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस ऐतिहासिक उपलब्धि का उत्सव मनाने के लिए नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में एक भव्य शताब्दी समारोह आयोजित हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित देश के अनेक प्रमुख गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। औपनिवेशिक काल में अधिकारियों के चयन के सीमित दायरे से निकलकर आज यह संस्था भारत के दूरदराज और सामान्य परिवारों के युवाओं की प्रशासनिक आकांक्षाओं को साकार करने का प्रमुख माध्यम बन चुकी है। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के शासन की स्थिरता और सुदृढ़ता काफी हद तक उसकी चयन प्रणाली की शुचिता पर टिकी होती है, और इस कसौटी पर आयोग ने एक सदी से अपनी साख को लगातार मजबूत बनाए रखा है। ली कमीशन की अनुशंसा से संवैधानिक दर्जे तक का सफर इस प्रतिष्ठित भर्ती संस्थान की ऐतिहासिक जड़ें ब्रिटिश भारत के दौर से जुड़ी हुई हैं। वर्ष 1924 में गठित ली कमीशन की सिफारिशों के फलस्वरूप देश के भीतर एक औपचारिक एवं संवैधानिक पब्लिक सर्विस कमीशन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ था। इसके उपरांत 1 अक्टूबर 1926 को भारत के पहले पब्लिक सर्विस कमीशन की विधिवत शुरुआत की गई। उस समय इस इकाई का मुख्य लक्ष्य ब्रिटिश शासन के प्रशासनिक कार्यों के सुचारू संचालन के लिए अधिकारियों को चुनना था। जब 26 जनवरी 1950 को स्वतंत्र भारत का संविधान लागू हुआ, तब इस निकाय को संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के रूप में औपचारिक संवैधानिक स्वायत्तता और प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। स्वतंत्रता के बाद से आयोग ने बिना किसी राजनीतिक दबाव के अपने चयन कर्तव्यों का निष्पक्ष निर्वहन किया है। आईसीएस से व्यापक भर्ती तंत्र का विस्तार प्रारंभिक दौर में इस सेवा को इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस) के नाम से जाना जाता था, जिसमें भारतीयों के लिए प्रवेश पाना बेहद कठिन माना जाता था। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि वर्ष 1863 में रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर आईसीएस परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले प्रथम भारतीय बने थे। आजादी मिलने के बाद पूरी व्यवस्था का लोकतंत्रीकरण किया गया, जिससे योग्यता के आधार पर हर पृष्ठभूमि के अभ्यर्थी शीर्ष पदों तक पहुंच सकें। वर्तमान समय में आयोग केवल सिविल सेवा परीक्षा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह हर साल लगभग 250 से अधिक विविध भर्ती परीक्षाओं और साक्षात्कारों का सफल संचालन करता है। इनमें प्रशासनिक सेवाओं के अतिरिक्त इंजीनियरिंग, चिकित्सा और रक्षा सेवाओं से जुड़े महत्वपूर्ण पद शामिल हैं। चयन सूची में महिलाओं की मजबूत भागीदारी विगत दशकों के दौरान यूपीएससी की परीक्षाओं के स्वरूप तथा सफल अभ्यर्थियों के सामाजिक परिदृश्य में व्यापक सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। यदि शुरुआती दौर के सांख्यिकीय आंकड़ों का अध्ययन किया जाए, तो वर्ष 1952 में आयोजित परीक्षा से केवल 3 महिला उम्मीदवारों की ही सिफारिश हो सकी थी। इसके विपरीत हाल के वर्षों में परिणामों की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। वर्ष 2025 के अंतिम परीक्षा परिणाम में 31 प्रतिशत से अधिक पदों पर महिला अभ्यर्थियों ने सफलता अर्जित की, जबकि शीर्ष 25 रैंक में भी बेटियों ने उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज कराई। यह रुझान दर्शाता है कि आयोग की चयन व्यवस्था समाज के प्रत्येक वर्ग को समान धरातल और निष्पक्ष अवसर उपलब्ध कराने में निरंतर सफल रही है। कागजी प्रारूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता का तकनीकी अंगीकरण पारदर्शिता, विश्वसनीयता और परीक्षा की शुचिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से आयोग ने तकनीकी बदलावों को निरंतर अपनाया है। संस्थागत आधुनिकीकरण के क्रम में वर्ष 1978 में कंप्यूटर के प्रयोग की शुरुआत की गई, जिसके पश्चात वर्ष 1989 में ओएमआर उत्तर पुस्तिकाओं की तकनीक को लागू किया गया। इसके बाद वर्ष 2000 के आसपास अभ्यर्थियों की सुगमता के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया को पेश किया गया। समकालीन दौर में सुरक्षा मानकों को सर्वोच्च स्तर पर बनाए रखने के लिए आयोग ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित फेशियल ऑथेंटिकेशन, डिजिटल हेल्पडेस्क और यूनिवर्सल रजिस्ट्रेशन नंबर (यूआरएन) जैसी अत्याधुनिक प्रणालियां लागू की हैं। एक सदी का यह विकासक्रम प्रमाणित करता है कि परंपरा के प्रति निष्ठा और समयोचित आधुनिक तकनीक का समन्वय ही किसी संस्था को दीर्घकालिक विश्वसनीयता प्रदान करता है। इसका आप पर असर संघ लोक सेवा आयोग के 100 वर्ष पूरे होने से देश की प्रशासनिक चयन प्रणाली में निष्पक्षता और डिजिटल आधुनिकता को नई मजबूती मिली है। • प्रतियोगी छात्रों के लिए: भर्ती प्रक्रियाओं में आधुनिक तकनीक और फेशियल ऑथेंटिकेशन के प्रयोग से परीक्षा प्रणाली पूरी तरह सुरक्षित बनी रहेगी। दूरदराज के सामान्य परिवारों के अभ्यर्थियों को बिना किसी पक्षपात के अपनी योग्यता सिद्ध करने का समान अवसर मिलता रहेगा। • महिला अभ्यर्थियों के लिए: सिविल सेवा परिणामों में 31 प्रतिशत से अधिक महिला चयन की निरंतरता लैंगिक समानता को बढ़ावा देती है। यह उपलब्धि सरकारी तंत्र में महिलाओं के प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने वाले पदों पर उनकी भूमिका को और मजबूत करेगी। • प्रशासनिक व्यवस्था पर: सालाना 250 से ज्यादा परीक्षाओं के निष्पक्ष आयोजन से सरकारी विभागों को उच्च गुणवत्ता वाले अधिकारी मिलते हैं। इससे केंद्र और राज्य स्तर पर सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता और जनसमस्याओं के समाधान की गति में सुधार होगा। • डिजिटल सुरक्षा के मामले में: यूनिवर्सल रजिस्ट्रेशन नंबर और एआई टूल्स के इस्तेमाल से आवेदकों का डाटा पूरी तरह सुरक्षित रहेगा। अभ्यर्थियों को आवेदन से लेकर परीक्षा केंद्र तक पारदर्शी और परेशानी मुक्त व्यवस्था का लाभ मिलेगा। ऐसा क्यों हुआ संघ लोक सेवा आयोग का गठन औपनिवेशिक दौर की प्रशासनिक आवश्यकताओं और बाद में लोकतांत्रिक भारत की पारदर्शी भर्ती प्रणाली को स्थापित करने के उद्देश्य से हुआ था। • ली कमीशन की सिफारिशें: वर्ष 1924 में ली कमीशन ने भारत के लिए एक स्वतंत्र पब्लिक सर्विस कमीशन के गठन का स्पष्ट प्रस्ताव दिया था। इसी अनुशंसा के आधार पर 1 अक्टूबर 1926 को पहले आयोग का औपचारिक गठन किया गया ताकि प्रशासनिक मशीनरी को संगठित किया जा सके। • संवैधानिक स्वायत्तता की आवश्यकता: 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद इसे संवैधानिक संस्था का दर्जा प्रदान किया गया। इसका प्रमुख उद्देश्य राजनीतिक हस्तक्षेप से परे रहकर देश के प्रशासनिक अधिकारियों का निष्पक्ष चयन सुनिश्चित करना था। • व्यवस्था का लोकतंत्रीकरण: आईसीएस के सीमित औपनिवेशिक दायरे को तोड़कर आम नागरिकों को प्रशासनिक अवसर देना जरूरी था। आजादी के बाद परीक्षा प्रणाली को सुलभ बनाया गया ताकि देश के हर हिस्से से प्रतिभाशाली युवा शीर्ष पदों पर पहुंच सकें। • तकनीकी आधुनिकता की मांग: समय बीतने के साथ लाखों उम्मीदवारों के प्रबंधन और परीक्षा सुरक्षा के लिए नई प्रणालियों की जरूरत महसूस हुई। इसी कारण 1978 में कंप्यूटर, 1989 में ओएमआर और हाल में एआई आधारित पहचान सत्यापन को अनिवार्य रूप से लागू किया गया। सवाल-जवाब 1. संघ लोक सेवा आयोग की स्थापना कब हुई थी? इस संस्था की स्थापना 1 अक्टूबर 1926 को पहले पब्लिक सर्विस कमीशन के रूप में हुई थी, जिसे 26 जनवरी 1950 को संवैधानिक दर्जा मिला। 2. यूपीएससी का शताब्दी समारोह कहां आयोजित किया गया? आयोग के 100 वर्ष पूरे होने पर नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में भव्य शताब्दी समारोह आयोजित किया गया। 3. आईसीएस परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले प्रथम भारतीय कौन थे? साल 1863 में सत्येंद्रनाथ टैगोर आईसीएस परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले पहले भारतीय बने थे। 4. आयोग की स्थापना किस आयोग की अनुशंसा पर की गई थी? साल 1924 में आई ली कमीशन की सिफारिशों के आधार पर देश में पहले पब्लिक सर्विस कमीशन का गठन किया गया था। 5. यूपीएससी सालाना कितनी भर्ती परीक्षाओं और साक्षात्कारों का संचालन करता है? आयोग प्रतिवर्ष सिविल, रक्षा, इंजीनियरिंग और मेडिकल सेवाओं से जुड़ी 250 से अधिक भर्ती परीक्षाओं और साक्षात्कारों का आयोजन करता है। 6. साल 2025 की सिविल सेवा परीक्षा में महिलाओं का प्रदर्शन कैसा रहा? वर्ष 2025 के अंतिम परिणाम में 31 प्रतिशत से अधिक पदों पर महिलाओं का चयन हुआ और टॉप 25 रैंक में भी वे शामिल रहीं। 7. यूपीएससी ने हाल के वर्षों में कौन सी आधुनिक तकनीकें अपनाई हैं? आयोग ने परीक्षा सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए एआई आधारित फेशियल ऑथेंटिकेशन, डिजिटल हेल्पडेस्क और यूनिवर्सल रजिस्ट्रेशन नंबर तकनीक अपनाई है। प्रेरणा और सबक संघ लोक सेवा आयोग का 100 वर्षों का सफर कठिन परिस्थितियों से उबरकर सफलता पाने और व्यवस्था में सुधार लाने की प्रेरणा देता है। • कठिन बाधाओं को तोड़ना: वर्ष 1863 में सत्येंद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश प्रभुत्व वाले बेहद कठिन आईसीएस तंत्र में सफलता हासिल की थी। इससे सीख मिलती है कि दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत से किसी भी कठिन चुनौती और प्रतिकूल व्यवस्था में शीर्ष स्थान प्राप्त किया जा सकता है। • सामाजिक बदलाव का नेतृत्व: वर्ष 1952 में केवल 3 महिला चयनों से शुरू होकर वर्ष 2025 में 31 प्रतिशत से अधिक चयन का आंकड़ा एक बड़ा संदेश देता है। यह बदलाव साबित करता है कि निरंतर प्रयास और अवसर मिलने पर समाज की रूढ़ियों को तोड़कर आगे बढ़ा जा सकता है। • समय के साथ बदलाव स्वीकारना: आयोग ने पुरानी कागजी प्रणाली से आगे बढ़ते हुए कंप्यूटर, ओएमआर और अब एआई जैसी नई तकनीकों को अपनाया। इससे यह सबक मिलता है कि किसी भी व्यक्ति या संस्था को दीर्घकालिक सफलता के लिए समय की मांग के अनुसार खुद को अपडेट रखना चाहिए। https://trendkia.com/national/union-public-service-commission-ne-pure-kie-100-varsha-aupaniveshika-daura-ke-public-service-commission-se-adhunika-pariksha-prana-41076 TrendKia — Har trend, sabse pehle.