संघ लोक सेवा आयोग के सौ साल में सिर्फ चार महिलाओं ने संभाली शीर्ष कुर्सी, तीन नियुक्तियां 2014 के बाद हुईं संघ लोक सेवा आयोग के शताब्दी वर्ष पर सामने आया कि एक सदी के लंबे इतिहास में केवल चार महिलाएं ही अध्यक्ष पद तक पहुंची हैं, जिनमें से तीन की नियुक्ति 2014 के बाद हुई। भारत की सर्वोच्च नौकरशाही और प्रशासनिक मशीनरी को तैयार करने वाले संघ लोक सेवा आयोग के सौ वर्षों के सफर में एक बेहद अहम पहलू शीर्ष नेतृत्व में महिलाओं की हिस्सेदारी का रहा है। आयोग के शताब्दी वर्ष समारोह के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक महत्वपूर्ण तथ्य रेखांकित किया कि संस्था के पूरे इतिहास में अब तक केवल चार महिलाएं ही अध्यक्ष के पद तक पहुंच सकी हैं। इससे भी अधिक उल्लेखनीय बात यह है कि इन चार में से तीन महिला अध्यक्षों की नियुक्ति साल 2014 के बाद हुई है। यह आंकड़ा इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि देश के सबसे प्रतिष्ठित प्रशासनिक संस्थान में सर्वोच्च निर्णय लेने वाली कुर्सी पर महिला नेतृत्व को हाल के वर्षों में गति मिली है, जबकि आयोग के शुरुआती दशकों में यह पद लगभग पूरी तरह पुरुषों के हाथों में ही रहा। ब्रिटिश दौर से शुरू हुआ सफर और आजादी के बाद का प्रशासनिक ढांचा संघ लोक सेवा आयोग की नींव ब्रिटिश हुकूमत के दौर में वर्ष 1926 में रखी गई थी। उस शुरुआती दौर में भारतीय नागरिकों के लिए इस परीक्षा में शामिल होना और सफलता हासिल करना बेहद कठिन माना जाता था। समय बीतने के साथ देश आजाद हुआ और लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत प्रशासनिक सेवाओं का नया ढांचा खड़ा किया गया। आजादी के बाद से आयोग ने देश को हजारों समर्पित आईएएस, आईपीएस और केंद्रीय सेवा अधिकारी दिए, जिन्होंने राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई। हालांकि, संस्था के शीर्ष पद यानी अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने का अवसर बेहद चुनिंदा वरिष्ठ अधिकारियों को ही मिला। एक सदी के ऐतिहासिक दस्तावेजों का विश्लेषण करने पर यह साफ दिखाई देता है कि इस पद पर पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या बेहद सीमित रही है। इसके बावजूद जिन महिला अधिकारियों ने भी यह दायित्व संभाला, उन्होंने निष्पक्षता और दृढ़ प्रशासनिक सुधारों की गहरी छाप छोड़ी। रोज मिलियन बैथ्यू: पूर्वोत्तर से निकलकर आयोग की पहली महिला अध्यक्ष बनीं आयोग के इतिहास में शीर्ष पद पर पहली बार किसी महिला की ताजपोशी का ऐतिहासिक क्षण वर्ष 1992 में आया। पूर्वोत्तर भारत से आने वाली रोज मिलियन बैथ्यू खारबुली को आयोग की कमान सौंपी गई। उन्होंने 23 सितंबर 1992 को अध्यक्ष का पदभार संभाला और 23 अगस्त 1996 तक इस पद पर अपनी जिम्मेदारियां निभाईं। लगभग चार साल के अपने लंबे कार्यकाल के दौरान उन्होंने संस्था की कार्यप्रणाली में अनुशासन और शुचिता को मजबूती से स्थापित किया। रोज मिलियन बैथ्यू ने प्रतिष्ठित लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर विमेन से अर्थशास्त्र में स्नातक की शिक्षा हासिल की थी। इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र विषय में ही स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। अपनी उच्च शैक्षणिक पृष्ठभूमि और बेदाग प्रशासनिक दक्षता के बल पर उन्होंने मेघालय के साथ-साथ पूरे देश की महिलाओं के लिए एक मिसाल पेश की। उनके पूरे कार्यकाल को आज भी सख्त अनुशासन, पारदर्शिता और पूर्ण निष्पक्षता के लिए जाना जाता है। रजनी राजदान: 2014 के बाद महिला नेतृत्व की नई शुरुआत साल 2014 के बाद हुए प्रशासनिक बदलावों में आयोग के शीर्ष पद पर नियुक्त होने वाली पहली महिला रजनी राजदान थीं। वर्ष 1973 बैच की हरियाणा कैडर की आईएएस अधिकारी रजनी राजदान ने 16 अगस्त 2014 को अध्यक्ष पद की शपथ ली। आयोग की पूर्णकालिक कमान संभालने से पहले वह वर्ष 2008 से ही सदस्य के तौर पर संस्था की विभिन्न चयन समितियों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का अभिन्न हिस्सा थीं। रजनी राजदान का प्रशासनिक करियर बेहद गरिमामय और व्यापक रहा है। उन्होंने केंद्र सरकार के प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग के साथ-साथ पेंशन और पेंशनभोगी कल्याण विभाग में सचिव पद की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई थी। इसके अलावा उन्होंने हरियाणा राज्य सरकार में भी कई महत्वपूर्ण महकमों का नेतृत्व किया। उनकी पहचान एक सख्त और बेहद ईमानदार नौकरशाह के तौर पर रही है। हालांकि अध्यक्ष के तौर पर उनका कार्यकाल कुछ ही महीनों का रहा और वे नवंबर 2014 तक इस पद पर रहीं, लेकिन उन्होंने 2014 के बाद शीर्ष स्तर पर महिला सशक्तिकरण की एक मजबूत नींव रखी। अल्का सिरोही: प्रशासनिक अनुभव और पारदर्शिता की मिसाल मध्य प्रदेश कैडर की 1974 बैच की वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अल्का सिरोही ने भी इस संस्था की कमान पूरी कुशलता से संभाली। उन्हें सितंबर 2016 में संघ लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। इस सर्वोच्च पद पर ताजपोशी से पहले वह भी आयोग की सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं दे रही थीं, जिससे उन्हें संस्थागत कार्यप्रणाली का गहरा अनुभव था। दशकों लंबे अपने प्रशासनिक जीवन में अल्का सिरोही ने केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन के कई बड़े और संवेदनशील मंत्रालयों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। प्रशासनिक गलियारों में उनकी कार्यशैली को अत्यंत पारदर्शी, अनुशासित और नियमबद्ध माना जाता था। उनकी नियुक्ति ने यह साबित किया कि जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाओं के संचालन और संस्थागत निष्पक्षता बनाए रखने में वरिष्ठ महिला अधिकारियों का अनुभव कितना प्रभावी साबित होता है। प्रीति सूदन: संकट काल की कुशल रणनीतिकार और आयोग की तीसरी महिला प्रमुख साल 2024 में देश के प्रशासनिक नेतृत्व में एक बार फिर बड़ा कदम देखने को मिला, जब 1983 बैच की वरिष्ठ आईएएस अधिकारी प्रीति सूदन को आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। हरियाणा की पृष्ठभूमि से आने वाली प्रीति सूदन आंध्र प्रदेश कैडर की अधिकारी रही हैं। वह आयोग के समूचे इतिहास में शीर्ष पद पर बैठने वाली चौथी महिला और वर्ष 2014 के बाद से तीसरी महिला अध्यक्ष बनीं। प्रीति सूदन की शैक्षणिक पृष्ठभूमि वैश्विक स्तर की रही है। उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से उच्च शिक्षा पूरी की। अपने करियर के दौरान उन्होंने भारत सरकार में कई अत्यंत महत्वपूर्ण पदों पर काम किया, जिनमें केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग और रक्षा मंत्रालय शामिल हैं। वर्ष 2020 में फैली वैश्विक महामारी कोविड-19 के विकट दौर में देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीति तैयार करने और समन्वय बैठाने में उनकी मुख्य भूमिका रही। इसके साथ ही केंद्र सरकार की प्रमुख सामाजिक पहलों जैसे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और आयुष्मान भारत योजना को जमीनी स्तर पर अमलीजामा पहनाने में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। सिविल सेवाओं में बदलती भागीदारी और महिलाओं का बढ़ता प्रभाव संघ लोक सेवा आयोग के सौ वर्षों के सफर में महिला अध्यक्षों का यह सफरनामा इस बात का गवाह है कि किस तरह से संस्थागत शीर्ष पर प्रतिनिधित्व का दायरा विस्तृत हुआ है। प्रमुख पूर्णकालिक अध्यक्षों के अलावा विभिन्न प्रशासनिक चरणों और कार्यवाहक भूमिकाओं में भी महिला अधिकारियों की उपस्थिति दर्ज की गई है। वर्ष 2014 के बाद से शासन व्यवस्था के हर स्तर पर लैंगिक समानता और महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को प्रोत्साहित करने पर विशेष बल दिया गया है। एक तरफ जहां आयोग के संचालन मंडल में महिला अधिकारियों की भूमिका अधिक स्पष्ट हुई है, वहीं दूसरी ओर सिविल सेवा परीक्षा में शामिल होने और शीर्ष स्थान हासिल करने वाली छात्राओं की संख्या में भी निरंतर बढ़ोतरी देखी जा रही है। हाल के वर्षों में कई बार परीक्षा के अंतिम परिणामों में महिला अभ्यर्थियों ने शीर्ष स्थान हासिल किए हैं। इस संस्थागत बदलाव और सर्वोच्च पद पर महिला नेतृत्व की मौजूदगी ने पूरे देश की युवा पीढ़ी के लिए एक नई प्रेरणा स्थापित की है। इसका आप पर असर संघ लोक सेवा आयोग के शीर्ष नेतृत्व में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी देश भर के प्रशासनिक ढांचे और अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण संदेश देती है। • राष्ट्रीय स्तर पर: देश की सबसे बड़ी चयन संस्था में महिलाओं की शीर्ष स्तर पर तैनाती प्रशासनिक प्रक्रियाओं में लैंगिक समानता को मजबूत करती है। इससे केंद्र और राज्य सरकारों के नीतिगत निर्णयों में महिलाओं के दृष्टिकोण और अनुभव को बढ़ावा मिलता है। • प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थियों के लिए: सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने वाली लाखों छात्राओं के लिए यह प्रतिनिधित्व एक बड़ा आत्मविश्वास प्रदान करता है। हाल के वर्षों में शीर्ष रैंक हासिल करने वाली छात्राओं के साथ यह संस्थागत बदलाव युवाओं को प्रेरित करता है। • संस्थागत सुधार और विश्वास: आयोग के निष्पक्ष और पारदर्शी संचालन में वरिष्ठ महिला अधिकारियों का रिकॉर्ड अभ्यर्थियों का परीक्षा प्रणाली पर भरोसा बढ़ाता है। इससे परीक्षा संचालन में आधुनिक और संतुलित कार्यप्रणाली को बढ़ावा मिलता है। • भविष्य की प्रशासनिक नीतियां: स्वास्थ्य और कल्याणकारी योजनाओं का अनुभव रखने वाली प्रमुखों की नियुक्ति से चयन प्रक्रियाओं में व्यावहारिक प्रशासनिक समझ को बल मिलता है। यह आने वाले समय में लोक सेवकों के प्रशिक्षण और मूल्यांकन को अधिक जनोन्मुख बनाता है। ऐसा क्यों हुआ संघ लोक सेवा आयोग के 100 साल के इतिहास में महिला अध्यक्षों की संख्या का यह आंकड़ा संस्थागत संरचना और प्रशासनिक बदलावों के कारण सामने आया है। • आरंभिक दशकों में प्रतिनिधित्व की कमी: ब्रिटिश काल में 1926 में स्थापित इस आयोग में शुरुआती दौर में भारतीयों और विशेषकर महिलाओं का प्रवेश अत्यंत दुर्लभ था। आजादी के बाद भी शुरुआती दशकों में उच्च नौकरशाही में महिलाओं की भर्ती संख्या बहुत सीमित थी, जिसके कारण वरिष्ठता सूची में शीर्ष तक पहुंचने के अवसर देरी से मिले। • वरिष्ठता और चयन का ऐतिहासिक पैमाना: आयोग के अध्यक्ष पद के लिए दशकों का लंबा प्रशासनिक अनुभव और सचिव स्तर का सेवाकाल अनिवार्य होता है। 1970 और 1980 के दशक के बैचों की महिला अधिकारियों के वरिष्ठ पदों तक पहुंचने के बाद ही 2014 के उपरांत उनके नाम अध्यक्ष पद के विचार क्षेत्र में प्रमुखता से आए। • 2014 के बाद नीतिगत प्राथमिकता: वर्ष 2014 के बाद प्रशासनिक शीर्ष भूमिकाओं में महिला नेतृत्व को प्रोत्साहित करने की नीति को गति मिली। इसी के चलते पिछले एक दशक में तीन महिला अधिकारियों को आयोग की कमान सौंपी गई। सवाल-जवाब 1. संघ लोक सेवा आयोग के इतिहास में अब तक कुल कितनी महिला अध्यक्ष हुई हैं? आयोग के 100 वर्ष के इतिहास में अब तक केवल चार महिलाएं ही अध्यक्ष पद तक पहुंच पाई हैं। 2. इनमें से कितनी महिला अध्यक्षों की नियुक्ति साल 2014 के बाद हुई है? इन चार में से तीन महिला अध्यक्षों की नियुक्ति वर्ष 2014 के बाद की गई है। 3. आयोग की पहली महिला अध्यक्ष कौन थीं और उनका कार्यकाल कब से कब तक रहा? आयोग की पहली महिला अध्यक्ष रोज मिलियन बैथ्यू थीं, जिन्होंने 23 सितंबर 1992 से 23 अगस्त 1996 तक पदभार संभाला था। 4. साल 2014 के बाद नियुक्त होने वाली पहली महिला अध्यक्ष कौन थीं? साल 2014 के बाद नियुक्त होने वाली पहली महिला अध्यक्ष रजनी राजदान थीं, जिन्होंने 16 अगस्त 2014 को शपथ ली थी। 5. अल्का सिरोही किस कैडर की आईएएस अधिकारी थीं और उन्हें कब अध्यक्ष नियुक्त किया गया? अल्का सिरोही मध्य प्रदेश कैडर की 1974 बैच की आईएएस अधिकारी थीं और उन्हें सितंबर 2016 में अध्यक्ष बनाया गया था। 6. प्रीति सूदन किस वर्ष आयोग की अध्यक्ष नियुक्त हुईं और उनका पिछला मुख्य अनुभव क्या रहा है? प्रीति सूदन को वर्ष 2024 में अध्यक्ष नियुक्त किया गया, और वह कोविड-19 महामारी के दौरान केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव के रूप में मुख्य रणनीतिकार रही हैं। 7. संघ लोक सेवा आयोग की स्थापना किस वर्ष हुई थी? संघ लोक सेवा आयोग की नींव ब्रिटिश शासन के दौरान वर्ष 1926 में रखी गई थी। प्रेरणा और सबक संघ लोक सेवा आयोग की कमान संभालने वाली इन महिला अधिकारियों की जीवन यात्रा निष्ठा और दृढ़ता से सफलता हासिल करने की सीख देती है। • दृढ़ संकल्प और धैर्य: पूर्वोत्तर से निकलकर रोज मिलियन बैथ्यू का आयोग की पहली महिला अध्यक्ष बनना साबित करता है कि प्रतिभा और समर्पण भौगोलिक सीमाओं से परे सफलता दिलाते हैं। युवा इससे यह सीख सकते हैं कि लगन से किसी भी संस्थागत बाधा को पार किया जा सकता है। • सार्वजनिक सेवा में ईमानदारी: रजनी राजदान और अल्का सिरोही का लंबा करियर दिखाता है कि निष्पक्षता और बेदाग छवि से लंबे समय तक संस्थागत गरिमा बनाई रखी जा सकती है। इससे यह प्रेरणा मिलती है कि कार्यस्थल पर नियमबद्धता और पारदर्शिता हमेशा सम्मान दिलाती है। • संकट में समाधान ढूंढना: कोविड काल के दौरान प्रीति सूदन द्वारा स्वास्थ्य नीतियों का प्रबंधन यह दर्शाता है कि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में शांत और रणनीतिक सोच से ही बड़े परिणाम हासिल होते हैं। किसी भी कार्यक्षेत्र में दबाव के बीच प्रभावी फैसले लेना ही नेतृत्व की असली पहचान है। https://trendkia.com/national/upsc-ke-sau-sala-men-sirpha-chara-mahilaon-ne-snbhali-shirsha-kursi-tina-niyuktiyan-2014-ke-bada-huin-41104 TrendKia — Har trend, sabse pehle.